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Showing posts with the label रश्मिरथी

चाहिए

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उसे वैभव नही वैराग्य चाहिए उसे मंहगा चढा़वा नही बस राख चाहिए उसे अमृत पान नही विष पान चाहिए और मुझे तो बस महादेव का साथ चाहिए।

ये स्मृतियां

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ये स्मृतियां सुःखद"ये स्मृतियां " ये स्मृतियां सुःखद या दुःखद! जमीं होती परत दर परत! मन की भित्तियों पर । जैसे सेल्फ पर लगी किताबें ,, खङी रहती हैं अथक!       ✍️"पाम"   इन्हें हिलाना डुलाना होता है,, पङी धूल हटानी होती है। तब ये सज जाती हैं बिल्कुल नई सी,, और आंखों को सुकून दे जाती हैं।  मन की दिवारों की धूलें इतनी आसानी से नहीं जातीं।  पङी रहती हैं किसी कोने में  हमारे व्यक्तित्व को खोखला करते,, दीमक की तरह अन्दर ही अन्दर सबकुछ रूग्ण करते,, जब तलक सब गिर नहीं जाता... भरभराकर,,अचानक!! पर अचानक तो कुछ नहीं होता! दिखता जरूर है। कितना कुछ ढोता है मन... मान,,अपमान,,प्रतिष्ठा,,सम्मान।  सिर्फ नेह के बन्धन नहीं दिखते,, आज अभी जो हमारी मुट्ठी में है नहीं दिखता..        ✍️"पाम " हम देखते रहते बीता कल.. अपने ह्रदय की मिट्टी पर .. राख से कुछ उगाने का प्रयत्न करते! या भविष्य के त्रिशंकु की तरह  कुछ तो अधर में लटकाते रहते! मन के दरवाजे पर चिटकनी लगा कर  कुछ भी सुनना नहीं चाहते! बंद कर पङे रहते  रौशनी अवरूद्ध कर! पर अंधकार में...

वो डरावने सपने - भाग २

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सोनाली के हाथ से चाय का कप छूट गया और फर्श पर पड़ते ही टूट गया | क्या हुआ सोनाली तेरी तबीयत तो ठीक है ना ! हां मां सब ठीक है ये बोल कर वो घर से बाहर चली गई | पीछे से सोनाली कि मां आवाज देते रह गयी | नाश्ता तो कर ले बेटा... तब तक सोनाली स्कूटी स्टार्ट कर के ऑफिस के लिए निकल गई | इधर सोनाली कि मां मधु अपनी सास के पास जाकर रोने लगी | क्या हो गया है मेरी बच्ची को किसकी बुरी नजर लग गयी है ! हे भगवान अब तुम ही हमारी मदद करो |  मधु कि सास शंकुतला देवी ने अपनी बहू को समझाया और जल्दी से तैयार होने के लिए कहा | मधु - हम कहा जा रहे हैं मां ! मधु कि सास - हम ऐसी जगह जा रहे है जहां हमारी समस्या का समाधान होगा |  कुछ ही देर में दोनों एक मंदिर के सामने थे | सोनाली कि मां और दादी शंकुतला देवी अपने शहर चांपा के प्रसिद्ध काली माता के मंदिर में थे | दोनों मंदिर में प्रवेश करके माता के दर्शन करते हैं | दर्शन करने के बाद वहां के परोहित जी से मिलते हैं | प्रणाम परोहित जी!!! मधु और शंकुतला देवी ने एक साथ कहा | परोहित जी - मां काली आपकी सभी मनोंकामना पूर्ण करें | कहिए क्या समस्या लेकर आयी है ...

अंग तस्कर बन गया डॉक्टर-इंसान

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आज कितना बदल गया इंसान। पैसे के खातिर देखो है परेशान।      बेच रहाहै मानव अंगों को इंसान।      डर नहीं लगता देख रहा भगवान। मानव अंगों की तस्करी है करता। ऑपरेशन में अंग निकाला करता।     बेहोशी में मरीजों से खोट करता।     जान बचाने को खेला वह करता। डॉक्टर तो धरती के हैं भगवान। जाने क्यों फिर बनता है शैतान।    कितने करते स्वयं ही हैं अंग दान।    ब्रेन डेड बॉडी  का होता अंग दान। यहाँ तो धोखे से ले लेते हैं जान। पैसे के खातिर बेच रहे हैं ईमान।    मानव अंगों की तस्करी का रैकेट।    कुछ निकृष्ट मिल चलाएं ये रैकेट। हृदय लीवर किडनी का पैकेट। आँख कॉर्निया टिसू का पैकेट।         बना-बना कर बेंच रहे हैं इंसान।         औषधियों में अंग रखते शैतान। मानवता में करते जो अंग दान। जीते जी ही कर वे जाते हैं दान।      अंगों के व्यापार में भारी मुनाफा।      देख-2 तस्करों का हुआ इजाफा। बड़े-2 लोग रुपया भरा लिफाफा। जरूरी अंग खरीदें देके लिफाफा...

तस्करी

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वो ज़माने लद गए, जब मानवता ज़िन्दा थी। अब जीते जी इंसान, किसी काम का नहीं।। बैठें हैं कई आदमख़ोर, तस्करी की कश्ती में। बेच खाते है अंगों को, अमीरी की बस्ती में।। इनको फ़र्क़ नही जीने, या जीते जी मारने वाले से। ये बस दाम लगते है, महँगे खरीदने वाले से।। अस्पतालों के आड़ में, ये व्यापार चलते हैं। किसी की किडनी, लिवर, तो किसी का दिल बेच खाते है।। हज़ारो की कीमत को, ये करोड़ो तक ले जाते हैं। गरीब को हो ज़रूरत, तो खाली हाथ दिखाते हैं।। फ़रेब और चोरो की दुनिया के, ये बादशाह कहलाते है। ऑपरेशन की आड़ में, ये ऑर्गन फेल बताते हैं।। हेरा फ़ेरी अंगों की करते, पैसा खूब कमाते है। बड़े बड़े हस्तियों से मिलकर, ये तस्करी की दुनिया चलाते है।। ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

भुतहा मकान भाग 3 : साक्षात दर्शन

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एक विशेष प्रकार की आवाज सुनकर राजन की नींद खुल गई । आवाज ऐसी आ रही थी जैसे कोई सांप रेंग रहा है । उसने धीरे से अपनी आंखें खोली मगर उसे कुछ दिखाई नहीं दिया । उसे लगा कि उसने डर के मारे आंखें खोली ही नहीं थीं । उसने अपनी दोनों हथेलियों से अपनी थोनों आंखें मसली फिर खोलीं । अभी भी कुछ दिखाई नहीं दिया । राजन सोच में पड़ गया कि आखिर माजरा क्या है ?  राजन के दिमाग में अचानक कौंधा कि वह शायद बिजली बंद करके सोया था । पर उसे याद आया कि वह तो बिजली जली छोड़कर बिसार लेटा था और हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था कि अचानक उसकी आंख लग गई । लेकिन पूरे मकान में ये अंधेरा क्यों है ? शायद लाइट चली गई होगी , राजन के मस्तिष्क में एक क्षण को यह बात आई लेकिन अगले ही पल उसने गर्दन घुमाकर बाहर की ओर देखा तो पता चला कि रोड लाइट जल रही थी । "ये क्या माजरा है" ? राजन को कुछ समझ नहीं आ रहा था । जब दिमाग में भय समाया हुआ हो तो फिर वहां बुद्धि और ज्ञान नहीं रहते हैं । दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है ।  राजन ने सोचा कि वह उठकर लाइट जला दे । क्या पता बंद करके सोया हो ? लेकिन उठना कोई कम जोखिम का काम था क्य...

अंगों का व्यापार

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मानवता की हद सारी यह पार करने लगा  अरे अब तो यह अंगों का व्यापार करने लगा   विद्या बुद्धि बल को शर्मसार करने लगा   मानवहोके मानव का संहार करने लगा   धरती का भगवान मानकर पूजा जिसे है जाता   जीवन उसके हाथ सौंपते  जिससे ना कोई नाता   वह भी जान बचाने में है पूरी जान लगाता   खुशियां देता है सबको तो दुगनी खुशियां पाता   फिर भी कुछ मक्कारों को यह जीवन नहीं है भाता   पैसों का लालच उनसे यह गलत काम करवाता   अंग तस्करों से मिलकर वह दानव फिर बन जाता   अपने कौशल को फिर वह बद नीयति में है लगाता   करते हैं खिलवाड़ जान से जो चंगुल में आता   तब मरीज की जान से उसका रह जाता ना नाता   तस्कर गैंग में शामिल होकर जेबे भारी करने लगा   अरे अब तो यह अंगों का व्यापार करने लगा                      प्रीति मनीष दुबे     .              मण्डला मप्र

वो डरावने सपने

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भयानक अंधेरी रात में एक लड़की बेतहाशा भागे जा रही है , शायद किसी से डर कर भाग रही है । उसने घुटने तक साड़ी पहन रखी है और पैरों में पुराने जमाने की पायजेब पहनी हुई है । पहनावे से किसी कबीले कि जान पढ़ रही है । भागते - भागते अचानक वह किसी मंदिर के प्रांगण में प्रवेश कर आसमान कि तरफ देखकर कहती हैं - तुम मुझे कभी नहीं पा सकते ना इस जन्म में और ना ही किसी और जन्म में .... इतना कह कर वह लड़की मंदिर में बने तालाब में कूद जाती हैं ..... और हमेशा की तरह यह सपना देखते हुए सोनाली डर कर जाग जाती है । सोनाली जब 10 साल की थी तभी से उसे ये डरावने सपने दिखाई देने लगे हैं और अभी तक ये सिलसिला चल रहा है । डर कर अचानक उठने के कारण सोनाली कि सांसें तेज चलने लगी थी , तभी अचानक सोनाली की मां कि आवाज आई -  सोनाली उठो बेटा ऑफिस नहीं जाना क्या ? जाना है मां बस थोड़ी देर में आई ... ये कह कर सोनाली फ्रेस होने बाथरूम में जाने लगी | करीब आधे घंटे में तैयार हो कर सोनाली रूम से बाहर आई |  अभी सोफे पर बैठ कर वो चाय पी रही थी और उस सपने के बारे में सोच ही रही थी कि मां ने कहा - कोई परेशानी है क्या बेट...

ईश्वर कृपा,रुचि,कर्म,भाग्य से सब बनता है

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प्रभु ने मानव योनि में ये तन देकर उसमें भर दी है सांसें। सबकी नपी तुली हुई है गिन कर लिखी गई हैं यह सांसें। उससे ज्यादा नहींहै चलती किसी भी प्राणी की ये सांसे। इंसा तभी ये रोये गाये हँसे हँसाये बोले छींके पादे खाँसे। पुण्य प्रताप ये कुछ मिलता है मात-पिता पूर्वजों का भी। पूर्व जन्म के कर्मो का भी फल मिलता है प्रारब्ध का भी। निज रुचि कर्म धर्म भाग्य से ही जीवन में कुछ बनता है। डॉक्टर इंजीनियर बैरिस्टर वैज्ञानिक सभी कुछ बनता है। आई ए एस,आई पी एस,पीसीएस,पीईएस भी बनता है। आई एफ एस,आई आर एस,आई ई एस,कभी बनता है। विभागी अफसर,सेनाओं में सर्वोच्च अधिकारी बनता है। जल थल वायु सभी सेवाओं में 1 उच्चाधिकारी बनता है। चोर उचक्का कतली डाकू गुंडा मवाली लोफर बनता है। भूमाफिया खनन माफिया  डॉन ब्लैक मार्केटर बनता है। मजदूर मिस्त्री रेहड़ीवाला रिक्शा चालक कोई बनता है। पंचरवाला सब्जी वाला धोबी नाई मोची कोई बनता है। जादूगर मदारी नर्तक गायक कौवाल बाजीगर बनता है। वाद्य यंत्रों के वादक कवि लेखक साहित्यकार बनता है। गीतकार नाटककार उपन्यासकार कहानीकार बनता है। इतिहासकार  दर्शनशास्त्री  शिक्षाशास्त्री कभ...

अंकुर

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जब दिल में प्रेम का अंकुर फूटता है  तो यह जहां कितना मनोरम लगता है  आसमान "जन्नत" जैसा दिखाई देता है "सागर" प्रेम पतवार का खिवैया लगता है  पत्ती पत्ती डाली डाली "कामनाएं" सी लगती हैं  फूल किसी प्रेमिका के नाजुक बदन के से अंग  घने काले बादल नवयौवना के खुले हुए केशराशि  बिजली "अभिसारिका" के हिय में उठती सी तरंग  तब प्रकृति से बेसाख्ता प्यार होने लगता है  मन दुश्मन को भी अपना समझने लगता है  जड़ , जीव सबमें प्रेमी का वास महसूस होता है प्रेम के बिना ये जीवन निसार लगने लगता है  मगर किसी मजहबी तकरीर सुनने के बाद  दिल में नफरतों का लावा खौलने लगता है  अंध घृणा में डूबा कोई "फिदायीन गुलाम"  किसी "कन्हैयालाल" का सिर कलम करता है  इन नफरतों के शोलों को "भड़काऊ भाईजान"  वोटों की खातिर और ज्यादा भड़काते रहते हैं  किसी धर्मस्थल का कोई धार्मिक व्यक्ति उनमें  72 हूरों का ख्वाब दिखा घृणा का अंकुर भरते रहते हैं  नफरतों के अंकुर को विशाल वृक्ष मत बनने दो  जेहादी मानसिकता को शांति भंग मत करने दो  कुचल...

समाज के पिशाच

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आज समाज भरा पड़ा है  जगह जगह पिशाचों से  नही सुरक्षित देश हमारा दरिंदो नर पिशाचों से !! नही कोई बहु बेटी सुरक्षित  आज इस समाज में  गिद्ध बन झपटने को बैठे  पिशाच हैं कबसे ताक में!! मौका पाते लड़की का अस्मत लूट  उसे जीते जी मार देते हैं  फिर खुद खुली हवा में वो निडर हो  बिचरते रहते हैं!! जब देखो लड़की के साथ जबरदस्ती होती है रहती प्रतिदिन एक निर्भया सड़क पर मरती दिखती है रहती लड़की ने अवहेलना की तो तेजाब मुंह पर फेक देते  उसका जीवन बर्बाद कर नेताओं के आड़ में छिप जाते !! ये देश के नेता भी किसी पिशाच से कम नही वो भी देश को लूटने से कभी बाज आते नही! अपने ओहदे का ये भरपूर लाभ उठाते है  नरभक्षी राक्षस ये औरतों बेटियों  को कहां बख्शते हैं!! दहेज लोभी भी सच पूछो तो समाज के पिशाच हैं होते ? दहेज खातिर ये कुछ भी ,करने से कहां चूकते! आए दिन समाज में बहुओं के साथ अत्याचार के किस्से सुनने में आते उनको घुट घुट कर जीने के लिए, ये हैं बाध्य करते !! कई जगह तो पति भी मां बाप के साथ मिला होता  नई नवेली दुल्हन को तिल तिल करके है तड़पाता! शारीरिक म...

मैं कवियत्री हूँ

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मैं कवियत्री हूँ श्रृंगार सजाती हूँ 🌹🌹🌹🌹 सभी रस भाव छंद बंध लिखती हूँ प्रेम के सभी अनुबंध लिखती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ श्रृंगार सजाती हूँ 🌹 मै ही ओज हास्य विभत्स और रस सार लिखती हूँ विश्व व्यापक सर्वोच्च अभिसार लिखती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ अंलकार सजाती हूँ 🌹 मण्डन खण्डन अभिनन्दन में ही रचती हूँ कृष्णा माधव केशव सा चितरंजन रचती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ शिवात्व सजाती हूँ 🌹 दैवित् निमित्त उद्धत  ब्रह्मत्व  बुनती हूँ आकाश निमित्त प्राणो के श्वास बुनती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ संसार  सजाती हूँ 🌹 कोमल समता रमता में ही होती हूँ प्राणो से भी प्रिय प्रिया ममता होती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ मातृत्व सजाती हूँ 🌹 रोली अक्षत दीप मोती ज्योती सी जलती हूँ . बागो की ठण्डी छाव हूँ पलको में सोती  हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ अर्चन सजाती हूँ 🌹 लक्ष्मी दुर्गा काली चन्डी शिव को लिखती हूँ  मन के भीगे अहसासो को सत्य मेव लिखती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ सौन्दर्य सजाती हूँ 🌹  ईद दीवाली होली कभी  गुरुवाणी सी खिलती हूँ भावो के भीने पोखर में पंकज कभी जलज सी खिलती हूँ हाँ म...

अग्निवीर"(आखिर कब तक)

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             आजादी को 75 साल पूरे होने वाले हैं। सरकार ने कई सपने बुने कुछ पूरे हुए,कुछ अधूरे और कई सपने तो सपने ही रह गए।आख़िर क्यों??? कथनी और करनी सदैव एक सी नहीं होती। जब सरकार युवाहित के भविष्य के लिए कुछ योजनाओं का आगाज करती है तो उसके शुरू होने के पहले ही कहीं कोई छोटी सी चिंगारी, आग भड़काने को तैयार रहती है।एक विनाशकारी ज्वालामुखी की तरह सब तहस-नहस करने के लिए। आखिर कब तक हमारे देश में नवयुवकों को दिग्भ्रमित किया जाएगा। जो जोश व उत्साह अपने मातृभूमि के प्रति समर्पण व अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए होना चाहिए। वही युवावर्ग हिंसात्मक घटना में अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। किसने भड़काया , किसने चिंगारी सुलगाई इन युवाओं के जेहन में????? इन सबसे परे,  सिर्फ़ हमें अब यही सोचना है कि हम सब सर्वप्रथम भारतीय हैं, जो हमारे हित में है, उसे हम सब मिलकर आगे बढ़ायेंगे , व कामयाब होने की कोशिश करेंगे। तू, तेरा और मैं, मेरा से नहीं......... यह संस्कारों, एकता ,सद्भभावों की भारत भूमि है। यहां सिर्फ और सिर्फ "हम और हमारा" ही होना चाहिए। तभी हमारा भा...

अग्निवीर (सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि) (अंतिम भाग)

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(लाइफ स्टोरी ऑफ अलख पांडे)  पांडे अब इतना विश्वसनीय बन चुके थे कि कुछ ही समय में ऐप पर 2 लाख स्टूडेंट आ गए और एप क्रैश हो गई। असंख्य युवा ऐप में एनरॉन कर चुके थे, ऑनलाइन फीस भर चुके थे । इसी बीच पांडे के पास एक ऑफर आया। एक बड़े व्यापारी ने उनकी ऐप का मूल्य  लगाया , मूल्य था 75 करोड़ रुपए । पांडे  चाहते तो उसी समय इतनी धनराशि के मालिक बन सकते थे । लेकिन उन्होंने इस ऑफर को लात मारकर ठुकरा दिया । जैसे कि मैंने शुरुआत में ही कहा कि पांडे का "फिजिक्स वाला" अब 777 करोड़ से ऊपर फंडिंग जुटा चुका है । आज के तारीख में राष्ट्र के सबसे सफल स्टार्टअप में से एक हैं।  आज पांडे रोजगार बांट रहे हैं। फिजिक्स लगभग 19000 लोगों को रोजगार दे रहा है। इनमें टीचर्स, एसोसिएट प्रोफेसर, सब्जेक्ट मैटर, एक्सपर्ट से लेकर टेक्नीशियन आदि शुमार हैं। पांडे अकेले नहीं हैं ,जिन्होंने अपने सपनों का पीछा करते शून्य से  करोड़ों तक का सफर तय किया है। सिर्फ पांडे ही नहीं जो भुखमरी के दौर से उठकर करोड़ों के मालिक बन गए। ऐसे कई उदाहरण हैं । र उन सभी उदाहरणों में एक बात सामान्य है कि उन सभी ने कभी ...

"हे भारत के वीर जवान"

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हे ! भारत के वीर जवान, तुझसे है जिंदा यह हिंदुस्तान पिता तेरा यह खुला आकाश, सरहद की भूमि तेरी मात समान। हे ! भारत के वीर जवान। तेरी रग-रग में बहता लहू दर्प का, ह्रदय तेरा राष्ट्रप्रेम से है भरा, माथे पर चमक रहा सूर्य शौर्य का, भुजाओं में अदम्य साहस है भरा, किन शब्दों से करूं तेरा गुणगान। हे ! भारत के वीर जवान। वंदे मातरम् स्वर के गर्जन से, देश के हर दुश्मन थर्राते, नमन करता उस माटी को माथा, तेरे कदम जहां-जहां तक जाते, तू ही इस मातृभूमि की शान। हे ! भारत के वीर जवान। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

अग्निवीर

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देश की माटी इनका चंदन रक्त प्रवाह इनका नवयौवन रिपु की राह में स्थिर रहते अग्निवीर है यह कहलाते क्या कर लेगा अंधड़ इनका अटल रहे हर झंझावात में देश प्रेम में निशदिन रहते अग्निवीर है यह कहलाते मात पिता का आदर करते भ्रात सखा संग प्रेम भी करते देशप्रेम सर्वोपरि रखते अग्निवीर है ये कहलाते देश भी इनको देता सब कुछ भोजन स्वास्थय सुरक्षित भविष्य आन बान और शान से रहते अग्निवीर है ये कहलाते।                       साधना सिंह                      

समाज के कोढ़ हैं,राक्षस हैं,ये नर पिशाच हैं

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देखो कैसी झेल रहीं हमारी बेटियाँ चारो तरफ है जुल्म। समाज के पिशाचों की बर्बरता औ बुरी नजर का जुल्म। जीवन जीना मुश्किल होगया रस्ता चलना हो गया दूभर। सड़क छाप मजनुओं के मारे जाएं वह कैसे कहाँ किधर। नहीं सुरक्षित जीवन उनका खतरा रहता है आने जाने में। कैसे करें पढ़ाई पूरी अपनी स्कूलों कालेजों में वे जाने पे। मानव भेष में दानवी घृणित सोचों घूरती नजरों से बैचेन। बेटियों को मिलता नहींहै कहीं भी सुख शान्ति और चैन। मानवता की हदें पार कर क्रूरता से इंसानियत हो शर्मिंदा। सभ्य समाज में रहने लायक नहींहैं ऐसे इंसा नहों शर्मिंदा। पहन मुखौटा इंसा के ये राक्षस घूम रहे हैं घर बाहर अंदर। भरी शरारत जेहन में इनके पिशाच बैठाहुआ इनके अंदर। रूप रंग से लगते मानव कृत्य करम दिखते असुरों के जैसे।  मौके की बस तलाश में ही सिरफिरे झपटें नोचें काटें कैसे। मानसिक रूप से बीमार हैं होते यह हैं समाज के पिशाच। दरिन्दगी बहसीपन अमानवीय करम का सरताज पिशाच। निर्भया की पीड़ा भूले भी नहीं लोग मौत की शिकार हुई। हैदराबाद में डॉ. सक्सेना भी दरिन्दों की मौत शिकार हुई। हाथरस में भी घटी घटना है मनीषा पर अत्याचार किया। ऐसे अनजानी कितन...

समाज के पिशाच

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इंसान के भेश में, हैं ये पिशाच। न करते दया किसी पर, न है करते विश्वास।। देखो ज़रा संभल जाओ, कही हो न तुम्हारे आस पास। पहचान नही सकते इनको, ये हो सकते है तुम्हारे खास।। मानवता की कब्र खोदे, ये कातिल कसाई हैं। हो सकते है ये कोई ग्राहक, जिसने प्यास खून से बुझाई है।। ये नही छोड़ते किसी कीमत पर, ये तो अंधे व्यापारी हैं। ये मांस नोचते फिरते है, इन्होंने कसम शैतान की खाई है।। ये बन के रिश्तेदार, पड़ोसी, तुमसे जोल बढ़ाते हैं। फिर नफरत के खंजर लेकर, तुम्हारी बली चढ़ाते हैं।। ये किसी की टांग चीरते, अंगों की करते कटाई हैं। रोज़ी रोटी फूँक डालते, दंगो की करते अगुवाई हैं।। ये झट से गायब हो जाते, न खोज इनकी हो पाई है। आंख मूंदे कानून है बैठा, तो सबकी शामत आई है।। सारेआम ये बंदूक उठाते, पत्थरों की बारिश आई है। नही बख्शते बच्चे बूढे, औरत की इज़्ज़त लुटाई है।। ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

अग्निवीर (सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि) भाग -५

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(लाइफ स्टोरी ऑफ अलख पांडे)  अमन की बातों को सुन वह व्यक्ति मुस्कुराने लगता है। वह समझ जाता है की ये लड़का अंदर ही अंदर टूट चुका है , किंतु अभी भी उसके अंदर सैनिक बनने का जज्बा है। फिर वह उमार्दराज व्यक्ति अमन से कहता है -  अलख पांडे !  नाम सुना है ....नहीं सुना? फिजिक्स वाला .....नाम सुना है ...शायद सुना होगा ।  क्योंकि पांडे जी द्वारा स्थापित फिजिक्स वाला स्टार्टअप लगभग 100 मिलियन डॉलर की फंडिंग यानी 770 करोड रुपए जुटा चुकी है।  दोहरा रहा हूँ......777 करोड़  पांडे छठी कक्षा में थे । घर की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पांडे के पिता को उनका पुश्तैनी मकान बेचना पड़ा। पूरा परिवार सड़क पर आ गया। पांडे पढ़ाई में अब्बल थे ,और जिम्मेवार भी ।आठवीं कक्षा में पांडे छठी कक्षा के बच्चों को जीवन यापन हेतु ट्यूशन पढ़ा रहे थे इसलिए पढ़ा रहे थे कि दो वक्त की रोटी के इंतजाम में कुछ योगदान उनका भी हो।  पांडे आठवीं में ही मास्टर जी बन चुके थे । स्कूल से लेकर कॉलेज तक पांडे जी बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर जीवन यापन करते थे। फिजिक्स में उनका ऐसा इंटरेस्ट बैठा कि उन्ह...

पिशाचों की जंग नरपिशाचों से

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  जंगल के इस हिस्से में पिशाचों की बस्ती बनी हुई थी। अनेकों पीपल और बरगद के पेड़ थे। जिनपर पिशाच रहते थे। रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्यों के साथ साथ पिशाचों की भी मूल जरुरत है।     पर मनुष्यों से अलग वे केवल अपनी जरूरतों से ही खुश रहते। भरे पेट पर किसी से कुछ न कहते। जगह की कमी होने पर शाखाएं भी बांट लेते। भोजन तो बांटते ही थे।    पिशाचों का भोजन क्या। सुना जाता है कि पिशाच खून के शौकीन होते हैं। ये भी खून के शौकीन थे। पर नरपिशाचों के खून के।    रात अंधेरी होते होते पिशाचों की टोली शिकार करने निकलती। जंगल में अनेकों जानवर थे। पर इन पिशाचों की जीभ पर तो नरपिशाचों का खून लग चुका था। जैसे किंग कोबरा का भोजन दूसरे सर्प हैं। उसी तरह इनकी मुख्य खुराक नरपिशाच थे।   " चाचा। दो दिन हो गये। पेट में कुछ भी नहीं गया। अब कुछ करना होगा।"   एक नये पिशाच ने अपने सरदार से कहा।   पिशाचों का सरदार गंजे सिर बाला, बड़ा़ दुबला पतला सा पर नरपिशाचों के लिये निर्दयी था। जब वह जिंदा था तो बड़ा शरीफ आदमी था। ठाकुर के आदमियों ने उसके बाप को मारा। उसकी बहन की इज्ज...