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भेड़ों की भीड़ खड़ी है

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कैसी रेलमपेल मची है  कैसी धक्कमपेल मची है  कोई आगे तो कोई पीछे  कोई ऊपर तो कोई नीचे  आगे आने की होड़ बड़ी है   ना जाने बचपन कब आया था, ना जाने कब यूँ ही मुस्काया था, गठरी सपनों की, ढेर पड़ी हैं,पर  देखो देखो भेड़ों की भीड़ खड़ी है, सुन्दर सुन्दर सजधज, जामे पहने, मदारी की डमरू पर बन्दर नाचे,  कही कोई बैसाखी का साथ लिए, तो कही बंदर बाँट की भीड़ बड़ी है,  देखो देखो भेड़ों की भीड़ खड़ी है  सबकुछ सीखा,पर फ़िर भी खड़े हैं  ना जाने किस, दिशाभ्रम में पड़े हैं, सफ़लता,ट्रॉफ़ियों से मेज भरी पड़ी है, पर देखो ना, हर तरफ़, हर जगह तो  भाषा,संस्कृति,शिक्षा की लाश पड़ी है, देखो देखो.... भेड़ों की भीड़ खड़ी है,, ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸 (स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)

ख्वाब

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उठते बैठते तूने कब कब,कैसे क्या क्या कहा था मुझसे और  क्या क्या, कैसे समझाया था,  हाँ हर वो पल याद हैं मुझे,कि  तूने कब कब मुझे दुलारा था,  हर हाल में खुश कैसे रहते हैं  और स्वाभिमान किसे कहते हैं  ये पाठ भी तूने मुझे पढाया था, अपने ही संघर्ष की कहानियों से, अपने पैरों पर खड़े कैसे होते हैं,  ये तूने ही तो मुझे बतलाया था, कभी ना टोका, कभी ना रोका हर बात में तेरी हाँ थी, पर क्यों ये बात समझ नहीं पाई थी, पर  फ़ैसला खुद कैसे करना है, यह  बात बताने का तेरा किस्सा था,  हर एक कदम बढ़ाने पर मैं तो  हरदम ही तो डर जाती थी,पर  तेरी आँखो का विश्वास देखकर हँसते हँसते आगे बढ़ जाती थी, मेरी एक ही तो बेटी हैं,ये कहके  जब तू प्यार से मुझपर हँसता था खुद पर ही गर्व करना,सिखाने का  तेरी परवरिश का ही एक हिस्सा था, यूँ तो हर बात में तेरी ही याद आती है  तेरी सिखायी हर बात,कहाँ भूल पाती हैं  मेरे वजूद से बस,तेरी ही खुशबू आती हैं, मेरी नजरों में,जो आज तेरी ये इज्जत हैं, बस एक यहीं ख्वाहिश है मेरी, कि काश      ...

प्रेम की निशानी

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कितने प्यार से माँगी थी ना  तुमने,अलग होने से पहले पर क्या करता मैं!!  मैं जानता था, उस रात  बहुत रोई थी तुम,  निष्ठुर बन जब तुम्हें  मना किया था मैंने  अपनी निशानी देने से, जानता था, बहुत अच्छे से  उस निशानी के बदले  बहुत कुछ सुन लेती तुम,  वही तो कहना नहीं चाहता था कि मुझे कितना विश्वास है  तुम्हारी ईमानदारी पर  और अपनी कायरता पर, इसलिए तो उस भ्रम से ये भ्रम अच्छा है ना कि  ये दोस्ती कितनी अच्छी है,  सही कहा ना !! ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸 (स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)

ना जाने तू कहाँ था

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जब तक मैं अनमोल था,  तू मुझे तौलता था  जब तक मैं एक ख्वाब था, तू मुझे सोचता था  जब तक मैं ऊँचाईयों पर था, तू मुझे देखता था  जब तक मैं एक ख्वाहिश था, तू मुझे चाहता था  जब तक मैं तेरी मंजिल था,  तू मुझ तक दौड़ता था जब तक मैं खास था, तेरे जेहन में एक 'लम्हा' था,  जब इन दूरियों को मिटाकर,  ख़ास-ओ-'आम क्या हुए  मैं ढूँढता ही रह गया,  ना जाने तू कहाँ था l ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸 स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

वक्त

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रेत की मानिंद, फ़िसल रहा है वक्त,  कितना भी थामों हाथों से,  बस यूँ ही सरक रहा है वक्त, आँखो में ठहरे रहते है ख्वाब, आँधी सा गुजर जाता है वक्त, हम चंद लम्हों में कैद रह जाते है, अभी अभी उफ़नकर बह गया है,देखो  घर के किसी कोने में नाचता ये वक्त, अपने वजूद की क्षत-विक्षत लाश उठाए, हम दर-बदर फ़िरते ही रहे, और  कतरा-कतरा बहता रहा ये वक्त, ताउम्र जिंदगी के थपेड़े,  पेशानी पर बजते रहे, मौन की लकीर सा,  गुजर गया वक्त ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸 स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

सच और समाचार

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जनमत एक प्रोडक्ट,दर्शक उपभोक्ता, खुली हुई खिड़कियाँ हैं, दिमाग बंद हैं,  जुबान लहक रही है और आँखे तंग हैं,  टीवी पर सुंदर सुंदर कबूतर चहक रहे हैं,  सुना है कि मुर्दा लोग भी जागरुक हो रहे है, तूतू मैं करते लोग, जाने क्या सिद्ध कर रहे है  एक पंक्ति की खबर में सब कुछ होता है,बस  उस सर्कस में, एक 'सच' ही दफ़न होता है l  पैसों की जंजीरो में, सबकुछ जकड़ा होता है, कहने की आजादी में'कुछ और ही खेल होता है, चिल्ला चिल्ला कर 'सच' कहने का ढोंग होता है, झूठ को जामा पहना, एक फ़ँतासी रची जाती है, बार बार दुहराकर उसे, सच्चाई दबा दी जाती है,  जब'सच' के नंगे उघड़े बदन को ढँक नहीं पाते हैं,  सौ सौ बार उसे दिखाकर, अपनी पीठ थपथपाते हैं, कभी हाथ से लिखे 'दो कागज' देश जगा जाते थे, आज सौ सौ लंगूर नाचकर भी सच कह नहीं पाते हैं l ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸 स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

अगर शब्दों के पंख होते

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अगर शब्दों के पंख होते तो  आसमाँ में लिखती रोज  एक नयी सी कहानी,   अगर शब्दों के पंख होते तो  हवा में चमकते, तैरते होते  मेरे अलहदा से जज़्बात, अगर शब्दों के पंख होते तो  किसी डायरी के अधूरे पन्नों में यूँ ना दम तोड़ते मेरे एहसास, अगर शब्दों के पंख होते तो  शायद पहुँच ही जाते उड़कर  और दस्तक देते तुम्हारे दिल पर,  हाँ शायद,..शायद !! ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸 (स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)

कतरा कतरा

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कतरा कतरा जो रगो में बहते थे,  जिन्हें हमने रहनुमाँ बन सँवारा था, अपनी रहनुमाई से मुहँ चिढ़ाते हमे आज वही हमारे रहनुमाँ बन बैठे हैं, जिन कतरों को नाज़ों से संजोया था, वही हमे छोड़ कहीं,आगे बह निकले है, फ़िर सोचा कि,शामिल करदे किसी के  जीवन में, जो चंद कतरे बचे हैं रगो में, शायद रोशन हो जाए किसी की दुनिया और हमे भी कुछ मोल मिले इन कतरो का l ✍️ शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸 (स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)  #रक्त दान

शाम का नाश्ता और मैं

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दुपहरी का जाना,वो शाम का आना  शाम का नाश्ता,और वो चाय बनाना, तेरे आने से पहले वो मेरा सँवर जाना  उबलती चाय और उसकी खुशबू से वो  मेरा चेहरा महकना, समझ नहीं आता,  तुम उस चाय से खुश होते हो या फ़िर,  उस नाश्ते के कुरकुरेपन से या स्वाद से, पर कभी कभी सोचती हूँ मैं, कि तुम्हें, चाय की उड़ती हुई भीनी भाप के पीछे, तुम्हारी नज़रों में,अपना अक्स तलाशती, सँवरी हुई,मुस्कराती,क्या नजर आती हूँ मैं,  तुम दिनभर काम करके, थककर आये हो, ये सोचती,तुम्हारा हरपल खुशनुमाँ बनाने को, बाट जोहती,कभी तुम्हारे ख्यालों में आती हूँ मैं,  तुम कितना कुछ करते हो हमारे लिए,ये कहती  और सबको सुनाती और जताती हूँ मैं,पर कभी  सुबह से शाम तुम्हारे लिए,कितने जतन करती हूँ,  मुस्कराते हुये, तुम्हारे मुहँ से सुनने को बेताब हूँ मैं,  सालों से कितना कुछ कर रही हूँ,शाम के नाश्ते पर  आमने सामने होते हैं जब, तो चाय का कप बढ़ाती, उसके पीछे से झाँकती,तुम्हें कभी दिखती हूँ या नहीं मैं,  ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸 (स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)

कशमकश

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अजीब कशमकश है  कि लापता भी हुए  तो कहाँ हुए...  जिंदगी के झुरमुटे में  कभी डूब गये तो  कभी पार हुए..  ये जिंदगी का भी  अजीब फ़लस्फ़ा हैं कि..  अपने ही घर के आँगन में  आकर हम गुमनाम हुए .. ये बड़ा ही अजब मामला है कि  अपनो से सजी बज़्म में  कोई अपने ही ना मिले...  ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸 (स्वरचित)सर्वाधिकार सुरक्षित

जुगलबंदी

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मानाकि तुम्हारा अहम् बड़ा था,  पर मेरी जिद भी तो कम ना थी, हर बात, जीत हार का प्रश्न क्यों ? सुलह की कोई कोशिश भी ना थी, हम तेरी परवाह की उम्मीद में ही, बस,समझौते ही करते रह गए और  तुमने उसे अपनी जीत ही बना ली, समझौतों को, मेरी कमजोरी समझ,  मुझे छोड़कर, सभी राहों पर आपने आगे बढ़ने की तो, होड़ ही लगाली, हमने भी कुछ वक्त ही इंतजार किया,  अकेले रहने की अपनी,आदत बनाली, घर गृहस्थी की चादर ओढ़कर हमने, बच्चों के ही संग एक दुनियां बसा ली,  पति पत्नी भले ही ना बन पाए हो,पर  माता पिता की भूमिकाएँ शानदार थी, जीवन के दो हाशिए पर खड़े हुए हम, ये कठिन जुगलबंदी ही,एक आस थी l ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸💝 (स्वरचित) सर्वाधिकार सुरक्षित

किरदार तो बस तू ही था

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तू करता रहा कोशिशें मेरे ख्वाबों में बसने की  हमें नींद आई ही नहीं,कि करवटे बदलते रहे  तू सिखाता रहा ताउम्र, मुझे जिंदगी के सबक  और हम हमेशा ही अपने उसूलों पर अड़े रहे  हम तो बहते रहे हमेशा, तेरे रंग में संग संग  बस जिंदगी के ही हरपल,किनारे बदलते रहे  खुशियों से ज्यादा तो, शिकायतें थी शामिल  तन्हाई उनकी हो या मेरी, बस दर्द बदलते रहे  क्या करुँ कि लिखना आता है,सिर्फ़ दर्द ही मुझे किरदार तो बस तू ही था,बस फ़साने बदलते रहे  ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸 (स्वरचित) सर्वाधिकार सुरक्षित

बतादूँ क्या हूँ "मैं"

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मैं बस एक शरीर नहीं हूँ, मैं यौनसुख की पूर्ति नहीं हूँ, मैं उगते सूरज की लालिमा हूँ, अंधेरे में चमकता हुआ चाँद हूँ, जिस पर तुम खड़े हुए हो,उसे  ठहराव देती तुम्हें, जमीन हूँ मैं,  जो रोज नयी नयी उड़ान भरते हो, उस ऊँची उड़ान में शामिल हवा हूँ मैं, जिस सफ़लता के तुम गुण गाते हो,  उस सफ़लता को पाने की प्रेरणा हूँ मैं, जिस लक्ष्य के पीछे भागते हो वह भी मैं, जिस पौरुष की तुम बातें करते रहते हो ना,  कभी सोचना कि, उसे मायने भी देती हूँ मैं,  सोचा है कभी,जिस घर को पाना चाहते हो,  उस घर में 'मैं' ही ना हुई तो क्या करोगे भला, तुम उच्श्रृंखल,असीमित,उन्मुक्तता के भंडार थे,  उसे दिशा देती, बंधनो की डोर से बाँधती हुई मैं,  मैं ही जीवन, मैं ही पथ, मैं ही गन्तव्य, मैं ही पूर्ति,  तुम्हारे वज़ूद की 'वज़ह'भी मैं,तो अभिमान क्यों हैं? मैं हूँ तो तुम हो, और तुम्हारे लिए ही तो, मैं हूँ फ़िर, तभी ये संसार हैं, तो कभी ये क्यों नहीं सोचते तुम, हमेशा आगे चलने की ही, तुम बात करते हो, कभी  साथ साथ चलने की मेरे, क्यों नहीं सोचते हो तुम, हमेशा अपने लिए सारे विकल...

उसको पाने की कोई आस नहीं होती

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अब वह खिलखिलाती नहीं है,  बस एक तिरछी सी मुस्कान है,  अब वह शिकायतें नहीं करती,  बिना सिर पैर की,बेमतलब की  तुमसे बातें दो चार नहीं करती,  जरा सी बात पर वह तुमसे कोई  फ़िर झगड़ा बार बार नहीं करती,  तुम्हारे किसी ताने पर वह तुमसे  भूलकर भी, तकरार नहीं करती,  तुम्हारे दिल दुखाने पर भी,उसकी  आँखो से कोई बरसात नहीं होती, उसकी हर छुअन में, एहसास में, तुम्हें,फ़िर कोई गर्माहट नहीं होती,  तुम्हारे हर सवाल पर जब, उसके  जवाब में सिर्फ़ मौन पसरा मिले तो,  समझलो कि, उसकी तुम्हारे पास  लौटने की भी, गुंजाइश नहीं होती, तुम सोचते रहते हो कि, तुमने उसे  जीत लिया है,पर ऐसा होता नहीं है,  समझलो कि,फ़िर तुम्हारी होकर भी  उसको पाने की कोई आस नहीं होती,  ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸 (स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)

खामोश रात का सफ़र

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खामोश रात का सफ़र  क्या पूरा होता है  कभी  बिस्तर की सिलवटों में  शुरू तो होता है, कोई लालसा  लेकर आता है  तो किसी को  रुह की तलाश होती हैं,  किसी को  जिस्म तो मिलता है पर  लम्हों की गर्माहट  फ़ना होती है,  कोई रूह को ही  तलाशता रह जाता है  बस जिस्म से बात होती है,  दोनों ही गुमसुदा हैं  बिस्तर के दो  किनारों में,  कभी तो झाँकते  एक दूसरे के  किनारों पर,तो  ये खामोश रात का सफ़र  मुकम्मल होता  तो शायद  बोझिल दिन का सफ़र भी  आसान हो जाता,  ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸 (स्वरचित) सर्वाधिकार सुरक्षित

खामोशियों के तलबगार

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खामोशियों के  तलबगार तो बहुत है,  पर सौदा तो शोर से ही करते हैं  रिश्ता तो शोर से है,  पर हमेशा खामोशी की ही  ख्वाहिश है,  ऐसा क्यों है?  रिश्ते से पहले तो  शोर कितना पसंद था तुम्हें,  फ़िर उससे जुड़ते ही  खामोशी के बुर्के में  पसंद क्यों है ? शोर की बेबाकी  कितनी पसंद थी तुम्हें,  पर अब खामोशी के  शर्मिलेपन की  तुम्हें तलब क्यों है ? मुझे तो लगा था  कि तुम मेरे "उस" शोर को समझते हो  जिससे नफ़रत थी,मुझे  तुम उसी भीड़ का  हिस्सा क्यों हो ? शायद शोर बेबाक लफ़्ज़ों का  पुलिन्दा है,और  खामोशियों के तो  अपने लफ़्ज़ ही नहीं होते  यही बात हैं ना !! ✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸 (स्वरचित)सर्वाधिकार सुरक्षित

अधूरी डायरी के पन्ने

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ये अधूरी डायरी के पन्ने  कितना कुछ कहते है ना  कुछ अधूरे जज्बात  कुछ भूले से एहसास  कुछ भूले बिसरे चेहरे  कुछ अधूरी कहानियाँ  ये अधूरी डायरी के पन्ने  कितना कुछ सुनते है ना  दिल में दबा हुआ दर्द  कुछ अनसुने ख्वाब  दिल टूटने की चटक  कुछ की हुई गलतियाँ ये डायरी के अधूरे पन्ने  कितना कुछ देखते हैं ना  कुछ टूटते, छूटते रिश्ते और  कुछ बनते,बिगड़ते हालात  कुछ अधूरे से दुस्साहस और छिपे हुए राज                                                 ये अधूरी डायरी पन्ने  कितना कुछ समेटे रहते हैं  वो अधुरा इश्क़,वो सूखे गुलाब  कुछ मुँदी हुई चोटे और जख्म  कुछ सहमी, लरज़ती हुई साँसे  ख्वाहिशें के पूरा होने का वहम  ये अधूरी डायरी के पन्ने कितना कुछ बोलते हैं ना पर क्या बोल पाते हैं वो...  फ़टे हुए पन्नों की कहानियाँ  अधूरी छूटी इबारतों की कोशिशें  गुजरे वक्त स...

अधूरा रंग प्यार का

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होली आने वाली थी ..और घर में चारों तरफ होली पर बनने वाले पकवानों की सौंधी सौंधी खुशबू फ़ैली हुई थी.. सभी मिलकर काम करने में लगे हुए थे, कालोनी में होली उत्सव की धूम दो दिन पहले से ही शुरू हो जाती थी और सभी मिलकर एक दूसरे के साथ मिलकर ही तैयारी करते थे.. तो आज होली पर बनने वाले पकवान इस बार मेरे यहाँ बन रहे थे l  सीमा और प्रीति दोनों ही अपनी पहली होली की यादों को हँसते हुए सुना रही थी.. उन्हें सुनते हुए उसे भी अपनी पहली होली याद आ गई और उसके गालों पर फ़िर वही गुलाबी रंगत छा गई l उस होली पर.... जब शायद उसने होली और उस पर चढ़नेवाले प्यार के रंग को पहली बार महसूस किया था l  बहुत छोटी थी वह नौ या दस साल की, होली की छुट्टियों में वह भी आया था, हमउम्र थे दोनों.. तो उसने उसे रंगने के लिए एक बाल्टी में रंग घोला और इंतज़ार ही कर रही थी कि अचानक से.. उसी बाल्टी के रंग में वह सारोबार खड़ी थी और वह सामने खड़ा हुआ हँस रहा था.. उस एक पल में क्या हुआ... उसे भी पता नहीं था.. बस कुछ अलग सा महसूस हुआ था उसे... वो क्या था वह भी नहीं जानती थी.. एक शर्म सी गालों पर तैर गई और वह अंदर को भाग गय...

रंग एक जैसा

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वह अपने दोस्तों के साथ बैठी हुई गुफ़्तगूँ कर रही थी और बता रही थी कि आजकल उसने अपनी दोस्त श्रेया के साथ काम करना छोड़ दिया है क्योंकि जब वह अपनी 'बच्चे की आया' को साथ लेकर उसके घर गयी थी... तो यार!  वह तो उसे खाना देना तो दूर, उसे पानी तक देने में तकलीफ हो रही थी और ऐसा बिहेवियर था उसका, जैसे कि कोई अछूत हो वह, ऐसे कोई करता है क्या! गरीब की कोई इज्जत नहीं होती .. बताओ ? मैं तो उल्टे पैर वापिस आ गई l तभी उसकी एक दोस्त ने किसी सामान का जिक्र किया तो उसे याद आया कि.. उसे तो वह आज सुबह से ढूंँढ रही हैं.. मिल ही नहीं रहा l फ़िर ना जाने क्या सोचा उसने कि आया को बुलाकर उसे सबको नाश्ता परोसने का कह, धीमे से उस कमरे में गयी जिसमें उसकी आया का थैला रखा था और उसकी तलाशी लेने लगी कि तभी अचानक से वहाँ "आया" आगई और बोली - दी आप सुबह से यही ढूँढ रही थी ना.. ये बालकनी मे डला था, शायद बाबा खेलने के लिए ले गए होगे l वह झटके से उठी और अपने चेहरे पर आते जाते रंग को छिपाती हुई उससे सामान ले निकल गई l उधर आया के चेहरे पर एक व्यंग्यस्मित लहर आई.. जैसे कह रही हो कि दोनों दोस्तों का रंग...

दिल के तार

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जब वह उससे जुड़ी थी तो उसमें ऐसा कुछ भी ना था, जो उसके सपनों के राजकुमार में था l लेकिन वह लड़की थी जानती थी कि विवाह होने के बाद कुछ नहीं बदलता.. तो जो कुछ भी हैं, यहीं है l उसने अपने आप को समझाया कि "सपनों के राजकुमार" सच नहीं होते वह तो स्वप्न टूटने के साथ ही खत्म हो जाते है l  वह उस रिश्ते में हौले हौले खूबसूरती तलाशने लगी l वह अपने दिल के तारों को उससे जोड़ने के लिए रोज एक वजह देने लगी और उससे खुद को जोड़ती हुई उसने एक तारों का जाल बुन लिया l वह हर उस तार के साथ एक प्रतिउत्तर की आशा भी बुनती l  लेकिन वह जितनी आशाओं की उमंग के साथ आगे बढ़ रही थी, वह उससे, उसके किये गये हर प्यार भरे समझौते को, अपना हक समझ, उससे उतने ही कदम दूर होता जा रहा था l वह अपने बुने तारों में ही इस कदर बँधने लगी थी कि उसका साँस लेना मुश्किल होने लगा था l  वह अपने से बँधे हर रिश्ते का ख्याल रखता था उनकी साज-सँभाल करता.. बस उसका ही रिश्ता उसे गैर-जरुरी लगता था l  उसकी संवेदनशून्यता उसे कचोटने लगी थी और धीरे धीरे इस रिश्ते में उसका दम घुटने लगा था l उसे लगने लगा कि वह खत्म ही ना हो जाए...