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सच मैं तुमको बहुत चाहता हूँ

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अगर तुमने रोके नहीं होते मेरे कदम, उसकी तरफ बढ़ते मेरे हाथ को, बताया नहीं होता मुझको मनुष्य, जिसको मैं भूल चुका था तब, सच में मिट जाते उसके अरमान, जिसका ना कोई कसूर था। वह एक तुम ही तो हो, जिसने कराई थी मुझको महसूस, उसकी पीड़ा और उसकी कहानी, और ऑंसुओं की अश्रु धारा, जो हर आदमी को पिघला देती है, पत्थर दिल को भी हिम की तरहां। मैं तो पागल ही हो गया था, मुस्कराते उस फूल को देखकर, और पार करने ही जा रहा था, अपनी इंसानियत की सीमाएं, शुक्रगुजार हूँ तुम्हारा मैं, कि तुमने मुझको रोक लिया। बचा लिया उस जिंदगी को, मेरी हैवानियत की आदत से, याद दिला दी मुझको मोहब्बत, मेरी इंसानियत और मेरा जमीर, मेरी मंजिल और मेरी खुशी, जिसको पाने के लिए करता रहा हूँ , मन्दिर - मस्जिद -गुरुद्वारा में मिन्नत, सच मैं तुमको बहुत चाहता हूँ। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

माफी मैं नहीं मांगता

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नहीं करता अफसोस मैं, क्योंकि मुझको विश्वास है, मुजरिम सिर्फ मैं ही नहीं हूँ, शर्म उनमें भी तो हो कुछ, माफी मैं नहीं मांगता। गुनाह सिर्फ मैंने ही नहीं छुपाया, सच्चाई उन्होंने भी तो दबाई है, पाने को प्रशंसा सभी दिलों से, और जीतने को बाजी अपनी, मैंने भी दबा दिये अपने पाप, माफी मैं नहीं मांगता। हाँ, उनकी पहुंच है वजीर तक, और मैं हूँ एक अनजान चेहरा,  जैसे कि वो सोते हैं फूलों पर, ऐसे ही मैंने भी खरीद लिया, एक बाग अपने आराम के लिए, नहीं चुकाकर ऋण बैंक का, इसमें अब मेरी क्या खता है, माफी मैं नहीं मांगता। उनको मालूम है हकीकत मेरी, याद है उनको मेरे अहसान भी, कैसे जी रहा हूँ मैं वतन में, लेकिन नहीं बेचा है मैंने, सच में अपना यह वतन, जैसे कि उन्होंने बेचा है, अपना देश और जमीर, ऐसे में गुनाहगार मैं नहीं, माफी मैं नहीं मांगता। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

आपकी तरहां मैं भी

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आपकी तरहां बिल्कुल आप सा ही, मैं भी हूँ एक इंसान इस जमीन पर, आप अमीर है तो मैं दौलत दिल की, मैं भी आपकी तरहां मालिक हूँ अपना, आप गरीब है तो मैं भी गरीब झूठ का बिल्कुल खाली हाथ आपकी तरहां मरने पर, गुलाम हूँ मैं भी आपकी तरहां अपने रब का, और जी रहा हूँ मैं भी जी आजाद आपकी तरहां। फिर भी आप समझते हो मुझको अलग इंसान, मुझमें भी तो है एक इंसान मौजूद आपकी तरहां, लेकिन ना मैं हिन्दू हूँ और ना ही मुसलमान, मैं स्वयं गुरु हूँ हर दीन का इंसानियत के लिए, आबाद हूँ मैं भी आपकी तरहां यहाँ कहीं पर, और जी आजाद हूँ निभाने को अपना फर्ज। लगते हैं यहाँ आपकी तरहां नारे मेरे भी, निकलता हूँ बाहर तो होती है भीड़ मेरे साथ भी, जिंदाबाद, जिंदाबाद कहते हुए मुझको सच में, हाँ ,यह सच है कि मैं बोलता कम हूँ , फिर भी देखता हूँ सब कुछ आपकी तरहां, और समझता हूँ सब कुछ आपकी तरहां, सच मैं भी एक हस्ती हूँ आपकी तरहां, इस जमीं पर ,जी आजाद इस हिंदुस्तान में। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

सच, एक दिन

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तुम आज जो हंस रहे हो, जिसकी खामोशी को देखकर, उसके मुर्दनी स्वर पर, जो निकलता है उसके कण्ठ से, या फिर उसकी तूलिका से। अपने तरकश के तीरों से तुम, हाथों में लेकर गर्म छड़ें तुम, कर रहे हो उसके टुकड़े आज, शून्य का भाव उसमें पैदा कर, किया है जिसको तुमने, निर्मूल और पतझड़ सा एक दरख़्त। तुम विश्वास करो या मत करो, यही वृक्ष इस जमीन पर, इसी आतप में बनेगा वटवृक्ष, एक ऐसी पहेली जो कभी, नहीं सुनी होगी तुमने जीवन में, और नहीं पढ़ी होगी कभी, किसी किताब में तुमने  ऐसी एक अमर कृति, श्रृंगारित संस्कारों से इस धरा पर, जिससे आबाद होगा उसका नाम, उसकी मातृभूमि करेगी गर्व,  उसके संघर्ष और संस्कारों पर, और होगा उसका नाम अमर, सच , एक दिन। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

जी हाँ, मैं

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रचना चाहता हूँ मैं, एक ऐतिहासिक पवित्र दर्शन, गौरवान्वित एक सत्य, अकंलक एक प्रतिष्ठा, अपनी नई रचना में। महकाना चाहता हूँ मैं, एक फूल मेरी वाटिका में, तरु की तरह सींचकर, अपने खून-पसीने से, अपने इस जीवन में। दिलाना चाहता हूँ मैं, उसको इज्जत और कीर्ति, महानुभावों एवं सन्तों से, सृष्टि के सृजनकर्ता से, हर महफ़िल- सभा में। बैठाना चाहता हूँ मैं, उसको अपनी पलकों पर, मोहब्बत की मूरत बनाकर, एक स्वच्छ निर्मल बिम्ब स्वरूप, सुसंस्कृत सभ्य स्त्री के रूप में। इस जमीं पर उसको, एक अमर कृति के रूप में, वर्तमान में और भविष्य के लिए, अमर करना चाहता हूँ मैं, अपनी लेखनी से उसको, जी हाँ, मैं। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

इंसानियत बनाती है

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 इंसानियत बनाती है, धरती को जन्नत यारों।  जिंदा रहे इंसानियत, मांगों ऐसी मन्नत यारों।।     इंसानियत बनाती है-----------------।। इंसानियत बढ़ाती है, प्रेम- भाईचारा देश में। रहता है इससे चैनों-अमन, आबाद किसी देश में।। रहता है इससे सुरक्षित वतन, और खुशियों की बरकत यारों। जिंदा रहे इंसानियत, मांगों ऐसी मन्नत यारों।। इंसानियत बनाती है-----------------।। अमीरी-गरीबी में भेद, मिट जाता है इंसानियत से। मिलती है शरण अनाथों को,धरती पर इंसानियत से।। जीते हैं सभी खुश होकर तब,होती है खुशी उन्नत यारों। जिंदा रहे इंसानियत, मांगों ऐसी मन्नत यारों।। इंसानियत बनाती है------------------।। खुशहाल रहे यह अपना वतन, आबाद रहे यहाँ धर्म सभी। नफरत की खड़ी हो दीवारें, नहीं ऐसा हो यहाँ कर्म कभी।। इंसानियत सिखाती नहीं, ऊंच-नीच,नफरत यारों। जिंदा रहे इंसानियत, मांगों ऐसी मन्नत यारों।। इंसानियत बनाती है-------------------।। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

मुझसे सवाल करते हैं

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लोग मुझसे सवाल करते हैं कि, मेरी औकात क्या है, बात करते हैं कि, मेरा जमीर क्या है, पूछते हैं मुझसे कि, मेरी जात क्या है। जैसे कि मालूम नहीं हो, कहते हैं मेरा नाम क्या है, मैं किस देश का है, मेरी जन्मभूमि कहाँ है, जिसकी मिट्टी से मैं बना हूँ, कहते हैं कि मेरी भाषा क्या है। मुझसे सवाल करते हैं कि किस ईश्वर को मैं मानता हूँ, किस देवता की पूजा करता हूँ, किस की तस्वीर रोजाना, मैं चढ़ाता हूँ फूल हाथों से, और कहते हैं कि, मैं किस धर्म से हूँ। कभी पूछते हैं मुझसे, करीब बैठाकर प्यार से, मेरे सपनें क्या है,  मेरी मंजिल क्या है, किससे मैं प्रेम करता हूँ, क्या जवाब दूँ मैं उनको, करना होगा अभी इंतजार। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

राज उसको मालूम नहीं हो

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देखा है उसको हमेशा, मुस्कराते हुए मैंने, रुलाना नहीं चाहता उसको, दूर रहता हूँ इसीलिए उससे, कहता नहीं हूँ उससे मन की बात। नफरत है मेरी सूरत से उसको, और मैं करता हूँ प्यार उसको, पी लेता हूँ अपने ऑंसुओं मैं, महफ़िल में छुपकर उससे, ताकि बदनाम नहीं हो वह। खिलता हुआ गुलाब है वह, लाजवाब माहताब है वह, दीवानें है हजारों उसकी सूरत के, लेकिन बेख्याल है वह इनसे, मैं छुपाता हूँ उसको इनसे। ताकि वह नासाज नहीं हो, शायद उसको होगा यकीन, मेरी शराफत और प्रेम पर, मगर रहना चाहता हूँ मैं, उससे अभी दूर इसलिए कि, वह खुश और आबाद रहे, और राज उसको मालूम नहीं हो। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

मुझको मत बुलाइये

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जी हाँ, मैं नहीं चाहता कि, बिगड़ जाये तुम्हारा काम, मेरी दर्द भरी कहानी से, अभी मैं ठीक नहीं हूँ, मुझको मत बुलाइये। आप नामवर हो जहां में, आपकी शौहरत है जहां में, आप हाकिम है साहेब, मखमल बिछा है आपके चरणों में, गन्दा हो जायेगा मेरे कदमों से, मुझको मत बुलाइये। बहुत गन्दा है मेरा धंधा, मलिन बस्ती में रहता हूँ मैं, आश्रित हूँ मैं भीख पर, बिल्कुल अनपढ़ हूँ मै, बोल नहीं पाऊंगा अच्छी भाषा, आप इज्जतदार है, मुझको मत बुलाइये। कोई नहीं मेरा रखवाला, नहीं है कोई मेरा भविष्य, पल-पल में बदलता रहता हूँ मैं, अपना रूप और जुबान, नहीं निभा पाऊंगा, मैं अपना वचन आपसे, क्योंकि मैं गरीब और पिछड़ा हूँ, मुझको मत बुलाइये। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

हाँ, मुझको कुछ कहना है

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मैं भी तो इंसान हूँ , उन्हीं की तरहां, जो रहते हैं इस जमीं पर, और जुटाते हैं कुछ साधन, खुद को सुखी बनाने के लिए, अपना नाम कमाने के लिए। हाँ ,मैं कुछ वैसा नहीं हूँ, जो जीतने को दुनिया की दौड़, गिराते हैं पैर मारकर दूसरे को, जिनका नहीं है कोई कसूर, या खरीद लेते हैं दौलत से, इंसान और दुनिया को सच में। हाँ, मैं ऐसा इंसान हूँ , जो चाहता नहीं है कभी, किसी की बद दुहाएँ, कामयाब बनने के लिए, किसी का मकान गिराना, अपना मकान बनाने के लिए। डरता हूँ मैं रस्मों-रिवाज से, करता हूँ शर्म भगवान की, आ जाते ऑंसू आँखों में, किसी का रुदन सुनकर, आ जाती है दया मुझको, किसी की बर्बादी देखकर। बेच नहीं पा रहा हूँ अपना धर्म, बना नहीं पा रहा हूँ अपना महल, बहा नहीं पा रहा हूँ किसी का खून, जमीं पर अपना खौफ जमाने के लिए, बन नहीं पा रहा हूँ मैं कातिल, क्योंकि मैं डरता हूँ सच में, इंसानियत और पाप से, हाँ, मुझको कुछ कहना है। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

तलाश रहा हूँ कुछ शब्द

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तलाश रहा हूँ कुछ शब्द, अपने लिखे काव्य में,  ताकि आवाज उसको दे सकूँ, और आरंभ कर सकूँ मैं, अपनी बात को कहना, आज की इस सभा में। देख रहा हूँ उसको, आज की मजलिस में, अंतिम पंक्ति में बैठे हुए, अपनी पलकों को झुकाये, अपने होठों पे खामोशी लिये। समझ रहा हूँ मैं, उसकी मजबूरी को, उसके मन की पीड़ा को, उसके मन की कहानी को, पर्दे के पीछे के राज को। फिर भी कहना तो है मुझको, आज की इस महफिल में, किस नाम से पुकारूँ उसको, क्या नाम दूँ मैं इस रिश्ते को, या बन्द कर दूँ अपनी बात को, या आगे की कहानी लिखूँ , और क्या रखूँ उसका शीर्षक, तलाश रहा हूँ कुछ शब्द। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला-बारां(राजस्थान)

जी हाँ, प्रगति के पथ पर

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जी हाँ, हम बढ़ रहे हैं, विकासशील है हम, विकसित बनने के लिए, जीत रहे हैं हर दौड़, राष्ट्र दौड़ रहा है, प्रगति के पथ पर। फुरसत नहीं है किसी को, सब एकाग्रचित्त है इस दौड़ में, गरीब भी दौड़ रहा है, तो अमीर भी दौड़ रहा है, और नारी भी दौड़ रही है, इस प्रगति के पथ पर। गरीब पसीना बहा रहा है, अमीर पैसा बहा रहा है, नारी बेड़ियां तोड़ रही है, बुलन्दी को छूने के लिए, शान्ति से जीने के लिए प्रगतिशील हैं ये सभी, इस प्रगति के पथ पर। और पीछे नहीं है दीवानें भी, अपनी लक्ष्मी को पाने के लिए, दौड़ रहे हैं स्वयम्भर में, तैयार है हर प्रकार की जंग के लिए, चाहे जायज हो या नाजायज, और दिखाना चाहते हैं, कि हम किसी से कम नहीं,  आजमा रहे हैं सब अपनी किस्मत, जी हाँ, प्रगति के पथ पर। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला-बारां(राजस्थान)

कितने हम बदले और कितनी हमारी मानसिकता

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बदल गई है प्रकृति और ऋतुयें भी, वक़्त के साथ सन्तुलन बनाने के लिए,  अपने को संवारने और खुश दिखाने को, पहुंच गए हम भी प्रगति के शिखर पर, और हमारी परम्परायें और सभ्यता,  बदल गई है हमारे जीवन और व्यवहार में। जाति और गरीबी के आधार पर शोषण में वृद्धि है, भूल गए हम अपनी संस्कृति के संस्कारों को, राम के आदर्शों को अपने जीवन से दूर कर दिया, सीता स्वरूप आदर्श पत्नी एक बोझ है जीवन में, कृष्ण , अर्जुन और युधिष्ठिर को पर्दे के पीछे रखा है। जाति - धर्म और मजहबी झगड़ों में इजाफा हुआ है, नारी के शोषण और उसके साथ दुष्कर्म में वृद्धि हुई है, आडम्बरों , अंधविश्वासों और पाखंडों में वृद्धि हुई है, दोस्ती , रिश्तों और सम्मान में भेदभाव बढ़ा है, जबकि हमारी साक्षरता में तो इजाफा हुआ है। दौलत और शोहरत को देखकर बनते हैं रिश्ते अब, दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या में वृद्धि हुई है, हालांकि नारी शिक्षित और सक्षम बन गई है, देश के उच्च राजनीति पदों पर नारी पहुंची है, हर विभाग के उच्च पदों और आसमां को, नारी ने छुआ है अपनी प्रतिभा के दम पर, फिर वंश की वृद्धि के लिए पुत्र की मांग, नर और नारी की मानसिकता से नहीं...

शायद किस्मत में यही लिखा है

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पूछा है इन आँसुओं से मैंने, जो बहते रहते हैं अक्सर, खामोश इन आँखों में, झांककर देखा है मैंने, पर्दा करने वाली इन पलकों को, छूकर किया है अहसास मैंने। क्यों झुकी हैं ये इतनी, क्यों मायूस है ये चेहरे, क्यों नहीं कहते हैं ये , अपने मन की कहानी, क्यों नहीं बढ़ाते ये कदम, हाँ, मैंने इनको करीब से देखा है। उन आँसुओं को गिरते हुए, छुपाकर अपने प्यार को, दो गज अपनी जमीन को, अपने सीने से चिपकाये, सींचते हुए अपने खून-पसीने से, मगर उफ तक नहीं करते हुए। सहनशीलता की इस मूर्ति को, हंसकर सहते हुए अपनी पीड़ा को, समाज के तानों को को सुनते हुए, बड़े लोगों के जुल्म को सहते हुए, नहीं मांगते हुए इंसाफ और मदद, शायद ये आंसू डरते हैं कानून से, शायद किस्मत में यही लिखा है। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

मुझको इंतजार है तुम्हारे जवाब का

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माना कि तुम मुझको जानते हो,  मेरा नाम, मेरा काम - शहर को,  और मेरी सच्चाई को जानते हो,  और मालूम भी है यह सच कि,  हम दोनों का जन्म हुआ है,  इसी धरती और वतन में l तुम भी पढ़े -लिखे हो,  मगर कुछ सवाल है,  जो आते हैं अक्सर,  मेरी जुबां - जेहन में,  नहीं चाहकर भी मैं,  पूछ रहा हूँ आज तुमसे l क्या हम आज़ाद हैं,  क्या हम में कोई बुराई नहीं,  क्या सभी आबाद हैं यहाँ,  क्या अब यहाँ नहीं हैं,  भुखमरी और बेरोजगारी,  देश की आजादी के बाद भी,  जी. आज़ाद हिंदुस्तान में l हम पूछते हैं इंसान की जाति,  विश्वास करते हैं अंधविश्वासों पर,  बाँट रखा हैं खुद को मजहबों में,  सीख नहीं पाए हम आजादी के बाद,  मिलजुलकर जीना हम इंसान बनकर,  जान नहीं पाए उस लहू को हम,  जो बहता हैं सभी के रगों में,  क्योंकि मेरी तरह तुम भी,  एक हिंदुस्तानी और देशभक्त हो,  मुझको इंतजार हैं तुम्हारे जवाब का l शिक्षक एवं साहित्यकार  गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी. आज़ाद  तहसील एवं जिला - बारां (राजस्थान )

देखेंगे हम तो आपको

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देखा नहीं उनको तो कभी,जिनको लोग याद करते हैं। देखेंगे हम तो आपको , कि अब आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी----------------।। कहती जिनकी कहानी, यह जमीं ये हवाएं। पढ़ी है मैंने तो सिर्फ किताबों में, ये कथाएं।। किसने लिखी यह दास्तां ऐसी, अपने बलिदान से। देखेंगे अब इस देश के लिए, कुर्बान आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी-----------------।। कौन हुआ है शहीद इसके लिए, नींव का पत्थर बनकर। कौन है तैयार इसके लिए, करने खत्म खुद को हंसकर।। किसको नहीं है मोहब्बत, यहाँ अपनी जिंदगी-सुख से। देखेंगे अब इस देश के लिए, त्याग आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी------------------।। उत्सुक है हर कोई यहाँ, देश का ताज पहनने को। बनकर कंगूरा देश में , अपना नाम अमर करने को।। बहुत आसान है लिखकर गजल, महफ़िल में सुनाना। देखेंगे अब इस देश के लिए, बलिदान किसका करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी-----------------ll शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

हे वतन , क्या होगा तेरे कल का

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देखकर आज इंसान की हरकतों को, उसके लफ्ज़ और उसके कारनामों को, सोचता हूँ तेरे बारे में , हे वतन, क्या होगा तेरे कल का ? पुकारता हूँ उस मालिक को, जिसकी रचना है इंसान, जो होकर गुमराह इस प्रकार, अपने स्वार्थ के लिए, कर रहा है ऐसे कुकृत्य, जिनसे नहीं है अमन वतन में। कर रहा है वह विश्व में, नाम बदनाम तेरा सच में, कर रहा है धूमिल तेरी वह तस्वीर, जो बनाई थी तेरे सपूतों ने, देकर अपना बलिदान, तुमको दासता से मुक्त कराने के लिए। लिखा था जो भविष्य तेरा, उन शहीदों ने लहू अपना बहाकर, सब रिश्तें- नाते तुझपे कुर्बान करके,  देने को हंसी-खुशहाली नई पीढ़ी को। लेकिन आज देखकर नई पीढ़ी को, जो कर रही है तेरा सौदा विदेशों में, तेरे महापुरुषों की विरासत का, और बुझा रही है वो ज्योति, जो जलाई थी तेरे सपूतों ने  तुमको रोशन करने के लिए, लेकिन कर रही है बर्बाद, यह नई पीढ़ी उन सभी को, अपनी जठराग्नि को बुझाने को, सोचता हूँ और आश्चर्य करता हूँ, हे वतन, क्या होगा तेरे कल का ? शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

क्या था, क्या हो गया

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मुझको मालूम नहीं था बिल्कुल भी, मोहब्बत किस चिड़िया का नाम है, और किस तरह जुड़ते हैं, दो अजनबी दिल आपस में, अंजान और नादान था मैं। हुई जब उससे पहली मुलाकात, देखकर उसकी खामोशी को, चांदनी सी उसकी सुंदरता को, बेमिसाल उसकी खूबसूरती को, होता गया उसके नजदीक मैं, और जुड़ते गए दिल के तार उससे। लेकिन भूलता गया ऐसे में मैं, अपने अजीज दोस्तों को, अपने परिवार के रिश्तों को, अपनों की प्रार्थनाओं को, अपने माता-पिता के प्यार को, उससे नजदीकी और प्यार में। हमेशा चंचल रहने लगा, मेरा दिल उससे मिलने को, मेरे कदम उसके घर जाने को, उससे बातें करने को, उसके निमंत्रण के बिना, बिना मान- सम्मान के मैं। लेकिन मालूम नहीं था, वह करेगा मुझको बदनाम, मुझको बर्बाद जीवन में, वह देगा मुझको ऐसा दर्द, मेरे प्यार के बदले तोहफे में, क्या था, क्या हो गया। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

या खुदा बचा लेना उसके दामन को

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पूछता हूँ हर बार यही सवाल, जब भी जाता हूँ उसकी दर पर मैं, क्या नहीं मिला तुमको मेरा प्यार, जब भी वो मिलता है मुझको, किसी भी राह या मंदिर में। वो कहता है मुझसे, कुछ भी नहीं हुआ है तेरे यार को, सलामत है तेरा यह यार हर कहीं, कोई नहीं पहुंचा सकता चोट,  तेरे इस यार को सच में। मगर मुझको नहीं होता है विश्वास, उसकी बातों पर सच में दिल से, उसकी चंचलता को देखकर, उसकी शरारत को देखकर, उसकी नादानी को देखकर। आवाज देकर पुकारता हूँ मैं, दीपक लेकर तलाशता हूँ मैं, मंदिर में जाकर प्रार्थना करता हूँ मैं, दुहा करता हूँ मैं खुदा से, करता हूँ उसकी सलामती की फरियाद। मगर उसको क्या शक है मुझसे मिलने में, उसको क्या डर है दर्द मुझको सुनाने में, फिर भी लगे नहीं दाग उस चांद पर, उसके पवित्र शरीर - दामन पर, लुटे नहीं उसकी अस्मत कभी , किसी गैर के हाथों मेरे मालिक, या खुदा बचा लेना उसके दामन को। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

वह लता

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दरख़्त से लिपटी हुई वह लता, जो पुलकित कर देती है मन को, अविराम हवा की भांति, गतिशील रखती है मेरे विचारों को, चाहे वह है स्वप्न मेरे लिए, अविस्मरणीय याद मेरे लिए। उसकी मौन अभिव्यक्ति, जो सृजित होती है मेरी कलम से, हर महफ़िल में शिरकत में, हर कोई पूछता है प्रश्न मुझसे, मेरी रचना को देखकर , वह अलभ्य है मेरे लिए, और मुश्किल मेरा उस मंजिल तक, पहुंचना और उसको सीने से लगाना। मगर मुझको विश्वास है कि, कुछ भी हो फिर भी वह, नहीं मुझसे अपरिचित, और नहीं हूँ मैं दूर, उसकी स्मृति में , उसकी बातों और दर्द में। लेकिन वह करीब है, हर पल मेरे विचारों में, मेरे अदब और मेरे रचना में, मेरे काव्य की प्रेरणा बनकर, काव्यात्मा बनकर हर वक़्त, जिसको स्वीकार करता है, यह संसार और हर कवि। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)