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तेरी मेरी कहानी

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            जब हम और तुम सपनों में ही मिल लेते हैं तो बेवजह मिलने मिलाने की जरूरत क्या है।  इश्क इक आग का दरिया है कोई समंदर नहीं फिर इसमें कूद के जाने की जरूरत ही क्या है।  सरे दुनिया में ढूढ़ लिया है जब तुमको  ही अब किसी और पे मरने की जरूरत क्या है।  सिर्फ तेरी मेरी कहानी लिखी है इस जीवन ने फिर मुझे गैर के पास जाने की जरूरत क्या है।  तुम कहते हो दिल का हाल समझ लेते हैं बिन कहे फिर आपस में खतों किताबत की जरूरत क्या है।  तेरे इश्क़ में हैं हम गुम की मुझमे बस गए हो तुम अब मुझे किसी और डगर जाने की जरूरत क्या है।  तुम कहते हो अब छोड़कर कहीं न जाएंगे तुम्हें फिर बार-बार के कसमों वादों की जरूरत क्या है।                                 (अनिता कुशवाहा)                                 मौलिक एवं स्वरचित

ऐसा भी एक बचपन

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जहाँ बोझ है शैशव पर जिंदगी का वहाँ पर मासूमियत किस तरह से दम तोड़ती है  ये सिर्फ सहानुभूति का ही विषय नहीं जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी भी है जब उम्र हो पढ़ने की और बचपन को जीने की हाथबफैलान पड़ता है दूसरों के आगे सारी ख्वाइशें और चाहतें दम तोड़ जाती है पाई पाई को मोहताज है ये बचपन क्या कभी मुक्त कर पायेगा ये जहां ये हम सब की जिम्मेदारी ही नहीं कर्तव्य भी है कि हम अपने मसरूफ जीवन से कुछ समय निकाल कर इनके बारे में सोचें और  कोई राह निकाले जिससे ये भी जी सकें अपना बचपन।                         (अनिता कुशवाहा)                        मौलिक एवं स्वरचित

शतरंज

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                जिंदगी मानो शतरंज की बाजी है हम सब इसके मोहरे हैं हमें फूंक फूंक कर समय की चाल के हिसाब से चलना पड़ता है जिंदगी ने जो बिसात बिछाई है इसमें हम सब कठपुतलियां है हमे समय की चाल के अनुसार ही  अपनी अपनी चाल चलना पड़ता हैं कब शह मिलेगी कब मात कहना मुश्किल है अचानक बीच में कौन बोल दे चेक और हम स्तब्ध खड़े रह जाते हैं सही चलती जिंदगी की बाजी कब पलट जाये कौन कह सकता है ये समय की चाल कभी हमें जिता देती है कभी हम मात खा जाते हैं ये दौर यूं ही चलता रहता है और एक दिन  एक झटके में सब खत्म हो जाता है और ये बाजी खत्म ये समय की चाल अच्छे अच्छे को जीने का शऊर सिख देती है बस अगर हमने जिंदगी में कुछ अच्छे कर्म किये हैं तो वही रह जाता है बाकी सब शून्य है।                         (अनिता कुशवाहा)                         मौलिक एवं स्वरचित

मजबूर बचपन

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जहाँ बोझ है शैशव पर जिंदगी का वहाँ पर मासूमियत किस तरह से दम तोड़ती है  ये सिर्फ सहानुभूति का ही विषय नहीं जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी भी है जब उम्र हो पढ़ने की और बचपन को जीने की जिम्मेदारियों तले रौंद दी जाती हैं सारी ख्वाइशें और चाहतें ये दम तोड़ता बचपन  ये खुशियों की उम्र में कुचलता यौवन क्या कभी मुक्त कर पायेगा ये जहां ये हम सब की जिम्मेदारी ही नहीं कर्तव्य भी है कि हम अपने मसरूफ जीवन से कुछ समय निकाल कर इनके बारे में सोचें और  कोई राह निकाले जिससे ये भी जी सकें अपना बचपन।                         (अनिता कुशवाहा)                        मौलिक एवं स्वरचित