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💫 कैसे समझाऊंँ?

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बात सरल है अर्थ अबूझे  कैसे समझाऊँ? जितना ऊर धारूँ में तुमको  खोती ही जाऊँ चैन मिला तो बस एक तमसे  है बेचैनी कैसी बाली उमर में कोई सुहागन विधवा के जैसी सहज सादगी सरल हृदय  भूल नहीं पाऊंँ  जितनी मैं सुलझाऊँ माला उलझाती जाऊंँ डगमगाते पैर आज क्यों  समझ नहीं आता  संकल्पों से भरा हुआ मन धीरज न पाता है कैसी नजदीकी ये कि दूर बहुत पाऊंँ प्रेमाकुल व्याकुल प्राण हैं बेबस हो जाऊंँ उड़ना चाहूंँ नील गगन में पंख कटे पाऊंँ दिखती भरी-भरी सी भीतर रिक्त बहुत पाऊंँ सांँझ ढले सूनी राहों में  मेला लगता था  ये लोक परलोक के जैसे स्वर्ग लगता था ढूंँढ रहीं पथराई आंँखें  ढूंढ नहीं पाऊंँ दीप है छोटा तूफानों में  जला नहीं पाऊंँ हे अज्ञात परम प्रेमी तुम  रस बरस जाओ  जन्म-जन्म से प्यासी हूँ मैं प्यास बुझा जाओ आलिंगन में लेकर मुझको प्रेम राग गाओ प्रेमामृत से बंजर मन में  फूल खिला जाओ ✍️ आरती 'अक्षरा'🌹 छतरपुर  मध्य प्रदेश