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Showing posts with the label सतीश निर्दोष

--- क्यों नही आज ---

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गर बिछड गया जो,कल को मै तुमसे.... तुम आंसू बहाओगे पर वो देख कहां मै पाउँगा! गर करते हो प्यार जो इतना तो जताते क्यों नही आज!! फूल चढ़ाओगे मेरी अर्थी पर पर वो खुशबू कहां मै ले पाउँगा! गर चाहते हो खुशबू फैलाना तो वो फूल भेजते क्यों नही आज!! तब बांधोगे तारीफों के पुल पर वो सुन कहां मै पाउँगा! गर बात मेरी कोई अच्छी लगती है  तो बताते मुझको क्यों नही आज!! तब सोचोगे काश बिता पाते पल कुछ और हमारे साथ! मिले है पल जो ये किस्मत से जी लेते उन्हें क्यों नही आज!! भुला दोगे सब गिले-शिकवे तब पर जान कहां मै पाउँगा! गर मिल सकते है भुला कर सब  तो फिर मिलते क्यों नही आज!! तरसोगे सुनने को इक आवाज़ मेरी  पर तब बोल कहां मै पाउँगा! गर दिल चाहता कुछ बात करें हम  तो फिर करते क्यों नही आज !! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

-- मेरा महबूब ---

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वो चाँद सा मुखड़ा उसका  होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से लगे बहते हुए झरने हों कोई जो खिलखिला कर वो हँस दे! वो सुराही सी गर्दन उसकी  कजरारे से वो नयन नशीले  उठा कर पलके झुका ले जो  मदहोश सभी को वो कर दे! वो बलखाती नागिन सी कमर  उसपर लहराते काले बाल  लगे मोरनी विचर रही हो  जो मटक मटक कर वो चल दे! मन-मदिर मे घंटिया बजादे  वो बेपरवाह उसकी अंगड़ाई  महकते बदन की खुशबू से  सब घर-आँगन को वो भर दे! जो खिलखिलाकर वो हंस दे!! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

वफ़ा कौन करेगा

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हस्ती को मुहब्बत में फ़ना कौन करेगा! जब हम ना रहेंगे तो वफ़ा कौन करेगा !! ये माना मेरी जान मेरी ये सलोनी सूरत खटकती है तुम्हारी आँखों में काँटों सी मगर काँटे ही किया करते हैं फूलों कि हिफाज़त ये हक़ सिवा मेरे फिर अदा कौन करेगा! जब हम ना रहेंगे तो वफ़ा कौन करेगा!! ये माना मेरी जान कि तुम हो दुश्मन मेरी इस जान के मगर आज तक फिर भी दुआ करते आए हैं कि ए ख़ुदा मेरे दुश्मन को सलामत रखना वरना मेरे मरने कि दुआ कौन करेगा! जब हम ना रहेंगे तो वफ़ा कौन करेगा!! ये माना मेरी जान मिलनी हैं जफ़ाएं मुझको लाख वफ़ाओं के बदले मगर गुनगुनाता हूँ हर वक़्त अकेले में मेरे हाथों की लकीरों को देख जरा नजूमी ये बता कि मेरे संग वफ़ा कौन करेगा! हस्ती को मुहब्बत में फ़ना कौन करेगा जब हम ना रहेंगे तो वफ़ा कौन करेगा!! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा)

दुनियादार

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भगवान के घर से कुछ गधे फरार हो गए! कुछ तो पकड़े गए कुछ दुनियादार हो गए !! बेईमानी की कमाई ऐसी फली - फूली कि कल तक जो खुद हमारे रहमो करम पर पलते थे आज वो ही हमारे पालनहार हो गए ! कुछ तो पकड़े गए कुछ दुनियादार हो गए!! इंसा को आज  रंग बदलते देर नही लगती कल तक जो यूं दूर खड़े थे  जायदाद के लिए आज वो ही सबसे करीबी रिश्तेदार हो गए ! कुछ तो पकड़े गए कुछ दुनियादार हो गए!! आज यूहीं नही है हमारी बेटियों की आबरू खतरे में कल तक जो ख़ुद रहे शामिल गुनाहगारों के झुंड में आज वो ही उनकी इज्जत के पहरेदार हो गए! कुछ तो पकड़े गए कुछ दुनियादार हो गए!! गुनाहों के दलदल में ये जवानी यूं फसती जा रही  अब कौन इससे बचा पाएगा  क्योंकि जो इस चक्रव्यूह को तोड़ सकते थे आज वो सब 'निर्दोष' ख़ुद गुनहगार हो गए! भगवान के घर से कुछ गधे फरार हो गए कुछ तो पकड़े गए कुछ दुनियादार हो गए!! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

मै एक कवि बनना चाहता हूँ

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मै एक कवि बनना चाहता हूँ  मै एक कवि बनना चाहता हूँ! टूटी फूटी दो चार लाइनों को जोड़कर विसर्ग, मात्राओं की परवाह किए बगैर कोई नई, आधुनिक पद्द्ति की कविताएं रचना चाहता हूँ ! मै एक कवि बनना चाहता हूँ !! चिड़ियों के चहचहाने झरनों के बहने मूक खड़े पर्वतों के कुछ कहने से लेकर हल चलाते किसान उसके बैल और निर्जीव समझे जाने वाले हल तक पर लिखना चाहता हूँ ! मै एक कवि बनना चाहता हूँ !! कश्मीर की मुरझाई हुई मासूमियत डरे, सहमे हुए चेहरों विधवाओ के सूख चुके आंसू अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहते कश्मीरी पंडितों से लेकर दहशत की आग फैलाते उन वहशी दरिंदो  तक पर लिखना चाहता हूँ! मै एक कवि बनना चाहता हूँ !! आज सम्पूर्ण मानवता पर छाई इस महामारी की गर्दिश हर रोज लगते लाशों के ढेर  अपने सामने  अपनों को यूं बिछड़ते देखने की बेबसी से लेकर मदद को बढ़ते हाथ और अब भी लूटने वालो तक पर लिखना चाहता हूँ ! मै एक कवि बनना चाहता हूँ !! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

---- ख़ुदा है या नेता ---

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ए मालिक बता ये तू क्यों चाहता है - तेरा कोई  बंदा ना हरदम सुखी हों, कभी ना कभी वो जरूर दुख पाएं! घिसटते हुए फिर तेरे दर पे आए वो माथा यूं रगड़े  और फिर गिड़गिड़ाएं !! तू क्यों चाहता है कि हर कोई यहां पर, कभी ना कभी किसी अपने को खोए ! तड़फे दुःखों से ना रातों को सोये, तू पौछेगा आंसू पर पहले वो रोए !! तू क्यों चाहता है ये लम्बी कतारें, दुखियों की दुनिया मे बढ़ती ही जाएं ! तू क्यों चाहता है कि  रोते हुए ही, तेरे दर पे आएं और जयकारा लगाएं !! तुझसे तो अच्छे वो माता पिता हैं, जो हरदम ये चाहें कि उनके सब बच्चे ! कभी ना दुखी हों कभी ना वो रोएं, कभी ना हों वो बीमार भूखे ना सोएं !! तू क्यों ना ये चाहे कि हर कोई अपनी, सारी ही खुशियाँ तेरे दर पे मनाएं ! ना हो कोई दुःखिया ना रोता ना भूखा, फिर भी तेरे दर पे सब खुश हो के आएं !! कहीं धरती कापें जो भूकंप आए, कहीं जिंदगियों को कोरोना लील जाए ! क्या ये सब यूं कि कहीं ये सारी दुनिया, तेरे इस वजूद को भूल ना जाएं !! अगर ऐसा है तो तू कैसा खुदा है, बता मेरे नेताओं से तू कैसे जुदा है !!  सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

--- आ जाओ तुम ---

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पुकारते है तुमको हम आ जाओ तुम जहाँ भी हो सहा ना जाए ये अकेलापन  आ जाओ तुम जहाँ भी हो! ये शाम भी बड़ी सुहानी है  ठंडी पवन यूं अगन लगाए  मुझे मार ना डाले जुदाई ये  आ जाओ तुम जहाँ भी हो! चंचल से वो नयन नशीले  गहरी मादक मुस्कान तेरी सोच कर पागल हो ना जाऊँ  आ जाओ तुम जहाँ भी हो! बारिश की ये हल्की बूँदे  यूं तन मन को भड़काए  कहीं जल ना जाए ये बदन आ जाओ तुम जहाँ भी हो! थी ख़ुदा की भी मर्जी कुछ  जो उसने हमें यूं मिलाया मासूम तुम और निर्दोष हम आ जाओ तुम जहाँ भी हो! पुकारते है तुमको हम आ जाओ तुम जहाँ भी हो!! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा)

---उसके बिन ---

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वो सुबह अधूरी लगती है वो चाय अधूरी लगती है उसकी जो ना ख़बर मिले अख़बार अधूरे लगते हैं! वो शाम अधूरी लगती है महफिल वीरानी लगती है समझें ना जो जज्बातों को वो अपने बेगाने लगते हैं! वो रात अधूरी लगती है ना नींद सुहानी लगती है जिन ख़्वाबों मे वो ना आएं वो ख़्वाब अधूरे लगते हैं! अब तो उसके बिन मुझको हर बात अधूरी लगती है बरसात अधूरी लगती है सब मौसम विराने लगते हैं! वो बेगाना लगता अपना सा अपने बेगाने लगते हैं !! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

--- बेबसी---

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मै बेबस हूँ ये सब देखने के लिए रोते हुए रोज यूं मुस्कुराना तेरा गुजरते हर इक पल के एहसास से सूखे पत्तों सा यूं थरथराना तेरा! सूखे ठूठों को जिन्दा रखने के लिए बेवजह लहू अपना पिलाना तेरा औरों को रोशन करने के लिए घुट-घुट के यूं जलते जाना तेरा! इक हल्की सी रोशनी की चाह मे  घुप अंधेरों मे यूं डूब जाना तेरा बीते पलों के लौटने की आस मे हर आहट पर यूं चौँक जाना तेरा! मीठे झरने को पाने की झूठी चाह मे तपते रेत पर यूं चलते जाना तेरा मै जानता हूं कि मेरा दोष क्या हैं फिर भी मुझको 'निर्दोष' कह जाना तेरा! सूखे पत्तों सा यूं थरथराना तेरा हर आहट पर यूं चौँक जाना तेरा !! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

--- क्यूँ लगे ---

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जो नही है मेरा अपना वो ही अपना सा क्यूँ लगे ! रहूं दिन भर यूं खोया सा जो खोया हो कुछ अपना ये भी तो समझ ना आए जो कभी पाया ना था खोया है वो ऐसा क्यूँ लगे ! क्यूं सुबह सुहानी नही लगती क्यूं ये शाम उदास लगे रातों कि क्यूं नींद उड़ी है हकीकत में है जो बेगाना ख़्वाबों में वो अपना क्यूं लगे ! हम चाहें बस उसको ही वो शायद कुछ हमको भी उसके अपने और भी तो हैं  नही है हक जिसपर अपना  उस पर यूं जताने क्यूँ लगे! जो नही है मेरा अपना वो ही अपना सा क्यूँ लगे !! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

- भुगतनी तो होगी -

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चुनी है जो सज़ा ख़ुद ही वो भुगतनी तो होगी दवा हो चाहे कड़वी कितनी वो निगलनी तो होगी! हँसे है जो इतना हम  कभी यूं दिल खोलकर  रोने की भी जिम्मेदारी  अब पूरी करनी तो होगी! यूं ही नही मिलती यहां  सज़ा कोई किसी को भी  रही है हमारी करनी जैसी  वैसी अब भरनी तो होगी! हम तो है तैयार अकेले  ही भुगतने को सजा सारी  पर अफ़सोस कि उनको भी अब ये भुगतनी तो होगी!! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

-- घबराने से क्या होगा --

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मुश्किल है ये दौर मगर यूं घबराने से क्या होगा हम सब को मिलकर लड़ना है सिर्फ सरकारों से क्या होगा! वैक्सीनेशन, मास्क जरूरी और दो गज की दूरी भी मन को भी मजबूत बनाओ  यूं डर जाने से क्या होगा ! बनें हौसला इक दूजे का मिलकर लड़े लड़ाई हम आज नही तो कल जीतेंगे अभी रुक जाने से क्या होगा!! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

--- वक़्त ---

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जिंदगी का हर पहलू दिखाता हमें वक़्त है हों जो हम परेशा कभी तो बहलाता हमें वक़्त है! दो साथी गर बिछड़ जाएं जीवन के किसी मोड़ पर उन सच्चे प्रेमियों को फिर मिलाता भी तो वक़्त है!! तुम रह गए जो तन्हा तो घबराने कि क्या बात है तन्हाइयों को झेलना सिखाता भी तो वक़्त है! क्या हुआ जो आज यूं गलतफहमी कुछ हो गईं सही वक्त आने पे इसको मिटाता भी तो वक्त है!! 'निर्दोष' हो तुम फिर क्यों हो जिंदगी से यूं कटते बुझी शमा को फिर से रोशन बनाता भी तो वक़्त है! मिल ना पाते हों आज जो किसी भी वजह से उन  एहसासों को जज्बातों से मिलाता भी तो वक़्त है!! सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

--- किस्मत ---

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हर तरफ है मारामारी कहीं दवा कहीं ऑक्सीजन की पल पल साँसे टूट रही है अपनों की अपनों के आगे ! कितने टूटे कितने बेबस चाहकर भी कुछ कर ना पाएं देखो लाचारी दुनिया की नतमस्तक किस्मत के आगे !! --- सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

--- जीना ही होगा ---

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माना हैं हालात बुरे अब  हर ओर मचा है कौलाहल  पर जान बचाने को अपनों की  हर हाल मे लड़ना ही होगा ! औरों का भी साथ निभाएं  भूल के उनको बिछड गए जो  माना हैं ये कड़वे घूंट भले पर  हर हाल मे पीना ही होगा ! अपने और अपनों की खातिर  हर हाल मे जीना ही होगा !! --- सतीश निर्दोष

जमाने के सांचे में

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ज़माने के सांचे में अबतक ढ़ले नही हम चाहते हैं जैसा लोग वैसे बनें नही हम! इसीलिए नही है  कुछ ज्यादा दोस्त हमारे  लगता है दोस्ती के लिए बनें नही हम! बरसों अकेले रह सकते हैं जो ना मिले मन का कोई पर बेमन से कोई साथ रहे रहते वहां नही हम! आसान नही हैं झेलना हमको ज्यादा दिन इसीलिए मिलते किसी से  अब ज्यादा नही हम! जमाने के सांचे में अबतक ढ़ले नही हम !! मौलिक एवं स्वरचित सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

तपता हुआ रेत

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मै अपने आप को इस भीड़ में कुछ इस कदर खो देना चाहता हूं कि मै खुद भी अपने आप को ना पहचान सकूं! क्योंकि मुझे नफ़रत है इस झूठी शक्लो-सूरत से किसी दिन ऐसी ही तुम्हारी प्यारी सूरत पर मै ख़ुद को लुटा चुका हूं! मुझे क्या पता था - जिसे मैंने प्यार भरा बादल समझा वो सिर्फ धुएँ का एक ढेर था जो किसी के दिल की आग तो क्या बुझाता,उल्टा उसे जलाता है! जिसे मैंने मीठे पानी का झरना समझा वो तो तपता हुआ रेत था जो किसी मुसाफिर की प्यास तो क्या बुझाता,उल्टा उसे थकाता है! मै अब तक इसी मृग - मरीचीका में फंसा था इसीलिए पग पग पर ठोकरें खाता रहा तुम्हारी इस प्यारी सूरत को देखकर मीठे झरने की कल्पना तो करता रहा लेकिन यह ना समझ सका कि इस मीठे झरने कि असलियत तो तपता हुआ रेत है! जब से मैंने इस असलियत को समझा है मुझे हर मीठा झरना तपता हुआ रेत नजर आता है! इसलिए अब मै तुम्हारी तो क्या खुद कि शक्ल से भी दूर भागना चाहता हूं क्योंकि मुझे अपनी शक्ल में भी तपता हुआ रेत नजर आता है!! मौलिक एवं स्वरचित सतीश निर्दोष रेवाड़ी (हरियाणा )

--- उफ़ ये बेबसी ---

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उफ़ ये बेबसी.......मुझे जीने नही देती! देखता रहूं रोज डूबते हुए यूं अपनों को  ये ग़वारा तो नही मुझको पर बढकर आगे थाम लूं हाथ मै उनका  हालातों की आंधी ये इजाजत नही देती! मरने के डर से यूं हर रोज टुकड़ों मे मरना  ये पसंद तो नही मुझको  पर क्या होगा मेरे अपनों का जो मै ना रहा  ये सोच मुझे एक झटके मे मरने नही देती! यूं मिटा देता ये दुनिया की सारी तकलीफे जो होता मै ख़ुदा  पर जानता हूं क्या हैं हदें इक इंसान की  जो चाहकर भी ऐसा कुछ करने नही देती! उफ़ ये बेबसी मुझे जीने नही देती और अपनों की ये चाहत मरने नही देती !!

--- नही मालूम था ---

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कोई ऐसा भी मिल जाएगा,नही मालूम था! जो पाया था वो तो कब का खो चुके थे  क्या खोया और क्यों खोया ये सोचकर  उलझे हुए थे इस कदर एक अरसे से कोई यूं सुलझा जाएगा,नही मालूम था! कभी होते थे हम भी जिंदादिल मगर  लड़े हैं हालातों से बरसों तक कुछ ऐसे  कि जो मुस्कुराना तक गए थे भूल हम  कोई इतना हँसा जाएगा,नही मालूम था! बरसों से सूनी पड़ी थी आँखें जो मेरी उनमे भी कैसे कुछ नजर आया उनको  पतझड़ में भी हरियाली कैसे देंखे हम  कोई ये भी सिखा जाएगा,नही मालूम था! कोई ऐसा भी मिल जाएगा,नही मालूम था!!