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Showing posts with the label Rajani katare

"मजदूरों का दुख"

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                    छा गयीं काली घटायें,बादल दुखों के छाये,  माथे पर जो आयीं उनके, चिंता की रेखायें, अचानक से, लाकडाउन जो आया, प्रवासी मजदूरों पर, भारी पड़ गया,  काम बंद, फैक्टरियों में पड़ गये ताले,  बंद हो गये, रोजी रोटी के सारे दरवाजे,  रोजी रोटी का जुगाड़, कहाँ से होगा अब, बन गया था करोना, परेशानी का सबब,  छटपटाने लगे मजदूर, दुख से अपने,  लोट पायेंगे अब कैसे, हम घर अपने,  आने जाने के साधन, हो गये सब बंद,  किराया भाड़ा भरने, पैसा न था पास,  जिम्मेदारी भारी, आ गयी उन पर,  पत्नी बच्चे, भरा पूरा उनका परिवार,  मन लबालब उनका, दुखों से भर गया, मदद की लगी आस, पास कोई न आया, फैसला करना पड़ा, कोई न सानी, पैदल ही चलने की, घर जाने ठानी, चलते चलते, घर एक दिन पहुँचेगे,  रहे गर यहाँ तो, भूखे ही मर जायेंगे,  खाली है पेट, सफर लम्बा, चलना पैदल,  मन था दुखी, कदम भारी, चलना मुश्किल,  चलना रखा जारी, कठिन सफर हो गया,  कोई हो गया बेहोश, राह चलते गिर गया,  राह में ही कुछ...

"आज की नारी न बेचारी" हास्य काव्य

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नारी देखो अब, मौज मनाती, पतिदेव से सब, काम करवाती, नारी देखो अब..... खुद पलंग पर, आराम फ़रमाती, ऐ जी सुन लो अब, तुम मेरी बात, अब न करुं चाकरी, गया ज़माना,  सासू माँ जब, सब काम करवाती, नारी देखो अब..... चूल्हा चौका, और बरतन भाड़े, कर देती सब, मेरे मत्थे चढ़ाए, उन्ना लत्ता धो ले, तना बहुरिया, बुलाए फिर, हाथ पाँव दबवाती, नारी देखो अब..... अब आ गयी हूँ मैं, अपने रुप में, नहीं रही मैं बेचारी, अबला नारी, पैसा भी लाओ, घर भी सम्हालो, बहुत हुआ अब, मैं काम करवाती, नारी देखो अब..... घर का कूड़ा करकट, साफ करो, उन्ना लत्ता भी अब, सब फीचो तुम, बहुत करी बेगारी, जरा आराम करुं, कामचोरी क्या होती, तुम्हें बतलाती, नारी देखो अब..... खुद पलंग पर, आराम फ़रमाऊं, मजों से अब, फल-फूल खाऊं, पतिदेव से अब, रोटी बनवाती, तिगनी का देखो, नाच नचवाती, नारी देखो अब मौज मनाती, नारी देखो अब.....।      काव्य रचना-रजनी कटारे             जबलपुर म.प्र.

भारतीय संस्कृति का प्रतीक साड़ी"

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हमारी संस्कृति, का प्रतीक, पुरातन से चली, आ रही साड़ी, साड़ी ही पहनती, नारी जब, ब्याह कर, आ जाती ससुराल, पल्लू सीधा लिया, या उल्टा, ससुराल में होता, सिर ढकना, घुघंटा काढ़े, मुँह के नीचे तक, करती रहती ,सारे दिन काम, शुरु होती दिनचर्या, मुँह अंधेरे, झाड़ू कटका,बर्तन भाड़े, कपड़े, चूल्हा चौका कर,सम्हालो बच्चे, सेवा सुश्रुषा,सबकी करते रहना, बचा खुचा ही, खाकर पेट भरना, जी जान से, दिन रात जुटे रहना, पीहर की जब, याद सताये तो, चुपके से, अश्रु की धार पोंछना, यही कहलाता था, जीवन गौरव, गरिमामय थी, संस्कृति भारत की, इसीलिए शायद, बनी ये कहावत, आज भी दिया जाता, ये उदाहरण, अबला जीवन हाय,तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध, और आँखों में पानी ।      काव्य रचना-रजनी कटारे           जबलपुर (म.प्र.)

"मुबारक हो नौ रात्री"

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तर्ज:- मुबारक हो सबको समां ये सुहाना.... मुबारक हो मैया, ये तुमको नौ रात्रि, मैया आ जाना, आ जाना,आ जाना, मैया जी के माथे पे, बिंदिया भी सोहे, मैया जी के कानों में, झुमकी भी सोहें, सिंदूर को लगा के, झाले पहन कर, मैया आ जाना, आ जाना आ जाना, मैया जी के कंठ में, हरवा भी सोहे, मैया जी के हाथों में, कंगना भी सोहें, माला को सजा के, चूड़ी पहन कर, मैया आ जाना, आ जाना आ जाना, मैया जी के पावों में, पायल भी सोहें, मैया जी के पैरों में, बिछिया भी सोहें, पायल को छनका के, मेंहदी रचा के, मैया आ जाना, आ जाना आ जाना, मैया जी के अंग में, चुनरी भी सोहे, मैया जी के संग में, लंगूरे भी आयें, दीपक लगा कर मैया, भोग लगाऊँ, मैया आ जाना, आ जाना आ जाना, मुबारक हो मैया, ये तुमको नौ रात्रि, मैया आ जाना, आ जाना आ जाना ।     भजन रचना-रजनी कटारे           जबलपुर (म.प्र.)

"आत्मनिर्भरा नारी"

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                  आधुनिका नारी हूँ मैं, आत्मनिर्भरा हूँ मैं,  बाजुओं में दम है मेरे, अबला नहीं हूँ मैं, आधुनिका नारी हूँ मैं , आत्मनिर्भरा हूँ मैं,  गया वो ज़माना, जो दोहते थे मुझको, खूंटे से बंधी गाय, आज नहीं हूँ मैं, आधुनिका नारी हूँ मैं, आत्मनिर्भरा हूँ मैं,  रखते थे मुझको, बंद दरवाजों के पीछे, खोल कर दरवाजे सारे, आगे बढ़ गयी हूँ मैं, आधुनिका नारी हूँ मैं, आत्मनिर्भरा हूँ मैं,  घुंघटे में रखा मुझको, बाहर निकलने दिया नहीं, लाज शर्म में बांधा मुझको, वो बंधन तोड़ दी हूँ मैं, आधुनिका नारी हूँ मैं, आत्मनिर्भरा हूँ मैं,  लाज शर्म और हया, तो मेरा गहना है, इसको मैंने न छोड़ा है, रुढ़ियाँ तोड़ दी हूँ मैं, आधुनिका नारी हूँ मैं, आत्मनिर्भरा हूँ मैं,  करती हूँ वार त्यौहार, छोड़े नहीं संस्कार अपने, सजती संवरती हूँ मैं, रीत सभी निभाती हूँ मैं, आधुनिका नारी हूँ मैं, आत्मनिर्भरा हूँ मैं,  दरवाजे गर कोई आए, आदर सत्कार करती हूँ, अतिथि देव मान कर, मान सभी का रखती हूँ मैं, आधुनिका नारी हूँ मैं, आत्मनिर्भरा हूँ मैं,  जात...

"दोस्त होता है खास"

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                     यार, दोस्त, मित्र, सखि, सहेली, जो भी कह लो, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, संजीदगी में भी जो, चेहरे पर ला दे मुस्कान, फरमादार कह लो, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, परेशानियों हों कितनी भी, कैसी भी आएं मुसीबतें, खड़ा रहे जो साथ, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, हंसी ठिठोली करे, पेट में उठ जाए मरुड़, करे न कोई गिला शिकवा, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, हँसी मजाक भी करे, गलती पर आपकी जो, दे सके आपको समझाइश, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, दोस्ती में न होती कोई, जात पात न अमीरी गरीबी, कृष्ण सुदामा है मिसाल, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, दोस्तों के बीच कभी, न होता कोई दुराव छिपाव, किसी से न कह सकें जो बात, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, कब हो जाती बतियाते, सुबह से शाम रात, मन मिले का है ये सार, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, न ही कोई नाता, न कोई रिश्तेदारी, न ही खून का रिश्ता, दिल से दिल मिले का नाता, दोस्त!! होता तो है कुछ खास, मिले जो सच्चा दोस्त, न हो मन में कोई खोट, मिला है ईश्वर से तोहफ़ा, बन कर आया वो फ़रिश्ता, दोस्त ही तो है!!...

"भाग्य ने रंग जमाया"

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भाग्य ने अपना, रंग जमाया, रोके से रुके न, ये समय का पहिया, राजा से रंक बनाया इसने, रोते को हंसाया,  मुर्दे में जान फूंकी, राम जैसे राजा को, दे दिया चौदह वर्ष वनवास, विदेह नंदनी बन गयी, कानन की नंदनी, पति के श्राप से, अहिल्या बन गयी, एक पाषाण शिला, आए रघुवीर त्रेतायुग में, सति का उद्धार करने, दर्शन देकर देवकी को, सुत हुए वसुदेव के, कहलाए नंदलाल, खेलें यशोदा माँ के अंगना, गुरु कुल में जो खाए, सुदामा, गरीबी को झेला, दो मुट्ठी चावल के बदले, दे दिया, दो लोक का राजपाट, गौरा मैया ने बनवाई, स्वर्ण नगरी रहने को, रावण ने मांग ली अपने लिए, पंडिताई की दक्षिणा, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, न राजपाट बचा, खुद को भी बेच दिए, एक डुमार के हाथ, शर की शैया बन गयी, भीष्म पितामह की, इच्छा मृत्यु का वरदान, फंस गया समय के चक्र में, समय का पहिया, चलता जाए, इंसान की क्या बिसात, जब भगवान न बच पाए, भाग्य ने अपना.....।     काव्य रचना-रजनी कटारे           जबलपुर म.प्र.

"सरस्वती वंदना"

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        मनहरण घनाक्षरी छंद विधान- 8,8,8,7 कमल विराजती माँ, सरस्वती वंदनि हो, शीष मुकुट मणि माँ, कष्ट निवारिणि हो, ज्ञान प्रकाश देती माँ, दुखों की विनाशनि हो, मंगल करने वाली, पाप विमोचनि हो, गीत संगीत की देवी, भाव जगाने वाली हो, श्वेत वस्त्र धारिणी माँ, विघ्न विनाशनि हो, मंगल को देने वाली, सर्वस्व प्रदायनी हो, करते नमन तुम्हें, पुण्य प्रकाशनि हो,     काव्य रचना-रजनी कटारे            जबलपुर म.प्र.

"बासंती बयार"

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आ रही,  ठंडी ठंडी मस्त,  पवन पुरवाई, बसंत ऋतु,  आने वाली है, आ रही ठंडी ठंडी..... अब हो रही,  शीत मदमस्त, आली पवन पुरवाई, आने वाली,  ऋतुओं की रानी है, आ रही ठंडी ठंडी..... कभी प्रखर,  कभी अलमस्त, सुनहरी धूप सुहानी, अब सबको,  जतलाने वाली है, आ रही ठंडी ठंडी..... आ रही बासंती,  बहार मस्त, बौर खिले अमराई, बसंत बहार,  आने वाली है, आ रही ठंडी ठंडी..... फ़िजाएं बहक रहीं,  होकर मस्त, डाली डाली पर आई,  देखो अब,  कोयल कूकने वाली है, आ रही ठंडी ठंडी..... पीली पीली,  सरसों फूली मदमस्त, खेतों में महकाई, प्रीत पीत चुनरिया,  ओढ़ने वाली है, आ रही ठंडी ठंडी..... गाँव की गौरी,  काढ़े घुंघटा वो मस्त, बांट जोह रही, प्रीत मिलन बेला,  अब आने वाली है, आ रही ठंडी ठंडी..... आ रही, ठंडी ठंडी मस्त, पवन पुरवाई, बसंत ऋतु, आने वाली है, आ रही ठंडी ठंडी.....।      काव्य रचना-रजनी कटारे             जबलपुर म.प्र.

"26जनवरी गणतंत्र दिवस"

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         "26जनवरी गणतंत्र दिवस"  जय हो गणतंत्र दिवस,  जय हो हिन्दुस्तान की, आज के दिन,  संविधान रचा गया, आज का दिन, बेमिसाल, जय गणतंत्र दिवस, जय हो गणतंत्र दिवस की, जय हो हिन्दुस्तान की । भारत देश पे हमको,  नाज़ है अपने, आज का दिन,  बड़ा है खास, कितनों ने दी,  कुर्बानी अपनी, श्रद्धा से नमन करें उनको, जय हो गणतंत्र दिवस की, जय हो हिन्दुस्तान की । तिरंगे को मिल गया,  बड़ा आज,  मान सम्मान, देश पे अपने है,  बड़ा अभिमान, आज का दिन,  बन गया महान, जय गणतंत्र, जय हो गणतंत्र दिवस की, जय हो हिन्दुस्तान की । लाल किले पे,  आज, झंडा हम,  फहराएंगे, याद करेंगे,  उन शहीदों को, हम जिन्होंने,  अपने प्राण दिए, जय हो गणतंत्र दिवस की, जय हो हिन्दुस्तान की । भारत देश का,  यह पर्व सर्वधर्म,  समभाव का, अनेकता में, एकता का भाव, धर्मनिरपेक्ष है, राष्ट्र हमारा, जय गणतंत्र,  जय हो गणतंत्र दिवस की, जय हो हिन्दुस्तान की । हिन्द के वासी, हिन्दुस्तान हमारा, गणतंत्र दिवस पर, करते सबको नमन, भारत की आन बा...

"बिंदिया री बिंदिया"

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बिंदिया री बिंदिया, रंग-बिरंगी अनोखी बिंदिया, शीर्ष पे चुनरी साजे, भाल पे साजे बिंदिया, माथन को है श्रंगार, चमक दमकती बिंदिया, बिंदिया री बिंदिया, रंग-बिरंगी अनोखी बिंदिया, शोभा इसकी अद्भुत, संस्कृति का मान बिंदिया, मान सम्मान इसका, सुहागन का श्रंगार बिंदिया, बिंदिया री बिंदिया, रंग-बिरंगी अनोखी बिंदिया, सिंदूरी लाल माथे पर, सौलह श्रंगार की बिंदिया, घूंघट की ओट से झांके, साजन का अभिसार बिंदिया, बिंदिया री बिंदिया, रंग-बिरंगी अनोखी बिंदिया, चाँद से मुखड़े पर, लजाती शर्माती बिंदिया, जाने अंजाने बन जाती, महफ़िल की रौनक बिंदिया, बिंदिया री बिंदिया, रंग-बिरंगी अनोखी बिंदिया, नज़रों से ओझल होती, आँखो के आँसू बनती बिंदिया, नज़रों से जब बचाती, डिठोना बनती काली बिंदिया, बिंदिया री बिंदिया, रंग-बिरंगी अनोखी बिंदिया, बिंदिया री बिंदिया ।      स्वरचित रचना काव्य रचना-रजनी कटारे      जबलपुर ( म.प्र.)

"इंद्रधनुष सतरंगी"

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                     अंतस में उठते, भीगे से, सतरंगी सपने, भीगी पलकें, लग रहा है,  आसमां से,  उतर आयेगा,  धरा पर,  ज्यौं धनुष सतरंगी,  उतर आया हो,  धरा पर, लाल हरा,  आसमानी, नीला पीला नारंगी, मिल गये सब,  एक दूसरे से,  आकर धरा पर, लगता है,  तीर छोड़ा इंद्र ने,  विलुप्त हो,  आसमां से, इंद्रधनुष सतरंगी,  मिलने को आतुर, धरा से ।        काव्य रचना-रजनी कटारे              जबलपुर म.प्र.

" भाईचारा की मिसाल "

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सबसे प्यारा, सबसे न्यारा , भारत देश है हमारा, एक देश है, एक गरिमा इसकी,  धर्मनिरपेक्ष है, पहचान इसकी, भाई चारा की है, अजब मिसाल,  भारत में देखा, हमने ये कमाल,  मंदिर, मस्जिद, या हो गुरुद्वारा,  क्या हिन्दू, क्या मुस्लिम, हैं भाई भाई, सबसे प्यारा, सबसे न्यारा , भारत देश है हमारा, होली, दीवाली, राखी का त्यौहार,  भाईचारे के दिखते हैं संस्कार , गुरूकुल, मदरसा, या हो पाठशाला,  भाईचारे का हर, जगह बोलबाला,  नदी का तट हो या, हो समुद्र किनारा,  गंगा, यमुना, कावेरी, सबकी एक धारा,  सबसे प्यारा, सबसे न्यारा , भारत देश है हमारा, सूर, तुलसी, और, कबीर के दोहे , वो भाईचारे का, गुण गान करते,  वेद, पुराण, गीता, ग्रन्थ और कुरान,  धार्मिक ग्रन्थ हें, आदर्श महान, राष्ट्र में देखो, राष्ट्र-गान में देखो तुम , सब और भाईचारा, चंहुदिशी देखो तुम, सबसे प्यारा, सबसे न्यारा , भारत देश है हमारा ।          काव्य रचना -रजनी कटारे                   जबलपुर म.प्र.       ...

"जयंती विवेकानंद जी की"

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                 नमन करें, कोटि कोटि उनको, जयंती है, विवेका नंद जी की, ज्ञान का दर्पण, उनका जीवन, विश्व भर में दी, पहचान देश को,  प्रगति शील, और प्रेरक विचार, ज्ञान के असीम, अक्षय भंडार,  सृजन शील व्यक्तित्व जिनका, अलौकिक अनुकरणीय विचार, पहुँचाया, भारत को उन्होंने,  विश्व के, उच्चतम शिखर पर,  युवाओं के, आदर्श प्रर्वतक,  था जीवन, अलौकिक उनका,  विश्व बंधुत्व की थी भावना, मनुष्यता का पाठ पढ़ाया, कहलाए विश्व में "हिन्दू योगी" अध्यात्म की अलख जगाई, राष्ट्र निर्माण में, समर्पित जीवन, शत शत नमन, करें हम उनको ।                         -------*------    काव्य रचना -रजनी कटारे          जबलपुर (म. प्र.)

कृषक जीवन की दासतां" बुंदेली

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  कौनऊ खेत, कौनऊ खलियान,  कृषक जीवन की, आये दासतां,  जीवन है, कृषकाय ओको, विचरत रहत, दिन रात,  टूटी सी एक, खटैया मचैया, परी रहत, सौवे बैठवे को,  धरा पे एक, बिछौना फटो सो,  कम्बल सोयी, ओई में परे, सिमटे ठिठुरे, महतारी ओ, बिटिया, गुदड़ी के लाल    होतई भुंसारौ, कुकड़ु कूँ कुकड़ु कूँ,     सुन पकड़ लई, खैतवन की गैल,             जाड़ो होवे घामऊँ, तपन सूरज की,  कोयला सों बदन, भुंज गओ सारो,    भरी दुपहरिया, आ रयी मेहरारु,  लये पोटली, चुभन घामऊँ की,  सूनी पगडंडी, चिड़ी चोंके ने बंदर भौंके,       सता रही बाकों, भरी दुपहरिया,          लायी बाँध, पुटलिया में रोटी,  अथानों आम, दो फांका प्याज,                   विधाता तूने, कैसी लगा दयी,  पेट की आग, सूखो भोजन भी,  लागे छप्पन भोग, दिन देखो ने रात,  हुईये फल मीठो, बारिश कैसी जा, मचमचा गयी,  हुयी जयी है का, खैतन म...

" झोली भर दी माँ ने "

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कोई माने या न माने, मेरी झोली भरदी माँ ने,  मेरी विनती करी कबूल,  मैं दौड़ी दौड़ी लाऊँ, शिव चरणों की धूल,  कोई माने या न माने..... माथे गौरा जी के, बिन्दिया सोहे, कानों में करण फूल,  मैं दोड़ी दोड़ी लाऊँ, शिव के चरणों की धूल, कोई माने या न माने..... गले गौरा जी के,  हरवा सोहे, हाथों में हथ फूल, मैं दौड़ी दौड़ी लाऊँ, शिव चरणों की धूल,  कोई माने या न माने..... हाथ गौरा जी के, कंगना सोहे, पैरों में पद फूल, मैं दौड़ी दौड़ी लाऊँ, शिव चरणों की धूल, कोई माने या न माने..... अंग गौरा जी के,  चुनरी सोहे, चुनरी मैं गोटे फूल,  मैं दौड़ी दौड़ी लाऊँ, शिव चरणों की धूल,  कोई माने या न माने..... संग गौरा जी के, शिवजी बिराजें, हाथों मैं तिरशूल, मैं दौड़ी दौड़ी लाऊँ, शिव चरणों की धूल,  कोई माने या न माने, मेरी झोली भर दी माँ ने,  मेरी विनती करी कबूल, मैं दौड़ी दौड़ी लाऊँ माँ के चरणों की धूल  ।       भजन रचना -रजनी कटारे              जबलपुर ( म.प्र.) 

"अलविदा वर्ष 2021"

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       अलविदा वर्ष 2021 के साथ कुछ अच्छी तो कुछ बुरी यादें भी जुड़ी हैं.... वर्ष 2020 का बीजा रोपड़ कोरोना ने जिस तरह शुरुआत ही दौर से कहर मचाना शुरू कर दिया था, जिसके फलस्वरूप 2021में भी उसने अपनी चपेट में ले लिया- जिसने बहुत नुक्सान करा.... घर के घर उजड़ गए, लोगों का सहारा छिन गया, आर्थिक रुप से भी लोग परेशान हुए, रोजगार छिन गये, काम काज छूट गया..... सबसे ज्यादा परेशानी हुई मध्यम वर्ग को क्यों कि न तो वह किसी से कुछ सही स्थिति बता सकते हैं, और न ही कोई ने उनकी सहायता करी.... सरकार भी सिर्फ नीचे तबके के लिए सोचती है, और मदद करती भी है...... लेकिन मध्यम वर्ग के लिए सरकार भी नहीं सोचती, ये तबका जिए या मरे उसको क्या....? क्यों कि ये तबका ऐसा है शरमोहया में हल्ला- गुल्ला भी नहीं करने वाला....... और अमीरों का तो कहना ही क्या..? उनको तो जरुरत ही नहीं है कोई दिक्कत नहीं!! और कसर बाकी थी तो कुछ एक वर्ग ने....  इंसानियत को ताक पर रख दिया.... लूट खसोट को अपना धंधा बना लिया.... कहने का तात्पर्य ये है जो हो हल्ला करे या जिनका घर पहले ही से भरा है, सरकार भी उन्हीं क...

"जरा गौर फरमायें"

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        जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,  अख़बार की सुर्खियों में:-- नेताओं की हर खबर, अखबार की सुर्खियों में,  याद न आते कभी वो दिन,  जब खड़े रहते जोड़ के दोनों हाथ!!  जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,  अखबार की सुर्खियों में:-- लूट खसोट का गोरखधंधा,  अखबार की सुर्खियों में,  राशन की जब तब बंद दुकानें,  नज़र नहीं आतीं खाली गरीब के हाथ!!  जरा गौर फरमायें, इधर भी, अखबार की सुर्खियों में:-- चोरी डकेती और नकबजनी,  अखबार की सुर्खियों में,  हर गली मुहल्ले चौराहों में,  क्यों रहते पुलिस के खाली हाथ!!  जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,  अखबार की सुर्खियों में:-- लुटती इज्ज़त होते बलात्कार, अखबार की सुर्खियों में,  अपने ही देश में नहीं सुरक्षित, क्यों रहता शासन मौन खाली हाथ!!  जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,  अखबार की सुर्खियों में:--  होतीं अपराधिक गतिविधियां,  अखबार की सुर्खियों में,  उठाया न जाता कड़ा कदम, क्यों जिम्मेदारों के बँधे खाली हाथ!!  जरा गौर फ़रमायें, इधर भी,  अखबार की सुर्खियो...

"उन्मुक्त आकाश में"

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मुझे आज मुक्ति मिली,  रुक गयीं सांसे मेरी, ख़त्म हुंई झंझटे सारी, उड़ चला मैं, उन्मुक्त नीले आकाश में, हो गयीं पूरी अब सारी, जिम्मेदारियां, रखा है क्या अब इस, नश्वर संसार में, उड़ चला मैं,  उन्मुक्त नीले आकाश में, बेटे बेटियों का बस गया, घर संसार, रम गये हैं बच्चे अब, अपने संसार में, उड़ चला मैं, उन्मुक्त नीले आकाश में, अपना अपना सब कहते, पर न कोई अपना, उम्र अच्छी पा ली मैंने, रहा न कोई सपना, उड़ चला मैं, उन्मुक्त नीले आकाश में, न बीमारी न कोई झंझट, न घिसटना मुझे, संतोषी सदा सुखी जीवन, पाया मैंने अविचल, उड़ चला मैं, उन्मुक्त नीले आकाश में, उड़ चला है जीव अब ये, छोड़ काया अपनी, गिरिवर शिखरों को लांघ, रुह बन कर अपनी, न जाने किस दुनिया में, उड़ चला मैं, उन्मुक्त नीले आकाश में, मुझे आज मुक्ति मिली ।      काव्य रचना-रजनी कटारे           जबलपुर ( म.प्र.)

वो चाय वाला

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गली के आखिरी मोड़ पर, अन्दर की तरफ, रहता था, वो चाय वाला.....रोज सबेरे - सबेरे उसका ठेला चाय बनाने के सामान से सजाकर, निकल जाता था, वो चाय बेचने.. पत्नी थी -तीन बच्चे थे उसके, मोहल्ले में खेलते रहते थे,  उसके बड़े बेटे का नाम सुहेल था, उसकी माँ प्यार से उसे  ' सुहू ' बुलाती थी, था भी बहुत होनहार..... बच्चों को उनकी माँ ही स्कूल छोड़ने जाती थी.... चाय वाले को पता चला यहाँ, किराए से मकान खाली है, तो वो आकर -माँ से बोला -माँ जी आपके यहाँ मकान खाली है, मुझे लेना है, माँ ने कहा -बेटा एक ही कमरा है वो भी छोटा है..... वो बोला -किराया तो कम है, हम रह लेंगे, माँ ने उसे वो कमरा, जिसमें सीढ़ी के नीचे भी जगह थी, उसे किराए से दे दिया...... चाय वाला दूसरे ही दिन अपनी पत्नी और बच्चों के साथ, सामान लेकर रहने आ गया..... उसकी पत्नी बड़ी ही धार्मिक प्रवृत्ति की थी, बड़े सबेरे उठ कर अपने नित्य के कामों में जुट जाती थी, चाय का ठेला तैयार करने में अपने पति की मदद भी करती, फिर पूजा पाठ करके मंदिर जाती, वहाँ से आकर बच्चों का टिफिन तैयार करके उन्हें स्कूल छोड़ने जाती, आकर अपने घर के बाकी काम निपटाने ...