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दाग़ (वर्दी पे लगे खून के दाग़)

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आज़ आप कहां हो, जमीं या आसमां में छुपे हो, या तारों में, या चांद में, सूरज की किरणों में या महकती फिज़ाओं में, कहां हो आप पता नहीं, हर पल हर जगह आपको महसूस करते हैं, पास तो नहीं हो फिर भी आपको साथ पाते हैं, आपके वर्दी पर लगे खून के दाग़ देख के, खुद पर हम नाज़ करते हैं, एक पल के लिए पैरों तले से ज़मीं खिसक गई थी, जब आपकी मौत की खबर घर आई थी, जब पता चला की देश के लिए जान दी है आपने, फिर बिना रोए अपना सिंदूर पोंछी थी, आपकी वर्दी पर लगे दाग़ देख के बेटी हमारी अब भी रोती है, इस साल दिवाली पर पापा आयेंगे या नहीं पूछती है, रात को आसमां में तारों को देखती रहती है, चांद पर लगे दाग़ को देख के फिर घबरा जाती है, आपकी वर्दी पर लगे खून के दाग़ देख कर अम्मा बहुत रोती है, मेरे बेटे ने इस जहां के लिए जान दी है बोल कर, सीना ऊंचा करके फिर हंसती है, आपके नाम की मेंहदी लगाई थी इस बार, वो दाग़ अभी तक छूटा नहीं है, और आपकी वर्दी पर लगे खून के दाग़, छुटाने से भी नहीं छूटते हैं, ये दाग़ अच्छे हैं, आपके जाने के बाद भी आपका पास होना  महसूस करातें हैं, माथे से भले ही सिंदूर के दाग़ मिट चुके हैं, पर दि...

ए जिंदगी फिर मिलोगी ना??

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जिंदगी के कुछ पन्ने खुलने अभी बाकी है, उसके ऊपर सिर्फ हाथ फेरी है, वो भी बड़ी मासूमियत से पूछती है, फिर मिलोगे ना!!! ऐ मेरी प्यारी ज़िंदगी!!! कुछ पल की माया जाल में इस तरह बंध गई थी, की कहीं न कहीं तुझे जीना भूल गई थी, हंसना,रोना लगा रहा ज़िंदगी में, पर मेरे लिए तू कितनी जरूरी है, ये भूल गई थी, वक्त की धारा में मैं भले ही आगे जा चुकी हूं, फिर भी वो पहली जिंदगी पाने को तरस जाती हूं, जब कभी रात में खुद को बहुत अकेला पाती हूं, जिंदगी से पूछती हूं, तुम फिर मिलोगे ना?? इस दुनिया से दूर, खुद की एक दुनिया हो, उस दुनिया में मैं और मेरी जिंदगी साथ हो, मेरी खुद की एक पहचान हो, साथ में कागज के कुछ पन्ने और एक कलम हो, बोलो ना ज़िंदगी, तुम फिर मिलोगे ना, तुम्हे मैं गले लगाना चाहती हूं, जी भर के जीना चाहती हूं, कुछ तुमसे सीख कर, कुछ तुम्हे देना चाहती हूं, वक्त के सिरहाने आ कर, क्या कुछ नहीं देखा है, एक ही पल में हस कर दूसरे ही पल में मरना भी पड़ा है, सुकून तो जैसे हवा की तरह गुज़र जाता है पास से, हम सिर्फ बैठे बैठे हमारी जिंदगी को ढूंढ रहे हैं, जिंदगी बिना इस जान का क्या ही करे, दिल में खुशी...

अब चुप रहती हूं

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न जाने ज़िंदगी ने कौन से मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, मुस्कुराहट भी बड़ी मुश्किल से निकलती है, कोई भी आ के कुछ भी सुना कर चला जाता है, फिर भी जुबां चुप रहती है, बेबसी ने दिल को इस तरह घेर लिया है, की सिर्फ आंखों में पानी के अलावा कुछ और न बचा है, बुरा भला से जैसे रिश्ता ही टूट गया है, बिन बातों में भी अश्क बह जाते हैं, यूं कहो की जीते जी हम मर चुके हैं, चारो तरफ भीड़ है,फिर भी हम अकेले पड़ गए हैं, खुशी ने रूठ कर मुंह मोड़ लिया है, उसको समझाने जाओ तो दो चार शर्त वो भी रखती है, हर वक्त अब चुप रहती हूं, खुद ही खुद में जवाब ढूंढती हूं, पर घूम फिर कर फिर से वही सवाल पे अटक जाती हूं, दिल करता है ,सबके मुंह पे जवाब दे दूं, पर अब बस चुप रहती हूं, सामने से आनेवाली हर बात को  समझने में अब वक्त लगता है, अपने भी गैरों जैसे बरताब करते हैं, पता नहीं ज़िंदगी इतनी नाराज़ क्यों है, हम हंसना तो चाहते हैं,पर रो पड़ते हैं, पता नहीं ज़िंदगी ने कौनसे  मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया है, आंसू से इतना प्यार हो गया है कि, हंसी से नफ़रत होने लगी है.... © ज्योतिजयीता महापात्र ओडिशा

सफलता का मूल मंत्र

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हर व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा सफलता पाना चाहता है। लेकिन इसी चाहत में उसे कैसे क्या करना है अक्सर वो भूल जाता है। तो सफलता प्राप्ति के लिए जीवन में हमेशा एक लक्ष्य होना चाहिए। कुछ लोग बहुत सारे लक्ष्य लेकर बैठ जाते हैं और उनके ध्यान हर तरफ बंटे रहने की वजह से  किसी एक चीज को हासिल करने में नाकामयाब रहते हैं। तो अब जब एक ही लक्ष्य है , अब बढ़ते हैं सफलता की और। सफलता पाने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है की कौनसे रास्ते पर चल कर हम उसे पा सकते हैं।फिर उसी रास्ते पर चलना चाहिये। हमारी सफलता के पथ में बहुत सारी द्विधाएं आयेंगी। और हमें उन सबको हरा कर आगे चलना चाहिये। मन में ईश्वर प्रेम के साथ साथ बहुत सारा संयम भी जरूरी है। कहीं पर अगर हम गिर जाते हैं तो फिर से खड़े होने की हिम्मत रखना चाहिये। सफलता किसी को भी आसानी से प्राप्त नहीं होती है। उसके लिए कठिन परिश्रम करना चाहिये। एक बार हार जाए तो बार बार कोशिश करते रहना चाहिए। मन से डर को एक दम से दूर कर देना चाहिए। लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं , ये बिलकुल भी सोचना नहीं चाहिए। सामने से आनेवाली हर मुसीबतों का डट कर सामना करना चाह...

सामनेवाली खिड़की

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मेरे सामने वाली खिड़की पे ना कोई चांद का टुकड़ा है, ना कोई हसीन दिलरुबा है, गुजरते वक्त के साथ मैने एक बूढ़ी अम्मा को हमेशा वहां देखा है, पता नहीं किस ज़माने से वो अपने अंदर कई राज़ छुपाए बैठी है, हमेशा उसकी आंखों के कोने पे एक बूंद आंसू को ठहरता हुआ देखा है, छड़ी के सहारे चलती है, हर वक्त सामनेवाली खिड़की पे बैठी रहती है, पता नहीं हर दिन किसको याद करती है, कभी कभी यादों की गोद में सो भी जाती है, आज हिम्मत से उसका हाथ थामा है, उसकी आंखों से टपकते आंसुओं को अपने हाथों से पोछा है, खुद के लिए उसके दिल में जगह बना कर, उसकी जिंदगी की किताब को खोला है, जब ज़िंदगी ने साथ छोड़ दिया था, उस मुश्किल वक्त पे रास्ते से एक अनाथ को उठा लाई थी, अपनी दानों से बचा कर,उसका पेट भरती थी, दूसरों के घर काम करके उसको पढ़ाती थी, हर वक्त सीने से लगा कर रखती थी, मानो वो इसकी आंखों का तारा था, पता नहीं वक्त कैसे बदल गया, जिसे आंखों का तारा समझती थी, वो गैर कैसे बन गया, जिसको उंगली पकड़ कर, चलना सिखाया था, वो बेरहमी से हाथ कैसे छोड़ गया, किसी और का हाथ पकड़ कर वो तो चला गया, पीछे अपनी मां को दर्द में जूझने...

दवाई

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ये दवाई अब जीने का एक सहारा बन गई है, ना चाहते हुए भी हर रोज इसे लेना पड़ता है, फंस गए हैं इस कदर मानव की इस जहरीली दुनिया में, खाना छोड़ जाए पर दवाई छोड़ी ना जाती है, पेड़ के पत्तों से हो या फल के छिलके से हो, समंदर की गहराई से हो या सांप के जहर से हो, बन जाती है दवाई अब, दुनिया के भले के लिए, मकसद एक ही है की तुम सलामत रहो, सर से लेकर पैर तक हर बीमारी का अब इलाज है, जिसको आसान करने के लिये दवाई की एक गोली ज़रूरी है, बड़ी से ब़ड़ी बीमारी ठीक हो जाती है, जब छोटी छोटी दवाई पेट के अंदर जाती है, पुरानी प्रथा गई, अब नई प्रथा आई है, एक ही झटके में लाखों दवाई तैयार है, बच्चों से बड़ों तक सब निर्भर करते हैं, जब रोग की चपेटे में आ जाते हैं, बेशक दवाई अच्छी रोग भगाने को है, पर ज़्यादा इस्तमाल भी जानलेवा है, जितना चाहे कम इस्तमाल करो, खाओ पियो व्यायाम करो, दवाई को अलविदा कहो, जब बढ़ जाए इसकी ज़रूरत, सिर्फ तभी इस्तमाल करो, डॉक्टर जी की सलाह लो, खाने के साथ दवाई लो.... ज्योति महापात्र ओडिशा

मैं और तुम

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मैं और तुम, मिल गए तो हो गए हम, मेरे जीवन का तुम आधार हो, हूं मैं काया,तो तुम छाया हो, मैं नदी की  एक धारा हूं, उस धारा में बहते हुई तुम एक नाव हो, हूं मैं तपती गर्मी, तुम शाम की ठंडी हवा हो, मैं कोमल सी एक फूल, तुम महकती खुशबू हो, मैं रात की घनी अंधियारी तुम खुबसूरत सा चांद हो, तुम्हारे साथ हर मौसम सुहाने  लगते  है, तुम्हारे रूठ जाने से होली के रंग भी फीके लगते हैं, जब मना लूं तुम्हे लगता है बहुत कुछ जीत ली, तुम्हारे साथ हम जहां की खुशियां पातें  हैं, तुम्हारा साथ हो तो मंजिल कितनी भी दूर हो पता नहीं चलता, तुम्हारे साथ चलते चलते लंबे सफ़र भी कम लगते हैं, तुम्हारे पास हम खुद को बड़ा महफूज़ सोचते हैं, हम ठहरे खुशनसीब इंसान और वजह तुमको मानते हैं, तुम्हारे बिना कुछ भी कभी सोच नहीं पाती हूं, कभी रूठ जाऊं तुमसे तो खुद ही रो पड़ती हूं, मेरे सागर जैसे दिल में तुम एक छोटा सा द्वीप हो, तुम्हारे साथ वहां एक खूबसूरत घर बसाना चाहती हूं, मैं तनाव,तुम राहत की वो सांस हो, मैं स्वादिष्ट एक पकवान,तुम उसमें नमक हो, मैं चलूं जिन राहों पे, उसके पास तुम वो बड़ा सा पेड़ हो, मैं जिस्म तुम...

श्रृंगार रस

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सबके नज़र अलग है, नज़रिए भी अलग है, कोई किसकी सूरत पे मरता है, तो कोई किसिके दिल पे.... कुछ वक्त आया था मेरी जिंदगी में, जब हम उसके आंखों में देख के खो गए थे, उसके काली काली आंखें, सिंदूर से भी लाल उसके होठ, फूलों से सजी उसके नथनी, जो सबके नज़र खींचे अपनी और.... बिना पैर के खड़ा है, दो बाहें फैला के, लग जाए डोर उसके तो बात ही कुछ और है... एक पल,बस एक पल खड़े हो जाओ  उसके आंखों में देख के, लगेगा जैसे पूरी दुनिया ही बेकार है,,, कोई जाकर उसके आगे झुक जाता है, कोई जाकर उसे गाली सुना देता है, और वो बस मुस्कुरा कर सब सुनता है, जिसको जो चाहे वो देता है, पूरे धरती में अपना नाम रोशन किया, एक ही चुटकी में अपनी श्रृंगार से सबको मोहित किया,, पच्चीस भेष उसका होता है , हर रूप में वो पैरों से सर तक अपरूप लगता है, मां के हाथ पकड़ कर जब पूछी थी की ये कौन है, मां ने हाथ जोड़ कर बताई थी, ये तो जगत के नाथ जगन्नाथ है........ स्वरचित मौलिक ज्योति महापात्र ओडिशा

बांझ

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रो रही एक मां कई सालों से है, अपनी ही बेटा उसे बोझ जो बोला है.... तरस रही वो एक बूंद पानी के लिए है, दाना तो दूर की बात, मुस्कुराने की वजह ढूंढ रही है..... सोच रही है किसके लिए मैं लड़ रही थी, जिंदगी भर किसकी हंसी खुशी के लिए तड़प रही ही, जिसके मुंह में एक दाना देने को मैं चार घर में काम कर रही थी, वही बेटा मेरी मुंह से दाना छीन कर मजे कर रहा है.... जिसके लिए दुनिया भर की बातों को अनसुना कर के आई, वो है की मुझसे मेरी जिंदगी है छीनने आई..... सब कहते रह गए,फिर भी उसको सराखों पर बिठाई थी मुझे क्या पता था बदनसीबी मेरे ही पीछे मुस्कुरा रही थी.... सोचो जरा एक बार उस मां की बारे में,, जिसे बोझ से ज्यादा बांझ बनना पसंद है..... उसकी दिल को दर्द उतनी तो जरूर हुई होगी,, जो वो मां की बदले बांझ बनना चाहती होगी... जिस बेटे की मां बन कर वो दुनिया की सामने गर्व से चलना चाहती थी, उस बेटे की मां बन कर वो बदनसीब से तमाचा खाई थी..... जिसके लिए वो घर की दहलीज पार करके आई थी, बिन ब्याही थी, तो कोख में बच्चे को रखके समाज से छुपते छुपाते जिसको बड़ा किया, जिसके रोने से दिल को बड़ी तकलीफ होती थी, जिसकी ...

लड़की हैं हम

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ये दुनिया थोड़ा खराब है, पापा ने बताया था,,, हमने ना समझ होके उसे फिर भी अपनाया था..... देखने की नजरिया बदल कर दुनिया को समझने क्या बैठ गए,,, कमबख्त उंगली तो हम पे ही उठ गए..... हम कंधो से कंधा मिला कर काम करने को चले थे, लड़की हो कहकर लोगों ने दूर भगाए थे,,, पुरानी रीत को पकड़के पैरों में बेड़ियां बांधने वाले, ये क्या समझेंगे कभी लड़कियां भी अवल रहा करते थे... लड़की की एक गलती करने पर सौ उंगलियां उठते हैं,,, पता नही औरत की बाहर निकलने से लोग क्यों जलते हैं... हम सर झुका कर खड़े हैं, तो कमजोर समझने की गलती मत करना, हम लड़कियां हैं हमें पैरों का जूता मत समझना.... है हम में हिम्मत हम भी दुनिया को दिखा सकते हैं,,, कलम चला कर पूरे देश में हम भी राज कर सकते हैं... एक ही शरीर में हम कई रूप धारण करते हैं,,, दिमाग से अंधे तुम क्या जानोगे हम कहां तक जा सकते हैं... अच्छा है की नारी की सम्मान करो, इज्जत दे रहे हैं तुम भी इज्जत दिया करो... यूं उंगली उठा कर दोष न दिया करो,,, जीने की अधिकार हमें भी है, हम से अधिकार छीनने की कोशिश न करो.... स्वरचित मौलिक अप्रकाशित:- ज्योति महापात्र ओडिशा

हथेली

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कहने को तो दो ही है पर ये हथेली के सौ कहानियां हैं.... उसमे से एक को आज  मेरी कलम ने कविता का रूप दिया है... छोटी छोटी हथेली में भगवान को फूल चढ़ाती थी उसी हथेली को जोड़ के बचपन में मंदिर में खड़ी रहती थी.... खूबसूरत तो वो पल भी था  जब मैं खुद अपनी हथेली से भिकारी को खाना देती थी.... छोटी छोटी चूड़ियां पहन कर  सौ बार उस हथेली को देखती थी.... और जब उसपे मेंहदी लग जाए  तो बात तो कुछ और ही थी.... उस हथेली को पकड़ कर बाबा ने  पहले चलना सिखाया,,, फिर दुनिया दिखाया.... उस हथेली को पकड़ के मां ने लिखना सिखाया बड़े भाई ने तस्वीर बनाना सिखाया..... पहले मां की हथेली से निवाला ली थी और मां तब खुल के मुस्कुराई थी जब पहली बार मैने अपनी हथेली से खाना खाई थी.... समंदर के किनारे छोटी छोटी हथेली से रेत की घर बनाती थी.... बन कर तैयार होने पर खूब ताली बजाती थी.... मंदिर के सामने उस हथेली से दिया जलाया करती थी, हथेली जोड़ के अपनों के लिए दुआ बटोर रही थी.... मां की सिखाने पर सब काम सिख गई थी बाबा ने बहुत तारीफ किए थे  जब पहली बार अपनी हथेली से खाना बनाई थी.... मेरी हथेल...

तेरी गलियां

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यूं कुछ नामुमकिन सा लग रहा है  तेरी गलियों को शब्दो में बयां करना,,, जहां पूरी जिंदगी गुजारी है, उसको चंद लफ्जों में सजाना..... बचपन से लेकर आज तक के एक एक पल याद है, बाबा तेरी गलियां मेरे मन में कुछ इस तरह समाई है.... सूरज के पहली किरण के साथ चिडियों के वो मधुर गान बच्चों के हंसी मजाक और मां की जल्दी उठानेवाली वो जो डांट..... मंदिर से आती वो शंख की धुन थी जो मन में पवित्रता भर देती थी.... वो सुमधुर भजन और घंट के आवाज से शांति से मन भर आती थी.... हर रोज की तरह लाल रंग की वो कार रास्ते से गुजर जाती थी, छोटे बच्चों को अपने पीछे भगाती थी.... खड़े हो जाते थे सुबह सुबह सब मांओं ने  दूधवाली आंटी जब आवाज लगाती थी.... चाय के बहाने टपरी पे लोगों के बातें गांव से लेके पूरी भारत की होते थे चर्चे..... अब सब सिर्फ याद करती हूं याद करके मन को बहलाती हूं...  बाबा  जब से तुम्हारे हाथ छोड़के किसी और के हाथ थामी हूं पता नहीं क्यों खुद को अकेली महसूस करती हूं.... बाबा तुम्हारी गलियां तो मेरी पूरी दुनिया थी,, अब उस दुनिया से दूर पता नहीं कैसी जीती हूं.... वो गलियां वो बचपन वो यादें सब द...

तेरा खत:

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मन में कुछ हलचल सी है यूं हर तरफ नया नया सा लग रहा है, बहकी बहकी सी महसूस हो रही है जब से तेरा खत आ पहुंचा है.... खत से नजर उठाना मुश्किल है, दिल में डर अब भी है, हाथ कांप रही है, तेरा खत पढ़ने को, फिर भी न जाने दिल बैचेन क्यू है.... एक मुस्कुराहट से दिल में जगह बनाके  तू मुझसे दूर गया था, कुछ कहने की कोशिश में सब अधूरा रह गया था,,, वो हमारी पहली और आखरी मुलाकात थी शायद जब हाथ पकड़ने की कोशिश में छूट गया था..... तेरे खत के इंतजार में हार रोज दरवाजे पे खड़ी रहती थी,,, कब कोई तेरा नाम लेके मुझे पुकारे यही सुनने को तरस गई थी,,, पर जब वो वक्त आ गया है, न जाने मन में अनजाना सा डर बैठ गया है..... खुलकर पढ़ने की हिम्मत अभी तक नहीं है, मन में इच्छा तो बहुत है, न जाने फिर क्या है जो पीछे खींच रहा है.... एक ही पल में खुशी फिर उसी पल में गम के आंसू आ रहे हैं..... ये तेरा खत को सिर्फ देख के  मन में हजारों सवाल आ रहे हैं...... हल्की सी सांस लेके खुलने की कोशिश की हूं..... आंखों की कोने से एक बूंद आंसू तेरे खत पे आ गिरा है,, पोंछने को दिल नहीं है खुशी के आंसू जो है.... पहली बार कोई ...

खट्टी मीठी यादों के संग तकरार भरी बातें

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कब तू आयेगी तेरी राह देख रही हूं मेरी  खुशी को खुद की ही  नजर से बचा रही हूं,, बार बार घड़ी की और नजर जा रही है तुझे देखने को आंखें मेरी तरस रहे हैं.... कुछ पुरानी यादें फिर से ताजा होंगे खट्टी मीठी यादों के संग तकरार भरी बातें होंगे यादें कुछ जो रुलाएंगे, कुछ हसाएंगे भी,,, पर सारी यादों से मिलेंगे सुकून भी बचपन का वो गुड़ा गुड़ी वाला खेल हो या बारिश में कागज की नाव छोड़ना हो या तो चुराके आचार खाना हो...... खुसनसिब हूं मैं जो मुझे तेरी जैसी बहन मिली बहन के साथ एक दोस्त भी मिली तुझे दर्द होने से हम तो रो पड़ते थे, पता नही तेरी शादी के दिन हम खुद को कैसे संभाले थे तेरी छोड़ जाने के बात से आंखों में आंसू भी थे पर तेरी नई जिंदगी की शुरुवात के खुशी में होठ में मुस्कान भी थे.... तेरी ससुराल चले जाने से मेरी जिंदगी जैसी अधूरी रह गई,,, तू यकीन नहीं करेगी पर मैं तो कुछ दिन के लिए तेरे बगैर हंसना जैसे भूल सी गई...... आज इतने दिनो बाद तू वापस आ रही है इंतजार कि घड़ी खत्म हो रही है....... तुझे गले लगाने को मैं बेकरार हूं, खुद को संभालने में अब नाकामयाब हूं..... तेरी राह देखते देखत...

ये राखी और मेरा भाई

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ये राखी सिर्फ एक जरिया है तेरे मेरे प्यार की, ये धागा क्या बयां करेगी बात हमारे अनमोल रिश्ते की, तू भाई है मेरा, मैं तेरी प्यारी सी गुड़िया हूं, रिश्ता जो दिल से निभाती हूं,उसे एक धागे के सहारे कैसे छोड़ दूं,,, आज तू दूर है तो तेरे लिए ये राखी भेज रही हूं, तू जहां भी रहे सलामत रहे ये दुआ करती हूं, राखी के बदले मुझे सिर्फ तेरा प्यार चाहिए, मेरी आखरी सांस तक तू मुझे मेरा साथ चाहिए,, नेक में तेरा वादा भेजना ,,,, छोटी हूं तुझ से तो प्यार के साथ अपना आशीर्वाद भेजना...... स्वरचित मौलिक अप्रकाशित ज्योतिजयीता महापात्र