Posts

Showing posts with the label अजित खरे

अब देखोगे.

Image
मैं टूटता रहा किश्तों में इसी उम्मीद में बरसों कि अब देखोगे.... अब देखोगे..। तुमने देखा ही नहीं  देखना मेरा.... और मैं मुंतज़िर ही रहा कि अब देखोगे.... अब देखोगे..। धुन्ध सी छा गयी इंतज़ार करते करते इन आँखों मे.. पर उम्मीद अभी भी बाकी है  कि अब देखोगे... अब देखोगे..। जिस्म है बस सांसों के ठहरने का ठिकाना, दिल आज भी  सिर्फ इसलिए धड़कता है कि तुम अब देखोगे... अब देखोगे..। डॉ0 अजीत खरे  सर्वाधिकार सुरक्षित

गज़ल

Image
एक चेहरा जो मेरे दिल को खिला देता है। मुझे हर रोज़ खुश रहने की वजह देता है।। वो मेरा कौन है मालूम नहीं है लेकिन। जब भी मिलता है सिजदे में जगह देता है।। मैं कभी टूटकर अंदर से बिखर जाऊं तो। वो मुझे थाम कर पहलू में सुला लेता है।। जब कभी तन्हाई में चुपके से रोना चाहूं। दिल के दरवाजे पे धीरे से सदा देता है।। उसकी आंखों में रब जाने, कैसा जादू है। बस एक ही पल में दुनियां को भुला देता है।। डॉ0 अजीत खरे

मेरी मां को समर्पित

Image
अब मैं उसे....  कहीं ढूंढता ही नहीं मेरे जेहन के अलावा शायद अब उसका कोई वजूद नहीं। नहीं आता मुझे कहना बस तूं मेरे आस पास रहना हर पल जरूरत थी तेरी, अजीब है मां  अब तूं पानी के घर में  रहती है अफसोस "मेरी मां" मेरी "चश्मे-तर" में रहती है..। *"चश्मे-तर"  - भीगी हुई आंखे* आपका आशीर्वाद.. सदैव मेरे साथ 🙏🙏😥😥 डॉ0 अजीत खरे

अहसास

Image
सुनो... तुम.. हर वक्त हर लम्हा  मेरे साथ ही तो रहती हो, नज़र नहीं आती हो मगर मेरे आस पास ही तो रहती हो... मैं जो चाहूं तुम्हें छूना तुम दूर चली जाती हो, फिर मुड़ के देखती हो और हौले से मुस्कराती हो... मैं जो उदास होता हूं तो तुम भी उदास होती हो, ख्वाबों में आके फिर तुम मुझसे लिपट के रोती हो... हां.....तुम रोज.... मेरे साथ ही तो रहती हो दिखती तो नहीं हो पर.... मेरे आस पास ही तो रहती हो।। डॉ0 अजीत खरे प्राचार्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय

दिल का रिश्ता

Image
एक वही शख्श मेरी हर कहानी हर किस्से में आया जो मेरा होकर भी  न मेरा हुआ, न मेरे हिस्से में आया। निभाते रहे उम्र भर पूरी दुनियां से रिश्ते मगर अफसोस जिससे दिल का रिश्ता था वहीं मेरे रिश्ते में न आया। एक हूंक है शर्म भी है रिश्तों की मौत का मातम भी है न उसने पलट के देखा न फिर  कभी मैने उसे बुलाया।। डॉ0 अजीत खरे

उसने...

Image
उसने... आखिरी खत में लिखा था "तूं बेबजह ही  मेरे लिए अल्फाजों से लड़ा था, वो कोरा कागज़  जो तूने मुझे भेजा.... मैंने वो भी पढ़ा था तमाम सिसकियां जो कागज की सिलवटों में थी तमाम दर्द  जो हाशिये पर पड़ा था। मैने वो भी पढ़ा था।  एक पड़ाव  जिसने रास्ते बदल दिए एक सफ़र  जो वहीं पर खत्म हुआ जहां राह में वो साया  रोता हुआ खड़ा था।। "तूं बेबजह ही  मेरे लिए अल्फाजों से लड़ा था, वो कोरा कागज़  जो तूने मुझे भेजा.... मैंने वो भी पढ़ा था डॉo अजीत खरे

बसंतोत्सव

Image
फूलों सी मासूम कहानी हुई बसंत की अगवानी। बासन्ती अब हुई बहारें ऋतुओं को चढ़ गई जवानी।। चहक रही गौरैया घर में कलियां खिलने लगीं मीठी मीठी धूप बदल कर बदन को चुभने लगी। आंगन में अब डाल खटोला किस्से कहतीं दादी, नानी। हुई बसंत की अगवानी।। तारे चमके अब रातों में कोहरे ने ले ली है बिदाई, पीली-पीली सरसों से भी भीनी-भीनी खुशबू आई। रंग बिरंगीं तितली उड़तीं भौरें करते मनमानी। हुई बसन्त की अगवानी।। रंग-बिरंगे फूल खिले हैं कितने प्यारे बागों में, मदहोशी सी बिखरी है इस मौसम के रागों में। महके महके बाग बगीचे कोयल फिरती बौरानी। हुई बसंत की अगवानी।। ये ऋतु कोई आम नहीं ये होती है बहुत सुहानी, सब ऋतुओं में ये होती है जैसे हो परियों की रानी। सोने के परिधानों में लगती है जैसे महारानी हुई बसंत की अगवानी।। डॉ0 अजीत खरे प्राचार्य

गज़ल

Image
आजकल हर कदम देखभाल कर रखिये। लम्हा-लम्हा खुद को संम्भाल कर रखिये।। क्या पता कौन किस घड़ी चाल चल जाये। कुछ तरकीबें दिल मे निकाल कर रखिये।।   ज़हर उतारने के मंत्र भी जानना जरूरी है। फिर आस्तीनों में सांप पाल कर रखिये ।। वक़्त संगदिल है किस घड़ी बदल जाये। हार-जीत का सिक्का उछाल कर रखिये।। बेखबर होकर जमाने से जंग मत लड़ना। 'अजीत' ख़ास दांव जेब में डालकर रखिये।। डॉ0 अजीत खरे

ग़ज़ल

Image
ख़्याल आते ही भर आतीं हैं आंखें मेरी बात करने से अंजान सा डर लगता है जाने किस बात का रंज पिन्हा है मेरे दिल में  किसी उजड़ी हुई मुहब्बत का असर लगता है अब तो खग भी नहीं करते हैं बसेरा उस पर कितना वीरान सा सूखा ये शज़र लगता है शाम होते ही सहम जाते हैं उजाले घर में ख़ौफ तेरी यादों से इस कदर लगता है, तुझको आवाज दूँ और दूर तलक तूँ न मिले, ऐसे सन्नाटों से अक्सर मुझे डर लगता है।। डॉ0 अजीत खरे

कितने दीप जलाऊँ

Image
कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा! शनैः शनैः बढ़ता ही जाता अंधियारों का घेरा!! मानवता भी रफ्ता रफ्ता जाने लगी रसातल, इस धरती पर नज़र आ रहा कंकालों का डेरा! कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा!! तूँ-तूँ मैं-मैं के अहंकार में उमर गुजारी सारी, अंतकाल पछताये क्या हो जो तेरा है ना मेरा! कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा!! आस्तीन में जिसको पाला उसने ही डस डाला, यूँ बस्ती बस्ती हुआ सिकंदर बनकर एक लुटेरा! कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा!! रात बसर तुमने तो कर ली, ऊँचे- ऊँचे महलों में, मैं करवट बदल-बदल कर सोचूँ कब होवेगा सवेरा! कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा!! डॉ0 अजीत खरे

ग़ज़ल

Image
यूँ तो कई बरस से सोया नहीं हूं मैं। चश्मे-तर तो हूँ वले रोया नहीं हूं मैं ।। मैं ढूंढता हूँ दर-बदर बजूद इस क़दर। खुद में कहीं जरूर हूँ गोया नहीं हूँ मैं।। क्यों जागता हूँ रात भर उसके ख्याल में। अफ़रोज़ कोई ख़्वाब संजोया नहीं हूं मैं।। कितना बदल गया वो,मुझको क्या पता। बे-लौस इश्क़ तो कभी खोया नहीं हूं मैं।। अच्छा हुआ जो टूट गया धागा वो इश्क़ का। उन मोतियों को फिर कभी पिरोया नहीं हूं मैं।। *********************************** डॉ0 अजीत खरे ------------------------

कशिश

Image
****** कुछ सवाल सुलगते से लगे उसकी आँखों में, शायद.... कुछ कहना था उसे आखिरी लम्हों में। अनकहा बोझ  जो उसके मन पर था न जाने क्यों .... जाते-जाते कह न सका। मैं जानता हूँ... जो रिश्ता कभी मरा है, न जाने क्यों दिल के किसी कोने में आज तक सुलग रहा है। शायद उसके वायदे सुलग रहे हैं या मेरी तन्हाईयाँ... बस एक धुन्ध है हमारे दरम्यां। फ़िज़ाओं में घुला है उसका अल्हड़पन, जैसे एक दूजे को ढूंढता हो वाबरा मन। हर तरफ एक अनदेखी दीवार है एक नदी के इस पार है एक उस पर है। एक कशिश.... जिसे आंखों से बहना था, शायद उसे आखिरी लम्हों में कुछ कहना था। ************************ डॉ0 अजीत खरे         प्राचार्य एम0 बी0 एल0 डी0 महाविद्यालय स्वरचित व मौलिक ***************************

ममता की मूरत

Image
***************** मां ममता की मूरत है, और श्रष्टि की संचालक है। यकीन करो माँ हर नन्हे से मासूम शिशु की पालक है। नहीं भेद शिशु और मेमने में, अपनी छाती से चिपकायी है। ईश्वर के बाद अगर कोई तो, इस धरती पर माँ कहलायी है।। आँचल से चिपका कर अपने, ममता की नींद सुला देगी। इस पावन सी मूरत देखो, पाषाण हृदय को रुला देगी।। माँ की बांहों का बिछा हुआ, एक नर्म बिछौना मिल जाए। यूँ तृप्त सुखद अनुभूति मिले, ज्यों स्वर्ग का कोना मिल जाए।। *************************** स्वरचित,मौलिक डॉ0 अजीत खरे

अतीत देखती नारी

Image
पिया सजने संवरने के दिन ले गए। **************************** श्वेत वस्त्रों में लिपटी विरह गीत सी सूनी महफ़िल के खामोश संगीत सी, हेरती हूँ मैं खुद को समय हूँ मैं क्या या नायिका हूँ किसी हार की जीत सी। मेरी पहिचान का आंकलन ले गए। पिया सजने संवरने के दिन ले गए।। हूक रह-रह के दिल को जलाने लगी फिर मुझे वो सुहागन याद आने लगी जब आते थे तुम मेरे आईने की तरह मेरी पाजेब ओ चूड़ी खनखनाने लगीं मेरी कैसी परीक्षा ये कठिन ले गए। पिया सजने संवरने के दिन ले गए।। छीन कर मेरे सपने सजन ले गए सुहागिन का मानस मिलन ले गए आज बैठी तन्हा आईने के प्रत्यक्ष मेरी रंगीनियों के पल छिन ले गए। पिया सजने संवरने के दिन ले गए पिया सजने संवरने के दिन ले गए। स्वरचित,मौलिक डॉ0 अजीत खरे

एक थी निम्मो

Image
इतनी कमजोर न थी मेरी मुहब्बत याद तो तुम्हें भी आती होगी... मेरे निम्मो कहने का वो अंदाज़ अब भी कानों में गूंजता होगा, झटक कर मेरे ख़यालों को.. ख़ुद पर ख़फ़ा तो होती होगी। सच बोलना... तुम्हें मेरी याद तो आती होगी। माना अब नहीं हूं शामिल तुझ में पर तुम महसूस तो करो कि मैं नहीं हूं, तुम्हारी बेचैनियां देखकर तो यही लगता है कि मैं वहीं हूँ अब भी वहीं कहीं हूँ। वही जानी पहिचानी आवाज कानों में निम्मो कहकर तो बुलाती होगी। सच बोलना..... तुम्हें मेरी याद तो आती होगी। इतनी कमजोर न थी मेरी मुहब्बत याद तो तुम्हें भी आती होगी.. **************************** डॉ0 अजीत खरे               प्राचार्य एम0 बी0 एल0 डी0 महाविद्यालय (मउ) --------------------------

इंतज़ार

Image
**************************** कभी आऊँगा सचमुच तुम्हारे पास.. और छू लूंगा तुम्हारे वो अहसास जिन्हें शायद... तुमने मेरे लिए सहेज कर रखे होंगे। उन लम्हों में ऐ उम्र..जरा ठहर जाना खुश्बू की मानिंद मेरे करीब आना, और.. मेरी रग़ रग़ में समा जाना। मैं चाहूंगा... तुम्हारे बालों को सुलझाना, देखूंगा... तुम्हारा फूल सा मुस्कराना। किसी छुई मुई सी... खुद में सिमट जाना मैं फैला दूंगा... तुम्हारे लिए अंकपाश, छू लूंगा... तुम्हारे वो अनछुए एहसास । वो लम्हें हमेशा याद रखना फिर ये वक़्त ... कभी लौट कर न आये, शायद अगले जन्म तक के लिए।। ****************************  डॉ0 अजीत खरे ----------------------------