अपने अपने राम
जब भी कुमार विश्वास के प्रोग्राम का विज्ञापन देखती हूं जिसमे बड़े बड़े शब्दों में लिखा हैं"अपने अपने राम" पढ़ती हूं तो वाकई में खयाल आता हैं,राम अपने अपने कैसे? मैने उनका प्रोग्राम देखा तो नहीं हैं लेकिन मेरे हिसाब से भी राम सबके अपने अपने ही होते हैं । वैसे देखें तो बचपन वाले राम तो गुरु ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में विद्या प्राप्ति के समय हवन में विध्न डालने वाले रक्षशों के काल थे तो अपने तीनों भाइयों को पथ दर्शक और आदर्श भी तो राम ही थे। पिता दशरथ और माता कौशल्या के वे आज्ञाकारी और आदर्श पुत्र ,जिन्हें ने अपने राज्याभिषेक की घड़ी में भी वनवास बिना हिचक स्वीकार कर लिया ये राम की त्याग की भावना का मूर्त स्वरूप हैं। अपने माता पिता के साथ पूरी अयोध्या नगरी को वियोग में रोते हुए छोड़ के जाना एक साधु जैसा परित्याग का दर्शन करवाता हैं।वैसे ही अपने राजकुमारों वाला वैभव को छोड़ वन की और वलकल पहन कर वन के विषम वातावरण में जाना ये सब राम का साधुत्व का दर्शन करवाता हैं।जहां राम का भ्रातृ प्रेम हर एक प्रसंग में दिखता हैं।वह चाहे लक्ष्मण हो या भरत हो दोनों ही उन्हे अति प्या...