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अपने अपने राम

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जब भी कुमार विश्वास के प्रोग्राम का विज्ञापन देखती हूं जिसमे बड़े बड़े शब्दों में लिखा हैं"अपने अपने राम" पढ़ती हूं तो वाकई में खयाल आता हैं,राम अपने अपने कैसे? मैने उनका प्रोग्राम देखा तो नहीं हैं लेकिन मेरे हिसाब से भी राम सबके अपने अपने ही होते हैं ।   वैसे देखें तो बचपन वाले राम तो गुरु ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में विद्या प्राप्ति के समय हवन में विध्न डालने वाले रक्षशों के काल थे तो अपने तीनों भाइयों को पथ दर्शक और आदर्श भी तो राम ही थे। पिता दशरथ और माता कौशल्या के वे आज्ञाकारी और  आदर्श पुत्र ,जिन्हें ने अपने राज्याभिषेक की घड़ी में भी वनवास बिना हिचक स्वीकार कर लिया ये राम की त्याग की भावना का मूर्त स्वरूप हैं। अपने माता पिता के साथ पूरी अयोध्या नगरी को वियोग में रोते हुए छोड़ के जाना एक साधु जैसा परित्याग का दर्शन करवाता हैं।वैसे ही अपने राजकुमारों वाला वैभव को छोड़ वन की और वलकल पहन कर वन के विषम वातावरण में जाना ये सब  राम का साधुत्व का दर्शन करवाता हैं।जहां राम का भ्रातृ प्रेम हर एक प्रसंग में दिखता हैं।वह चाहे लक्ष्मण हो या भरत  हो दोनों ही उन्हे अति प्या...

कटी पतंग

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एक एहसास लिए मोनू से मिलने गई थी मैं ,लेकिन जब वापस जाने के लिए निकली तो अपने आप को कटी पतंग सी महसूस कर रही थी।अपने ही बोझ से ढह रही थी में क्योंकि प्यार की पतंग को मिलता  हवा का सहारा आज खत्म हो चुका था।गिरते गिरते कहां पहुंचाया था प्यार के इस खेल, हां खेल हो तो था जो मोनू ने मेरे साथ खेला था।  जब पहली बार मिले थे तब मैं उसकी दुकान पर अपने अंतर्वस्त्र की खरीदारी करने गई थी और जो खास तरीके से वह मुझे एक के बाद एक नई डिजाइन दिखा कर उससे मिलने वाली सहूलियत के बारे में बता रहा था तब एक कवि सा लग रहा था मुझे,अनायास ही उसकी मीठी बातों ने मेरे मन में उसके लिए कुछ कोमल भावना, जो एक नवयुवती के मन में आना स्वाभाविक था,उसे जन्म दे ही दिया।मेरी खरीदारी तो खत्म हो ही  गई थी और कम से कम ६ महीने तक मोनू की दुकान पर जाने का अवसर प्राप्त नहीं होना था।लेकिन उसकी दुकान के सामने से निकल भी जाऊं तो भी दिल की धड़कनें तेज हो जाती थी और उसकी एक जलक पाने के लिए निगाहें उसकी दुकान का कोना कोना टटोलती थी। बेकरारी ही तो थी जो समय के साथ ऐसे बढ़ती जा रही रही थी कि पूछो ही मत।अब बहाने से सखियों के स...

अश्रु

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बहते है अश्क ही आंखो के द्वार से खुशी हो तो भी बहेंगे ये गम में तो बहने का दस्तूर ही हैं  भरे दिल को हल्का कर देते है ये आंसू रोने के बाद आंखो को निखार देते हैं आंसू चेहरा भी खिल जाता हैं अश्रु प्रक्षालन से बुरे दिनों में सहारा और अच्छे दिनों में अभिव्यक्ति हैं ये आंसू चाहों न चाहोँ बरबस ही निकल आते हैं ये आंसू आंसू पर तरस मत खाइए दिल का गुबार निकालते  हैं आंसू जयश्री बिरमी अहमदाबाद

हमारे पवित्र सोलह संस्कार

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हिंदू धर्म कोई व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं हैं,ये प्राचीन काल से आस्थाएं और ऋषि मुनियों द्वारा संचित अनुभव और तथ्यों के आधार  पर किया समुच्चय हैं। जिसमें स्वस्थ और सामाजिक  जीवन  यापन के लिए जरूरी रीति और रिवाजों का वर्णन किया गया हैं।कोई एक व्यक्ति द्वारा सूचित पथ पर चलने की सिख नहीं हैं,तथ्यात्मक  व्यवहार या बरताव के साथ चलना हैं।महर्षि वेदव्यास के अनुसार सभी सनातनियों को १६ संस्कारों से संपन्न किया जाता हैं। १. गर्भाधान एक संस्कार ही हैं जो आज के युग में सब को कुछ अलग सा लगेगा लेकिन आज भी सब उस संस्कार के महत्व को समाज कर गर्भाधान के लिए उचित व्यवहारों को  महत्व देते हैं,उसके लिए प्रकाशित साहित्य, टैप या वीडियो द्वारा अपने आप को प्रशिक्षित करते हैं।गर्भाधान के लिए स्त्री– पुरुष दोनों को प्रसन्न चित्त ,उत्साहित और स्वस्थ रहना आवश्यक हैं।जो संतति माता पिता के रज और वीर्य से उत्पन्न होती हैं उसके योग्य विकास, स्वास्थ्य  और सुरक्षा के लिए संस्कार किए जाते हैं। विधिपूर्वक किए गया संस्कार से संतति सुयोग्य और अच्छी प्राप्त होती हैं। २. पुंसवन...

कौवों की जमात

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 एक वीडियो देखा था,एक ताकतवर मुर्गा एक कौए पर  चढ़ बैठा था और उसको अपनी चोंच से  जोर जोर से वार कर उसे घायल कर दिया था और कौवों का झुंड उसके ऊपर और आसपास उड़ कर कांव कांव कर  रहे थे।कोई भी कौवा उसे बचाने के लिए कुछ ठोस कदम नहीं उठा रहे थे।सिर्फ उड़ा उड़ करके शोर मचाते हुए उस कौए को मरते हुए देख रहे थे।अगर सभी कौवे एक साथ उस अकेले हमलावर पर घात करते तो शायद उस कौवे को बचा पाते।अगर नहीं भी बचा पाते तो अपनी ताकत का संदेश तो उस हमलावर मुर्गे को दे ही सकते थे। कांव कांव करके उड़ने से सिर्फ शोर हो सकता हैं बचाव नहीं।  क्या हम उन कौओं की जमात से नहीं हैं?जो एक कौए पर होते  हमले पर उड़ा उड़ के का का करते हैं लेकिन  उसे बचाने का कोई प्रयोजन नहीं कर पाते हैं।हमलावर एक ही हैं और इतने सारे कौएं ,एक साथ हमला करदे तो कितना भी ताकतवर हो वह भाग जायेगा। क्या हम भी अपनी समस्याओं के बारे में यहीं नहीं कर रहे हैं क्या?राजकीय अन्याय भी होता हे तो हम सोशियल मीडिया पर पोस्ट कर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुप हो  जाते हैं।या अपने दोस्तों के साथ उग्र चर्चा कर चुप हो जातें हैं।स...