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प्यार की मूरत

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तुम प्यार की मूरत हो हम सबकी जरूरत हो मां की इज्जत पिता की जान दो दो कुल की एक पहचान तूं आंगन की खुशहाली  तुम शुभ मुहूरत हो तुम प्यार की........ हम सबकी...... तूं ही परंपरा तूं मर्यादा सभी भार तेरे सिर ज्यादा तूं ही वंश वृद्धि की ज्योति तू ही गर्भ पंक को धोती हवि बनने को तत्पर रहती जहां जरूरत हो  तुम प्यार की ...... हम सबकी........ पिता,पति और पुत्र संभाले हर विपदा आगे बढ़ टाले हो स्वतंत्र ज्यूं पैर निकाले तीनों ओर से चुभते भाले तेरे सपनों की बलि देता जिसे जरूरत हो तुम प्यार की......... हम सबकी........... हर दुख भाग्य लेख पर छोड़े  टूट - टूट कर निज गृह जोड़ें अकथ-अगम है तेरी क्षमता  सर्वकाल में रखती समता रोम रोम में भरकर "ममता" अति खूबसूरत हो तुम प्यार की ........ हम सबकी.......... स्वरचित रचना, ममता उपाध्याय  वाराणसी

करुणा का भाव

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जन-जन के मन दीप  जलाती मानव मूल्यों की माला मन में करुणा भाव  जगाती  मानव मूल्यों की माला   सदाचार के आभूषण  से    तन-मन खूब सजाना है    अपने आगे बढ़ना है    औरों को  खूब बढ़ाना है  सरल शब्द में हमें बताती  मानव मूल्यों की माला... मन में करुणा ......     हर प्राणी के अंतर्मन में    प्रेम,दया का भाव पले   लक्ष्य एक हो इस समूह का   सभी सत्य की राह  चले नीति रीत  की वली बनाती  मानव मूल्यों की माला ... मन में करुणा..............   दुर्गम  है हर लक्ष्य की राहें    सधे कदम से बढ़ना है   आलोचना  पे ध्यान ना देकर      कीर्ति शिखर पर चढ़ना है   नए सृजन  की राह दिखाती मानव मूल्यों की माला  ममता पे ममता  बरसाती ..... मानव मूल्यों की माला..... ममता उपाध्याय  वाराणसी

ट्रेन का सफरविधा

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    बड़ा खुशनुमा सहर था     ट्रेन का सफर था     मंजिल का इंतजार था     दिल बेजार था           अचानक आंख खुल गई     मन में मिश्री सी घुल गई     खिड़की के पास खड़ी थी     जब उसपे नजर पड़ी थी जी चाहा पास बुलाऊं  कुछ सुनूं कुछ सुनाऊं हवाएं बेईमान हो गई  वो भी परेशान हो गई      दायें घूमें बाएं घूमें      बालों से गालों को चूमें      थोड़ी सहमी सकुचाई थी       वो चश्मा नहीं हटाई थी जानी पहचानी लगती थी पल में अनजानी लगती थी अब आंखों पर ना जोर था जब देखो उसकी ओर था      वो अपनी जगह को छोड़ कर      अब बैठ गई मुंह मोड़ कर       मैं भी मन को आराम दिया               पढ़ने,सुनने का काम दिया कुछ सफर कटा मैंने देखा वो आई नजर मेरी रेखा जो आंखें बंद कर लेटी थी  जो मेरे ससुर की बेटी थी मैं दौड़के उसके पास आया उसका बचपन याद दिलाया फिर बातों का ...