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बारिश की बूंदें

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नभ में चमकी चंचल चपला, उमड़ घुमड़ कर बरसे बादल। श्याम घटा छाई अम्बर में, रिमझिम बरसा बर्षा का जल। मिट्टी ने छोड़ी सौंधी खुशबू, हरिताभ हो उठी फसलें झूमी। शीतल, मन्द,सुगन्ध मलय संग, कुसुमित मन की कलियां झूमी। वृक्षों में छाई हरियाली, कोयल ने राग सुनाया है। सखियों ने सावन झूलों संग, राग मल्हारी गाया है। घनन-घनन गहन मेघ बरसते, आद्रा बरस रही मूसलधार। तपिश भरी धरती पर देखो, अब्र करे प्रेमिल बौछार। अनुपम शोभा नील गगन की, हर्षित हुए हंस पारावत। इंद्र धनुष से सजे है अम्बर, हुए मुदित धरणी और पर्वत। स्वाति बिंदु पा हर्षित चातक, मयूरा मन चाह रहा नाचन को। चली उमड़ि सरिता और बनिता, प्रिय प्रियतम आलिंगन को। स्वरचित एवं मौलिक शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

बारिश

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 बीत गयी है तपिश जेठ की, रिमझिम   सावन   आया  है। मदमस्त मयूरा नाच रहे अब, कोयल  ने  गीत  सुनाया  है। दादुर झींगुर की झांय-झांय, वो  मीठी   तान  पपीहे  की। इकरार किया जब अम्बर ने, भींगी  चुनरिया  अवनी  की। घनन-घनन  घन  मेघ  गरजते, चंचल दामिनि लुकती छिपती। बूंदों की  उज्ज्वल  लड़ियों  से, उल्लासित  हो  धरा  महकती। मिट्टी  से छोड़ी   सौंधी  खुशबू, हरिताभ   हुई   फसलें   झूमी। खिले  पुष्प  महकी  है  लताएं, मनभावन  दृश्य प्रकृति  झूमी। धुंधलाया  सा  था  जो  अम्बर, वो स्वच्छ और  नीलवर्ण हुआ। स्मृति पटल के धूमिल चित्रों ने, मानो      पुनरावतार     लिया। रक्त  पुष्प  से   महका  उपवन, आशिक भँवरे को गीत मिला हो। विरह तपिश से आकुल मन को, जैसे  कोई   मनमीत  मिला  हो। शीला द्विव...

नवबर्ष

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हिन्दू नवबर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं हर्षित हुआ धरा  का कण-कण, प्रकृति  ने   भी  श्रृंगार  किया है। उल्लास  उमंग   साथ  में  लेकर, हिन्दू नवबर्ष का आगमन हुआ है। सिंदूरी  सी  आभा  लेकर   सूरज, पूरब     से    पश्चिम    जाता    है। नई   उमंगों  नई  तरंगों   के   संग, नव      संवत्सर       आता       है। करें   जागरण    माता    का   सब, गूंजे   धरा    गगन   जयकारों   से। मंगल     आरती     घर-घर    होवे, झांझर       ढोल      मंजीरों     से। सम्पूर्ण   विश्व   के    मालिक   का, आया  है  अवतरण   दिवस  देखो। आध्यत्मिकता  से   प...

मैं कमजोर नही

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मत समझो कमजोर मुझे मैं नही अबला बेचारी हूँ। रुख तूफानों का मोड़ने  वाली मैं भारत की नारी हूँ। मैं लक्ष्मी हूँ मैं सरस्वती हूँ मैं शिव की अर्धांगिनी हूँ। वेद शास्त्र की  बनी प्रणेता  ऋषियों की वामांगी हूँ। कर्तव्य धर्म  समझाने  वाली  कैकेयी  सी रानी हूँ। धर्म नीति बतलाने वाली मन्दोदरी  सी महारानी हूँ। पिय  वियोग  बिष पीने  वाली  मैं उर्मी सी नारी हूँ। छोड़े महलों के सुख सारे वो सीता सी सुकुमारी हूँ। वन-वन ब्रह्म नचाने वाली  बरसाने की ग्वालिन हूँ। कृष्ण  प्रीति रंग रंगने वाली  राजस्थानी जोगिन हूँ। सत्य की राह दिखाने  वाली  कुंती सी  महतारी हूँ। कौरव वंश  जलाने  वाली  द्रोपदी  सी चिनगारी हूँ। ज़हर  त्याग का  पीने  वाली  यशोधरा  से  नारी हूँ। फिरंगियों को धूल चटाई  बुंदेलखंड  की अंगारी हूँ। दीप दान करवाने वाली पन्ना धाय  सी  बलिदानी हूँ। भरत से सुत को जननेवाली शकुंतला सी कहानी हूँ। जिन आंखों में  बहती ममता  उन आंखों में हाला ह...

स्वर कोकिला, भारत रत्न, श्री लता मंगेश्कर जी को भावभीनी श्रद्धांजली

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💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 एक और सितारा भूमण्डल से पहुंच गया सुर लोक में, जिसके सप्तस्वरों  की ध्वनि अब  गूँजी  है परलोक में, शत वार नमन करती हूँ मैं धरती की  स्वर साम्राज्ञी को, हे लता तुम्हारी वो खुशबू महसूस करेंगे सब भूलोक में। वो स्वरों की स्वर्णिम बगिया जिसने हर दिल को महकाया, गीतों, गज़लों, और नज़्मों से संगीत का एक जहां बसाया, नाजुक थी कली स्वरलोक की जो वो सुरलोक सिधार गई, याद  रखेगा  राष्ट्र तुम्हे  जिसने अनमोल  रतन  को खोया। @अक्षरा

नेताजी सुभाषचंद्र बोस

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प्रारंभिक जीवन- नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म जनवरी 23 सन 1897 में उड़ीसा के कटक शहर में हिन्दू कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता जानकी नाथ बोस प्रख्यात वकील थे। उनकी माता प्रभावती देवी सती और धार्मिक महिला थीं। प्रभावती और जानकी नाथ की 14 संतानें थीं जिसमें छह बेटियां और आठ बेटे थे। सुभाष उनमें से नवें स्थान पर थे। सुभाष बचपन से ही पढ़ने में होनहार थे। उन्होंने दसवीं की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था और स्नातक में भी वो प्रथम आए थे। कलकत्ता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्तानक की डिग्री हासिल की थी। उसी दौरान सेना में भर्ती हो रही थी। उन्होंने भी सेना में भर्ती होने का प्रयास किया परंतु आंखें खराब होने के कारण उनको अयोग्य घोषित कर दिया गया। वे स्वामी विवेकानंद के अनुनायक थे। अपने परिवार की इच्छा के अनुसार वर्ष 1919 में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए इंग्लैंड पढ़ने गये। *कैरियर* भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए उन्होंने 1920 में आवेदन किया और इस परीक्षा में उनको न सिर्फ सफलता मिली बल्कि उन्होंने चैथा स्थान भी हासिल किया। वे जलियावाला बाग क...

नया मोड़

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आज हर किसी की जिंदगी में  एक ऐसा नया मोड़ आया है। जहाँ सुख तो हुआ कोसो दूर  हर तरफ सिर्फ गम का ही साया है।। रक्तरंजित से रंजित है धरा  हर तरफ निराशा के बादल छाए है। हर घर की  देहरी के बाहर बेखौफ काल खड़ा बाहें फैलाये है।। दहशतभरा माहौल हर तरफ जीना दूभर हो रहा है। महामारी के प्रकोप से देखो आदमी आदमी को छूने से डर रहा है। एक जुट होकर हमें ही  मिलकर संघर्ष इतना करना है। अंधकार को जीत कर एक  नई सुबह का आगाज देना है।। निराशा के बादल छट जायेगें  दुख की काली रात भी बीत जाएगी। तभी तो नई सुबह हमारे जीवन में  एक नया मोड़ पर ले कर आयेगी।। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

लम्हे

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रेशम के धागों सी  कुछ उलझी कुछ सुलझी सी जिंदगी। सलाइयों के उतार चढ़ाव में कुछ यूँ सिमटी सी जिंदगी। हर रोज अनगिनत  लम्हों से होकर गुजरती हूँ। कुछ को धुंधला और कुछ को दिल के करीब पाती हूँ। तख़य्युल से उन ख़्वाबों को दिन-रात संजोती हूँ। जी हा!!मैं गृहणी हूँ विश्वास की डोर में रिश्ते पिरोती हूँ। हर सांझ-ओ-सहर अनगिनत किस्से कहानियां गढ़ती हूँ। उड़ा देती कुछ बिखरे ख़्वाबों में  और कुछ को स्याह अंधेरों में खुद ही  मिटा देती हूँ। खुशी और गम से भरी जीस्त में न जाने कितने अनमोल लम्हों को जीती हूँ। गमों को गफ़न कर देती दिल के सन्दूक में और खुशियों से आने वाला कल सींचती हूँ। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

शिव महिमा

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अदभुत,अनुपम,अलौकिक,अविरल है रूप निराला। कर त्रिशूल अरु डमरू विराजे  गले मुंडों की माला। जटामध्य गंगधार धवल अति श्वेत त्रिपुंड ललाट पे सोहै। कालकूट बिच कंठ विराजे मस्तक द्वितीय शशांक उजाला। तन मृगचर्म है अंग भभूति कानन बिच्छू कुंडल साजे। मुख प्रसन्न त्रैलोक्य न्यारा धवल हृदय हरि चरण विराजे। गिरि पर विहारकरें गौरीनाथ संग में सोहति भूत पिशाचिनी। नंदी सवारी जग के रखवारे एकदन्त गणनायक गोदी विराजे। नील गगन के तले विराजे आसन उनका मृगछाला है। नही चाहिए छप्पन व्यंजन केवल भंग का प्याला है। जग को पावन करने वाले राख मले श्मशान की देखो। पुष्प सुवाषित नही है भाते गले उनके रुद्राक्ष की माला है। संकट हरण भक्त पारसमणि सारे जग के रखवाले है। डम-डम,डम-डम डमरू बजाये तब नटराज कहाते है। धवल गौर तन रूप अनौखा कर्पूरीगौरं कहलाते शिव। जिसने चरण प्रीत सच्ची की उसके कर बिक जाते है। स्वररचित एवं मौलिक शीला द्विवेदी "अक्षरा"

जीवन की शतरंज

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मानव जीवन  की दुनिया में, शतरंज   के जैसी कहानी है। कहीं पे प्यादा  कहीं पे राजा, और   कहीं    पर   रानी   है। हार-जीत  का  खेल निराला, रिश्तों की बलि चढ़ जाती है। सूझ-बूझ  से  काम  अगर लें, तो  मंजिल।  मिल  जाती  है। कोई  नही  किसी   से   छोटा, सबका  अस्तित्व  यहां  पर है। कमियों  को  गर छोड़ दे पीछे, तो  सिर्फ  अच्छाई यहां पर है। छोटा  सा  प्यादा  शतरंज  का, जीवन का फलसफा बताता है। पाता    है   वही   ऊंचाई    को, जो हौसलों  के पंख लगाता है। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

ओस की बूंदें

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आसमाँ से गिरती हुई वो ओस की बूंदें, भोर की स्वर्णिम रश्मि में हरीतिमा कहलाती है। अनगिनत विन्दुओं से पिरोई हुई वो कोपलें, धरा पर दुलहिन सी सज जाती है। तरु पल्लव पर चमकती जैसे, मोती हो समंदर का। चाँद की ज्योत्स्ना पाकर, आँचल सजा देती है अम्बर का। हौले-हौले अहसास से, तन को सिहरनसे भर देती है। फूलों की पंखुड़ियों घास,  और लताओं को आकर्षित बनाती है। गुनगुनी वो धूप सुबह की, भ्रमर का कलियों को स्पर्श करना। पर्वत,नदियां वन और प्रकृति का अनुपम सौंदर्य, आसमाँ में हल्की सी धुंध आध्यत्मिकता का अहसास करना। ओस की इन बूंदों में,  छिपे रहते है अनेकों अहसास। कवि,योगी,सन्त,और प्रेमी सबका अलग अहसास।। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

नींद

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 बचपन की वो बेफिक्री वाली नींद बहुत याद आती है, जो चुपके से आंखों के कोयों में आकर बस जाती है। न ही सर पर जिम्मेदारी का बोझ था न ही चिंता थी काम पर जाने की, पढाई का नाम सुनते ही आदत पड़ गयी थी अलसाने की। नींद में सोए हुए हम अकसर सपनों की दुनिया में रहते थे, कभी करते थे सैर समंदर की  तो कभी हवा में उड़ते थे। बचपन की इस खूबसूरत दहलीज को न जाने हम कब पर कर गए, दब गए जिम्मेदारियों के बोझ तले और सुकून की नींद से कोसों दूर हो गए। न ही मिलती अब वो बेफिक्री वाली नींद और न ही सपनों में खोते है, नींद की गोली का सहारा लेकर हम फिर वही दिनचर्या शुरू करते है। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

मेरा भारत

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सब देशों में न्यारा है, मेरा भारत सबसे प्यारा है। उत्तर में है खड़ा हिमालय पल-पल सौंदर्य बढ़ाता है, दक्षिण में लहराता सागर विशालता के गीत गाता है। कहते है जिसको घर का स्वर्ग ऐसा कश्मीर हमारा है। सब देशों में न्यारा है, मेरा भारत सबसे प्यारा है। कण-कण को पावन करती माँ गंगा की धार यहाँ, हर-हर महादेव जहां गूंजे वह काशी और हरिद्वार यहाँ। धर्म के खातिर रामचंद्र ने  यहाँ रावण को संहारा है। सब देशों में न्यारा है,मेरा भारत सबसे प्यारा है। जीर्ण शीर्ण करते तन को परमार्थ के खातिर सन्त यहाँ, किंकर्तव्यविमूढ़ हुए अर्जुन को केशव ने दिया गीता का ज्ञान यहाँ।  हर बाला यहाँ राधा है  हर बालक कृष्ण सा प्यारा है। सब देशों में न्यारा है,मेरा भारत प्यारा है। मन्दिर और मस्जिद का रास्ता जहां एक ही जाता है, भगवा और हर मिलकर जहाँ श्वेत शांति का सन्देशा लाता है। स्वर्ग लोक की ध्वजा सा चमके ऐसा वो तिरंगा हमारा है। सब देशों में न्यारा है, मेरा भारत प्यारा है। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश

श्रद्धांजलि

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नमन जांबाज़ वतन  के तुमको  बारम्बार करती हूँ, माँ  भारती  के  लाल  तुम,  तुम पर  गर्व  करती हूँ, मिटा   तम  घोर भारत  का  तुम्हारे  शौर्य  के आगे, अश्रुजल दृग छलकता  है विदा मैं तुमको करती हूँ। था वो नायाब  हीरा देश  की  बलि  चढ़  गया देखो, अमर   इतिहास  स्वर्णिम अक्षरों  में सज गया देखो, पराक्रम,धैर्य, साहस, शौर्य देशभक्ति की निशानी है, सितारा हिन्द  का  फिर से गगन  में सज गया देखो। @अक्षरा

सैनिक

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कांधे पर बंदूक सजाए करते देश की रखवाली है, सीमा पे निर्भीक खड़े  ज्यों चमके सूरज सी लाली है। कर्तव्य पथ पर है अडिग वो सेना के जवान है, दुश्मनों का करे दलन वो देश की आन,वान, शान है। पंथ कठिन विश्वास अटल है फिर भी बढ़ते जाते है, लाखों दुश्मन हो सामने पर तनिक न वो घवराते है। ईद,दिवाली,होली हो या फिर हो रक्षा बंधन, फ़र्ज के खातिर सब छोड़ा देश सेवा में अर्पित है तन मन धन। फौलादी सा सीना है नही किसी से डरते है, मातृभूमि की रक्षा में अर्पित वो खुद को करते है। जिस देश में हमने जन्म लिया उस माटी का कर्ज चुकाएंगे, मन में विश्वास का दीप जला हम अंधियारों से लड़ जाएंगे। मौत सदा साथ में चलती हाथों में कफ़न तिरंगा है, भारत माँ के रक्षक तुमको दिल से सलाम हमारा है। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

सर्दियां

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सन-सन चलती हुई वो सर्द हवाएं, आसमाँ में छाई घनघोर धुंध, और चौपाल में जलता हुआ वो अलाव, आज भी अकसर स्मृतियों में आ जाता है। जहाँ जाति-पांति की दीवारें नही थी, नही थी एक दूसरे के लिए द्वेष भावना, एक ही चिलम से बारी-बारी कश लिया करते थे, न ही मंडराता था कभी संक्रमण का खतरा। कभी राजनीति की बात हुआ करती थी, तो कभी कहानी और चुटकुले हुआ करते थे, कभी बांटते थे एक दूजे की परेशानी, तो कभी घरेलू मुद्दे भी सुलझते थे। सुबह की वो गुनगुनी धूप, जहाँ बुजुर्गों की चारपाई  उनके अपनत्व का अहसास कराती है, तो कहीं चूल्हे पर बनाती हुई माँ की वो मक्के की रोटी याद आती है। वो धूप में स्वेटर बुनना हर सलाई पर एक सवाल पूछना, खुद को छोड़ सबका ख्याल रखना कभी चक्की पीसते हुए गीत गुनगुनाना। हर रोज भजन गा कर जगाती थी, सच में वो सुबह बहुत याद आती है। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

शबरी की प्रतीक्षा

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अनुराग हुआ प्रभु चरणों से, माया का बंधन तोड़ दिया, आयेंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया। थी निम्न जाति की लेकिन वो,प्रभु चरणकमल की भ्रमरी थी। भक्ति  के  रंग  में रँगी  हुई,  ऐसी   वो   माता   शबरी   थी।। श्रीराम भक्ति के दीपक को,निज हृदयकमल में जला लिया। आएंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर विश्वास किया।। प्रभु चरण पखारन को शबरी, प्रतिदिन गंगाजल लाती थी। निज प्रभु को भोग लगाउंगी, मीठे फल चुन चुन लाती थी।। कांटा न चुभे पग में कोई, पुष्पों  से  पथ  को   सजा दिया। आएंगे एक दिवस राघव, गुरु बचनों पर  विश्वास किया।। अवतार  लिया जब श्री हरिने, पृथ्वी का  भार  उतारन को। चल दिये छोड़ कर अवध पुरी, असुरों का दल संघारन को।। लीला धर की लीला के बस, रावण  ने सीता हरण किया। आएंगे एक दिवस राघव, गुरु  बचनों पर विश्वास किया।। आये जब सहित अनुज के प्रभु, शबरी की कुटिया धन्य हुई। पाकर  दरसन  जग पावन का, भिलनी से फिर वो संत हुई।। अतिसय प्रीती देखी  प्रभु ने,...

धरा

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सहनशक्ति से भरपूर है वो, मेरी धरती। मिट्टी को सोना, करने वाली वो है, पारस मणि। भार सहती, पर्वतों नदियों का, नही चाहती। धर्म से टिकी, अधर्म से डरी है, शांति की धुरी। वरदान है, ईस्वर का उसको, पूजनीय है। निस्वार्थ भाव, से करती है कर्म, नही कोई है स्वार्थ।।। स्वरचित एवं मौलिक शीला द्विवेदी"अक्षरा"

स्पर्श

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स्पर्श  पा नवजात शिशु का, उर    स्पंदन    खिल   गयी। एहसास कर  के  पूर्णतः का, वो  ममतामयी   मूरत  बनी। गुनगुना   स्पर्श    लबों   का, नफ़स   सरगम    गा   उठी। तनमन रोमांचित  जब हुआ, वो  नवतरंगिणी शरमा उठी। आवारा  आशिक  भ्रमर ने, स्पर्श  कलियों   का  किया। प्रीत  की    थी  रीत  सच्ची, पाकर  मधु  मदमस्त  हुआ। स्पर्श  राघव  ने  किया जब, पत्थर अहिल्या जड़वंत थी। चेतन  हुई  वो पतित पावन, जो नारि ऋषि  कुलवंत थी। एहसास ही स्पर्श प्रिय का, ये घुट्टी  जिसको मिल गई। बिन  स्पर्श   मीरा  दीवानी, कान्हा  चरण  में समा गई। शीला द्विवेदी "अक्षरा" उत्तर प्रदेश "उरई"

तेरे इश्क़ में

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"किताब सी मैं और कहानी से तुम"बन गए, चूम के वरक के लफ़्जों को इश्क की दास्तां बन गए।  बहती हुई नदी का पानी में और तुम समंदर बन गए, कल्पनाओं से भरे मेरे मन में तुम अनन्त से अम्बर बन गए। मासूम से तेरे दिल की मैं हृदय स्पंदन बन गई, समा के तेरी साँसों में मैं प्यार भरी सरगम बन गई। बनाया है तुम्हे शिव सा और मैं तुम्हारी शक्ति बन गई, तुम बने आस्था से दीपक मैं भक्ति की ज्योति बन गई। पाकर तुम्हारा इश्क का तोहफा मेरा मन मयूर हो उठा, इस जहां हो या उस जहां हो खुश किस्मत मैं हो गयी छोड़ कर सब रिश्ते-नाते मैं तुम्हारी हो गई, बसा कर मन में मोहिनी मूरत मीरा श्याम की दीवानी हो गई। शीला द्विवेदी "अक्षरा"