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बसंत

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चौके से कमरे, कमरे से चौके तक का, आगंन मेरा था। आंगन से जो दिख जाता, बस इतना अंबर मेरा था । आंगन में झांकती नीम की डाली, पतझड़ निर्वसन कर जाता।  अपनी जड़ों के संबल से, डाली पर यौवन छा जाता। सिखा गई बाहर खड़ी नीम, कितना भी पतझड़ आए, खुदी अगर बुलंद हो तो पुनः मधुमास छा जाता। आंगन से बाहर मुझको जाना है,  कितना  विस्तृत है नभ, मुझको समझना है, बहुत हुई निर्वसन, अपने हिस्से का बसंत मुझको अब पाना है।  पुष्पा बंसल

मुझको मुझसे मिलना है

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तुम माधुरी, तुम कान्ता, तुम कामिनी  तुम रागिनी, तुम बनिता, तुम सुंदरी,    एक नाम और है तुम्हारा, और वह है अबला...    पर आज के संदर्भ में इस नाम का औचित्य क्या है भला...    जब भी कोई विवाद होता तुमको ही झुकना होता था,    नौबत आती तो छोड़ना पड़ता था अपना घर द्वार।    छोड़ने पड़ते थे बच्चे, और छोड़ने पड़ते थे हर अधिकार।    हां वह अधिकार जो कहने को होते थे मेरे,    पर पर हकीकत में कुछ नहीं होता था आखिरकार।    पर नहीं अब और नहीं, क्यू हर बार मैं ही घर छोड़ कर जाऊँ,    क्यू मैं ही, परित्यक्ता कहलाऊ।    मै कोई त्यागी हुई वस्तु नहीं, मैंने ही तुम को छोड़ा है।    क्योंकि कदम कदम पर तुमने मुझको तोड़ा है।    पर अब और नहीं, मुझको अब मुझसे मिलना है,    फ़र्ज़ हर निभाउंगी, पर फर्ज के नाम पर पिंजरे में नहीं रहना है।    जो ख्वाहिशें , जो शौक दफन थे मेरे,    अब उनसे मिलना जुलना है।    मै नारी कोई अबला नहीं,    उन्मुक्त गगन का पक्षी...