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स्वामी विवेकानंद

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विवेक हो,नरेन्द्र हो,स्वामी पूज्य हमारे दिनकर,भानू से तपते लगते कितने प्यारे 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 विश्व पटल पर गूँजी जबसे  तेरी वो दहाड़ हिन्द संस्कृति खुब चमकी पिघल गये थे पहाड  🚩🚩🚩🚩🚩🚩 वेद,उपनिषद ग्रन्थों की जो करते थे उपहास इतिहास के पन्नों में देखो उनका वो परिहास  🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 जगत गुरु है राष्ट्र हमारा, जन जन को समझाया केसरिया ओर भगवा झण्डा चहुंओर लहराया  🚩🚩🚩🚩🚩🚩 युवाओं का बना होंसला,भारत का अभिमान  अल्पायु में पाठ पढाया,कराया सत्य का ज्ञान  🚩🚩🚩🚩🚩🚩 अध्यात्म कभी किसी को सिखलाया नहीं जाता  सत्य कहो चाहे जिस तरहा बस सत्य  वही होता 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 उठो, जागो साध्य करो, लक्ष्य को पा जाओगे स्वाभिमान से जीने का,मार्ग प्रशस्त पाओगे 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 भारत माँ की पूजा होगी, बस देव न कोई दूजा स्वतंत्र जीवन की चाह है तो ओर न कोई पूजा  🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 अपनी ओज भरी वाणी से,सनातन को समझाया  भ्रान्तियाँ सारी दूर कर दी,वेदों को जब बताया 🚩🚩🚩🚩🚩🚩 कृष्णा की ✍कलम से 

पितृपक्ष

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"जानती हो बाऊजी को हल्वा बहुत पसन्द था "' रमेश ने अपनी पत्नी से कहा । आज हल्वा पूरी बनाकर धुप लगाना अच्छे से। सुनीता चूल्हे पर दूध चढाते बोली हाँ हाँ जरूर बनाऊगी,ओर क्या पसंद था ये भी बता दो। दोनो पति पत्नी अपने पिता ओर श्वसुर के श्राद्ध की तैयारी कर रहे थे।घर में भोज रखा ,रमेश ने अपने ससुराल वालों की खुब खातीरदारी की । सबने खाना खाया दोपहर हो गयी तभी अचानक रमेश को उस माँ की याद आ गयी जो अभी जिन्दा थी ओर पलंग पर लेटी अपने भोजन का इन्तजार कर रही थी । रूखी आंखो में अनगिनत प्रश्नों को समेटे ,बेबस ,लाचार एक माँ अपने पति का श्राद्ध देख रहो थी ,जिस बाप को बेटे ने कभी रूखी सुखी रोटी समय पर नहीं दी आज उसके मरने पर शाही भोज हो रहा था। ये सब देखकर माँ किंचित यही सोच रही होगी ये श्राद्ध जीते जी क्यूँ नहीं होता .................... कृष्णा की✍️ कलम से