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Showing posts with the label लघुकथा

गरीब कौन...!

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सेठ :- ए... लड़के ये स्कूटर कितने में दिया..?  बच्चा :- बीस रुपया साहब...।  सेठ :- बीस रुपये... लूट मचा रखी हैं तुम लोगों ने तो..। मेले में मौके का फायदा उठाते हैं तुम जैसे लोग...। सही सही बोल... वरना ओर भी लोग हैं यहाँ बेचने वाले..।  बच्चा:- साहब अठारह रुपये दे दिजिएगा... बोनी करवा दो साहब... मेहरबानी करो साहब..।  सेठ :- दस रुपये में देनी हैं तो बोल...।  बच्चा :- क्या साहब पन्द्रह रुपये तो खरीद हैं हमारी..।  सेठ :-चल छोड़ फिर... नहीं चाहिए..।  बच्चा :- साहब सत्रह रुपये दे दिजिएगा...। दो रुपया कमाएंगे तो रात का खाना खा पाएंगे...।  सेठ :- अरे छोड़ो ये तुम लोगो का फिल्मी डायलॉग...। साले तुम जैसे लोगो की असलियत अच्छे से जानता हूँ मैं...। हम जैसे लोगो को लूटकर रात को चरस गांजा पीते हो... शराब पीते हो..। हमारा देश... हमारा समाज तुम जैसे हरामियों की वजह से पीछे होता जा रहा हैं...।  बच्चा :- साहब गाली काहे दे रहे हो..।  सेठ :- अरे तुम जैसे लोग इसी लायक हो...। अभी आखरी बार बोलता हूँ दस रुपये में देना हैं या नहीं..!  बच्चा :- नहीं सा...

डाकू के प्रेम की निशानी

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भारत आजाद हो चुका था। सारी रियासतें देश का हिस्सा बन चुकी थी। राजाओं के रहन-सहन, काम करने के तरीके में थोड़ा बदलाव तो आया, किंतु जनता आज भी उनको उतना  ही प्रेम करती थी। जो जिस रियासत का राजा था वहां की जनता सरकार के बजाय उसे का हुकुम मानती थी। मुन्नी  बाई सालों से अपना कोठा इसी रियासत में चलाती आ रही थी।   बड़े बड़े सेठ, हुक्मरान उसके कोठे की शान होते थे। परंतु कुछ 2 साल से उसके कोठे की एक लड़की गोरी की चर्चा पूरे शहर में फैली थी। मुन्नीबाई गोरी को ऊपर वाले कमरे में रखती थी। कोई उससे मिलने नहीं जा सकता था। आए दिन ग्राहक उसके लिए आते, पैसे भी बढ़ाते ऐसा नहीं है कि मुन्नीबाई उसका सौदा नहीं करना चाहती थी, किंतु वह मजबूर थी। वह तो दिन रात सपने देखा करती कि कब गोरी का सौदा हो? कब उसको माल मिले? पर गोरी किसी की अमानत थीः डाकू हजीरा की हुआ यह कि रात को 2 साल पहले हजीरा मुन्नीबाई को गौरी को सौंपते हुए कहा कि -'मेरी अमानत है, संभाल कर रखना लेने आऊंगा। अब हजीरा से मुन्नीबाई बड़ी डरती थी। एक तो डाकू ऊपर से वह काफी रुपया पैसा और गहने देकर गया था । गौरी की देखभाल के लिए। जाते-जात...

खुशहाल परिवार की चाबी

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                          🏡 धर्मगढ़ नाम की एक सुंदर नगरी थी वहां पर लोग आनंद पूर्वक अपना अपना जीवन यापन कर रहे थे। वही, रणविजय जी का मध्यम वर्गीय परिवार भी खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा था। तभी उनके पड़ोस में गुरुशरण जी का परिवार रहने आया। वही पास के बड़े नगर में उनका बहुत बड़ा व्यापार था। वे बहुत संपन्न और समृद्ध परिवार से थे। पर उन्हें अपनी समृद्धि का तनिक भी घमंड नहीं था बड़े व्यवहार कुशल लोग थे। कुछ ही समय में रणविजय जी और गुरुशरण जी का परिवार आपस में बहुत घुल मिल गए दोनो परिवार अब एक परिवार की तरह रहने लगे, पर गुरुशरण जी को अपना मध्यमवर्गीय होना धीरे धीरे अखरने लगा और वो भी बड़े आदमी बनने की होड़ में दौड़ने लगे। और इस दौड़ भाग में उनका खुशहाल परिवार बिखरने लगा, पहले रणविजय जी अपने परिवार और बच्चों के संग उत्तम समय व्यतित करते थे पर उन्हें अब समय की कमी होने लगी पैसे तो उनके पास बहुत आ गए सुख सुविधाएं भी बढ़ गई, पर अब खुशियों में कमी होने लगी। अब रणविजय जी के बच्चें अपने पिता संग खेलने को तरसने लगे उनकी पत्नी पति ...

हाइवे का कैफे

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“ अरे यहां शहर से दूर किसको सूझा ये कैफ़े खोलने का ?” मैंने हाईवे से शहर के अंदर मुड़ती हुई सड़क पर अपनी कार मोड़ते हुए लगभग सुनसान जगह पर कैफ़े देखकर सोचा।  उस वक्त रात के करीब नौ बज रहे थे। मैं करीब दस साल बाद उस शहर वापिस जा रहा था। मैंने उस शहर में हॉस्टल में रहते हुए इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी। इस हाईवे पर तब भी कुछ ढाबे थे जहां हम कॉलेज के फ्रेंड्स खाना खाने आया करते थे।  कॉलेज की पढ़ाई के बाद मेरी एक मेट्रो सिटी में मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी लग गई थी। नौकरी और घर परिवार की व्यस्तताओं के कारण इतने साल यहां नहीं आ पाया था।  पिछले हफ़्ते कॉलेज के समय के एक दोस्त राहुल का फोन आया था कि उसकी बहन की शादी है। उसने मुझे जोर देकर कहा था कि हर हाल में आना है।  मैंने भी ये सोचकर हामी भर दी कि इसी बहाने उस शहर में फिर से जाने का मौका मिलेगा और दोस्तों से मिलना भी हो जायेगा। बच्चों के एग्जाम होने के कारण पत्नी साथ नहीं आ पाई थी।  मैं अकेला खुद कार चलाकर आ रहा था। करीब चार सौ किलोमीटर का सफ़र था। लगभग छः घंटे का वक्त लगता था। घर से दोपहर में तीन बजे के आ...

रंग एक जैसा

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वह अपने दोस्तों के साथ बैठी हुई गुफ़्तगूँ कर रही थी और बता रही थी कि आजकल उसने अपनी दोस्त श्रेया के साथ काम करना छोड़ दिया है क्योंकि जब वह अपनी 'बच्चे की आया' को साथ लेकर उसके घर गयी थी... तो यार!  वह तो उसे खाना देना तो दूर, उसे पानी तक देने में तकलीफ हो रही थी और ऐसा बिहेवियर था उसका, जैसे कि कोई अछूत हो वह, ऐसे कोई करता है क्या! गरीब की कोई इज्जत नहीं होती .. बताओ ? मैं तो उल्टे पैर वापिस आ गई l तभी उसकी एक दोस्त ने किसी सामान का जिक्र किया तो उसे याद आया कि.. उसे तो वह आज सुबह से ढूंँढ रही हैं.. मिल ही नहीं रहा l फ़िर ना जाने क्या सोचा उसने कि आया को बुलाकर उसे सबको नाश्ता परोसने का कह, धीमे से उस कमरे में गयी जिसमें उसकी आया का थैला रखा था और उसकी तलाशी लेने लगी कि तभी अचानक से वहाँ "आया" आगई और बोली - दी आप सुबह से यही ढूँढ रही थी ना.. ये बालकनी मे डला था, शायद बाबा खेलने के लिए ले गए होगे l वह झटके से उठी और अपने चेहरे पर आते जाते रंग को छिपाती हुई उससे सामान ले निकल गई l उधर आया के चेहरे पर एक व्यंग्यस्मित लहर आई.. जैसे कह रही हो कि दोनों दोस्तों का रंग...

सरहद के पार (मिलन)

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रेगिस्तान की तपती रेत,में एक बुढ़िया अपनी झुकी हुई कमर और कपकपाते हाथो में लाठी टेकते हुए चली आ रही थी,, ये सिलसिला उसका आज से नही पिछले पैसठ सालो से चला आ रहा था,, क्या गर्मी क्या बारिश ,और क्या ही तूफान उसे कभी कोई रोक नही पाया था,,,,मानो उसके आगे सब नमस्तक हो गए थे।।,,,,,,, शन्नो धीरे धीरे चल कर सामने कटीले तारो से बने बाउंड्री के पास आकर  खड़ी हो जाती,,,,देखने मे  ये बाउंड्री कोई आम सी लगती जो अमूमन लोगो के घरों के आस- पास बनाई जाती है,,, , लेक़िन  ये आम सी दिखने वाली बाउंड्री दो देशों को बांटने का काम करती है,,,,, शन्नो रोज तपती दोपहरी में आकर बॉर्डर से कुछ दूर पर आकर खड़ी हो जाती और एक टक अपनी डबडबाई आँखो से , बार्डर के उस पार देखने लगती ,, अब तो कोई फ़ौजी भी उसे न रोकता और न टोकता था,,,,  वह बावरी बुढ़िया घण्टो बैठकर बॉर्डर के उस पार देखती,,, दोनो देशों के सैनिको की भी आंखे नम हो जाती ,,,शन्नो की दशा देखकर,, लेकिन वो भी क्या कर सकते थे,,,वो तो बस अपना फ़र्ज़ निभा रहे थे,,,अपने  देश की सुरक्षा करके,,,, ,  ये जगह  शन्नो  लिए किसी मंदिर से कम ...

टिपिकल सास

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नीरजा को आज फिर अपने पुराने दिनों की याद आ गई l उसने घर से बाहर जाने के लिए चौखट की ओर कदम बढ़ाया ही था कि पीछे से उसकी सास ने आवाज़ दी -" सिर पर पल्ला रख, नीरजा l" उसने मुड़कर देखा और गर्दन झुकाते हुए,लम्बा पल्ला निकाल कर सिर ढक लिया  और सास से बाहर जाने की अनुमति माँगी  पर जब देखा कि वे फ़ोन पर बात कर रही हैं तो वहीं पर खड़ी हो l उनकी बात खत्म होने की प्रतीक्षा करने लगी l  उसे आज भी याद है, दीपक से वह पहली मुलाक़ात जिसने उसके दिल पर पहली बार दस्तक़ दी थी l दीपक का व्यक्तित्व उसे उसके खुले विचारों के कारण ही तो पसंद आया था l विवाह उपरांत उसे आगे पढ़ने की स्वीकृति दी गई थी जिसके कारण  ही उसने दीपक से शादी करने का फैसला लिया था l परंतु तब वह यह नहीं जानती थी कि परिवार के सदस्यों द्वारा हर दिन अकारण छोटी-छोटी बातों पर संस्कारों की परीक्षा, धैर्य की परीक्षा, इच्छाओं की परीक्षा, मान-सम्मान की परीक्षाओं में  वह उलझ कर रह जाएगी और अपने पढ़ने की बात को भूलाकर कब आगे बढ़ जाएगी l इसकी भनक भी उसे नहीं लगी l इस बात का अहसास उसे तब हुआ जब उसने अपनी सास को अपनी बहन से कहते...

कीमत

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आज फिर वही सब्जी..... मम्मी मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि मुझे करेला बिल्कुल भी पसंद नही, फिर भी आप वही मेरे सामने ले आती हो....  जाओ मुझे नहीं खाना, नीता खाने की थाली गुस्से से अपनी मम्मी की तरफ खिसका देती है और वहां से गुस्से से अपने कमरे में चली जाती है। कुछ समय बाद.... जब नीता अपने कमरे की खिड़की से बाहर की ओर देखती है तो उसे दिखाई देता है की एक छोटी सी बच्ची सब्जियां बेंच रही होती है और लोगों से खरीदने की अपील भी कर रही है। नीता यह दृश्य देखकर भावुक हो जाती है और नीता की आंखों में से आंसू निकल आते है। नीता को करेले की कीमत भी आज पता चल जाती है।                     आरती सिरसाट                 बुरहानपुर मध्यप्रदेश

संस्कार

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सुहागन                  आजकल समाज संस्कार विहीन सा होता जा रहा है। मानवता जैसे खत्म सी हो गई है। ऐसे ही एक सभ्य परिवार की परिभाषा है, जो अपने संस्कारों को भुल नहीं पाये है। नीलम एक सामान्य परिवार से थी,जिसका विवाह बाल विवाह हुआ था। पर उनके माता-पिता ने उसे ऐसे संस्कारों से पाला था कि वह अपने संस्कारों को कभी भुलाया नहीं, विवाह के बाद नीलम का पति शशांक जो पांच वर्ष तक सीमा पर एक सैनिक बनकर देश की सेवा करने के बाद घर वापस लौट कर आया,तब नीलम का गौना हुआ।नीलम ढेरों सपने संजोए अपने ससुराल पहुंची वहां उसका खूब आदर-सत्कार किया गया।उसे लगा कि वह स्वर्ग में आ गयी है। पर दो ही दिन हुए थे कि शशांक के पोस्टीग की खबर आ गई।शशांक बहुत निराश होगया। मगर जब नीलम को ये मालूम पड़ा तब उसने  शशांक  को बहुत गर्व के साथ विदा किया। नीलम से उसके पति ने कहा कि अगर मैं वापस नहीं आ पाया तो तुम दुसरी शादी कर लेना पता नहीं मैं जीवित रहुं या नहीं,नीलम ने शशांक से कहा कि मैं आपका इंतजार जीवन भर करुंगी। मैं ये जानती हुं कि मेरे कान्हा जी कभी मेरे सुहाग पर को...

विश्वासघात

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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 बाल्यावस्था की यात्रा को पूरा करके जब सारा ने युवावस्था में कदम रखा इस अवस्था में जो हर किसी को होता है पहला प्यार होना स्वाभाविक ही था उसे अपने सीनियर से प्यार हो गया एक तरफा प्यार नहीं कह सकते दो तरफा था लेकिन जात पात और सामाजिक कुरीतियों के कारण यह प्यार परवान नहीं चढ़ पाया, सारा ने अपने घर परिवार और खानदान की इज्जत को सर्वोपरि रखा और अपने प्यार को कभी जुबां पर आने नहीं दिया, दिल में ही प्यार को दफन कर दिया अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ सारा की शादी भी हो गयी, सारा की छोटी बहन सिया जिससे सारा को बहुत प्यार था दोनों बहनों में आपसी संबंध बहुत ही मीठे थे ससुराल में आया जाया करती थी सारा ने जब पहली संतान को जन्म दिया तो सिया उसकी देखभाल के लिए घर आई थी और उसने बखूबी अपनी बहन के प्रति जिम्मेदारी निभाई यह देखकर सारा के मन में अपने बहन के प्रति और सनेह ही बढ़ने लगा सिया का बहुत जल्दी सारा के घर आने का सिलसिला शुरू रहा कभी-कभी सारा के पति आदित्य भी सिया को घर ले आते थे सारा को अपनी बहन पर अटूट विश्वास था लेकिन कभी-कभी विश्वास भी आंखों में धूल झोंक देता है कभी-कभी ...

मुकाबला

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    वह एक खूबसूरत चिड़िया सी फुदकती रहती। कोयल जैसी मीठी बोली से सुनने बालों का दिल जीतती रहती। मुर्गे की तरह समय की पाबंद थी। दरबाजे पर सोते श्वान की भांति सचेत रहने बाली। उसमें कोई कमी न थी ।वह किसी से कम न थी। पर उसे बराबर अहसास दिलाया जाता रहा कि वह एक लड़की है। लड़के से कम है। उसके गुण कोई गुण नहीं। पुरुष के दुर्गुण भी गुण होते हैं।   आज भी वह उसी तरह की है। पर अब वह चिड़िया फुदकती नहीं है। आवाज जरूर कोयल सी मधुर है। फिर भी वह कमतर है। आखिर वह एक स्त्री जो है।    सुबह सूरज की किरणें धरती पर आ भी न पातीं, वह जग जाती है। फिर पूरे दिन घर और परिवार को सम्हालती है। वैसे वह बाहर का काम भी सम्हाल सकती है। पर पति को उसकी क्षमता पर विश्वास नहीं। आखिर क्यों हो। आखिर पति एक पुरुष है। पुरुष को स्त्री की क्षमता पर विश्वास नहीं करना चाहिये। बचपन से ही यही सीखता आया है।    पति को कुछ लिखने का शौक लग गया है । अपने मन के भावों को अच्छी तरह व्यक्त कर लेता है । साहित्यकारों के मध्य उसे वाहवाही मिलती है।    लिखती वह स्त्री भी है। पर चुपचाप। बिना किस...

समझौता( कम्प्रोमाइज)

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उसने कहा" मैं मां को साथ नहीं रखूंगा"। क्यों ?" जज ने पूछा "इस बुढ़ापे में तुम ही तो उसका सहारा हो फिर ये रवैया क्यूं"...। "मेरी बीवी नहीं चाहती उसका इगो हर्ट होता    है" लड़के ने बनावटी बात बोली। "ये भी भला कोई बात हुई ,समझाओ बीवी को" " नहीं समझा सकता" क्यूं" "उसका इगो भी महत्व पूर्ण है" वह कुछ सोचते हुए कहता है। " क्या मतलब" " मैं कौन होता हूं उसे समझाने वाला"  " अरे तुम उसके पति हो" "पति हूं तो क्या वो मेरी बात मानने के लिए बाध्य है" उसने उल्टा सवाल किया। जज ने सोचा ..... " तो तुम्हारी मां तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है? जज ने पुनः सवाल किया। " है और मैं उठाऊंगा भी.... पर मैं अपनी फैमिली के साथ उन्हें नहीं रख सकता " उसने मजबूती से कहा शायद उसे कुछ पिछला हिसाब चुकाना था। अब मां को तो वैसे भी अकेले रहने की आदत है... है  न मां !! " छोटी से छोटी बात पर कानून का फायदा उठाने वाली उस औरत से उसने पूछा। सन्नाटा...  मां के आंसू लगातार बह रहे थे। उसे याद आ रहा ...

अंधेरे रास्तों का उजाला

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"रामरतिया ,मर्द का पेट इतना बड़ा होता है कि कभी नहीं भरता।" "यह क्या कह रही है तू सत्तो?" "मैं क्या झूठ बोल रही हूँ ? वह देख वह मेरा मर्द है और कैसे उस छिछोरी के साथ रंगीन हुआ पड़ा है ।"सत्तो आक्रोशित थी । रामरतिया न समझाया ,"छोड़ सत्तो ।तू अपने बच्चे देख  कुछ दिन बाद सुधर जायेगा।" "तो क्या मैं तब तक कुढती रहूँ और इसकी नाजायज हरकतें बर्दाश्त करती रहूँ ।यह नहीं सुधरने वाला ।इसका बाप भी तो रंगीला था ।अपने चार बच्चे और बीबी को छोड़ दूसरी औरत बिठा ली और उसके भी चार बच्चे ।पहली वाली कहाँ है,जीती है या मरती है किसी को नहीं पता ।और अब सत्तर साल की उम्र में दो कुंवारी लड़कियों को छोड़ सिधार लिया ऊपर ।उन बच्चों को कौन संभालेगा कौन उनकी शादी ब्याह करेगा किसी को होश नहीं ।सब अपने में मस्त सांड से घूमते फिरते हैं ।" "तू क्यों परेशान है सत्तो ?" "क्यों न परेशान हूँ मैं ।उनकी जिम्मेदारी भी तो मुझे ही निभानी पड़ेगी ।बड़ी और अकेली बहु जो हूँ उस घर की ।बाप और भाई की आवारगी से क्या लड़कियाँ अछूती रह गई हैं ।वह भी गांव भर में मनमानी करती घूम...

गरीब का सपना

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सभी बच्चे समय पर स्कूल पंहुँच गए थे। प्रार्थना की घंटी बजते ही सभी बच्चे स्कूल के मैदान में पहुंच गए। प्रार्थना शुरू हुई:- बच्चे गा रहे थे:-" हम हैं छोटे छोटे बालक।                   ईश्वर आप जगत के पालक।" माँ कहती है -"ईश्वर ही सम्पूर्ण जगत का पालन करते हैं । माता पिता हैं हमारे तो वे अपनी संतानों में  इतना भेदभाव क्यों करते हैं?"  कोई बहुत धनवान तो कोई बहुत गरीब क्यों होता है? जिस तरह ये बच्चे स्कूल में पढ़ रहे है उसी तरह मैं भी पढ़ना चाहती हूँ किन्तु माँ-बाबा के पैसे नहीं हैं हम गरीब जो हैं। बाबा कहते हैं ये सब अमीरों के भाग्य में होता है बिटिया ! हम गरीब अपना पेट पाल लें यही बहुत है।  आज बाबा की तबियत खराब है। माँ भी मालिक के यहाँ काम करते हुए गिर गई थी उसके हाथ की हड्डी टूट गई है। सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा है उसका। भाई को बहुत भूख लगी थी मुझसे देखा नहीं गया इसलिए मैं आज भाई को लेकर आई और मालिक बड़े दयालु हैं मुझे मिट्टी ढोने का काम दे दिया।  इसी तरह भगवान भी हमारे ऊपर दया कर देते और माँ बाबू जल्दी से ठीक हो ...

सपनों की कब्रगाह

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   विद्यालय की बिल्डिंग बहुत खराब हालत में तो न थी। पर अभिवावकों का बराबर दखल हो रहा था। आखिर हो भी क्यों नहीं। विभिन्न मदों के नाम पर विद्यालय जमकर फीस भी तो बसूल रहा था।    पिछले ही वर्ष एक नया अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त विद्यालय खुला था। अनेकों अभिवावकों ने अपने बच्चों को हटाकर दूसरे विद्यालय में दाखिल करा दिया था। शिक्षा के स्थान पर चकाचौंध का भी एक अस्तित्व होता है।    विद्यालय प्रबंधन वैसे बेफिजूल के खर्च से बचता है। उनकी भी नीयत कम खर्च में अधिक लाभ की थी। पर प्रतिस्पर्धा के नवीन परिदृश्य में एक नवीन बिल्डिंग का निर्माण भी अति आवश्यक था। वैसे भी नवीन बिल्डिंग का खर्च भी बढी हुई फीस के रूप में अभिवावकों की जेब पर ही पड़ना था।    ठेकेदार की भी मंशा कम खर्च अधिक बचत की ही थी। दूर दराज से वह गरीब मजदूरों के परिवारों को ले आया। गरीबी से बेहाल आदमी और औरतों की बात तो छोड़िये, दस बारह साल के बच्चे भी यथासंभव मजदूरी कर रहे थे।   उन्हीं मजदूरों की टोली में दस साल की नीला एक हाथ से अपने भाई को पकड़ बहला रही थी, दूसरे हाथ से तसले में चि...

पापा, आप मुझे भूल गए।

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"पापा, प्लीज़ मुझे मत छोड़ना। मैं गिर जाऊंगी। पापा, मुझे डर लग रहा है। मुझे पकड़ लो।" नन्ही स्नेहा अपने पापा से चिपक कर मैरी गो राउंड में बैठी थी। "डरती क्यों हो स्नेहू, मेरी गुड़िया , मैं हमेशा तुम्हारे पास ही रहूंगा। तुम्हें कभी नहीं छोडूंगा।" उसके पापा राम प्रताप सिंह ने उसको कसकर पकड़ते हुए कहा। "आप कभी मुझे भूल गए तो?" स्नेहा ने भोलेपन से पूछा।  "ऐसा दिन कभी नहीं आएगा मेरी लाडो। मैं और तुम्हें भूल जाऊं। हो ही नहीं सकता। अगर ऐसा हुआ तो वो मेरी ज़िंदगी का आखरी दिन होगा।" राम प्रताप हंसते हुए बोले।  फिर दोनों मिलकर हंसने लगे और चारों तरफ उनकी हंसी गूंजने लगी।  उस हंसी की गूंज में स्नेहा को कोई परिचित सी आवाज़ सुनाई पड़ी,"स्नेहा,पापा....उठो पापा के पास चलो।"  स्नेहा जैसे अपने स्वप्न से निकलकर हकीकत में लौटी। उसने अपने इर्द-गिर्द के वातावरण को देखा।‌ वह हॉस्पिटल में बैठी थी। उसके सामने उसका पति कार्तिक और बेटी पूजा खड़ी थी।  "क्या हुआ पापा को?" स्नेहा चौंक कर खड़ी हो गई।  "तुम चलो। डॉक्टर बुला रहे हैं।" कार्त...

फूलों की वादियाँ

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  जीवन के पचपन बसंत देख चुकी सुषमा ने अपने जीवन के सारे सुख भोग लिये थे। राकेश के रूप में बङे अच्छे पति, एक बेटा और एक बेटी का सीमित परिवार, दोनों बच्चे पढे लिखे, लङकी की शादी हो चुकी, और अब बेटी की कमी बहू ने पूरी कर दी, फिर कौन कह सकता है कि सुषमा के जीवन में कुछ भी दुख है।     बेटा रजत और बहू रागिनी घूम कर आये । रागिनी बार बार फूलों की वादियों  का जिक्र कर रही थी। " मम्मी जी। बङी हसीन जगह है। एक बार देखो तो देखते ही रह जाओंगे। लगता है कि सचमुच जन्नत में आ गये हैं।"    आज सुषमा थोङा व्यथित थी। कुछ मन में छिपा था। भीतर ही भीतर...। बाहर नहीं निकाल सकती।    राकेश ने सुषमा के कंधे पर हाथ रखा।     " लगता है कि आज फिर मोहन की याद आ गयी। "   " सचमुच... ।उन हसीन वादियों में हम कितना घूमे। पर मोहन था सिपाही देश का। देश के लिये सब छोड़ सकता। मैं उसके आने का इंतजार कर रही थी। पर वह नहीं आया। आयी तो उसकी शहादत की खबर।"     सुषमा ने राकेश के कंधे पर सर रख दिया। राकेश जो मोहन का पक्का दोस्त था, वह जिसने मोहन के बाद भी सुषमा को सहारा द...

उसका धैर्य

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"निलिमा, निलिमा देखा न्यूज़ में, कल किसान अंदोलन में दुर्घटना घट गयी, तेरा पति भी तो गया था!  मुन्नी के मुहं में दूध की बाॅटल  देते निलिमा के हाथ कांप गये" कल से माधव आया नही था!  रात भर नींद नही आयी उसे, बुरे बुरे ख्याल, आते रहे, मुन्नी भी जाने क्यू रोती रही, हा काकी आती हूँ,!  कमला काकी अभी भी इंतजार कर रही थी! दरवाजे के बाहर" दरवाजे की कुंडी कुछ टाईट हो गयी थी! बरिश की वजह से " दरवाजा खुलते ही काकी अंदर आ गयी!  टी वी चालू कर, हा जैसे अभी निलिमा को होश आया!  जो कुछ चल रहा था, वो सीन देख निलिमा, के होश उड गये, हर ओर खून ही खून बिखरा था!  चार में एक नाम माधव का भी उसके कानो में गूंज रहा था!  माधव रस्तोगी, जो इस दुर्घटना के शिकार हुए, उन्हें पैतालीस लाख मुवावजा, और परिवार में एक सदस्य की नौकरी,  माधव का चेहरा उसे नजर आ रहा था, बाकी आंखों के सामने धुधंला सा अवरण छा गया!  निलिमा निलिमा """ बस काकी की आवाज हल्की सी सुनाई दे रही थी!  निलिमा ने आंखे खोलो, मुन्नी की जोर जोर से रोने की आवाज आ रही थी! बहुत शोर हो रहा था!  पूरा गाँव इकट्...

उदासीन...

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. 'राघव क्या तुम आज भी इंटरव्यू देने नहीं जाओगे"  मां ने कुछ कड़े स्वर में पूछा अगर घर ही बैठना था तो इंजीनियरिंग करने में इतना पैसा क्यों बर्बाद किया। जितना पैसा पढ़ाई में गया उससे तो दुकान खोल लेते कम से कम आय का जरिया तो बनता। राघव ने झुंझला कर कहा आप भी मां 'क्या पूरे दिन पीछे पड़ी रहती हो नौकरी करो नौकरी करो जब मरना ही है सब कुछ करके तो क्यों कुछ किया जाए" ''हां हां क्यों नहीं मरना बहुत सरल है ना तो सभी मर जाते आलसी बना रहना है कुछ करना ना पड़े बैठे-बैठे सब मिल रहा है ना मां बाप की मेहनत का ज्ञान बघार लो" हो गई शुरू मां की  किट किट और राघव पैर पटकता घर से चला गया। दादी चुपचाप देख रही थी और सोच रही थी सारी सुविधाएं देकर हमने आज के बच्चों को खुद ही आलसी बनाया है और अब अपनी गलती का भुगतान भुगतते  समय हम भूल जाते हैं कि जब हमने बच्चों को परिश्रम और कठिनाई का पाठ पढ़ाया ही नहीं बस उन पर अपनी इच्छाएं थोप दी तो कैसे हम उनसे मेहनत और जिम्मेदारी की उम्मीद रख सकते हैं। स्वरचित मौलिक प्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

दादी

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  कस्बे की मुख्य सड़क से लगी एक सड़क जो नजदीकी गांवों को जाने का रास्ता थी, शाम होते ही रोज की तरह भर गयी। यह सड़क हर शाम कस्बे की अघोषित सब्जी मंडी बन जाती। लोगों को जरूरत का सामान खरीदने व बिक्रेताओं को बेचने के लिये कोई तो जगह चाहिये।    बिक्रेता पंक्तियों में बैठ जाते। सामने टोकरियों में सब्जी फैला लेते। अपनी जगहों से आबाज लगाते। कुछ होशियार बिक्रेता चुपचाप मुख्य मार्ग पर भी अपनी ठेल लेकर खड़े हो जाते। यद्यपि मुख्य मार्ग को अवरुद्ध करना कहीं से समझदारी नहीं है। पर वास्तव में समझदारी का अर्थ केवल खुद का पेट भरना है। पेट के लिये किया कोई पाप भी शायद पाप नहीं होता है। वास्तव में पाप तो वह है जो भरे पेट भी किया जाये। धनकुबेरों द्वारा खुद को और धनी बनाने के लिये जो अधर्म किया जाता है, वही अधर्म कहलाता है।   अंधेरा हो गया पर अभी रात नहीं हुई थी। जाड़े के मौसम में अंधेरा जल्दी हो जाता है। पर वास्तव में यही बाजार का समय होता है। गांव से आये दुकानदार कुछ कमाने की आस में देर तक सब्जी बेचते हैं।   मुख्य मार्ग से दूर एक बुजुर्ग महिला ताजी हरी सब्जियां बेच रही थी। दूसरों...