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बिखरते रिश्ते

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यूं हाथों से बिखर रहे रिश्ते, जैसे माला के मोती बिखरते हैं। हाथ छूट रहे हाथों से, मानो एक दूजे से मुह फेर रहे। जब तकती नजरें सर उठा दुनिया को, बस वीरानी के साये दिखते हैं। फिर क्यों बोलो हम तुम, कैसा गुमान खुद पर करते हैं। न तुम अमिट, न में अनश्वर हूं, तो जानें क्यों हम एक दूजे से जलते हैं। हम तुम एक नइया में बैठे, फिर भी क्यूं बदला सा है मंज़र। जैसे सिमट गया हो समंदर रेतीले रेगिस्तानों में। यूं हाथों से बिखर रहे रिश्ते, जैसे माला के मोती बिखरते हैं। आरना दूबे

जज़्बात अल्फाजों के गुलाम नहीं

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नज़रें बेहतरीन बयां करती हैं हरफ-ए-मुहब्बत, वरना जुबां में ये हुनर कहां। ये तो जुल्फें जताती हैं राज़-ए-उल्फ़त, बाखुदा इशारे अभी भी इस नज़ाकत से मेहरूम हैं। लहरा कर चेहरे से लिपट गया दुपट्टा इस कदर, मानो साज ए हस्ती गुनगुनाती हो हवा उस पर। उंगलियां खुद-ब-खुद जुल्फों से तार्रुफ कर बैठी, मगर हम में वो ज़ज़्बा नहीं। यूं तो दफ्न कर के रखते हैं अफसाना हाल ए दिल का, पर आज मेरी शख्शियत इसे अलग अंदाज़ में जता रही है। इस्तकबाल करते हैं चांद के उस फन का, जो जज्बात ए दिल का इज़हार इस खूबसूरती से ज़ाहिर करता है।