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Showing posts with the label Monika Garg

परायी

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मै अपने घर से भाग जाना चाहती थी, लेकिन मैं जाती भी तो कहाँ ?          ट्रेन के डिब्बे मे  मेरे पास  वाली सीट पर दो महिलाएं बैठी थी।शायद दोनों  सहेलियां  थी।उनकी बातों के कुछ कुछ  अंश मेरे कानों मे पडे तो मन उत्सुक हुआ कि आगे  वो क्या बात बताने वाली है।किसी की यूँ पर्सनल बातें  सुनना सभ्यता  नही है पर हाय !रे नारी मन बैचैनी हो ही जाती है।वह औरत जो कहानी बता रही थी अपनी सहेली को उसका नाम रमा था। रमा आगे कहने लगी ,"क्या बताऊँ मनि जब से शादी हुई है सुख का एक भी सांस  नही लिया। पति को पता नही क्या है जब देखो बात बे बात मारते रहते है।उस दिन तो हद ही हो गयी।मायके से आना जाना तो पहले ही बन्द कर रखा है मेरा ।अपने आप को मेरा और बच्चो  का भगवान  समझते है। एक दिन  तो कह रहे थे तुम और तुम्हारे बच्चे  मेरी दया पर है।अगर मै रोटी ना दू तो सड़कों पर भीख मांगते घुमो। " इतने मै दूसरे वाली औरत जिसका नाम मनि था उसने सिर हिलाते हुए कहा ,"बडा ही जलील आदमी है भला अपनी बीवी और बच्चो के लिए कोई ऐसे शब्द बोलता है।"अब उन दोनो...

संस्कारी

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काफी देर से प्रकाश खिड़की मे बैठा उस सात आठ साल केे बच्चे को देख रहा था।वह रंग बिरंगी गोलियों के साथ खेल रहा था।कभी अपने से ही बोलता ,"कली या जूट"। फिर हंसता और कहता"पगले ये तो कली है।" प्रकाश काफी देर तक उसका ये खेल देखता रहा । अचानक से वह पुरानी यादों मे खोता चला गया।वो दोपहर बाद का समय ऐसा ही तो था जब वह अपनी टूटी फूटी झोपड़ी के आगे ऐसी ही रंगीन गोलियों के साथ खेल रहा था । बच्चे बार बार उसे हरा रहे थे ।पर उसने आज जीतने की ठान ली थी।तभी प्रकाश को अपनी मां की चीख सुनाई दी ।वह दौड़कर झोपड़ी मे गया तो क्या देखता है मां जमीन पर औंधे मुंह पड़ी थी । अचानक गिरने से माथे पर चोट लगी थी जिससे खून बह रहा था। प्रकाश की चीख निकल गई ।उसने मां को हिलाया डुलाया पर मां तो बोल ही नही रही थी ।दस साल के प्रकाश के आगे अपने पिता की मौत नाच गयी ।वो भी तो अचानक से चले गये थे उनकी जिंदगी से ।मां को उनके जाने के बाद घर घर जूठन साफ करके पेट पालना पड़ा।आज वही मंजर फिर उसकी आंखों के सामने था। मां को यूं जमीन पर पड़ा देखकर प्रकाश रोते रोते हलकान हो गया "मां तुम मुझे छोड़कर मत जाना ।तुम मु...

वो फौजी

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रिया को इंटरव्यू देने देहरादून जाना था । देहरादून उसके शहर से दस घंटे का सफर था। इसलिए उसे रात आठ बजे की देहरादून एक्सप्रेस पकड़नी थी ताकि वह समय पर पहुंच सके। मां ने रास्ते के लिए बहुत कुछ सामान पैक कर दिया था खाने के लिए वो कहती ही रह गयी कि मां इतना मत दो सामान कल तो वापस आ ही जाऊंगी।पर फिर भी मां का दिल मां का होता है।रिया ठीक आठ बजे रेलवे स्टेशन पहुंच गयी और ट्रेन के आते ही उसमे चढ़ गयी । लम्बा सफर था इसलिए रिया ने अपनी सीट सुनिश्चित कर ली थी।वैसे आज ज्यादा मुसाफिर नही थे रिया के डिब्बे मे पांच सात यात्री बैठे थे। रिया ने उपर की बर्थ पर सामान रखकर कुछ खाने का सामना और पढने के लिए किताब निकाल ली ।वह हमेशा सफर मे अपने साथ किताब ले जाती थी। क्यों कि उसका मानना था किताब जैसा कोई मित्र नही होता। अभी उसे किताब पढ़ते पंद्रह मिनट ही हुई थी कि उसने नोटिस किया कि एक जोड़ी आंखें उसे लगातार देखे जा रही थी।सामने की बर्थ पर एक फौजी की वर्दी मे एक लड़का बैठा था जो उसे लगातार देखे जा रहा था।रिया को बड़ी उलझन हो रही थी लेकिन वो भी मन मे ठान कर बैठी थी कि अगर वो लड़का कुछ भी बदतमीजी करेगा त...

सौ भाईयों की बहन

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आज संगीत बहुत खुश थी।आज उसका इकलौता भाई सेना की ट्रेनिंग पूरी करके लेफ्टिनेंट के पद पर आसीन होकर घर जो आ रहा था।तीन साल से बैंगलूरू मे रहकर ट्रेनिंग ले रहा था। इसलिए संगीत अपने भाई सुनील को राखी भी ना बांध सकी थी।भेज तो वो हर साल देती थी लेकिन तिलक लगाकर अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने का अलग ही सुख होता है।आज राखी के मौके पर ही सुनील घर आ रहा था।तीन महीने बाद उसकी पोस्टिंग होनी थी।उससे पहले वह अपने घर वालों के साथ रहना चाहता था। इतने मे डोर बैल बजी । संगीत ने भागकर दरवाजा खोला।सामने अपने भाई को खड़ा देखकर उसके बरबस ही आंसू निकल आये।वो दौड़ कर सुनील से चिपट गयी और बोली,"ओ भैया। तुम को कितने सालों बाद देखा है ।और वह रोये जा रही थी।सुनील भी अपनी छोटी बहन को बाहों मे भरकर फूटफूट कर रोने लगा।तभी पीछे से आते हुए पिताजी बोले,"क्यों भयी।बहन भाई यहीं सारी बातें कर लेंगे या घरके अंदर भी जाओगे।"संगीत आंसू पोछते हुए बोली ,"आओ भैया। यहां बैठो मै पहले अपने भाई को राखी बांधूंगी फिर कोई और काम होगा।"वह सुनील को हाथ पकड़ कर पूजा की थाली के पास ले गयी।सुनील ने भी बहन के आगे कला...

सर्कस

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आईये भाईजान आईये ।आइये बहन जी आप भी आइये और अपने बच्चों को भी साथ लाइये और देखिए एक दमदार तमाशा।हमारा बच्चा अपनी जान पर खेल कर आप को अपनी कलाबाजियां दिखायेगा।" आजकल शहर मे सर्कस लगी थी । चेतना का बड़ा मन था सर्कस देखने का।उसने अपने पति से बच्चों की तरह जिद करते हुए कहा,"सुबीर मुझे भी सर्कस देखना है सुना है वहां शेर ,हाथी, घोड़े बड़े ही अच्छे अच्छे करतब दिखाते हैं। मैंने कभी नही देखी सर्कस।"उन की नयी नयी शादी हुई थी ।शहर आये थोड़े ही दिन हुए थे।सास की कोई रोक टोक तो थी नही ।बस सुबीर को मनाना था ।आज सुबीर का मूड अच्छा था सैई चेतना के मुंह को अपने दोनों हथेलियों के बीच लेकर बड़े प्यार से उसे देखते हुए बोला ,"सर्कस देखना है।चलो ठीक है शाम को तैयार रहना मै आफिस से आकर तुम्हे ले चलूंगा ।अब तो आफिस जाने दो बाबा।" चेतना ने सुबीर का टिफिन पैक किया और वह आफिस चला गया।चेतना भी फटाफट घर का काम निपटाने लगी दो जनों का काम ही कितना होता है।काम निपटा कर वह पड़ोस मे उसकी नयी सहेली बनी थी उसके पास भी बैठ आयी पर दिन है के बीतने का नाम ही नहीं ले रहा था।जैसे जैसे शाम हो रह...

संस्कारी

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काफी देर से प्रकाश खिड़की मे बैठा उस सात आठ साल केे बच्चे को देख रहा था।वह रंग बिरंगी गोलियों के साथ खेल रहा था।कभी अपने से ही बोलता ,"कली या जूट"। फिर हंसता और कहता"पगले ये तो कली है।" प्रकाश काफी देर तक उसका ये खेल देखता रहा । अचानक से वह पुरानी यादों मे खोता चला गया।वो दोपहर बाद का समय ऐसा ही तो था जब वह अपनी टूटी फूटी झोपड़ी के आगे ऐसी ही रंगीन गोलियों के साथ खेल रहा था । बच्चे बार बार उसे हरा रहे थे ।पर उसने आज जीतने की ठान ली थी।तभी प्रकाश को अपनी मां की चीख सुनाई दी ।वह दौड़कर झोपड़ी मे गया तो क्या देखता है मां जमीन पर ओधे मुंह पड़ी थी । अचानक गिरने से माथे पर चोट लगी थी जिससे खून बह रहा था। प्रकाश की चीख निकल गई ।उसने मां को हिलाया डुलाया पर मां तो बोल ही नही रही थी ।दस साल के प्रकाश के आगे अपने पिता की मौत नाच गयी ।वो भी तो अचानक से चले गये थे उनकी जिंदगी से ।मां कै उनके जाने के बाद घर घर जूठन साफ करके पेट पालना पड़ा।आज वही मंजर फिर उसकी आंखों के सामने था। मां को यू जमीन पर पड़ा देखकर प्रकाश रोते रोते हलकान हो गया "मां तुम मुझे छोड़कर मत जाना ।तुम मुझे...

नशा

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बबलू अपने बहन भाइयों मे सब से बड़ा था।वे दो भाई और एक बहन थे। मदनलाल (बबलू के पापा)जी एक जाने माने वकील थे । दिल्ली मे खूब अच्छी वकालत चलती थी आये दिन क्लाइंट घर पर आते थे कोई केस डिस्कस करने कोई जीत की खुशी में तोहफा देने।अकसर तोहफे मे शराब की बोतल ही होती थी।मदनलाल जी आवभगत करने मे कोई कौर कसर नही छोड़ते थे मेहमानों की।सो आये दिन घर मे शराब के दौर चलते थे।मदनलाल जी ने घर मे ही अलग से अपना आफिस बना रखा था।वही पर ही जाम बाजी होती थी कभी क्लाइंट के साथ कभी दोस्तों के साथ।बबलू बारह तेहरह साल का बच्चा था अकसर यही सोचता कि पापा आफिस का दरवाजा बंद करके कया करते है। मां भी अकसर परेशान हो जाती थी इन हररोज की पार्टियों से ।अब शराब के साथ खाने को भी तरह तरह की चीजें चाहिए।बबलू देखता था कि पापा लड़खड़ाते हुए किचन मे आते थे और मां से तरह तरह के स्नेक्स बनवा कर ले जाते थे बबलू और उनके बहन भाई का आफिस मे जाना मना था। एक दिन बबलू की मां की तबीयत ठीक नही थी तब उसके पापा उसकी मदद से खाने का सामान आफिस ले जा रहे थे कि अंदर से उसके पापा के दोस्त ने बबलू को आवाज दी।अब मदनलाल जी मना कर नही सकते थे कि बच्च...

पैसा तेरे तीन नाम

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कहते है पैसे मे बडी ताकत होती है ।कहावत है पैसा तेरे तीन नाम परसु ,परसा,परसराम ।मेरी माँ अकसर ये कहावत दोहराती थी।और मैं हमेशा माँ को यह कहानी सुनाने के लिए कहती थी।एक दिन माँ अपना यादों का पिटारा खोल के बैठी तो इस कहानी का ज्ञान प्राप्त हुआ ।माँ ने बताया, बहुत समय पहले की बात है  एक गाँव में एक किसान रहता था।उस के पास जमीन नही थी।वह दूसरों के खेतों में काम करता था और अपना जीवन यापन करता था। बेचारा बड़ी मुश्किल से घर का गुजारा करता था ।उसका नाम परसराम था। लोग बाग अपने खेतों का काम करवाने के लिए अकसर उसे बुलाने आते थे।घर के बाहर खड़े होकर आवाज़ लगाते थे।,"परसु घर पर है क्या तू ?आज खेतों पर आ जाना काम करना है।"बेचारा परसराम बाहर आकर हाथ जोड़कर खडा हो जाता और सिर हिला कर हां भर देता।दिन यूँ ही कट रहे थे।एक दिन परसराम घर के लिए लकड़ी लेने जंगल में गया।वहाँ पर वह थकान उतारने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठा ।जब वह पेड़ के पास पहुँचा तो एक बहुत अच्छी सुगन्ध से उसका मन बड़ा प्रफुल्लित हो गया । वह उस पेड़ की कुछ  लकड़ी  तोड़  लाया।घर आकर उस ने लकड़ी को अपनी पत्नी को दिखाया।परसराम...

भेदभाव

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बात उन दिनों की है जब सुधा मां बनने वाली थी।पता नहीं क्या परेशानी थी बच्चा ठहरता और फिर मिसकैरेज हो जाता था।शादी के दो साल बाद सुधा को सांतवा महीना चल रहा था । सुधा को हाई ब्लड प्रेशर रहने लगा था तो डाक्टर ने कंपलीट बैडरेसट बोला था ।जैसे ही सास को पता चला कि बैडरेसट है माथे पर हाथ रख कर रोने लगी ।सास टीचर थी सो घर का काम सदा ही बोझ रहता था। सुधा जब से इस घर आयी थी उसने काम को ओढ़ सा लिया था ।सुनने मे आया था सुधा की शादी से पहले मां बेटी(सुधा की सास ननद)मे काम के लिए सदा झगड़ा रहता पर सुधा के आते ही जैसे उन्हें एक बिन तनख्वाह की नौकरानी मिल गयी थी। पर अब बेडरेस्ट मे सुधा को काम नही करना था तो काम करेगा कौन घर का यही बहस बाजी चलती रहती थी। आखिर सास ने फ़रमान जारी कर दिया कि अगर ये काम नही करेंगी तो हम इसका काम नही करेंगे जैसे हम (ननद,देवर,सास)अपनी रोटी बना लेंगे तो ये अपनी और अपने पति की रोटी बना लेगी।मतलब सास ने बैडरेसट मे भी आधा घर का काम सुधा के जिम्मे डाल दिया। बेचारी शरीर में जोर ना होते हुए भी करती। काम के समय तो सास को कोई फ़िक्र ना थी कि बहू को हाई ब्लडप्रेशर है पर खाने के समय सा...

सर्वगुण संपन्न

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सीमा की सास आज सुबह से ही बड़बड़ कर रही थी,"हाय पता नही कैसी मनहूस हमारे पल्ले पड़ गयी है । कोई काम सही ढंग से नही करना आता ।बता मठरिया बनाने मे भी कोई मंतर पढ़ने थे क्या । मां ने कुछ सीखाया हो तो कुछ आये।भाग फूट गये हमारे जो ऐसी बहू पल्ले पड़ी है।" सीमा की सास का आज पारा हाई था क्योंकि आज सीमा से नमक पारे बनाते समय थोड़े जल गये थे।वो भी क्या करती सारे घर का काम उसी के ऊपर था।उसका एक साल का बेटा भी था जिसे सम्हालना भी पड़ता था।और सास टीचर थी सुबह ही स्कूल जाते समय सीमा की सास ये कह गयी थी ,"सुन मिननी आये गी उसके लिए नमकपारे और कचोरी बना दियो।मै स्कूल जा रही हूं।दोपहर मे आते समय सामान ले आऊंगी।इतने सारा काम करके रहियो।" सीमा की सास जैसे नौकर को सुना कर जाते है ऐसे हुक्म सुना कर चली गयी।सीमा बेचारी के लिए इतना काम बढ़ गया था कि पूछो मत।ननद का परिवार,और सीमा ,उसके पति , बच्चा,और एक दो रिश्तेदार और आये हुए थे ।वो बेचारी भाग भाग कर सारे घर का काम करती रही ।बेटे को दूध पिला कर सुला दिया था अब दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थी तभी मिननी उसकी ननद उसका हाथ बंटाने रसोईघर मे आ...

दोषी कौन?

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बाय, मम्मी!बाय, आज भी अंशुल जोर जोर से अपनी माँ को  स्कूल जाता हुआ बाय बाय कर रहा था।ये इत्तेफाक ही था कि इधर मीना चाय पी रही होती और उधर अंशुल स्कूल जा रहा होता था।वह दौड़ कर छज्जे पर आ जाती और उसको स्कूल जाते हुए देखती।थोड़ी देर वह भूल जाती कि उसे पति के लिए नाशता भी बनाना है ।बस उसके मासूम चहेरे को देखती रहती और अपनी माँ न बन पाने की कमी को उसे देख कर पूरा करती रहती।                           अंशुल था ही इतना मासूम।कई बार वह उसे भी 'बाय 'बोल कर जाता था।जिस दिन बोल कर जाता उस दिन तो निहाल सी हो जाती थी मीना । दोनों  में कही पिछ्ले जन्म का रिश्ता था शायद।कभी कभार वह उसके घर आ जाता था खेलने  तो मीना उसकी जेबे भर देती थी खाने की चीजों से ।कई बार अंशुल की माँ कहती,"मीना बहन तुम  बिगाड़ दो गी अंशुल को।"वह हंस कर रह जाती ।      उस दिन भी अंशुल हर बार की तरह जोर जोर से 'बाय 'बोल  रहा था।मीना भाग कर छज्जे पर गई।उस दिन अंशुल ने उपर देखते हुए मीना को भी हाथ  हिला कर 'बाय  ब...

जिंद ले गया ...वो

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राधा बहुत दुखी है।जबसे बडी बहन की शादी हुई है।राधा का कही भी मन नही लग रहा।उदास सी सारे घर मे घूम रही है। राधा ऐसी लडकी।जो अगर ए बार कोई देख ले तो अपने  को रोक नही पाता उससे प्यार करने से।भगवान ने फुर्सत से घडा था शायद।बड़ो से कैसें अदब से बात करनी है।छोटी को कैसे प्यार देना है वह उससे सीखे कोई।बहुत दिनों से घर मे चहल-पहल थी।उसकी बडी दीदी की शादी जो थी।राधा भाग भाग कर शादी की तैयारी मे हिस्सा ले रही थी।छोटी बहन थी। कुछ तो जिम्मेदारी उसकी भी थी। शादी के दिन अपसरा सी लग रही थी राधा।शादी से पहले जब दीदी को देखने आये थे तो राधा को देखते ही उसकी दीदी की ससुराल वाले कहने लगे हमारे छोटे वाले लडके किशन के साथ आप की ये बेटी ब्याह दो।तो गंगा नहाते जाए।दोनों बहने।सर्वगुण संपन्न है । पर राधा के पिता ने हां नही भरी।एक तो राधा की उम्र अभी शादी लायक नही थी दूसरा ऐसे ही किसी के भी पल्ले कैसे बांध दे अपनी बिटिया को ।सगाई पर भी दीदी का देवर नही आया था।विदेश से जल्दी से टिकट नही बनी।सगाई बहुत जल्दी में हुई थी। राधा को भी इंतजार था।जिस का रिश्ता उसके लिए आया था वो कैसा था। बरात दरवाजे पर पहुंचने वाली ...