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धरती का स्वर्ग - - दो शब्द

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                                               हां शायद मैं ही पागल हूं जब अधिकतर लोग धरती पर स्वर्ग अपनी अट्टालिकाओं की चहारदीवारी में या मंदिर या मस्जिद या देवालय के प्रांगणन में खोजते हैं- तब मैं  झोपड़ पट्टी में भूख से लड़ते लोगों को  भोगते हुए नर्क की तश्वीर देख विचलित होता हूं,  और जानना चाहता हूं प्रगति का दंभ भरने वाले हमारे भाग्य विधाता क्या सोचते हैं- पता नहीं  मरने के बाद की स्वर्ग की अवधारणा सत्य है या असत्य- लेकिन समझ नहीं पाता  स्वार्थ में लिपटा, दूसरों के निवालों को छीन कर कैसा है धरती पर स्वर्ग ढ़ूढ़ने का कृत्य- धरती जहां कल तक बहती थी निश्छल, निर्मल नदी की धारा अब वहां रेत ही रेत है- पेड़ो की अंधाधुंध कटाई, कंक्रीट की इमारतें और सिमटे खेत है- पर्यावरण के समन्वय को लगाते पलीता बस स्वार्थ और अर्थ का अंधा अनकहा खेल है- राजनेताओं और संरक्षण के लिए जिम्मेदारों का बड़ा अजीब मेल है- जहां बहती थी  ठंडी और स्वच्छ हवायें वहां दूषित ...

खट्टी मीठी यादें - - दो शब्द

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                    याद बहुत वो आतीं है मुझको तेरी खट्टी मीठी यादें  मन को तो तरसाती हैं मुझको तेरी खट्टी मीठी यादें  तन्हाई में जुगनु जैसी रौशन है तेरी खट्टी मीठी यादें अहसास दिलाती इश्क - मोहब्बत ,खट्टी मीठी यादें तेरी वह खट्टी मीठी यादें हां तेरी वह खट्टी मीठी यादें  नैनो से जब नैन मिले थे,नैनौं ने छीन लिया चैना था मेरा दिल  तोता बन गया और तेरा दिल तो मैना था जब सीने पै सर था तेरा,बोलती दिल की धड़कन थी कायनात खामोश सी तकती, स्पर्शों की सिहरन थी अधर रहें खामोश मगर हर स्पंदन का यह कहना था जन्म जन्म तक अब तो तेरे साथ ही जीना मरना था वह झुकी हुई पलकों ने की मीठी मीठी सी फरियादें अहसास दिलाती इश्क- मोहब्बत,  खट्टी मीठी यादें सावन की वह रिमझिम गिरती,भींगी भींगी बरसातें  जाग कर तब हमने काटी थीं,अंखियन कितनी रातें  वह तारों से घिरी चांदनी वह तेरी मीठी सी बातें थीं मुंदी हुई पलकें ख्वाबों की रंग- रंगीली  बरसातें थीं आज भी चितवन करे इशारा हम सारे गम भुला दें अहसास दिलाती इश्क- मोहब्बत  खट्टी मीठी याद...

इशारे इशारे में--दो शब्द

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                      उसने अपनी झुकी हुई पलकों से कुछ कहा - बैचेनी में डूबा सा दिल का लावा अचानक बहा- और निकल कर एक प्यार का स्त्रोत  दिल के धरा से फूट कर यूं बहने लगा- चुपचाप मोहब्बत की अनकही दास्ताँ लिखने लगा- बस अब तुम्हारे सिवा  कहां आता था कोई भी नजर- उड़ चला था दिल का पखेरू मोहब्बत के लगा कर पर- तुम्हारी मुस्कान  नजरों के दर से गुजर कर दिल के दरिया में गहराई तक डूब गयी थी- गजब थी वह अदा जब तुम्हारी वह लहराती लट  करती हुई अठखेलियाँ, शैतानी के आलम में गुलाबी अधरों को आहिस्ता से चूम गयी थी- आज भी तुम्हारी अदाओं की वह वाजीगरी अंकित है दिल-ए-कैनवास पर- मानों चांद की लुपाछिपी  चल रही हो बादलों से छाये आकाश पर-                        राजीव रावत             भोपाल (म0प्र0)

पुकार - - दो शब्द

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(युद्ध की समाप्ति पर उसके मन में जो  अंतर्द्वंद होता है, जो अपनी मातृभूमि की पुकार पर युद्ध क्षेत्र में सब कुछ छोड़ कर जाता है। उसी पर यह रचना है) एक सैनिक ने  अपनी मां को  एक पत्र लिखा था- शब्दों में उसके  दिल का अनकहा दर्द छिपा था-- यह युद्ध किसी समस्या का हल नहीं होता मानवता यही पुकारती है-- फिर कौन है  जिनकी अतृप्त रक्त क्षुधा जो युद्ध को ललकारती है-- मां!  तेरे आशिर्वाद से  शायद मैं अभी तक जिंदा हूं- कैसे बयां करूं. व्यथा में अपनी जीत कर भी शर्मिंदा हूं-- कितने जीवन की आस लिए -  अपने मन में देश प्रेम का विश्वास लिए- कुछ साथी  रक्त रंजित, कुछ डरे हुए हैं- कुछ मानवीय अवसादों से भरे हुए हैं-- मां,  हम क्या पाने को हो गये थे दानव -  जो तड़फ रहे या मरे हुए हैं वो भी थे न मानव -- कल  उनकी मां का आंचल भी सूना होगा- कितनों के पुछे सिंदूरों का दर्द भी दूना होगा- कितने सपने टूटे होगें खाली फैली राहों में- मां! कितनी बेदना - दर्द - बेबसी होगी उनकी आहों में-- जब भी आंखे बंद करता हूं सामने आता चीखों का वह मंजर -- क्यों मर गयी संवेदनाये...

उड़ान - - दो शब्द

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निराश पेड़ की छांव में बैठे बुजुर्ग दम्पति- जीवन के अंतिम मोड़ पर धुंधली नजरों से देख रहे अपने नियति- पेड़ के उस तरफ दूर क्षितिज को आलिंगन करता था एक रास्ते का मोड़- जिसकी आखिरी हद तक तो दिखा था अपना वह परिंदा जो सपनों का बहाना कर उन्हें यूं गया था छोड़- दोनों की आंखों में छलकते आंसू सिर्फ़ एक दूसरे को दे रहे थे खोखली सांत्वना -  किसको दोष दें अब कल उन्होंने ने ही तो तैयार की थी  दुनिया में उड़ान भरने प्रस्तावना-   पेड़ पर  बैठी एक चिड़िया अंडों से निकले अपने चूज़ों को खिला रही थी- फिर आहिस्ता आहिस्ता  उन्हें उड़ना सिखा रही थी- यह देख कर अचानक बुजुर्ग दंपत्ति की डबडबाई आंखो को देख कर चिड़िया चहचहाई- और बोली  यह तो प्रकृति का नियम मैं जानती हूं कि कल यह भी ऊचाईयों पर उड़ जायेंगे और एक नया घोंसाला बनायेंगे,  और रह जायेगी हमारी भी आपकी तरह तन्हाई - - संभावना है आप के बेटे/बेटियाँ तो  शायद एक बार लौट आयें या आपको अपने साथ ले जायेंगे-- अभागे तो हम हैं हमारे बच्चे तो एक बार उड़े तो  आसमान में उड़ कर न जाने कहां घोंसला बनायेंगे-  फिर भी हम...