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जनता की आवाज

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कभी दबा दी जाती है,  कभी छिपाई जाती है।  संसद में मुद्दों पर बहस,  आवाज उठाई जाती है।। कभी बुलंद होती यही कलम जन-जन की बनती आवाज  कलम के सिपाही की लेखनी संचार तंत्र की एक आवाज उर पटल पर दस्तक देती, भावविभोर करें मन को।  संदेश संप्रेषित करती,  हर खास हर आमजन को। दिल को दहला भी सकती,  दिल को झकझोर भी सके।  एक आवाज मीडिया में उठे कुर्सी हिले तख्त ताज पलटे मत जकड़ो यूं मीडिया को  इन जंजीरों और बेड़ियों में जब-जब सत्ता नशे में लूड़की साहित्य ने संभाला सीढ़ियो में  जनता की आवाज है भाई इनमें छपे हर शब्द गूंजायेंगे पत्र-पत्रिका रेडियो टीवी सब समाचार जनता तक पहुंचाएंगे यह अखबार पत्र पत्रिकाएं समाचार पत्र मीडिया के अंग लोकतंत्र में ये आंख नाक कान  सजग प्रहरी पत्रकारिता के रंग रमाकांत सोनी नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान

धूम्रपान निषेध दिवस पर

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  आग का दरिया बचो लत बूरी इंसा बचो सिंधु यह दुख भरा डूब मत जाइये व्याधि मूल मानो इसे भारी भूल जानो इसे अवगुण की खान को  मन से हटाइये आये मूर्छा फुले सांस  तन मन का हो नाश जड़ विनाश की यह खुद को बचाइए नाना यह बीमारी दे  दौलत छीन सारी ले खुशियों के चंद पल सुख से बिताइये बीड़ी पान मसाला या गुटका वाला हो शौक लत बुरी होती है ये कभी न लगाइए धुआं धुआं कर देती जिंदगी को पल में ही धूम्रपान की आदत गले न लगाइए कहते है सब जन धूम्रपान अभिशाप रोग का ठिकाना तन कभी न बनाइए केंसर टीबी का रोग कोरोना का भी संजोग जहरीला नाग है ये सबको बताइए रमाकांत सोनी नवलगढ़

तपती दोपहरी

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सन सन करती लूऐ चलती आसमां से अंगारे।  चिलचिलाती दोपहरी में बेहाल हुए पंछी सारे।  आग उगलती सड़कें चौड़ी नभ से ज्वाला बरसे।  बहे पसीना तन बदन से पानी को प्यासा तरसे।  आंधी तूफां नील गगन में चक्रवात चले भारी।  गरम तवे सी जलती धरा फैले विविध बीमारी।  रवि प्रचंड किरणों से व्याकुल जीव जंतु हो जाते।  त्राहि-त्राहि जग मचे सुखे सरिता तालाब हो जाते।  मत निकलो दोपहरी को धूप में झुलस जाओगे।  आग बरसती धूप भयंकर सहन नहीं कर पाओगे।  जेठ की भीषण गर्मी सूरज तपे होकर लाल।  कूलर पंखे फेल सारे सब गर्मी से हुए बेहाल।  सहता रहता धूप धाम वो प्रचंड गर्मी की मार को।  कड़ा परिश्रम बहा पसीना जीत लेता हर वार को।  किसान तपती दोपहरी में कर्मवीर बनकर जाता।  तपस्वी जीवन से माटी का कण कण महकाता। रमाकांत सोनी नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान

मेरी मां

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ममता की मूरत मां होती खूबसूरत मां  आंचल की छांव तेरी हर बला टालती करती खूब प्यार मां मधुरम दुलार मां ममता के मोती सारे मुझ पर वारती तुम्ही हो सारे तीर्थ मा जग के सारे धाम मां  सुंदर सा जीवन मेरा भाग्य संवारती मैं तेरी आंखों का तारा रखती खयाल सारा अंगुली पकड़कर मेरी मां निहारती कोई नहीं है मां जैसा चरणों में स्वर्ग ऐसा  प्यार के मोती लुटाए मां ही पुचकारती प्रथम गुरु हो तुम वंदनीय मां हो तुम शिक्षा संस्कार देकर जीवन संवारती अपार आशीष देती बाधाओं से भीड़ लेती संकटों से बचाकर लाल को दुलारती मार्गदर्शक होती मां जीवन दर्शन होती  अनुभवों का खजाना खोल खूब वारती रमाकांत सोनी सुदर्शन नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान

ले हाथों में इकतारा

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गली-गली घुमा करता ले हाथों में इकतारा।  सात सुरों के तार जोड़ संगीत सुनाता प्यारा। शब्द शब्द मोती से झरते बहती जब रसधारा  महफिल में भी तन्हा रहता मनमौजी बंजारा।  ले हाथों में इकतारा प्रेम गीत के मधुर तराने ले अनुबंधों की माला।  बंध बंध सुघड़ सलोने जब गाता वो मतवाला। मोहक हो महफिल सुनती सुनता जन मन सारा।  झड़ी बरसती अनुरागों की जब गाता वो बंजारा। ले हाथों में इकतारा भाव सिंधु उमड़ा आता मोती बरसे नेह धारा।  शब्द सुरीले मीठे-मीठे सुन समां झूमता सारा।  महफिल में तन्हा लगता कंठो का मधुर सितारा।  सारी दुनिया घूम के गाता वो झूम-झूम बंजारा।  ले हाथों में इकतारा वीणा के बजे तार सारे दिलों को दस्तक दे जाते।  तान छेड़ता जब गीतों की साथ-साथ सारे गाते।  महक उठती महफिल सारी भावन सा सुर प्यारा।  महफिल में भी तन्हा लगता निखरा चांद हमारा।  ले हाथों में इकतारा मधुर स्वर लहरियां गूंजे शब्द सुधारस धारा।  गीतों की लड़ियों से झरता प्रेम तराना प्यारा।  हर्ष खुशी आनंद बरसता मन मयूरा झूमें सारा।  थिरक उठते साज सारे जब गाता व...

पुस्तकों की पीर

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कंप्यूटर क्या कहर ढा रहा मोबाइल मुस्काता है।  अलमारी में पड़ी किताबों को बहुत धमकाता है। इतने सारे चैनल हुये पाठक सारे दर्शक हो गए।  टीवी परोसता सीरियल पुस्तक प्रेमी कहीं खो गए।  कलमकार लाइव चले ऑनलाइन हुआ चलन है।  पुस्तकों का दम घुट रहा किताबे हो रही दफन है। यह कैसा आया चलन है -2 साहित्य साइटों संग फेसबुक पेजो पे चल आया।  साहित्य सुधा काव्यधारा सुरताल सुधारस लाया।  गीत गजल छंद मुक्तक चौपाई सोरठा रच दो।  कवि हृदय के भाव लिखो जो मन की पीर हो।  मंचों पर कविता गूंजे रचनाकार अब सारे मगन है।  पुस्तकों से दूरी महापाप किताबे हो रही दफन है। यह कैसा आया चलन है-2 पुस्तक प्रेमी सारे आओ नया माहौल बनाओ।  रामायण महाभारत लाओ गीता ज्ञान सुनाओ।  वेद उपनिषद ग्रंथ सारे दिव्य ज्ञान ज्योत हमारे।  जिनसे बहती ज्ञान की धारा बदले जीवन हमारा।  शब्द शब्द गंगाजल सा पावन कर दे तन मन है।  पोथियां चिंता में डूबी किताबे हो रही दफन है। यह कैसा आया चलन है-2 अलमारी से उन्हें निकालो पढ़ो देश के नौनिहालों।  भाग्य के तारे चमकाओ ज्ञान सिंधु गोते लगाओ।...

मजदूर

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मुश्किल से टकराता है  मेहनत को वो अपनाता है  गरम तवे की रोटी खातिर  परदेस तलक वो जाता है हाथों का हुनर रखता है  वो महल अटारी करने को  खून पसीना बहा देता  पेट परिवार का भरने को मजदूर आज मजबूर हुआ  महंगाई की मार सहने को  कौन ले सुधबुध उनकी  बचा नहीं कुछ कहने को सर्दी गर्मी वर्षा में भी  वो कर्म पथ अपनाता है  नीली छतरी के नीचे बैठा  हाथों का हुनर दिखाता है रमाकांत सोनी नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान प्रमाणित किया जाता है कि प्रस्तुत की गई रचना स्वरचित व मौलिक है