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ग़ज़ल

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कतरा - कतरा   पानी  का  बरसाना  होगा यानी  बादल  को  भी कर्ज़  चुकाना  होगा उसकी आंखों में खोया हूं सब कुछ अपना इश्क़ किया है अब इतना तो जुर्माना होगा मसला ये  है  मैं घर  से खाली  निकला था गम ये है अब  घर  फिर खाली जाना होगा लैला  के  ख़्वाब  मरे  हैं  महलों  में लेकिन मजनू  को  सड़कों  पर  पत्थर खाना होगा तुम ही बतलाओ  कब तक दोगे साथ मिरा मुझको  तो   राहों  में   चलते  जाना  होगा यानी  पल  भर के  लब  छूने के  बदले  में  सारी   उम्र  मुझे   अब  शेर  सुनाना  होगा ~ विवेक विस्तार | दतिया, मध्यप्रदेश

चाँद से नज़र

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     ऐसे शब्दों को तुम पिरोया ना करों.... २) पानी में शराब को मिलाया ना करों....  हम भुल जाते है खुद को भी....२) तुम यूँ सामने आया ना करो....२)       वो आईना तुमको समझ बैठगा.....२) यूँ चाँद से तुम नज़र मिलाया ना करों....२)           सही को सही कहने का हुनर रखो....२) हर बात पे, हर बात पे यूँ सिर हिलाया ना करों.... कोई देख लेगा आते हुए तुमको....२) चांदनी रात में तुम मिलने आया ना करों....२) ऐसे शब्दों को तुम पिरोया ना करों.... २) पानी में शराब को मिलाया ना करों....                  आरती सिरसाट               बुरहानपुर मध्यप्रदेश           मौलिक एवं स्वरचित रचना

गज़ल

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एक चेहरा जो मेरे दिल को खिला देता है। मुझे हर रोज़ खुश रहने की वजह देता है।। वो मेरा कौन है मालूम नहीं है लेकिन। जब भी मिलता है सिजदे में जगह देता है।। मैं कभी टूटकर अंदर से बिखर जाऊं तो। वो मुझे थाम कर पहलू में सुला लेता है।। जब कभी तन्हाई में चुपके से रोना चाहूं। दिल के दरवाजे पे धीरे से सदा देता है।। उसकी आंखों में रब जाने, कैसा जादू है। बस एक ही पल में दुनियां को भुला देता है।। डॉ0 अजीत खरे

गज़ल

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हर शब के हिस्से  सहर  नहीं  होता घुट जाता दम जो शजर नहीं  होता  पाक दिल  की  दुआ कबूल होती  है कातिलों की दुआ में असर नहीं होता बेचकर  वो  ईमान  रईस  हो  गया  है अब अपनों में उसका बसर नहीं होता दीवारों  दरख़्त  को  सब घर  कह रहे लगता  है  गांव जैसा शहर नहीं  होता नजर  लग  जाती  है  जमाने  की   उसे जिसके हिस्से प्यार भरा पहर नहीं होता दुश्मन  यूं  ही  नहीं   जीत   पाता   उसे अगर अपनों के हाथ खंजर नहीं होता युद्ध  होता  कभी  कलम का कलम  से तब तो ऐसा  भयावह मंजर  नहीं  होता स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

जमाना बदल रहा है

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पतिदेव सेंकते रोटी , पत्नी आराम फरमा रही हैं सच कहते हैं सब लोग अब  जमाना बदल रहा है जूठे बर्तनों का अंबार सा लगा हुआ है किचेन में फरमाइश चाय की आ रही, जमाना बदल रहा है ऑफिस  से थके हुए हैं फिर भी झाड़ू लगा रहें हैं   अभी कपड़ों का धुलना बाकी ,जमाना बदल रहा है  महंगे ब्यूटी पार्लर में जाकर देवी जी व्यस्त हैं जब  पति घर के जाले छुड़ा रहा है जमाना बदल रहा है किटी पार्टी से आकर पत्नी जी अब थक गई है तो  पति उनके पैर दबा रहा है अब जमाना बदल रहा है ये रचना केवल हास्य और मनोरंजन के लिए लिखी गई है पुरुष वर्ग और महिला वर्ग दोनों कृपया अन्यथा न लें😊😊😀😀🙏🙏 संगीता शर्मा

ग़ज़ल

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फूल किसका है पात किसका है ? रात किसकी है प्रात किसका है? जिसकी छाया में उम्र कटती है मेरे सर पर वो हाथ किसका है? होके तन्हा भी जीना पड़ता है उम्र भर मिलता साथ किसका है? जिसने बख्शा है छीन लेगा वो होता तन का लिबास किसका है? मेरी आंखों में तेरी आंखों में जो भी रहता प्रकाश किसका है? वक्त के साथ उड़ गई रौनक चांद सा चमके गात किसका है? मुफलिसों का कोइ "किंजल्क" नहीं यहां होता अनाथ किसका है?           🌺🌺🌺🌺🌺                 --किञ्जल्क त्रिपाठी "किञ्जल्क"                        आजमगढ़ (उ.प्र)

गज़ल

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कि कहने को महज़ हैं प्यार की बातें तुम्हें लगती हैं बस बेकार की बातें हमारे साथ सबका साथ दोगे अब तुम्हीं करने लगे सरकार की बातें  यहाँ हमने सँभाला होश है जबसे तभी से हो रहीं रफ़्तार की बातें भरोसा इस ज़माने में करें किस पर टके में बिक रहीं अख़बार की बातें तुम्हें मालूम अब हमने यूँ ही दिल से लगाना छोड़ दी दिलदार की बातें मियाँ तुम इस तरह सुन तो रहे हो पर डुबा देंगी तुम्हें विस्तार की बातें - विवेक विस्तार

मोहब्बत हो रही है।

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मुझे तेरी जरूरत हो रही है.... एक तूं ही मेरी आदत हो रही है.... आंखों से तुम्हारी देखो जरा, आंखों से मेरी शरारत हो रही है.... टकराने लगी हूं दिवारों से दिन के उजाले में, न जानूं मन में कैसी ये हसरत हो रही है.... निहारूं मैं आईना रोजाना जमाने में देखो कयामत हो रही है.... जागने लगी हूं अंधेरी रातों में मुस्कुराऊं अकेले में, कहें रातें मुझसे ख्यालों में ही तुमसें बात हो रही है.... क्यों करना मिलने का कोई बहाना नींदों में ही तुमसे मुलाकात हो रही है.... संभालें से ना संभले ये नादान दिल मेरा, मुझे धीरे धीरे तुमसे मोहब्बत हो रही है....               कु. आरती सिरसाट             बुरहानपुर मध्यप्रदेश

गज़ल

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आजकल हर कदम देखभाल कर रखिये। लम्हा-लम्हा खुद को संम्भाल कर रखिये।। क्या पता कौन किस घड़ी चाल चल जाये। कुछ तरकीबें दिल मे निकाल कर रखिये।।   ज़हर उतारने के मंत्र भी जानना जरूरी है। फिर आस्तीनों में सांप पाल कर रखिये ।। वक़्त संगदिल है किस घड़ी बदल जाये। हार-जीत का सिक्का उछाल कर रखिये।। बेखबर होकर जमाने से जंग मत लड़ना। 'अजीत' ख़ास दांव जेब में डालकर रखिये।। डॉ0 अजीत खरे

गजल

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आप जब भी कोई फैसला कीजिए आईने   से   पहले  वफा   कीजिए हक जमाने  में कोई  भी  देता  नहीं हक    जिंदगी   का   अदा  कीजिए आप तब तक भले हैं जब तक हैं चुप बोल  कर   कभी   आजमा   लीजिए उंगलियां  भी  थप्पड़  बनकर लगेगी भ्रम  को  हकीकत से  मिला  दीजिए दुश्मन   जमाने  का   बनना  है  तय बस  सोए   हुए   को   जगा   दीजिए स्वरचित : .... पिंकी मिश्रा  भागलपुर बिहार ।

जगनुओं को रोशनी

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जगनुओं को रोशनी का यूं पता देता हूं मैं जल रहे कमरे की बत्ती को बुझा देता हूं मैं है मुझे मालूम तेरा दिल जलाता हूं फिर भी बुझ सके ना आग दिल की सो हवा देता हूं मैं आपके गुरूर में कोई खलल ना पड़ जाए शोर दिल का इसलिए दिल में दबा देता हूं मैं इस ज़माने से मिरे रिश्ते अलग हैं थोड़े से लोग देते हैं दगा तो मुस्कुरा देता हूं मैं यार कहते हैं सुनाओ इश्क के किस्से अपने  और अपनी एक दो गज़लें सुना देता हूं मैं ***** विवेक विस्तार

ये रिक्शा खींचने वाले

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हमें दिल से बुलाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले। हमेशा याद आते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। झुलसती धूप में भी जिनके नंगे पांव होते हैं। पसीने से नहाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। भरी बरसात में जो हम पे पर्दा तान देते हैं।  वो खुद ही भींग जाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। हमेशा चाहते हैं सिर्फ वो दो जून की रोटी। नहीं ज्यादा कमाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। कंपाती सर्दियों में भी मिलेंगे चंद कपड़ों में। हमेशा कपकपाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। भरी नोटों से थैली घर किसी की छूट जाए तो। उसे बापिस दिलाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। अचानक हो कहीं पर जब कभी भी बंद हड़तालें। तो भूखे लौट जाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। किसी सरकार ने अब तक नहीं पूछा है आकर के। कि कैसे घर चलाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। बड़े खुद्दार हैं रावत नहीं लेते हैं फोकट में। सदा मेहनत की खाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।। रचनाकार भरत सिंह रावत भोपाल

हम उन्हें भुला ना सके

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दिल के घाव कभी दिखा ना सके  हम आज तक उन्हें भुला ना सके  गुलाबी खुशबू से महकता तन बदन  उसकी गिरफ्त से खुद को बचा ना सके वो चले गये थे एक दिन रूठकर हमसे तो जिंदगी भर उन्हें कभी बुला ना सके  एक छुअन से सिहर जाता था ये बदन वैसी छुअन हम फिर कभी पा ना सके जिस मुस्कान से सजती थी महफिलें उसी मुस्कान पे सब कुछ लुटा बैठे  जिस गली में उनका ठिकाना था कभी उस गली से हम अपना दिल लगा बैठे  कतरा कतरा कर टूटता रह गया दिल  इश्क ए मलहम से भी उसे जुड़ा ना सके  हरिशंकर गोयल "हरि"

ग़ज़ल

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ख़्याल आते ही भर आतीं हैं आंखें मेरी बात करने से अंजान सा डर लगता है जाने किस बात का रंज पिन्हा है मेरे दिल में  किसी उजड़ी हुई मुहब्बत का असर लगता है अब तो खग भी नहीं करते हैं बसेरा उस पर कितना वीरान सा सूखा ये शज़र लगता है शाम होते ही सहम जाते हैं उजाले घर में ख़ौफ तेरी यादों से इस कदर लगता है, तुझको आवाज दूँ और दूर तलक तूँ न मिले, ऐसे सन्नाटों से अक्सर मुझे डर लगता है।। डॉ0 अजीत खरे

गज़ल

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2122 2122 2122 212 दर्द है आवाम सारी मजहबी दिखने लगी क्या कहूं तुमसे धरम की बंदगी दिखने लगी।। जिस्म के संग रूह भी वो बेच बैठें हैं यहां शहर हो या घर सभी में नाखुशी दिखने लगी।। क़त्ल होता है सरे बाज़ार अब तो हर पहर  सूख जाते हैं लहू वो दिल्लगी दिखने लगी।। मुल्क मेरा दर्द से उभरा है अभी तो और फिर बदनसीबी की वही सब दरिंदगी दिखने लगी।। राज अब तो कर रहें सिंह भेष धर गीदड़ यहां, बेअसर होती दुआयें कीर्ति" की दिखने लगी।। मौलिक व स्वरचित:- कीर्ति रश्मि "नन्द( वाराणसी)

बहुत जरूरी है

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आज   हर  हाल  में  ढलना, बहुत जरूरी है। वक़्त  के  साथ  में  चलना, बहुत जरूरी है।। इन हवाओं को बदलना, तो नहीं है मुमकिन। साथ  में  इनके बदलना,   बहुत  जरूरी  है।। आप सोने की तरहां, चाहते हो अपनी चमक। फ़र्ज़ की आग में गलना,   बहुत  जरूरी   है।। इन फिजाओं में बहक, जाए ना ये दिल अपना। दिल के अरमान मसलना,   बहुत   जरूरी  है।। गल्तियां  हो  चुकी  हैं ,  उनको  भुला दीजे अब। आपको  पाक  निकलना ,  बहुत  जरूरी   है ।। ये  दशहरे  का   पर्व ,  हमको  ये  सिखाता  है। दिल  के  रावण का भी, जलना बहुत जरूरी है।। रोजगारी   का   इंतजाम   , कीजिए   रावत   । इन  गरीबों का भी पलना ,   बहुत जरूरी है ।। रचनाकार ✍️ भरत सिंह रावत भोपाल मध्यप्रदेश

बेरुखी

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बेरुखी में इस तरह वो आजमाते  हैं मुझे। वो तड़प के और ज्यादा तोड़ जाते हैं मुझे।(१) चाहतों का देखिए तो ये मजा भी है जुदा, साथ हैं पर रोज तन्हा छोड़ जाते  हैं मुझे ।(२) खिलखिलाते से नजर आते रहे वो आज कल, कहर से अक्सर जमाने  के बचाते हैं मुझे ।(३) ये हुनर भी इक नया ही देखने को है मिला, पूछ कर मुझसे ही बातें तो बताते हैं मुझे ।(४) पूछ  लेते  हैं  कभी  वो  हाल  मेरा  भूल से  , चोट खाकर भी मगर मरहम लगाते हैं मुझे।(५) राह की वो धूल इक समझा  कभी था जो हमें भी, आग बन  के खाक में  अक्सर मिलाते हैं मुझे ।(६) बेरुखी कुछ बेबसी कुछ कश्मकश है कुछ दिखी, नाम  मेरा  रेत  पर  लिख कर  मिटाते  हैं मुझे।(७) वक्त तेवर ही बदलता है नया इक रूप ले, रोज ही इल्जाम से इक तो सजाते है मुझे ।(८) वो जरा बहके हुए से कुछ नजर हैं आ रहे, इक कहानी भी जुदा ही अब सुनाते हैं मुझे।(९) आज बेगानी छुवन सी है निगाहों में तेरी, कौन है  जिसके लिए वो भुलाते  हैं मुझे।(१०) जिंदगी "बेफिक्र" तन्हा बीत ना जाए कही, छोड़ दो जिद यार इ...

गजल

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भोर की पहली किरण मुस्कुरा रही है  एक नई रोशनी सी मुझमें समा रही है  ये कैसा संगीत गूंज रहा है फिजाओं में  दूर से मंदिर की घंटी की आवाज़ आ रही है दिल में फिर कोई नई तमन्ना पैदा हुई है  तेरी चाहत भी नित नये गुल खिला रहीं है   खुली हुई बांहों के हार लिए खड़े हैं वो  आज फिर से जयमाला की घड़ी आ रही है   खुली आंखों में पल रहे हैं ख्वाब कई  ऐसे में ये ज़मीं जन्नत नजर आ रही है तुझसे ही शुरू तुझपे ही खत्म होती है  जिंदगी कुछ इस तरह तमाम जा रही है दिल के अहसासों को उकेरा है कागज पर  वो समझ रहे हैं कि कोई गजल पढ़ी जा रही है हरिशंकर गोयल "हरि"

मलंग

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काफिया - अन रदीफ़ - में  छुपे हैं चिलमन में,  नाम लिया भजन में। आपने नजर उठाई,  फूल खिले चमन में। इश्क छाया इस कदर,  हसरतें बिछी हैं मन में।  तेरी साँसें मेरी धड़कन, प्यार तलाशे अंजुमन में। तेरी बाहों में बिखर जाऊँ  बनूँ मलंग"झा"उड़ूँ गगन में आरती झा(स्वरचित व मौलिक) दिल्ली सर्वाधिकार सुरक्षित © ®

खूबसूरत हंसी मैं प्यार का वो पल लिख दूं।

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खूबसूरत  हंसी मैं प्यार  का वो पल लिख दूं। तेरे चेहरे को किसी झील का कंवल लिख दूं। करीब  आओ    तेरी  फूल   सी  हथेली  पर किसी गुलाब की डंठल से मैं ग़ज़ल लिख दूं। करूं  जो  बात  किसी  से  मैं  सादगी  की तो किसी मंदिर के कलश का मैं तुझे जल लिख दूं। बंद  कर  ले  मुझे  आंखों  के  आशियाने  में चाहता खुद को तेरी आंख का काजल लिख दूं। संगेमरमर  की  दीवारों  को  देख  दम घुटता कहो तो फूस का तुझको कोई महल लिख दूं। मेघ  यादों  के  तुम्हारे  ये  दिल  पे  छाए  हैं तुझे आंखों  से बरसता हुआ बादल लिख दूं। सियाह   रात  की  चुप्पी  जो  तोड़  देती  है तेरे  पांवों  की  खनकती हुई पायल लिख दूं। गमों  की मार  से आहत  ये  दिल  हमारा है नाम कैसे ये तेरे मैं दिल-ए- घायल लिख दूं। फागुनी  रात में "किंजल्क" से मिली आकर कोई  कह  दे कि उ...