श्रृंगार रस पर लेखक की गागर...
तेरे दो मृग नैनो ने मुझ पर तो तिरछे वार किए ऊपर से तेरी सुंदरता कामरूप की रति बनी... तेरी सुंदर सी वाणी तो मेरी प्रेम तपस्या ले डूबी तेरी पायल की वो खनके मेरे अंतर्मन तक जा बैठी... उपहास करेगी यह दुनिया अगर प्रेम नाम इसे दे दू तो बड़ चली उम्र अब मेरी भी मुस्कान मधुर तेरी ले लूं तो... है प्रीत मधुर संगम सी तट सरिता तू रेत पर नदी एक सी तू मीन सुकोमल चाल बड़ी तेरी थाह में मन उतरा मेरा... अब कलम मेरी तेरी क्या उपमा तुम तो स्वर्ग लोक की रंभा सी नैनो में बसती तेरी छवि पल-पल के तेरे आकर्षण सी स्वरचित@लक्ष्मीनारायण🙏