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Showing posts with the label नीलम गुप्ता

अनजान राही बना हमराही

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"ओह!! माई गाॅड "कितना सुंदर दृश्य है, नीला स्वच्छ आकाश ,सोंधी सोंधी मिट्टी की खुशबू, हल्की हल्की बारिश, सफेद कोहरा ,रात को ये सब अनुभव नही हो रहा था। आते आते रास्ते मे अंधेरा छा गया था ,बस ठंडक महसूस हो रही थी। ओह कितना सकुन है यहाँ ,नहीं तो शहरों मे उठते ही टैफिक की आवाज से सुबह-सुबह ही सिर में दर्द हो जाता है। कितना डर गया था मैं यहां आने से पहले कि सुनसान पहाड़ी वादियों में  क्या करेगा। यहां के टेढ़े-मेढ़े रास्ते बहुत डराते हैं। जब खाइयो की तरफ देखो एक खौफनाक मंजर नजर आता है ऐसा लगता है यदि कोई इन में गिर गया तो उसका अता पता भी नहीं मिलेगा। लेकिन आज न जाने क्यों यह सब बहुत सुंदर और अच्छा लग रहा है । तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज आई। साहब जी आपको कुछ चाहिए। मैं यहां पर आप की देखभाल करने के लिए हूं। मेरा नाम गोपाल है, आप जब चाहे मुझे आवाज लगा सकते हैं, इस समय आपको कुछ चाहिए तो बताइए। अच्छा गोपाल काका मेरे लिए एक कप गर्म गर्म चाय ला दीजिए। गोपाल राहुल के कमरे में चाय के साथ सुंदर फ्रेश फूल लेकर आया और गुलदस्ते में लगा दिए। सारा कमरा महक ऊठा।वाकई यह जगह जन्नत है ।कहते हुए...

रहस्यमई समुद्र

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छपाक …… अरे देखो कैसी आवाज आई उधर से ,अरे भाई लगता है कोई डूब रहा है। बचाओ कोई तो उसको अरे !!गोताखोर जी आप यहां आए हैं प्लीज जल्दी से समुंद में एक इंसान ने छलांग लगा दी है प्लीज उसे बचाइये। किधर जल्दी से बताइए , उधर गोताखोर जल्दी से पानी में कूद गया। जिस दिशा में उस इंसान ने उस व्यक्ति को गिरते हुए देखा था। बहुत ढूंढने के बाद गोताखोर को आखिर वह इंसान मिल ही गया जो पानी में कूदा था। वह उसे  निकालकर कंधे पर लाया । फटाफट उसको सीधा लिटा कर उसके पेट फेफड़ों से पानी निकाला। उसके बाद भी उसे सांस नहीं आई तो मुंह से कृत्रिम दिलाई तब जाकर कहीं उसको सांस आई। गोताखोर ने कहा ..आगे से ऐसे करने की कोशिश मत करना ।कितनी भी परेशानी आए जिंदगी में, इसका मतलब यह थोड़ी ना है कि अपनी जान ही खत्म कर दो ,यह समुद्र इंसानों को जीवन देने के लिए है ना कि इंसानों की जीवन लीला समाप्त हो जाए । इसे भी तो कितना बुरा लगता होगा कि कहां मेरे अंदर एक समुद्री जीवो की दुनिया बसती है और कहां यह इंसान मेरे पानी में कूदकर अपनी जान गावाते हैं । सांसे तो उस प्रभु की दी हुई हैं फिर आपको इसको खत्म करने का कोई मतलब नहीं ...

जिंदगी किताबों के मध्य।

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जिंदगी के अनुभव क्या ,किताबों के बोझ तले मिलते हैं। किताबों से क्या सारा ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। माना एक अच्छी दोस्त मित्र हैं हमारी किताब है लेकिन जिंदगी का अनुभव जिंदगी से मिलता है। पढ़ना जरूरी है ज्ञान के लिए।  लेकिन उस ज्ञान को बोझ न बनाओ । गीता का सार रामायण का प्यार। हमारे ग्रंथों में बसा है। लेकिन जिंदगी की जीने की कला। जिंदगी की हकीकत से मिलती है। सुख दुख में शामिल हो, बनो किसी का आधार। तब सफल होता है,हमारा किताबों से प्यार। किताबों को रट कर उच्च पद तो स्थापित हो सकता है। लेकिन उस उस पद को सौम्यता से निभाना व्यवहारिक जिंदगी सिखाती है। तो फिर मत दबाओ अपने आप को किताबों के बोझ तले । जियो जिंदगी और जीने दो बचपन हंसता खेलता जिंदगी की छांव तले। नीलम गुप्ता नजरिया दिल्ली

बिंदी की अहमियत

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परिधि तुम घर से बाहर निकलो।इस तरह कब तक घर में बंद रहोगी। कब तक पराग की याद को सीने से लगाकर रखोगीं। अपने हाथ में तो कुछ है नहीं, तुमने- हमनें तो बहुत कोशिश की, उसको बचाने की। बहुत इलाज कराया ।लेकिन जब प्रभु की यही इच्छा थी, उसके आगे हम क्या कर सकते हैं, यह सुनते ही परिधि फक फक रो पड़ी उसकी आंखों से आंसू धारा बहती चली जा रही थी। तभी अपनी गीली आँखों से उसकी सास  में उसको संभाला और गले लगाकर उसको संतावना दी। बेटा जीवन बहुत लम्बा हैं ऐसे नहीं कटता हैं। "जहां तुमने स्कूल में पहले नौकरी की थी ,वहीं से फिर से शुरुआत करों। कल से तुम जाना शुरू कर दो। पहले तो जिम्मेदारियों के कारण  तुमने अपनी जॉब छोड़ दी थी ।लेकिन अब मैं चाहती हूं तो फिर से अपनी नौकरी ज्वाइन करो और अपनी जिंदगी में आगे बढ़ो" सुबह उठकर परिधि की सास ने उसे तैयार होने के लिए कहा ।जबरदस्ती उसको ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठा दिया और उसके बाद उसके बाल सवारने लगी ।देखो क्या हाल बना लियाहै तुमनें अपना।अचानक से शीशे पर चिपकी बिंदी परिधि के माथे पर लगी हुई दिखाई दे रही थी।  परिधि को पराग की याद आने लगी ।कि किस प्रकार क...

यादें

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यादें यादों के भवर से कहाँ ,उभर पाती हैं जिंदगी। सारा जीवन इसी,उधेड़ बुन में, निकल जाती हैं जिंदगी। किसने क्या कहा, ये क्या हुआ। सोच सोच ,ये होता ,तो ये न होता। पग पग पर इंतिहान लेती हैं जिंदगी। सारा जीवन इसी,उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी। कभी पीछा नहीं छोड़ती हैं ये यादें। उठते  बैठते खाते सोते हसते खेलते। झूठे सपनों में ही बीत जाती हैं जिंदगी सारा जीवन इसी, उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी। हमारा जीवन ,नहीं हमारा  डोर दूसरे के हाथों में है। बस कठपुतली बन नाचती हैं सारी जिंदगी। सारा जीवन इसी ,उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी। जीवन के ये विभिन्न उद्गार  कभी हसाँते कभी रूलाते। हकीकत से ज्यादा,ख्यालों में जीती हैं जिंदगी। सारा जीवन इसी उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी। क्या खोया ,क्या पाया। उलझे रहते इन्हीं सवालों में। इन प्रश्नों का जवाब ढुंढती रह जाती हैं जिंदगी। सारा जीवन इसी, उधेड़बुन में निकल जाती हैं जिंदगी। नीलम गुप्ता नजरिया दिल्ली।

दे दे माँ थपकी।

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माँ अपनी गोदी में लिटा ले। दे दे प्यार की थपकी । बहुत थक गई हूँ।  सकुन भरी नींद सुला दे। अपनी बाहों का झूला बना ले। दे दे प्यार का झोंटा।  लगे ठंडी हवा का झोंका।  सावन बन प्यार बरसा दे। सुना दे एक लोरी। मैया मै तेरी गोरी। गुनगुना कर मुझको । स्वपन सुहाने दिखा दे।  दर्पण में देखूँ तेरी सुरत। अपने अन्दर तेरी मूरत।  प्यार के आँसु मेरी आखों से।  छलक छलक कर आए। तु कहाँ है मेरी माँ।  बचपन मुझे लौटा दे।  बहुत थक गई हूँ।  सकुन भरी नींद मुझे सुला दे।  #नीलम गुप्ता नजरिया दिल्ली

नन्ही उम्मीदें

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                                  नन्ही नन्ही उम्मीदें बांधकर । जीत लिया जग सारा। छोटी छोटी आशाओं से। प्रफुल्लित हो गया जीवन सारा। न कभी की कोई बहुत बड़ी लालसा। जो अपनी चादर से बाहर हो। उतने पैर फैलाएं हमनें। जिस से जिस्मानी न भुख हो। आत्मा तृप्ति हो जाए । जब नाम ईश का हम जपे। तृपण कर दे अपने लोभ। सुख सुविधाओं का न भोग लगे। एक गुब्बारे से भी आसमां में उड़ने की चाहत पूरी होती हैं। एक बच्चे की मासूम मुस्कान से। दिन मे भी दिवाली होती हैं। नीलम गुप्ता नजरिया दिल्ली

बेटी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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बेटियाँ हमारी हमारे दिल का टुकड़ा हैं। दिखती उनमें मां की परछाई। वह तो मेरा ही मुखड़ा हैं। हँसते हँसते सारी कायनात  अपने नाम से महका देती हैं। सारी जिम्मेदारी चुपचाप उठा लेती हैं। इनके जन्म के साथ फिर । एक सृष्टि की रचियता जन्म लेती हैं। जो कर अपने को कुर्बान। फिर नये जीवन को जन्म देती हैं। कहते है एक औरत , औरत के जन्म पर दुखी होती हैं। वह इसलिए नहीं की एक कन्या जन्मी हैं। कोई कष्ट उस कन्या को न हो । इस बात से थोड़ा विचलित होती हैं। जब पराया धन कह उसे  परिवार से दूर जाना पड़ता है। अपनी संतान को दूर करना। बड़ा दुर्भर एक मात पिता के लिए होता हैं। जिस बेटी को पलकों पर पालकर बड़ा करते हैं। नाज़ नखरे उठाकर उसको प्यार करते हैं। जब मुश्किल में वह आए , दिल मात पिता का रोता हैं। इसलिए उसके जन्म पर। मन थोड़ा क्रदन करता हैं। बेटियाँ मात पिता की जान होती हैं। अलगाव में जीवन की ह्रास होती हैं। इनके बिना न जीवन होगा। न जीवन की उत्पत्ति। सांसारिक चक्र की संचालन होती हैं। बेटियाँ केवल एक लड़की नहीं। पूरे समाज की नीवं होती हैं। # नीलम गुप्ता (नजरिया) दिल्ली

नारी का मन

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चाहे नारी कितनी टुट जाए। अपने परिवार की भलाई ही सोचती है।  खुद चाहे टुट कर बिखर जाए। अपनों को हमेशा जोड़ कर रखती है।  टुटा तारा हो या टुटा नारी का दिल। अपनों से चाहे ज़ुदा हो जाए। भगवान से लड़ने की ताकत रखते हैं।  कबूल करवा लेते हैं। अपनों की मांगी दुआए।  ये करिश्मा ही तो है उस खुदा का। जो ये बरकत का वरदान नारी को दिया।  सूखे में भी बहार ले आए। ऐसा उसकी दुआओं में असर दिया। #नीलम  गुप्ता(नजरिया)दिल्ली

पति -पत्नी की नोक झोक।(सात फेरे)

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पत्नी... सात जन्म और तुम्हारे साथ।  नही नही नही।  लेकिन एक शर्त पर हो सकता है।  मैं अगले जन्म बनू पति तुम्हारा।  निकालू सारे बदले गिन गिन। ना छोडू तुम्हे तंग करने से एक पल ।  पति... ओ मेरी भोली। पिछले जन्म में मै पत्नी था । और तु पति।  जब भी तुमने यही किया था वादा। इसलिए अबकी बार मैं पति । बनके आया तुझे सताने ।  पत्नी... ठीक है तो ऐसे इस जन्म में।  अगले जन्म में भी ऐसे ही बनेंगे।  अबकी बार तो कोई नहीं।  अगली बार पत्नी ही बन । करूँगी तुम्हारी नाक में दम।  दिखा अपने त्रिया चरित्र।  महोपाश में बाँध लुंगी।  अबके जन्म तो छोड़ दिया।  अगले जन्म नहीं छोडूगी।  पति... अरे ओ भाग्यवान।  इस जन्म में भी नही भरा तेरा मन।  मुझसे लड़ लड़ कर। जो अगले जन्म में भी बुक कर लिया।  अगले जन्म की देखेंगे अगले जन्म।  चल इस जन्म चले अब साथ मिलकर ।  चलो अब मान भी जाओ।आओ मिलकर।  इस अपनी दुनिया को और रंगीन बनाएँ।  #नीलम गुप्ता(नजरिया)दिल्ली

पति पत्नी की खट्टी मीठी नोक झोक (समुद्र)

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पत्नी…. सुनो पति जी आज करा दो सागर की सैर। देखूगी 😎 बहुत सारी छोटी -बड़ी मछलियां। शायद देखने को मिल जाए द्वारका पूरी और टाइटेनिक जहाज। असली में तो ना बैठ सके । लेकिन शायद दर्शन उसके हो जाए। तृप्त होकर जीवन, हमारा सुधर जाए। टाइटेनिक पोज में तो, हम भी फोटो खिचवाए। पति…. चल तु भी क्या याद करेगी..  तुझे स्कूबा डाइव करा दूँ। बन मछली, रंग बिरंगी मछलियों के बीच में घूमना। हाँ खा जाएंगी व्हेल शार्क तुझको । फिर मुझसे ना कहना। पत्नी…. तुम कि क्या किसी मगरमच्छ से कम हो।  जान मेरी खाने को  रहते हमेशा तैयार।  लेकिन हाथ कभी न आती हूँ । क्योंकि कछुआ जैसी गति तुम्हारी।  मैं सेलफिश सबसे गति तेज। पति…. मुझको नहीं उलझना तेरे कांटे में।  जैलीफिश जैसी तुम हो खतरनाक। एक बार मे ही आदमी का हो जाए कामतमाम। पत्नी…. मैं बैटफिश जैसे पहले ही खतरे को भाप लेती हूँ। तुम्हारी झूठी बातों के कच्चे जाल में मैं न फसती हूँ। पति….. सही कहा तुम हो बैटफिश , पत्ते बन जैसी आँखो को धोखा देती हो। फिर बड़ी चतुराई से फ्लाईंग फिश बन उड़ जाती हो। पत्नी…. घर में ही समुद्र की सारी प्रजातियाँ है। फिर ...

ग्रहों की भूल या किस्मत का दोष।।

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ग्रहों की भूल या किस्मत का दोष।।                             ग्रहों की भूल है इसमें या, क्यों किस्मत रूठी हुई है। जाने क्या बात है,जाने क्या बात है। प्यार इस कदर है उनसे। फिर भी ना जाने क्यों जिंदगी रुकी हुई सी है। जाने क्या बात है, जाने क्या बात है। सब कुछ अपना अपना सा है। फिर पराये का सा एहसास हो क्यों पलके झुकी हुई है। जाने क्या बात है, जाने क्या बात है। कोई गिला न शिकवा है। फिर ये ख्बाबो खयालो की दुनिया झूठी हुई है। जाने क्या बात है, जाने क्या बात है। उनकी तलब में तड़प जाऊँ। उनके पास आते ही राहे मेरी मुड़ी हुई है। जाने क्या बात है ,जाने क्या बात है। कोई दोष निवारण बता दो मुझे। असफल हो जाए उपाय ,उनके साए से जिंदगी मेरी जुड़ी हुई है। जाने क्या बात है, जाने क्या बात है नीलम गुप्ता (नजरिया) दिल्ली

शिव गौरी माँ की शादी।

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ऊँ नमःशिवाय जाप का । भाँग आज सभी ने पीली। भोला बाबा और गौरी माता की। शादी में सब भक्त जन की आँखे । खुशी से झूम हो गयी गीली। आज हुआ उद्धार इस पृथ्वी पर।  जब शिवगौरी माता का मिलन हुआ।  उनके पुत्र कार्तिकेय द्वारा जब । तारकासुर का नाश हुआ। चंदा शीश विराजे भोले के।  गौरी बैठी मेहंदी हाथों में सजाए। भूत प्रेत सब नाचन लागे। लगा भाँग प्रभु के नाम की लगाए। विभूति में नहाकर भोले । पहुँचे गौरी के द्वार।  डरे जन जन देख रूप अनोखा। जब देखा गले में कालिया नाग। गौरी ने जब की प्रार्थना । भोले ने बदला अपना स्वरूप।  निहाल हुए फिर जन जन   देख अलौकिक उनका रूप।  मिलन हुआ जब इसी। अनन्त जोड़ी का। जन्मजन्मांतर तक याद करें सब। इस दिन की अद्भुत लीला का।  नीलम गुप्ता (नजरिया)

यादें अपनों की।

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यादें ही यादें रह गई। उनकी इन आँखों में। सपना सा सजा रहता । उनके साथ बिताई बातों में।  रहेगा आशीर्वाद हमेशा । उनका हमारे साथ। क्या हुआ जो दूर हुए। रहेगा आभास हमारे पास।  किसी की हसीं मे नजर आएंगे। किसी की बातों मे झलकेगे। किसी के चेहरे पर वह । अपना निशा छोड़ गये है।  मिल कर जब याद करेंगे। हमारे सामने होगें। बस एक बार दिल से पुकार लेना। तुम्हारी हर मुश्किल मे साथ खडे़ होगें।  नीलम गुप्ता( नजरिया)      दिल्ली

काला कंलक अंतिम भाग

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रागिनी जी ने घनश्याम जी से कहा बिटिया ने कैरियर अपना बना लिया है।अब हमें उसके अपने घर परिवार के बारे में सोचना चाहिए। आप उससे शादी की बात करें। इतनी भी क्या जल्दी है अभी तो वह बहुत भोली है। आप भी ना। आपको अपनी बिटिया कभी सयानी नहीं लगेगी। लेकिन एक मां को बिटिया के बड़े होने का पता चल जाता है। ठीक है रागिनी मैं मौका देख कर उससे बात करुंगा। तभी मोहिनी बाहर से आई और उसने अपनी मम्मी पापा की बात सुनी सुनकर वह घर के अंदर चली गई। रागिनी जी ने घनश्याम जी से कहा कि देखो मोहिनी ने हमारी बात सुन ली है अब बात करने में आसानी होगी। घनश्याम जी ने कहा ठीक है मैं शाम को बात करता हूं। जब रात को सब खाने पर एक साथ बैठे हुए थे तो घनश्याम जी ने मोहिनी से बात छेड़ी कहो बेटा अब आगे क्या प्लान है। मोहिनी ने कहा कुछ नहीं पापा अपने प्रैक्टिस करना जारी रखना चाहती हूं उसके लिए मुझे जॉब करना जरूरी है। घनश्याम जी ने कहा तुम्हें चुप करने की क्या जरूरत है हम तुम्हारे लिए नया नर्सिंग होम खुलवा देंगे। नहीं पापा पहले मैं नौकरी कर कर अपनी प्रैक्टिस अच्छे से करना चाहती हूं और अधिक सीखना चाहती हूं फिर मैं अपना क्लीन...

तेरी चाह की हलचल

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      मन के उद्गारों में मची एक हलचल। रुसवाइयों में न बीते फिर से कल। तन्हा हो सफर ,ओ मेरे हमकदम। चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल।  कौन सी मंजिल कहाँ तलक तक है। न हैं किसी राह की खोज खबर। बीते यूहीं मेरे साल महीने पल। चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल।  मेरे जीवन की कहानियाँ। बेताब हो कर जाती बिखर। न रहा कोई अपना सम्भल। चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल।  न दिमाग और दिल पर रहा जोर। जब मर्जी हो जाए तेरी ओर। न मेरा आज रहा न कल। चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल।  चाहत तेरी मेरी दिवानगी है। न जीते बनता हैं न मरते। तेरा प्रेम बन गया है गरल। चल चल तु यहाँ से बहुत दूर चल।  नीलम गुप्ता (नजरिया)          दिल्ली

काला कंलक भाग ७

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कृष्णा और मोहन दोनों एक-दूसरे के सुख दुख के साथी बन चुके हैं। मोहन पढ़ाई के साथ साथ बाबा की भी मदद करता था। कृष्णा की उम्र भी थकने लगी थी। मोहन ने कहा बस कुछ दिन और फिर आपको कोई काम नहीं करने दुंगा। कृष्णा कहता तु मेरी चिंता मत कर। अपनी जिंदगी की ऊंचाई छुओ। आपने सारी जिंदगी मुझे सम्हालने में लगा दी। मुझे जरा भी बुखार आता था।आप मेरी फ़िक्र में रातभर जागकर मेरी देखभाल करते थे। अच्छा बाबा तु जीता मैं हारा। बाबा तो आप ही हो मैं तो केवल तुम्हारा बेटा हूं।  उनका नहीं जिन्होंने मुझे नदी किनारे छोड़ दिया था। मैंने तुम्हें इसलिए बताया था ।तुम्हें सच्चाई का पता रहना चाहिए। हां बाबा तुम से ही मेरी पहचान हो। मोहन तुम मेरे ही बेटे हो। आगे से कभी ना कहना।  यह कहकर दोनों एक-दूसरे के गले लग गये। मौसम बदल रहे हैं ऋतूए बदल रही है। मोहन और मोहिनी दोनों योवन की उम्र की दहलीज पर कदम रख रहें हैं।  दोनों पढ़ाई कर अपना अपना मुकाम हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं।  मोहन का  नयुरो सर्जन बनने का सपना है । एक दिन कृष्णा ने मोहन को बोला।  बेटा कोई ऐसी विशिष्ट सर्जरी भी होती है ज...

काला कंलक भाग ६

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दोनों बच्चे समय के साथ बड़े होने लगे। जब रात को कृष्णा लोरी सुनाता था ।तभी मोहिनी सोती  थी उसकी आवाज उसके कमरे तक जाती थी ।जब तक कृष्णा लोरी नहीं सुनाता मोहिनी भी सोती नहीं थी। कृष्णा की आवाज थी ही इतनी मीठी कि सब उसकी लोरी का इंतजार करते थे। कृष्णा का रंग सांवला होने के बावजूद भी मोहिनी कृष्णा के पास बहुत खुश रहती थी। वह भी बाबा बाबा कहती थी। कृष्णा जी उसकी हर बात का ध्यान रखते थे। मोहन अपने बाबा की हर बात मानता था। और कृष्णा भी मोहन और मोहिनी दोनों बच्चों को अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था। एक तरफ घर की पूरी जिम्मेदारी निभाता। और दूसरी तरफ बच्चों का ध्यान रखते रखते उन्हें प्रेरक कहानियां सुनाता । जिससे उनके चरित्र का निर्माण अच्छी आदतों के साथ हो। बुराइयां उनको छू ना सके। अच्छाई बुराई की पहचान उनको बताता था। और जब बच्चे शैतानी करते हैं तो उनको भूत की कहानियां  सुना कर डराता था। और उन्हें समझाता था यदि तुमने गलत कार्य किया तो भूत  तुम्हें डराएगा। धीरे धीरे बच्चे स्कूल जाने की उम्र के हो गए और दोनों को स्कूल भेजना था उस मोहिनी का एडमिशन उसके पापा ने एक अच्छे प्रा...

मीराबाई चानू

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भारत की बेटी। मणिपुर से आई है। 4फुट11" भी लम्बाई। मेहनत के आगे न आई हैं।  जब ठान लिया तो ठान लिया। न भोजन न बहन की शादी। जोश मीराबाई चानु का। कभी कम कर पाई है।  रजत मेडल दिया भारत को। अपने दम पर कोशिश कर। छोटा शहर या गरीबी ,भूखे  पेट रहकर । कामयाबी की कसम जिसनें खाई है।  नाज हैं ऐसी बेटी पर। जिसने डिड नोट फिनिश मे । नाम लिखाकर अपना। सवर्ण अक्षरों में भारत को रोशन कर आई हैं।  नीलम गुप्ता( नजरिया)       दिल्ली

काला कलंक भाग ५

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रागिनी जी का आठवां महीना चल रहा था। घनश्याम जी को शहर से बाहर जरूरी काम के लिए जाना पड़ा वह सारी जिम्मेदारी कृष्णा पर छोड़ गए तुम्हें इस स्थिति में इस घर को संभालना रागिनी का भी ध्यान रखना। कृष्णा ने कहा साहब जी आप निश्चिंत होकर जाए मैं सबका ध्यान रखूंगा आप यहां की बिल्कुल भी चिंता ना करना मैं सब संभाल लूंगा। घनश्याम जी दो दिन के लिए शहर से बाहर काम से चले गए। अगले ही दिन रागिनी को लेबर पेन होने लगे ब सबको चिंता हुई ।सब काम कैसे होगा ।लेकिन कृष्णा बिल्कुल नहीं घबराया रागिनी की हालत इतनी खराब थी कि वह वहीं बेहोश हो गई है कृष्णा ने जल्दी से गाड़ी निकलवाई और रागिनी के सामने हाथ जोड़कर कहा मैं आपको अपनी बहन मानता हूं कोशिश तो की थी कि आपके सामने ना आए लेकिन अब मेरी मजबूरी है मैं आपको कुछ नहीं होने दे सकता उसने जल्दी से रागनी जी को गोदी में उठाया और गाड़ी में बैठा दिया। रागिनी जी को हॉस्पिटल में एडमिट करा कर उसने घनश्याम जी को फोन किया उन्होंने कहा मैं तुरंत आ रहा हूं लेकिन तब तक हूं तुम रागनी का ध्यान रखना।। वहां हॉस्पिटल में प्रीमेच्योर डिलीवरी के कारण रागिनी जी को ऑपरेशन के लिए ब...