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माँ

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युग बदले, जीवन बदला, बदला नहीं तो माँ के अस्तित्व का सार। माँ आदि, माँ अनंत, जो कराती संतान को भवसागर पार। प्रभु ने भी सृष्टि सृजन हेतु जिसे चुना, अधर्म के विनाश हेतु, माँ के नत शिर हो लिए युगों अवतार। माँ शब्द में एक ऐसी मंत्रशक्ति, जिसके जप से हो जाता कल्याण। माँ ही तो है हमारे सर्वस्व की पहचान। माधव ने लिया अवतार, बड़भागी बन पाया दो माताओं का प्यार। एक माँ से पाया निश्छल प्रेम, दूजी से सीखा त्याग, समर्पण के भाव। संतान के शुभ के लिए जलते अंगारों पर चल सकती है माँ  स्वयं संजीवनी बन संतान का  वृहत घाव भर देती है माँ । श्रीराम ने लिया अवतार, पाया तीन माताओं का प्यार। अपनी वचनबद्धता से सिद्ध किया, माँ के कुटिल वचन में भी संतान का भला निहित होता है। माँ के मौन में भी अलौकिक संवाद छिपा होता है। अपनी औलाद के खातिर इक माँ  कितने दु:ख उठाती हैं। सीता माता की जीवनी यही दर्शाती है। मलमल पर पांव धरने वाली शूल पथ पर चलती जाती है। अपने संतान के भविष्य के लिए हर पीड़ा गले लगाती है। अदम्य साहसी,करूणामयी,भयहारिणी माँ  जो कराती संतान को प्रेमामृत पान। विनायक का मस्तक कटा, क्...

तब गांव हमें अपनाता हैं।

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अपनत्व की यथार्थता, सर्व जन के पुलकित मन, हृदय में निवास निश्छल नेह का, मीठी बोली का मंतर, हरियाली सदाबहार, न शोर, न गुल, बरगद की छांव, नीम की दातुन, वो चूल्हे की रोटी व कुएं का पानी, जहां चित्रित होती है सबकी कहानी, जब कहानी का किरदार भूला बिसरा पुनः वापस आता  है, तब गांव हमें अपनाता है। निज चादर का आकार बढ़ाने, क्षणभंगुर जगमगाहट को पाने, जन देश की सभ्यता व संस्कृति पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। गांव की गलियों को सूना कर , गांव का राजा शहर का गुलाम बन जाता है। जब गुलामियत का आलम हमें न भाता है, तब गांव हमें अपनाता है। तात्कालिक परिप्रेक्ष्य ने गांव के औचित्य पर प्रकाश डाला, दंगों से दहला, महामारी से घबराया जन गांव की ओर भागा। गांव की आत्मीयता को रौंद, जिसने कभी शहर की भौतिकता को अपनाया। आज उसी ने अपने बुजुर्गों के सायं तले सुखों चैन पाया। जब हम झंझावातों के चक्रव्यूह में फंस हार मान जाते है, तब गांव सारथी बन हमारी आत्मा का मंथन कर , हमें विजयी का आभास कराता है  और हमें अपनाता है। स्वरचित एवं मौलिक मानसी शर्मा पश्चिम बंगाल