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मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना बिहार हूं

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थोड़ा अराजक थोड़ा सा हिंसक थोड़ा लाचार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना ही बिहार हूं  मेरी संतति की बुद्धि पर पूरी दुनिया को नाज है  मेरे नौजवानों की आसमानों से ऊंची परवाज है  "नालंदा" जैसी ख्यातिप्राप्त संस्था का पालनहार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना ही बिहार हूं  मैंने जे पी आंदोलन भी देखा था जब आपातकाल था  दमनचक्र में पिसता यौवन जन जन जीवन बेहाल था  "मीसा" की चक्की में पीसा, मां भारती का श्रंगार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना ही बिहार हूं  मैंने इसे जंगलराज बनते हुए करीब से देखा है  अपहरण उद्योग से बर्बाद होते लोगों को देखा है  चारा चरने वाला बस मैं ही तो इकलौता परिवार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना ही बिहार हूं  "सुशासन बाबू" कब "कुशासन बाबू" बने पता नहीं चला  सत्ता के लिए जाति, धर्म, अगड़ा पिछड़ा सब खेल खेला  आज के हालातों का भैया मैं ही तो सूत्रधार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना बिहार हूं  हरिशंकर गोयल "हरि" 

प्रेम की निशानी

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बनाया था कागज का ताज महल लिखा  था आंखों  पर  मेरी गजल कुछ  तो  लौटाया  था  मैंने  कभी कुछ    तेरी    निशानी    रखी  है । लिखा  था  मिलकर  हमने  कभी वो    प्रेम     कहानी     रखी    है। छोड़ा  ऐसे  क्यों  तूने  हाथ  मेरा मिल न पाया कभी फिर साथ तेरा कुछ    संवाद  अधूरे  हमारे   रहे अधूरी बातें कुछ रूहानी रखी  है। लिखा............ वो................. चिठ्ठी  समझ  कर  जला  न  देना खाक में मेरी दौलत मिला न देना जमाने की नजर से  मैंने छुपाकर तस्वीरें   कुछ   पुरानी   रखी   है। लिखा था......... वो......... ‌‌ राधा   बनकर   तुझे  पाया  कभी मीरा बनकर दरश चाहती हूं अभी  कभी रोते हुए पोंछ गए थे आंसू, चुनर    वो    धानी     रखी     है। ल...

सच मैं तुमको बहुत चाहता हूँ

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अगर तुमने रोके नहीं होते मेरे कदम, उसकी तरफ बढ़ते मेरे हाथ को, बताया नहीं होता मुझको मनुष्य, जिसको मैं भूल चुका था तब, सच में मिट जाते उसके अरमान, जिसका ना कोई कसूर था। वह एक तुम ही तो हो, जिसने कराई थी मुझको महसूस, उसकी पीड़ा और उसकी कहानी, और ऑंसुओं की अश्रु धारा, जो हर आदमी को पिघला देती है, पत्थर दिल को भी हिम की तरहां। मैं तो पागल ही हो गया था, मुस्कराते उस फूल को देखकर, और पार करने ही जा रहा था, अपनी इंसानियत की सीमाएं, शुक्रगुजार हूँ तुम्हारा मैं, कि तुमने मुझको रोक लिया। बचा लिया उस जिंदगी को, मेरी हैवानियत की आदत से, याद दिला दी मुझको मोहब्बत, मेरी इंसानियत और मेरा जमीर, मेरी मंजिल और मेरी खुशी, जिसको पाने के लिए करता रहा हूँ , मन्दिर - मस्जिद -गुरुद्वारा में मिन्नत, सच मैं तुमको बहुत चाहता हूँ। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

माफी मैं नहीं मांगता

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नहीं करता अफसोस मैं, क्योंकि मुझको विश्वास है, मुजरिम सिर्फ मैं ही नहीं हूँ, शर्म उनमें भी तो हो कुछ, माफी मैं नहीं मांगता। गुनाह सिर्फ मैंने ही नहीं छुपाया, सच्चाई उन्होंने भी तो दबाई है, पाने को प्रशंसा सभी दिलों से, और जीतने को बाजी अपनी, मैंने भी दबा दिये अपने पाप, माफी मैं नहीं मांगता। हाँ, उनकी पहुंच है वजीर तक, और मैं हूँ एक अनजान चेहरा,  जैसे कि वो सोते हैं फूलों पर, ऐसे ही मैंने भी खरीद लिया, एक बाग अपने आराम के लिए, नहीं चुकाकर ऋण बैंक का, इसमें अब मेरी क्या खता है, माफी मैं नहीं मांगता। उनको मालूम है हकीकत मेरी, याद है उनको मेरे अहसान भी, कैसे जी रहा हूँ मैं वतन में, लेकिन नहीं बेचा है मैंने, सच में अपना यह वतन, जैसे कि उन्होंने बेचा है, अपना देश और जमीर, ऐसे में गुनाहगार मैं नहीं, माफी मैं नहीं मांगता। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

आपकी तरहां मैं भी

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आपकी तरहां बिल्कुल आप सा ही, मैं भी हूँ एक इंसान इस जमीन पर, आप अमीर है तो मैं दौलत दिल की, मैं भी आपकी तरहां मालिक हूँ अपना, आप गरीब है तो मैं भी गरीब झूठ का बिल्कुल खाली हाथ आपकी तरहां मरने पर, गुलाम हूँ मैं भी आपकी तरहां अपने रब का, और जी रहा हूँ मैं भी जी आजाद आपकी तरहां। फिर भी आप समझते हो मुझको अलग इंसान, मुझमें भी तो है एक इंसान मौजूद आपकी तरहां, लेकिन ना मैं हिन्दू हूँ और ना ही मुसलमान, मैं स्वयं गुरु हूँ हर दीन का इंसानियत के लिए, आबाद हूँ मैं भी आपकी तरहां यहाँ कहीं पर, और जी आजाद हूँ निभाने को अपना फर्ज। लगते हैं यहाँ आपकी तरहां नारे मेरे भी, निकलता हूँ बाहर तो होती है भीड़ मेरे साथ भी, जिंदाबाद, जिंदाबाद कहते हुए मुझको सच में, हाँ ,यह सच है कि मैं बोलता कम हूँ , फिर भी देखता हूँ सब कुछ आपकी तरहां, और समझता हूँ सब कुछ आपकी तरहां, सच मैं भी एक हस्ती हूँ आपकी तरहां, इस जमीं पर ,जी आजाद इस हिंदुस्तान में। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

सच, एक दिन

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तुम आज जो हंस रहे हो, जिसकी खामोशी को देखकर, उसके मुर्दनी स्वर पर, जो निकलता है उसके कण्ठ से, या फिर उसकी तूलिका से। अपने तरकश के तीरों से तुम, हाथों में लेकर गर्म छड़ें तुम, कर रहे हो उसके टुकड़े आज, शून्य का भाव उसमें पैदा कर, किया है जिसको तुमने, निर्मूल और पतझड़ सा एक दरख़्त। तुम विश्वास करो या मत करो, यही वृक्ष इस जमीन पर, इसी आतप में बनेगा वटवृक्ष, एक ऐसी पहेली जो कभी, नहीं सुनी होगी तुमने जीवन में, और नहीं पढ़ी होगी कभी, किसी किताब में तुमने  ऐसी एक अमर कृति, श्रृंगारित संस्कारों से इस धरा पर, जिससे आबाद होगा उसका नाम, उसकी मातृभूमि करेगी गर्व,  उसके संघर्ष और संस्कारों पर, और होगा उसका नाम अमर, सच , एक दिन। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

जी हाँ, मैं

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रचना चाहता हूँ मैं, एक ऐतिहासिक पवित्र दर्शन, गौरवान्वित एक सत्य, अकंलक एक प्रतिष्ठा, अपनी नई रचना में। महकाना चाहता हूँ मैं, एक फूल मेरी वाटिका में, तरु की तरह सींचकर, अपने खून-पसीने से, अपने इस जीवन में। दिलाना चाहता हूँ मैं, उसको इज्जत और कीर्ति, महानुभावों एवं सन्तों से, सृष्टि के सृजनकर्ता से, हर महफ़िल- सभा में। बैठाना चाहता हूँ मैं, उसको अपनी पलकों पर, मोहब्बत की मूरत बनाकर, एक स्वच्छ निर्मल बिम्ब स्वरूप, सुसंस्कृत सभ्य स्त्री के रूप में। इस जमीं पर उसको, एक अमर कृति के रूप में, वर्तमान में और भविष्य के लिए, अमर करना चाहता हूँ मैं, अपनी लेखनी से उसको, जी हाँ, मैं। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

इंसानियत बनाती है

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 इंसानियत बनाती है, धरती को जन्नत यारों।  जिंदा रहे इंसानियत, मांगों ऐसी मन्नत यारों।।     इंसानियत बनाती है-----------------।। इंसानियत बढ़ाती है, प्रेम- भाईचारा देश में। रहता है इससे चैनों-अमन, आबाद किसी देश में।। रहता है इससे सुरक्षित वतन, और खुशियों की बरकत यारों। जिंदा रहे इंसानियत, मांगों ऐसी मन्नत यारों।। इंसानियत बनाती है-----------------।। अमीरी-गरीबी में भेद, मिट जाता है इंसानियत से। मिलती है शरण अनाथों को,धरती पर इंसानियत से।। जीते हैं सभी खुश होकर तब,होती है खुशी उन्नत यारों। जिंदा रहे इंसानियत, मांगों ऐसी मन्नत यारों।। इंसानियत बनाती है------------------।। खुशहाल रहे यह अपना वतन, आबाद रहे यहाँ धर्म सभी। नफरत की खड़ी हो दीवारें, नहीं ऐसा हो यहाँ कर्म कभी।। इंसानियत सिखाती नहीं, ऊंच-नीच,नफरत यारों। जिंदा रहे इंसानियत, मांगों ऐसी मन्नत यारों।। इंसानियत बनाती है-------------------।। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

मुझसे सवाल करते हैं

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लोग मुझसे सवाल करते हैं कि, मेरी औकात क्या है, बात करते हैं कि, मेरा जमीर क्या है, पूछते हैं मुझसे कि, मेरी जात क्या है। जैसे कि मालूम नहीं हो, कहते हैं मेरा नाम क्या है, मैं किस देश का है, मेरी जन्मभूमि कहाँ है, जिसकी मिट्टी से मैं बना हूँ, कहते हैं कि मेरी भाषा क्या है। मुझसे सवाल करते हैं कि किस ईश्वर को मैं मानता हूँ, किस देवता की पूजा करता हूँ, किस की तस्वीर रोजाना, मैं चढ़ाता हूँ फूल हाथों से, और कहते हैं कि, मैं किस धर्म से हूँ। कभी पूछते हैं मुझसे, करीब बैठाकर प्यार से, मेरे सपनें क्या है,  मेरी मंजिल क्या है, किससे मैं प्रेम करता हूँ, क्या जवाब दूँ मैं उनको, करना होगा अभी इंतजार। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

राज उसको मालूम नहीं हो

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देखा है उसको हमेशा, मुस्कराते हुए मैंने, रुलाना नहीं चाहता उसको, दूर रहता हूँ इसीलिए उससे, कहता नहीं हूँ उससे मन की बात। नफरत है मेरी सूरत से उसको, और मैं करता हूँ प्यार उसको, पी लेता हूँ अपने ऑंसुओं मैं, महफ़िल में छुपकर उससे, ताकि बदनाम नहीं हो वह। खिलता हुआ गुलाब है वह, लाजवाब माहताब है वह, दीवानें है हजारों उसकी सूरत के, लेकिन बेख्याल है वह इनसे, मैं छुपाता हूँ उसको इनसे। ताकि वह नासाज नहीं हो, शायद उसको होगा यकीन, मेरी शराफत और प्रेम पर, मगर रहना चाहता हूँ मैं, उससे अभी दूर इसलिए कि, वह खुश और आबाद रहे, और राज उसको मालूम नहीं हो। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

मुझको मत बुलाइये

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जी हाँ, मैं नहीं चाहता कि, बिगड़ जाये तुम्हारा काम, मेरी दर्द भरी कहानी से, अभी मैं ठीक नहीं हूँ, मुझको मत बुलाइये। आप नामवर हो जहां में, आपकी शौहरत है जहां में, आप हाकिम है साहेब, मखमल बिछा है आपके चरणों में, गन्दा हो जायेगा मेरे कदमों से, मुझको मत बुलाइये। बहुत गन्दा है मेरा धंधा, मलिन बस्ती में रहता हूँ मैं, आश्रित हूँ मैं भीख पर, बिल्कुल अनपढ़ हूँ मै, बोल नहीं पाऊंगा अच्छी भाषा, आप इज्जतदार है, मुझको मत बुलाइये। कोई नहीं मेरा रखवाला, नहीं है कोई मेरा भविष्य, पल-पल में बदलता रहता हूँ मैं, अपना रूप और जुबान, नहीं निभा पाऊंगा, मैं अपना वचन आपसे, क्योंकि मैं गरीब और पिछड़ा हूँ, मुझको मत बुलाइये। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

हाँ, मुझको कुछ कहना है

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मैं भी तो इंसान हूँ , उन्हीं की तरहां, जो रहते हैं इस जमीं पर, और जुटाते हैं कुछ साधन, खुद को सुखी बनाने के लिए, अपना नाम कमाने के लिए। हाँ ,मैं कुछ वैसा नहीं हूँ, जो जीतने को दुनिया की दौड़, गिराते हैं पैर मारकर दूसरे को, जिनका नहीं है कोई कसूर, या खरीद लेते हैं दौलत से, इंसान और दुनिया को सच में। हाँ, मैं ऐसा इंसान हूँ , जो चाहता नहीं है कभी, किसी की बद दुहाएँ, कामयाब बनने के लिए, किसी का मकान गिराना, अपना मकान बनाने के लिए। डरता हूँ मैं रस्मों-रिवाज से, करता हूँ शर्म भगवान की, आ जाते ऑंसू आँखों में, किसी का रुदन सुनकर, आ जाती है दया मुझको, किसी की बर्बादी देखकर। बेच नहीं पा रहा हूँ अपना धर्म, बना नहीं पा रहा हूँ अपना महल, बहा नहीं पा रहा हूँ किसी का खून, जमीं पर अपना खौफ जमाने के लिए, बन नहीं पा रहा हूँ मैं कातिल, क्योंकि मैं डरता हूँ सच में, इंसानियत और पाप से, हाँ, मुझको कुछ कहना है। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

तलाश रहा हूँ कुछ शब्द

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तलाश रहा हूँ कुछ शब्द, अपने लिखे काव्य में,  ताकि आवाज उसको दे सकूँ, और आरंभ कर सकूँ मैं, अपनी बात को कहना, आज की इस सभा में। देख रहा हूँ उसको, आज की मजलिस में, अंतिम पंक्ति में बैठे हुए, अपनी पलकों को झुकाये, अपने होठों पे खामोशी लिये। समझ रहा हूँ मैं, उसकी मजबूरी को, उसके मन की पीड़ा को, उसके मन की कहानी को, पर्दे के पीछे के राज को। फिर भी कहना तो है मुझको, आज की इस महफिल में, किस नाम से पुकारूँ उसको, क्या नाम दूँ मैं इस रिश्ते को, या बन्द कर दूँ अपनी बात को, या आगे की कहानी लिखूँ , और क्या रखूँ उसका शीर्षक, तलाश रहा हूँ कुछ शब्द। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला-बारां(राजस्थान)

जी हाँ, प्रगति के पथ पर

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जी हाँ, हम बढ़ रहे हैं, विकासशील है हम, विकसित बनने के लिए, जीत रहे हैं हर दौड़, राष्ट्र दौड़ रहा है, प्रगति के पथ पर। फुरसत नहीं है किसी को, सब एकाग्रचित्त है इस दौड़ में, गरीब भी दौड़ रहा है, तो अमीर भी दौड़ रहा है, और नारी भी दौड़ रही है, इस प्रगति के पथ पर। गरीब पसीना बहा रहा है, अमीर पैसा बहा रहा है, नारी बेड़ियां तोड़ रही है, बुलन्दी को छूने के लिए, शान्ति से जीने के लिए प्रगतिशील हैं ये सभी, इस प्रगति के पथ पर। और पीछे नहीं है दीवानें भी, अपनी लक्ष्मी को पाने के लिए, दौड़ रहे हैं स्वयम्भर में, तैयार है हर प्रकार की जंग के लिए, चाहे जायज हो या नाजायज, और दिखाना चाहते हैं, कि हम किसी से कम नहीं,  आजमा रहे हैं सब अपनी किस्मत, जी हाँ, प्रगति के पथ पर। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला-बारां(राजस्थान)

कितने हम बदले और कितनी हमारी मानसिकता

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बदल गई है प्रकृति और ऋतुयें भी, वक़्त के साथ सन्तुलन बनाने के लिए,  अपने को संवारने और खुश दिखाने को, पहुंच गए हम भी प्रगति के शिखर पर, और हमारी परम्परायें और सभ्यता,  बदल गई है हमारे जीवन और व्यवहार में। जाति और गरीबी के आधार पर शोषण में वृद्धि है, भूल गए हम अपनी संस्कृति के संस्कारों को, राम के आदर्शों को अपने जीवन से दूर कर दिया, सीता स्वरूप आदर्श पत्नी एक बोझ है जीवन में, कृष्ण , अर्जुन और युधिष्ठिर को पर्दे के पीछे रखा है। जाति - धर्म और मजहबी झगड़ों में इजाफा हुआ है, नारी के शोषण और उसके साथ दुष्कर्म में वृद्धि हुई है, आडम्बरों , अंधविश्वासों और पाखंडों में वृद्धि हुई है, दोस्ती , रिश्तों और सम्मान में भेदभाव बढ़ा है, जबकि हमारी साक्षरता में तो इजाफा हुआ है। दौलत और शोहरत को देखकर बनते हैं रिश्ते अब, दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या में वृद्धि हुई है, हालांकि नारी शिक्षित और सक्षम बन गई है, देश के उच्च राजनीति पदों पर नारी पहुंची है, हर विभाग के उच्च पदों और आसमां को, नारी ने छुआ है अपनी प्रतिभा के दम पर, फिर वंश की वृद्धि के लिए पुत्र की मांग, नर और नारी की मानसिकता से नहीं...

उतरकर हिमालय की गोदी से

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उतरकर हिमालय की गोदी से ,जब धरती पर आती हूं गले लगा कर सभी बाधाओं को , स्वयं रास्ता बनाती हूं  ऐसे  तो  रूप  हैं  कितने   मेरे  , इस  सृष्टि  में   वर्णित जीवन संघर्ष के इस रूप में ,बहती सरिता कहलाती हूं । वनवास के  चौदह  वर्ष ही  तो , रघुनंदन  ने  है  देखा उर्मिला -लक्ष्मण के हिस्से में यही , विरह  की है  रेखा रघुवंश के सिंहासन को मिल गया, राजा राम सा सेवक ताउम्र  वन में  सहती  हुई  पीड़ा , मैं सीता कहलाती हूं । रहती हूं पाषाण हृदय में भी , बहुत कोमल हृदय लेकर सिंचित करती आई हूं सृष्टि को,  दृग् झरते मोती  देकर छली भी जाती हूं  मैं  ही , होती  शापित शीला  बनती नारायण मोक्ष देते  हैं तब ही तो अमिता कहलाती हूं । जब भटकता है मनुज जग में,बहुत विचलित हृदय लेकर किया है शांत मैंने ही , प्रेम,  स्नेह सुधा , संजीवनी देकर कभी बनी काली  , कभी दुर्गा ,  कभी है रूप लक्ष्मी का  समर्पित है जीवन कर्तव्य पथ मेरा,मैं उपकारि...

शायद किस्मत में यही लिखा है

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पूछा है इन आँसुओं से मैंने, जो बहते रहते हैं अक्सर, खामोश इन आँखों में, झांककर देखा है मैंने, पर्दा करने वाली इन पलकों को, छूकर किया है अहसास मैंने। क्यों झुकी हैं ये इतनी, क्यों मायूस है ये चेहरे, क्यों नहीं कहते हैं ये , अपने मन की कहानी, क्यों नहीं बढ़ाते ये कदम, हाँ, मैंने इनको करीब से देखा है। उन आँसुओं को गिरते हुए, छुपाकर अपने प्यार को, दो गज अपनी जमीन को, अपने सीने से चिपकाये, सींचते हुए अपने खून-पसीने से, मगर उफ तक नहीं करते हुए। सहनशीलता की इस मूर्ति को, हंसकर सहते हुए अपनी पीड़ा को, समाज के तानों को को सुनते हुए, बड़े लोगों के जुल्म को सहते हुए, नहीं मांगते हुए इंसाफ और मदद, शायद ये आंसू डरते हैं कानून से, शायद किस्मत में यही लिखा है। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

मुझको इंतजार है तुम्हारे जवाब का

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माना कि तुम मुझको जानते हो,  मेरा नाम, मेरा काम - शहर को,  और मेरी सच्चाई को जानते हो,  और मालूम भी है यह सच कि,  हम दोनों का जन्म हुआ है,  इसी धरती और वतन में l तुम भी पढ़े -लिखे हो,  मगर कुछ सवाल है,  जो आते हैं अक्सर,  मेरी जुबां - जेहन में,  नहीं चाहकर भी मैं,  पूछ रहा हूँ आज तुमसे l क्या हम आज़ाद हैं,  क्या हम में कोई बुराई नहीं,  क्या सभी आबाद हैं यहाँ,  क्या अब यहाँ नहीं हैं,  भुखमरी और बेरोजगारी,  देश की आजादी के बाद भी,  जी. आज़ाद हिंदुस्तान में l हम पूछते हैं इंसान की जाति,  विश्वास करते हैं अंधविश्वासों पर,  बाँट रखा हैं खुद को मजहबों में,  सीख नहीं पाए हम आजादी के बाद,  मिलजुलकर जीना हम इंसान बनकर,  जान नहीं पाए उस लहू को हम,  जो बहता हैं सभी के रगों में,  क्योंकि मेरी तरह तुम भी,  एक हिंदुस्तानी और देशभक्त हो,  मुझको इंतजार हैं तुम्हारे जवाब का l शिक्षक एवं साहित्यकार  गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी. आज़ाद  तहसील एवं जिला - बारां (राजस्थान )

ले हाथों में इकतारा

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गली-गली घुमा करता ले हाथों में इकतारा।  सात सुरों के तार जोड़ संगीत सुनाता प्यारा। शब्द शब्द मोती से झरते बहती जब रसधारा  महफिल में भी तन्हा रहता मनमौजी बंजारा।  ले हाथों में इकतारा प्रेम गीत के मधुर तराने ले अनुबंधों की माला।  बंध बंध सुघड़ सलोने जब गाता वो मतवाला। मोहक हो महफिल सुनती सुनता जन मन सारा।  झड़ी बरसती अनुरागों की जब गाता वो बंजारा। ले हाथों में इकतारा भाव सिंधु उमड़ा आता मोती बरसे नेह धारा।  शब्द सुरीले मीठे-मीठे सुन समां झूमता सारा।  महफिल में तन्हा लगता कंठो का मधुर सितारा।  सारी दुनिया घूम के गाता वो झूम-झूम बंजारा।  ले हाथों में इकतारा वीणा के बजे तार सारे दिलों को दस्तक दे जाते।  तान छेड़ता जब गीतों की साथ-साथ सारे गाते।  महक उठती महफिल सारी भावन सा सुर प्यारा।  महफिल में भी तन्हा लगता निखरा चांद हमारा।  ले हाथों में इकतारा मधुर स्वर लहरियां गूंजे शब्द सुधारस धारा।  गीतों की लड़ियों से झरता प्रेम तराना प्यारा।  हर्ष खुशी आनंद बरसता मन मयूरा झूमें सारा।  थिरक उठते साज सारे जब गाता व...

देखेंगे हम तो आपको

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देखा नहीं उनको तो कभी,जिनको लोग याद करते हैं। देखेंगे हम तो आपको , कि अब आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी----------------।। कहती जिनकी कहानी, यह जमीं ये हवाएं। पढ़ी है मैंने तो सिर्फ किताबों में, ये कथाएं।। किसने लिखी यह दास्तां ऐसी, अपने बलिदान से। देखेंगे अब इस देश के लिए, कुर्बान आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी-----------------।। कौन हुआ है शहीद इसके लिए, नींव का पत्थर बनकर। कौन है तैयार इसके लिए, करने खत्म खुद को हंसकर।। किसको नहीं है मोहब्बत, यहाँ अपनी जिंदगी-सुख से। देखेंगे अब इस देश के लिए, त्याग आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी------------------।। उत्सुक है हर कोई यहाँ, देश का ताज पहनने को। बनकर कंगूरा देश में , अपना नाम अमर करने को।। बहुत आसान है लिखकर गजल, महफ़िल में सुनाना। देखेंगे अब इस देश के लिए, बलिदान किसका करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी-----------------ll शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)