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🌹सु प्रभात 🌹

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"उठो देखो सूरज निकल आया। हवा पेशानी को सहलाने आया। लेकर देखो चाय की प्याली प्रेम से किसी ने दरवाजा खटखटाया। चेहरे पर तेरे नूर है आंखों में सुरूर। दिल की धड़कन बढ़ी हुई है। और माथे पर गुरूर है। उठो देखो हो गई भोर दिल में उठ रही है हिलोर फिजा में फैली है खुशबू  छुप गए देखो चांद चकोर। लब है खामोश नजरें झुकी झुकी है खामोशियों में शब्दों की बरसात हो रही है। मची है दिल में हलचल चेहरे पे सुकून है। बह रही है पुरवाई मन हो रहा मयूर है।।  🌹सु प्रभात 🌹          अम्बिका झा ✍️

कैसे कहूं कि मेरा हाल कैसा है

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न तेरे बिन मैं जी सकती। न तेरे संग मैं चल सकती। न दूरी तुमसे सही जाति न पास अपने बुला सकती। कैसे कहूं कि मेरा ख्याल कैसा है। न दिल की बातें बता पाती न चेहरे पर शिकन लाती। मुस्काती हूं मैं हर पल लेकिन न हालात अपनी समझा पाती। कैसे कहूं कि मेरा मिजाज कैसा है। न तुझको कभी भुला पाती। न ख्वाबों में भी बुला पाती। डर है कि कहीं तुम्हें खो न दूं। न दिल में अपने छूपा पाती।। कैसे कहूं कि मेरा अंदाजा कैसा है। न नैनों में अपने बसा पाती। न अश्कों से बहा पाती। नाम हृदय पर गुदवाया है। न नाम से तुम्हें बुला पाती।। कैसे कहूं कि मेरा सवाल कैसा है। न जुबां पर अपने ला पाती  न जज्बात अपने जता पाती। मुझे डर है तेरी रुसवाई का। न पूछा कभी तुमसे न अपनी बता पाती।"         अम्बिका झा ✍️

"जिंदगी का सफर"

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कैसे कटा ये अपना सफर। ढ़ल गई जिंदगी की दोपहर। मैं तुम में ही खोई रही उम्र भर। तेरे साथ हर पल सुहाना रहा क्या पाया, क्या खोया, क्या पाकर गँवाया पता न चला  मैं तुम्हारी रहूँ... ,यही चाहत रही। तेरे साथ हर पल सुहाना रहा। बीता वक्त और जवानी गई कभी मैं बैसाखी कभी तुम छड़ी बन गए। कब आया बुढ़ापा, पता न चला। तेरे साथ हर पल सुहाना रहा। कभी खुशियों की बहारें  कभी दुख के बादल छाए। गम के तूफानों में हम डगमगाए तेरे साथ हर पल सुहाना रहा। दोस्त थे, फिर हमसफ़र बन गए माता पिता से दादा दादी हो गये, खुशियों को समेट कर्तव्यों में जकड़े। तेरे साथ हर पल सुहाना रहा।। कभी दुख कभी सुख के छाँव भी आए। कभी नम आँखों में भी हम मुस्काए। कभी साथ-साथ हम यूँ ही गुनगुनाए तेरे साथ हर पल सुहाना रहा।। कभी तुम से रूठी, कभी तुमको मनाया। अपनी अदाओं से तुम को रिझाया कब तुम्हारी हुई मैं पता न चला। तेरे साथ हर पल सुहाना रहा।। न इस जन्म न अगले जन्म हर जन्म "अम्बिका" तुम्हारी रहे। करती हूँ प्रभु से यही कामना। तुम सलामत रहो ओ मेरे साजना।।" शादी की सालगिरह की बहुत-बहुत शुभकामनाएं 🌹          ...

"सच की जंजीर"

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सच को बांधकर हथकड़ी में झूठ का बोलबाला है सच को डरा धमका कर झूठ का देते हवाला है।। बांधकर सच को बड़े-बड़े नोटों के बंडल से। हर गली चौराहे पर झूठ का परचम लहराते हैं।। अपनी जां पर खेलकर जो खबर लाते हैं पत्रकार। खाई है कसम सच को उजागर करने का लगातार। समाज के ठेकेदार पहुंच ‌का दुरुपयोग करते हैं। सच को बांधने का हर मुमकिन उपयोग करते हैं। करते हैं प्रयास सच को उलझाने का झूठ के जाल में। सच तो सच है उलझ सकता है नहीं मकड़जाल में।। कोशिश हजार कर लो बांध नहीं सकते सच को जंजीर में। बांधा है हमने भी खुद को सच की जंजीर में।।                                        अम्बिका झा ✍️

"नशा छीन लेता है हर सुख"

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जीवन बहुत सुंदर होता गर नशा नहीं करते तुम। मृत्यु तो निश्चित है लेकिन दर्द में नहीं जीते तुम।। धूम्रपान को छोड़ दो अब भी नहीं हुई है देर। मत करो सीने को छलनी अपने तन से बैर। तंबाकू, सिगरेट, शराब अपनों से करता दूर है। जो करता नशा कष्ट पूर्ण जीवन जीने को मजबूर है। नशा के हर पदार्थ पर लिखा हुआ स्पष्ट है।। इसके सेवन में है मृत्यु जीवन में सिर्फ कष्ट है।। जानबूझ कर फिर क्यों देते हो खुद को कष्ट।। गुटखा मुख में डालकर क्यों करते खुद को भ्रष्ट। नशा छीन लेता है फिर जीवन का हर सुख। सोच, समझ क्षमता को हर दामन में भरता दुख। मित्रों के संग बैठकर बनते आप नवाब। खाते और खिलाते हैं दारू ओर कबाब।। तन जर्जर कर देता है बुद्धि लेता छीन । सुख समृद्धि को छीन कर कर देता है दिन। परिवार को ध्यान रख ले लो यह संकल्प। छोड़ दोगे नशा को  बचे ना कोई विकल्प।।"    अम्बिका झा ✍️

"मैं स्त्री हूँ"

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मैं ही प्रकृति, दृष्टि और मैं ही सृष्टि हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ। गृहिणी, गृह लक्ष्मी गृह स्वामिनी भी मैं हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ। आर्या, दुर्गा और भार्या भी मैं ही हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ। रिद्धि-सिद्धि और समृद्धि भी मैं ही हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ। काली, कालरात्रि, कात्यायनी भी मैं हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ। ममता, क्षमा, दया की देवी भी मैं ही हूँ।  हाँ मैं स्त्री हूँ। गंगा ,जमुना, सरस्वती, त्रिवेणी भी मैं हीं हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ। प्रेम, प्रेरणा, और आराधना भी मैं ही हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ। कल की राधा, मीरा, सीता भी मैं ही हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ। आज की रणचंडी लक्ष्मीबाई भी मैं ही हूँ। हाँ मैं स्त्री हूँ।।"                  अम्बिका झा ✍️

"हर स्वप्न साकार"

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"तेरे सारे सपनों को साकार कर दूं। तुम उड़ो आसमा, मैं पंख तेरे नाम कर दूं। तेरे सारे .... गर तेरी ख्वाहिश, है सारी दुनिया, मैं यह जमीं तेरे नाम कर दूं। तेरे सारे.... ग़म, दर्द जो हो, वो में चुरा लूं, अपनी सारी खुशियां तेरे नाम कर दूं। चलो तेरे सारे..... तेरे सारे अरमानों को पूरा करने, अपनी सारी जिंदगी तेरे नाम कर दूं। चलो तेरे सारे..... अंजाने में गर तुम ग़लती करो, तेरी गूस्ताखियों को, मैं माफ़ कर दूं। तेरे सारे..... सफ़र में गर कोई मुश्किल भी आए, क़दम लड़खड़ाने से पहले, मैं थाम लूं। तेरे सारे..... मौत भी आवाज दे तो, नाकाम कर, अपनी हिस्से की सांसें तेरे नाम कर दूं। तेरे सारे.....                                           अम्बिका झा ✍️

नारी हूँ"

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"संस्कार से चलने वाली सम्मान की रक्षा करती हूँ। संस्कृति धर्म निभाने में कर्म सर्वोपरि रखती हूँ। मैं सृजनकारी जननी हूँ, अर्धागंनि कहलाती हूँ। अधरो पर मुस्कान सज़ा, हर कर्तव्य निभातीं हूँ। हर कार्य में तत्पर रहती, खुद के लिए है वक्त नहीं।           संपूर्ण बनाती हूँ सबको,         मैं चाहूँ ताज ओ तख्त नहीं।। हर लड़ाई की जड़ नारी, देते मुझको दोष सभी।             किसी पुरुष ने मुझे बताओ,              मानी है अपनी खोट कभी?                               भ्रूण हत्या की दोषी हूँ या              बाल विवाह मैंने ख़ुद से किया?             क्या सती प्रथा को बोलो तुम,              मैंने ख़ुद से ही अंजाम दिया??                अहिल्या के रूप मेंं बोलो,      ...

🌺नववर्ष कि हार्दिक शुभकामनाए 🌺

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नवपल्लव हर वृक्ष पर आए  हरियाली बागों ने लाए । हम सब ने यह हर्ष है पाया। खुशियों भरा बसंत ले नववर्ष आया।। खेतों में ‌फसल लहराईं। नवयौवना सी प्रकृति जगमगाई। मां दुर्गा की हुई अगुवाई नव संवत की आज बधाई।। अंधियारा मिटा सुर्य की लालिमा छाई है। फाग रंगों से रंग गई धरा लहराई है। शीतलहर मिटी बसंत दुल्हन सी सज कर आई। धरा पर खुशहाली ले नववर्ष आई। चहूओर खुशियाली आई है  सब नवमय हो रहा नव संवत्सर पर। धरती अंबर खुश हुआ हर मुख पर लाली छाई। नववर्ष की आप सभी को हृदय से बधाई।🌹 २ अप्रैल २०२२ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय नववर्ष की आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं 🌹🌹             अम्बिका झा ✍️

"नाराजगी"

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" हँसी छीन ली होंठों की तुम इतने गम क्यों पीते हो। क्यों जीवन की इस बगिया में यू घूट-घूट कर जीते हो।। क्यों जीवन से मोह नहीं है तुम को अपने बोलो तो। क्यों महफ़िल में खामोशी है तुम इतने क्यों रीते हो।। तुमको खुद की फ़िक्र नहीं क्यों, मुझको इतना बतलाओ। अंतर्मन के ज्वार को कैसे तुम अश्कों सा पीते हो।। ख़ामोशी का चादर ओढ़े क्यों गुमसुम तुम रहते हो। दर्द को अपने हंसी के पीछे बोलो क्यों तुम सीते हो।। मुझसे हो नाराज़ अगर तो मुझे बताओ सजा मेरी मेरी गलती की सजा में खुद को क्यों तुम छलते हो।"              अम्बिका झा ✍️

"तुम ने जादू किया"

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"जब मैं तुमसे मिली, तुमने जादू किया। मेरे दामन को खुशियों से भर दिया।। स्वप्न में भी जो न सोचा वो पूरा हुआ, मेरे उर को प्रणय पंथ पर कर दिया।। गीत लब पर मेरे गुनगुनाने लगे। आंसू नैनो से तुम तो चुराने लगे। तुमने दामन खुशी से मेरा यूं भरा, हम तुम्हें सोच कर मुस्कुराने लगे। गम के बादल सभी जिंदगी से छंटे , मेरे गम तेरे नैनों में दिखने लगे। तुमको अपना समझने लगा ये जिआ।। नभ से बारिश खुशी की यूं होने लगी। मेरे अंतःकरण में छुपी थी व्यथा। तुमने पढ़ नेह से पूर्ण मुझको किया। जिंदगी में जो मेरे घिरी थी निशा, आत्मविश्वास का ‌दीप तुमने रोशन किया।। डाल से टूट कर मैं थी बिखरी हुई। प्यार सावन की भांति मुझे ला दिया।। कष्ट मेरे सभी तुम हटाते गए। मेरी सांसो को तुमने सुगंधित किया।।"                अम्बिका झा ✍️

"बोलो कैसा अनुराग है ये"

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           "तुम बिन सूना-सूना सावन           तुम बिन सूना फाग है ये।          तुम बिन फीके रंग हुए सब,            बोलो क्या अनुराग है ये।। तुम बिन सूनी-सूनी राते दिन भी ये सूना-सूना है।           रंगों का त्योहार भी लगता          अब तुम बिन सूने से दूना है।।           इस होली पर लगता जैसे,              कोई बदनुमा दाग है ये। ‌          तुम बिन फीके रंग हुए सब,            बोलो क्या अनुराग है ये।। तुम बिन होली बीत गई, न बीते यह काली रातें। बिना तुम्हारे किसे बताऊं, अपने मन की ये बातें । प्रीत हमारी ठुकराई है, बोलो कैसा त्याग है ये।              तुम बिन फीके रंग हुए सब,                बोलो क्या अनुराग है ये।।           ...

भाग्य का खेल

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पहले के जमाने में, लड़की वाले पैसे लेते थे। लड़की के चचेरे भाई ने एक  लड़का पसंद किया। बहन के लिए लड़की की उम्र दस वर्ष, लड़के की उम्र उन्नीस वर्ष। लड़की वाले ने जो पैसे  लिए थे, वो सारे पैसे बारातीयों के स्वागत और शादी के व्यवस्था में खत्म हो गए। बारात जब दरवाजे पर पहुंची तब सब लोग वर को देखने आए। और सब ने वर की बहुत तारीफ की। वर के रूप रंग के साथ पर्सनालिटी, उनके कपड़े उनके बात करने के विचार सबको बहुत पसंद आया। वर की इतनी तारीफ सुनकर कन्या की माँ वर को देखने गयी। और वर को देखते ही उन्होंने कहा हमें अपनी लड़की की शादी इस लड़के से नहीं करनी। क्योंकि ये मेरी बेटी की उम्र से दुगुना दिखता है। सब की बोलती बंद। जो  अब तक वर और वरातीयों से प्रभावित थे। अचंभित रह गए। पर लड़की की माँ अपनी बात पर डटी रही, नहीं करनी इस लड़के से शादी हमारी फूल सी कोमल बेटी और शादी उससे दुगुने उम्र के लड़के से कदापि नहीं होने दूंगी। और लड़की को लेकर कमरे के अंदर जा गेट बंद कर लेती हैं। सारे गाँव वाले एक एक करके समझाने की कोशिश करते हैं पर वो नहीं मानती। बहुत ही बडी समस्या आन पड़ी। वारात वापस करने का ...

"आँखें एक्स-रे मशीन"

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क्यों बनती आँखें एक्स-रे मशीन, सिर्फ बहू के कामों पर। क्यों बेटी की शरारत मन को प्रफुल्लित कर जाती है।। क्यों बहू के गलती पर आए गुस्सा। बेटी की गलती नज़रंदाज़  कर दी जाती है? क्यों बेटी की जिद्द हक लगता है। बहू की मांगें क्यों ठुकराई जाती।। क्यों शौक़ अपने बच्चों का पूरा कर  मन पुलकित हो जाता है।। और बहू की जरूरत को भी, अगली बार, कह कर टाला जाता है। क्यों आँखें बनती है एक्सरे मशीन, सिर्फ बहू के ही व्यवहारों पर। क्यों बेटी की चंचलता मन में, उर्जा का संचार भर जाती है।। क्यों उठाते हैं सवाल  सिर्फ बहू के ही पहनावे पर। पर बेटी क्यों? हर रूप में प्यारी लगती है।। बेटी क्यों होती है परी, जो बहू नहीं बन पाती है। क्यों? नारी सिर्फ नारी न रहती,  दो पाटों के बीच पिस जाती है।।"            अम्बिका झा ✍️

"बोलो कैसा प्रेम दिवस"

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"कैसे  प्रेम दिवस मनाए हम जब आँखों में पानी हो। सैना के शोणित से निकली, जब बलिदान कहानी हो। । पुलवामा में रक्त बहा हो, भारत माँ के लालो का। और कोई हल न मिल पाया हो अनबूझ सवालों का।। कैसे उत्सव आज मनाएं, उनके मुश्किल दीद हुए। भारत माता के रक्षक जब,  बस के बीच शहीद हुए ।‌। कैसा उत्सव जब माँ के आँचल की ममता रोई थी। कैसा प्रणय दिवस, बहनों ने अपनी माँगे खोई थीं।। कैसा प्रेम दिवस जो केवल, नफरत लेकर आया था। संतानों के सर से जिसने छीना पिता का साया था।। बहन ने भाई को खोया था वृद्ध पिता लाचार हुआ। प्रणय दिवस पत्नी का जब, लहू सना शृंगार हुआ। प्रेम दिवस जब दुष्टों को आया नहीं था कोई तरस। आँसू भरी हुई आँखों से,  कैसे कह दूं प्रेम दिवस।।"         अम्बिका झा ✍️

"सरस्वती वंदना"

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सर्वप्रथम वँदन है माँ को , माँ सरस्वती तुम्हें प्रणाम। वीणा वादिनी हंस वाहिनी। भक्तों का माँ करो कल्याण। मधुर स्वर माँ कंठ में भर दो। जन-जन तेरा करे गुणगान।। बसंत पँचमी की यह वेला। बन जाए भक्तों की आन।। वँदन करूँ मैं माँ सरस्वती। यश कीर्ति का दे वरदान।। श्रद्धा पुष्प अर्पण चरणों में  बारंबार माँ तुम्हें प्रणाम।। सर्वप्रथम वंदन है माँ को , माँ सरस्वती तुम्हें प्रणाम।।"    अम्बिका झा ✍️

"नमन है वीर शहीदों को"

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सर्वप्रथम वंदन है उनको  जिनके कारण यह दिन आया है नमन है वीर जवानों को,  गणतंत्र दिवस यह आया है।। यह केवल तारीख नही  नियम है संविधान है। मान है सम्मान है। जो कोहिनूर को खो कर हमने पायी है। कितने वीर शहीद हुए तो यह शुभ दिन आया है। नमन है वीर शहीदों को जिन्होंने ये दिन दिखलाया है।। आज धरा पर जो यह पुष्पों की वर्षा हो पाईं है। मिट्टी में मिली हुई शहीदों के रक्त की लाली है।। वीर रस के गान से समस्त धरा थर्राई है। मैं करूं, वंदन उनका जिन्होंने जान गवाई है। सोच कर भी जो थर्रा जाए कलेजा। यमराज भी कांप उठे सुनकर, धारा की आन बचाने को ऐसी यातनाएं उन्होंने पाई है। आजादी दिलवाई है सीने पर गोली खाई है। सोचो कितने दर्द में होंगे देख तुम्हारे कर्म को, क्या इसीलिए उन्होंने आजादी दिलवाई है।। नहीं सुरक्षित यहां अपने ही अपनों से हैं। नहीं सुरक्षित मां बहन बेटी की अस्मत यहां। कांप नहीं उठती होगी क्या? उनका कलेजा वहां? मिटा कर वजूद अपना मणी तुम्हें जो सौंप गए। बचाकर देश दुश्मनों से,  राष्ट्रधर्म का मूलमंत्र समझा गए।। दुश्मनों के हलक में हाथ डालकर  छीन कर लाए हैं अपनी धरती की अस्मत, गर...

"कुछ भी करने को दिल चाहता है"

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"न तेरी दौलत न तेरी शोहरत पर मरती हूँ। तुम्हें देखकर तकलीफ में, तड़प उठती हूँ।। न तुम्हें चाहती हूँ, न तेरी पूजा करती हूँ। सुनकर तुम्हारी बुराई, मैं लड़ पड़ती हूँ।। न खोने से डरती हूँ न पाने की आरजू रखती। मुश्किल में सुनकर तुम्हारे पीछे दौड़ पड़ती हूँ।। न तुमसे उम्मीद है कोई न तुमसे आस रखती हूँ। तुम्हारी सलामती के लिए प्रभु से लड़ पड़ती हूँ।। न दूरी मुझे भाती, न तेरा साथ चाहती हूँ। कदम तेरी रुके तो मैं भी पीछे मुड़ पड़ती हूँ।।"            अम्बिका झा ✍️

"सावित्रीबाई फुले"

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सावित्रीबाई नाम नहींं, सच में ही सावित्री थी। कर्म ऐसा किया इन्होंने जग में मान बढ़ाई थी। थी शिक्षिका हर एक को शिक्षित करती थी पीड़ित और महिलाओं की मानो ये वरदान थी। करती थी वीरों की प्रशंसा हो निडर संग्राम में, भेंदती शब्दों के बाण से अंग्रेजों का सीना थी। किससे है कैसे लड़ना मूल मंत्र को जान गई थी। अंग्रेजों की नियत को पल भर में पहचान गई थी।। आड़े आई अंग्रेज़ी भाषा जिसे समझ न पाते लोग अंग्रेजी जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। नारी को नारी की शक्ति पीड़ित को देती हौसला। मार्ग प्रशस्त करने का फिर लिया इन्होंने फैसला।। शब्दों के लेखन में फिर धार इन्होंने तेज की। कलम को हथियार बना जन-जन तक संदेश दी। अंग्रेजों को अंग्रेजी भाषा से ललकार उठी शब्दों के तीखे बाणों से हरने भू का भार उठी। सावित्रीबाई नाम नहींं, सच में ही सावित्री थी। कर्म अपना इतिहास के पन्नों में दर्ज कराई थी।।"     अम्बिका झा ✍️ कांदिवली मुंबई महाराष्ट्र

"कुछ कदम सफलता की ओर"

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पश्चिम सभ्यता के तहत कल नव वर्ष मनाया गया और मुझे बहुत खुशी है कि जिस उद्देश्य से हम लोगों ने सनातन संस्कृति को बचाने का संकल्प लिया है उसमें सफलता के काफी नजदीक पहूंच गए हैं। कल के नव वर्ष में 50%लोग सम्मिलित हूए, बाकी के 50% ने तो खुलकर चैलेंज किया, मैं नहीं मानता तुम्हारे इस नव वर्ष को, यह नव वर्ष मुझे स्वीकार नहीं। इस से यह साबित होता है। गर इसी तरह हम लोग पूरी निष्ठा से अपना-अपना काम करते रहें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत का बच्चा-बच्चा यह कहेगा यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं। इसके लिए हमें अपने बच्चों को यह बताना होगा। जिस तरह अपने दोस्तों का जन्मदिन मानाते है एक उपहार दिया पार्टी लिया और बात खत्म। पर जब अपना जन्मदिन हो पूरे घर को सजाते हैं। परिवार में हर्षोल्लास छा जाता है। ईश्वर की पूजा करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हम हर जन्मदिन अपनों के साथ ही मनाएं। महीनों पहले से हम तैयारी करते हैं और महीनों तक याद रखते हैं।  तो अपने बच्चों को समझाइए जितना अंतर अपने जन्मदिन और अपने दोस्तों के जन्मदिन पर है उतना ही अंतर हमारे नव वर्ष और इस नव वर्ष में है।  जरूरी तो नहीं हर दोस्त के...