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मुरली

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मुरली मधुर तुम बहुत बजाते  मुरली की धुन पर रोज नचाते रोज रोज नए नए प्रपंच रचाते मोहे भरमाते,काहे मोहे रिझाते  तुम हो कान्हा मै बावरी सुध-बुध बिसराकर तुम में ही रम जाती हूं शाम ढले जब घर जाती उल्हाने माईं के खाती हूं फिर रैन ढले तेरी मोहक मुरली की धुन सुनते ही लोक लाज बिसराकर फिर  नंगे कदमों दौड़ी आती हूं देख कन्हैया मत उलझानवै मुरली तेरी बहुत खिजानवै जब जब मैं बावरी  तोसों मिलने आती हूं तेरी मनमोहक मुरली पर मै बलिहारी जाती हूं।। शीतल शैलेन्द्र "देवयानी"  इन्दौर

नटखट

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बिना बात रूठ जाते हैं  कितना कुछ जग से करवाते हैं पल में तौला पर में माशा कितनी शैतानी कर जाते हैं सबके प्यारे जग में सब से न्यारे चाचा नेहरू के राजदुलारे बच्चे नटखट ही होते अच्छे जिज्ञासु और देश हित सहारे अभिलाषाएं इनकी बहुत है शौर्य बहुलता का यह गृह है मार्ग दर्शन हो इनका गर सच्चा यह तो चलता फिरता प्रकाश पुष्प कुंज  है ।। शीतल शैलेन्द्र सिंह राघव "देवयानी"  इन्दौर

परिवार

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संस्कार का आधार परिवार हिम्मत और साहस परिवार बैठ जिनके साथ बांट लेते  दुख दर्द वह होता परिवार जब हो जाते चेतना शुन्य तब शक्ति बनता है परिवार जटिल समय के व्यवधानों में हिम्मत बन उभरता परिवार जब तक साथ है परिवार खुशहाली दिलों का है आधार मूलमंत्र सिखलाता जीवन जीने का जब अपनों पर हो जाता कोई  आघात ना हारो हिम्मत,  खड़े हो जाओ परिस्थितियों का सामना  डट कर कर जाओ परिवार यही सिखलाता है कम सुविधाओ में भी रहकर खुशियां अपार पाता है यही तो परिवार कहलाता है।। ************************** शीतल शैलेन्द्र सिंह राघव "देवयानी" इन्दौर

गांधी और अहिंसा

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बहुत हो चुकी अब हिंसा मार काट भी बहुत हुई मन व्यथित सा होने लगा जब मैने देखी रक्त नदी लूट पाट और हिंसा की अब तो सीमा पार हुई जब अपनों को कटते देखा अपनों के हाथों मरते देखा तब नफरत रक्त रूपी  संघार से मुझे हुई मार्ग कुछ नहीं रह गया  शेष जग मे जब तब सत्य और अहिंसा की  लौ प्रकाशित संपूर्ण जगत में हुई मार्ग अहिंसा पथ का  दिखलाया जो मवेशी मानसिकता थी मानव की मानव के प्रति उन्हें अहिंसा का अवलोकन करवाया।। शीतल शैलेन्द्र सिंह राघव "देवयानि" इन्दौर

पितर पक्ष

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पितर पक्षों में ये कैसी मनु आशा और अभिलाषा नहीं समझ रहे आज भूखे बुजर्गो के  मन की भाषा तड़पता मन भूख से व्याकुल तन सम्मान का मानसिक खनन तर्पण विधी में हजारों पैसै लगा दिए जीवित थे तब दुत्कार कर वृद्धाश्रम के रास्ते दिखा दिए जीवित थे तब श्रृद्धा नहीं तब रहकर भी संग अपनों की बेरुखी ने इन्हें लाचार बना दिए दूर,घर में ही कर अपनों की भीड़ में भी बेगाने से बना दिए क्या जाकर इस लोक से वो आशीर्वाद  तुम्हे दे पाएंगे करनी जो की तुमने मात- पिता, बुजुर्गों के साथ सभी कुछ क्या  यहीं छोड़ जाएगें देखो तो भाई आज के जमाने के इन खोखले,बनावटी  रिश्तों का आडम्बर आज के ये मायूस बुजुर्ग कल देव पितर ही तो बन जायेगें बीती बात क्या दिल से भुला पाएंगे या रिक्त आंखों से ही अलविदा जंग को कह जायेंगें चाह कर भी आशीर्वाद के लिए वो कभी हांथ उठा नहीं  पाएंगें देखो तुम्हारी आज की ये  आडम्बरी स्वार्थी और कुपोषित मानसिकता देकर कष्ट पूर्व में क्या ऐसे ही कल पितर देव पूजे जाएंगे।। नाम  :  शीतल शैलेन्द्र सिंह राघव "देवयानि"

" सार्थक उद्देश्य "

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--------------------- " हरीश बाबू कुसुम जी के जाने के बाद बिल्कुल तन्हा से हो गए थे। " अभी कुसुम जी की आयु ही क्या थी? मात्र 40 बरस। परंतु एक सडक  दुर्घटना नेें उनकी जान ले ली ।  "कोई आस औलाद भी नहीं थी। धन-संपत्ति अताह, परंतु सदुपयोग अथवा उपभोग करने वाला कोई नहीं। " "जीवन जीने का कोई सार्थक उद्देश्य तो कोई था नहीं। इसलिऐ हरीश बाबू अपने गम को भूलाए, दिन रात काम में मन लगाऐ रहते थे।"परंन्तु एक सवाल था कि, किसके लिऐ..!! "इतना बडा कुसुम सदन और घर में वो उनके नौकर रामदीन और सुशीला काकी, बस तीन जन ही रहा करते थे।" "बरसात की रात थी , घनघोर काली तभी अचानक से हरीश बाबू की नींद खुल गई। उन्हें लगा जैसे दरवाजे पर कोई बालक रो रहा है।" पहले अनदेखा किया । परन्तु फिर लगातार रोने की आवाजें आने लगी। "हरीश बाबू ने आकर दरवाजा खोल कर देखा तो एक छोटा बालक जिसकी आयु 7-8माह रही होगी। दरवाजे पर रो रहा था।"  उन्होने चारों तरफ देखा!!! आवाज लगाई!! किसका बच्चा है??कौन है?? परंतु कोई वहां होता तो, मिलता ना। बच्चे को गोद में लेकर हरीश बाबू अंदर आ ग...

तू कहां नहीं है

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तू,कहां नहीं है, मेरे यार बता,  क्यों ढूंढूं,  तुझे मैं बाहर,  मेरे यार,  एक बार बता,  ऐसा कोई कोना नहीं,  कोई दरख़्त, कोई दीवार नहीं, जिसमें तू,  मेरे यार नहीं,  तू तो हर जगह,  हासिल है,  जहां तू नहीं,  मेरे यार वहां,  मेरी कोई दरकार नहीं,  तू तो मुझ में है,  तू हार में जीत में,  रुदन में संगीत में,  गीत में प्रीत में,  असफलता में सफल जीवन में,  तुझे ढूंढना,  नामुमकिन नहीं,  मेरे लिए, तू मेरी,  नस नस में,  मेरे श्रृंगार में,  जीवन की हर आती जाती, बाहर में,  तू बिछड़ना भी है, तू मिलना भी,  तू दोस्त भी,  तो दुश्मन भी,  भूख में भी तू,  प्यास में भी तू मेरे दिल की,  हर आती-जाती,  सांस में भी तू, और कहां कहां है तू, मेरी जमी मेरी आत्मा में तू,  दिल में उठे,  दर्द की इंतहा में भी तू,  पागलपन की हद है तू,  मेरी सांसो की कश्ती,  मेरी जिंदगी के सफर में तू, तू नहीं तो,  मैं कुछ भी नहीं,  कुछ भी नहीं, मेरी ...