ऊंचाइयों पर पहुँचकर कुछ ह्रदयों का यह हस्र है, न सहते ही बने न कहते ही बने साथी उनका सब्र है, ऊपर चमचमाता ताजमहल अंदर,ख्वाहिशों की कब्र है, कदमों में पड़ी कर्म की साँकरे, मन का परिंदा भर रहा उड़ान है। एक पल में सब भुला दो , शायद व्यस्तता में बहुत आसान है, तन्हां जब भी होंगे मन को बरबस खींच लेगा, मन का जो वियावान है। उर के अन्तर शोर कितना, सब कहाँ समझेंगे, कुछ समझ लेंगे , बस इतना ही सोचेंगे है बात कोई बन्दा थोड़ा परेशान है। किसको पड़ी है किसी को सुने, मुस्कुराते होंठ अंदर से अनमने, देखकर जादूगरी ऊपर वाला भी हैरान है। शराफत ,मोहब्बत, अपनाइयत से था बनाया, दूर दूर तक न कोई फरेब , ईर्ष्या,स्वार्थ था सिखाया, जात पात में बटकर बना बैठेअलग जहांन है। आदमी भी क्या करे ,जो संग जमाने के न चले, कौन पूछेगा उसे जो अपनी ही धुन में चले, लोग कसते फब्तियां क्या अजब इंसान है। जब कभी अकेलेपन में होते खुद से रु व रु, हो जाटी जाग्रत इंसानियत की रूह, सबसे मिलकर सब सा हो गया,शोहरतों के शहर में सबकी यही पहचान है। देखकर दुनिया की रियाइस आदमी पागल हुआ, होड़ में बे तरकीब नुमाइशी जंगल हुआ, ...