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अनदेखा मीत भाग 6

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हंसी की छोटी सी किरन आ गईं अंधेरे में मुस्कान भी पलट कर मिलने चली आई उदासी ने छुट्टी की दरख्वास्त दे दी तब खुशी ने दिल में नई जगह बना ली अब  ऋद्धि सम्राट से बात करके पहली बार इतना हंसी,इतनी खुश हुई, अपने बचपन को याद किया, मम्मी पापा की ढेर सारी बातें की, कॉलेज की बातें की, अपनी शरारतें बताई, सम्राट की शरारतें सुनी। ऋद्धि आज पहले वाली ऋद्धि बन गई थी उसे कुछ पल के लिए ही अपने जख्म भूल गए थे , वो खुश हो गई थी बहुत खुश। रिनी ऋद्धि के कमरे में आई ऋद्धि को इतना खुश देखकर वो ऋद्धि से मुस्कुराते हुए बोली "क्या बात है भाभी,आज आप बहुत खुश हो,कोई गुड न्यूज है क्या ? एक बात कहें भाभी आज तो आपका चेहरा बिल्कुल गुलाब की तरह खिल उठा है, आप बिलकुल नई नवेली भाभी की तरह लग रही हो, आपके चेहरे पर वही ग्लो है जो इस घर में पहली बार कदम रखते समय था, थैंक गॉड, मेरी पुरानी भाभी मिल गई वरना वो तो जाने कब खो गई थी। भाभी प्रोमिस करिए अब आप हमेशा ऐसे ही हंसती मुस्कुराती हुई रहेंगी। " इतना कहकर रिनी ने ऋद्धि को प्यार से गले लगा लिया। ऋद्धि को रिनी पर बहुत प्यार आया, बिन मां की बच्ची उसे जितना प्यार...

अनदेखा मीत भाग 5

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उलझनों के धागे में पिरोकर धीरे धीरे बढ़ रही थी जिंदगी थे कितने अनसुलझे सवाल  जिनका जवाब वो नहीं जानती  ऋद्धि अंजान नंबर के उस गुड मॉर्निंग मैसेज से परेशान थी उसने अपनी फ्रेंड नित्या से बात की तो उसने ऋद्धि से कहा कि एक बार रिप्लाई दे दो आखिर पता चलना चाहिए कि वो है कौन? ऋद्धि को भी नित्या की बात सही लगी वैसे भी उसने कभी भी गुड मॉर्निंग मैसेज के अलावा और कोई मैसेज नहीं भी भेजा था ना कभी कोई हेलो हाय की थी। अगले दिन जब उस नंबर से फिर मैसेज आया तो ऋद्धि ने बहुत सोच समझ कर रिप्लाई कर दिया गुड मॉर्निंग, सेम टू यू  थैंक यू यार , रिप्लाई क्यों नहीं किया अभी तक , उधर से रिप्लाई आया। हू आर यू? ऋद्धि ने टाइप किया। डोंट यू नो ? उधर से रिप्लाई आया नो,आई डोंट नो, ऋद्धि ने कहा। कुछ देर को शांति छा गई । थोड़ी देर बाद रिप्लाई आया आई एम सम्राट , एंड यू?  आई एम ऋद्धि , ऋद्धि ने अपना इंट्रो दिया। सम्राट  - नाइस नेम, ऋद्धि - मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूं सम्राट जी। सम्राट  - जी पूछिए  ऋद्धि - आप मुझे पिछले एक हफ्ते से गुड मॉर्निंग मैसेज भेज रहे हैं, जबकि मैं आपको ज...

अनदेखा मीत भाग 4

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कितना दर्द छिपा है तेरी मुस्कुराहट के पीछे कितने जख्म हैं तेरे नाज़ुक हृदय के अंदर  इतना धैर्य है तेरी शख्सियत में क्यों  स्त्री तू सहनशीलता की पर्यायवाची है क्या? रिनी ऋद्धि की डायरी पढ़ती है तो उसके आंसू नहीं रुकते , वो सोचने लगती है कि सचमुच कितना सहन किया मेरी भाभी ने , और कभी मुझे थोड़ा सा भी अपने दर्द का अहसास नहीं होने दिया। चुपचाप अकेले ही सब कुछ सहती रही, और अपने होंठो पर झूठी मुस्कुराहट की लिपिस्टिक लगाए रखी। अपने बालों के जूडे के अंदर अपने सिर दर्द को छिपाए रखा, भैया के दिए हुए जख्मों को अपने कॉलर वाले ब्लाउज के अंदर पीठ पर छिपा के रखा , गालों पर पड़े तमाचों के निशान को गहरे मेकअप से छिपाया आंखों की उदासी को काजल से छिपाया, सब कुछ छिपाती ही तो चली आई हैं वो , मैं भी कितनी नासमझ थी कभी उन्हें ठीक से समझ ही नहीं पाई । रिनी रो रही थी और ऋद्धि भाभी की डायरी पढ़ रही थी भाभी कविता लिखती थी और उन्हीं कविताओं में अपने जीवन का दर्द उड़ेल देती थी। उनकी एक कविता सब कुछ बयां कर रही थी क्यों तुम मेरे होकर भी मेरे नहीं हो तुम क्यों तुम करीबी होकर भी अजनबी हो तुम क्यों...

धारावाहिक - अनदेखा मीत भाग 3

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क्यों पुती हुई है तेरे चेहरे पर अंजाने डर की नीली स्याही क्यों खौफ खाती है इतना क्यों हंसने की है तुझे मनाही ऋद्धि का चेहरा अच्युत को देखकर डर से पीला पड़ जाता है उसकी धारदार चाकू से भी भेदती निगाहें शरीर के अंदर तक घुसती हुई सी महसूस होने लगी थी ऐसा लग रहा था मानो उसकी धड़कनें बंद हो जाएगी। अच्युत  धीरे धीरे आगे बढ़ता है ऋद्धि और डर जाती है उसे लगता है कि अच्युत का कहर उस पर गिरने ही वाला है  लेकिन शायद अभी वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे ऋद्धि जानती है कि अच्युत रिनी से बहुत प्यार करते हैं वो रिनी के सामने ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे रिनी अच्युत को गलत समझे क्योंकि रिनी ऋद्धि से बहुत प्यार करती है । अच्युत  मुस्कराते हुए ऋद्धि से कहता है  "ऋद्धि जी, मुझे भूख लगी है क्या आप कृपा करके मुझे खाना देंगी? या फिर केवल बिस्तर पर आराम फरमाएंगी आप? ऑफिस से थका हुआ आया हूं थोड़ी सी तो कदर करिए अपने पति की।" ऋद्धि अच्युत की बात सुनकर तुरंत ही बिस्तर से उतरी और जल्दी से कमरे से बाहर की भागी, ऐसा लगा मानो कैद से छूटी हो । रिनी हैरानी से अपनी भाभी को देखती रह गई।  "भैया, भाभ...

धारावाहिक - अनदेखा मीत भाग 2

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बारिश तू मेरी दोस्त है ना फिर क्यों नहीं पास आती है तू आकर फिर से गले लगा ले मुझे दूर से ही क्यों मुस्कुराती है तू ऋद्धि अपने अतीत में खोई रहती है तभी उसकी ननद रिनी उसे वर्तमान में वापस ले आती है और बताती है कि भैया आ गए हैं और बहुत ही गुस्से में लग रहे हैं। ऋद्धि इतना सुनकर ही डर के मारे पीली पड़ जाती है और थर थर कांपने लगती है। "रिनी , मेरी एक बात मानोगी?" ऋद्धि ने रिनी की तरफ ऐसी नजरों से देखा कि रिनी को अपनी भाभी की हालत पर रोना आ गया। उसे अपनी भाभी ऋद्धि से बहुत लगाव था मां के जाने के बाद वही तो थी जिसने उसे मां का प्यार दिया था, खुद ऋद्धि की उम्र भी रिनी से 4,5 साल ही ज्यादा थी लेकिन ऋद्धि हमेशा उसे अपनी बेटी की तरह ही प्यार करती थी और रिनी की हर जरूरत का ख्याल रखती थी , रिनी चाहती थी कि उसकी भाभी हमेशा खुश रहे, पर पता नहीं क्यों उसकी भाभी की आंखें हमेशा लाल रहती थी रिनी कुछ पूछती तो ऋद्धि बहाना बनाकर टाल देती। वो नहीं चाहती थी कि रिनी परेशान हो। रिनी अपनी भाभी की ऐसी हालत देखकर बहुत दुखी रहती थी लेकिन वो कुछ कर नहीं सकती थी आखिर वो घर में सबसे छोटी थी उसके लिए ...

अनदेखा मीत

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आज फिर वैसी ही तेज बारिश हो रही थी, ऋद्धि  अपने कमरे की खिड़की से बारिश में भीगते हुए लॉन में लगे हुए बेला, गुलाब,मोगरा,  हरसिंगार के झूमते फूलों  को निहार रही थी, कैसे उन्मुक्त होकर झूम रहे थे जैसे बारिश का खुश होकर स्वागत कर रहे हो,। उसका भी मन कर रहा था कि वो बारिश में भीगे, आंखें बंद करके अपने दोनों हाथ फैलाकर बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस करे ,पूरे लॉन में गोल गोल घूमे , अपने दुपट्टे में फूलों को भर ले और उसका जेवर बनाकर पहन ले। कितनी पागल थी वो? कुछ भी सोचती है, जैसे वो सब पूरा हो जाएगा?  शायद कुछ सालों पहले अगर वो ये सब मांगती तो पूरा भी हो जाता पर आज तो ऐसा सोचना भी गुनाह है उसके लिए । ऋद्धि बारिश को देखकर हमेशा दीवानी हो जाती थी , बारिश उसकी कमजोरी थी और बारिश में भीगते हुए आइसक्रीम खाना उसकी आदत । लोग हंसते थे उसे देखकर । "बारिश के मौसम में आइसक्रीम? आर यू मैड ? ऋद्धि तुम क्या हो,लोग गर्मियो में आइसक्रीम खाते हैं और तुम्हें बारिश में आइसक्रीम चाहिए वो भी भीगते हुए । उसकी फ्रेंड विशी उसको डांटते हुए बोली। "बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद?"तू ठह...

शिक्षा: व्यवसाय या कर्तव्य

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शिक्षा व्यवसाय या कर्तव्य??? कौन निश्चित करेगा यह ? अभिभावकों के ऊपर बढ़ता मंहगी फीस का  दुगुना बोझ  या इस शत्रु  कोरोना की मार से  वेतन को तरसते लाचार  शिक्षक  शिक्षा माफिया का बढ़ता शिकंजा या शिक्षकों में अनिश्चितता का डर बड़ी बड़ी इमारतों में खरीदी गई शिक्षा या बच्चों के साथ पूर्ण समर्पित शिक्षक  कहीं होता ऑनलाइन शिक्षा का खेल तो कहीं खून चूसते मैनेजमेंट  रूपी जोंक  कहीं निःशुल्क विद्या दान देते गुरु कहीं खेल खेल में सिखाया गया ज्ञान कहीं बच्चों पर लादा गया बस्ते का भार कहीं शिक्षा के नाम पर किया गया शोषण तो कहीं शिक्षा को ही समर्पित पूरा जीवन वास्तव में शिक्षा ना तो पूर्णतः व्यवसाय है और ना ही सभी के लिए सच्चा कर्तव्य यह तो निर्भर करता है हम शिक्षकों पर कि उसे  क्या रूप दे सबके सामने व्यवसाय या कर्तव्य??? संगीता शर्मा

मेरा माटी का घर

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नदी के किनारे बने एक छोटे से गांव में बूढ़े बरगद और घने पीपल की छांव में कच्ची सड़क के पास बनी हुई बस्ती में अपनेपन की सौंधी महक की धरती में   बना हुआ था मेरा माटी का घर ...... मोटी मोटी दीवारों से घिरा हुआ आंगन  गेरुई लाल मिट्टी से वो लिपा पुता आंगन  सारे रिश्तों को समेटे वो भरा हुआ आंगन हंसी ठहाकों, मस्तियों से सजा हुआ आंगन कितना प्यारा था मेरा माटी का घर...... कहीं दीनू काका थे , कहीं बड़की माई  पूरे गांव में फैले हुए थे सबके बहन भाई  ना कोई चीज अपनी थी ना कोई थी पराई  गांव भर में बांटी जाती थी प्यार की मिठाई  बहुत याद आता है मेरा माटी का घर..... वो सरसों के फूलों से सजाई  गई चोटी  वो घी और चीनी लगाकर खाई गई रोटी  वो खेलने में झगड़ा , और चुराई गई गोटी वो शाम को तुलसी चौरे में जलाई गई जोती  कितनी यादें समेटे है मेरा माटी का घर..... वो मेरा पुराना माटी का घर.... जो इमारत में बदल गया संगीता शर्मा

वो शहीद ही होते हैं

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वो अमर हो जाते हैं हमारे दिलों में रहते हैं लाख कष्ट जो सहते हैं वो शहीद ही होते हैं वतन के वास्ते समर्पित होता है तन मन धन खुद को मिटा देते हैं जो, वो शहीद ही होते हैं छोड़ कर अपना घर परिवार सरहद पे रहते हैं खुद को वज्र बना लेते हैं वो शहीद ही होते हैं लड़ते हैं दुश्मनों से , सबकी  हिफाज़त के लिए अपनी परवाह नहीं करते हैं वो शहीद ही होते हैं छुपकर सभी से रो लेती हैं शहीदों की बीवियां   पर आंसू भी न पोंछ पाते हैं ,वो शहीद ही होते हैं  बनकर कठोर चल देते हैं  वो  फर्ज़ की राह पर सबको पीछे छोड़ देते हैं वो शहीद ही होते हैं जय हिन्द जय भारत

शहीदों का भारत

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शहीदों का एक दिवस नहीं संपूर्ण संसार  शहीदों का है  अपनी मातृभूमि की रक्षा में  पूरा  बलिदान शहीदों का है हम एक दिवस क्यो मनाए जब प्राण उन्हीं की बदौलत हैं आज़ाद वतन में सांस ले रहे यह उपहार उन्हीं के दम पर है कितनों की सूनी मांग हुई तब हम सबका सिन्दूर है बना हुआ  कितनों की लाठी टूट गई तब  यह भविष्य हमारा सुदृढ़ हुआ  मत खुद पर इतराओ कभी तुम कि हमने की कभी कुर्बानी  हैं गर आज सुकून की नींद सो रहे तो उन शहीदों की मेहरबानी है ख़ुद की जान की परवाह न की जय हिन्द का नारा लगाते रहे जब तक एक भी बूंद बची रही वो अपना लहू वतन पे बहाते रहे शत शत नमन तुम्हें अमर शहीदों  जो हमें आज़ाद हिंदुस्तान दिया तुम्हारे चरणों की धूल से हम सबने अपने माथे पर गर्व से तिलक किया जय हिन्द जय भारत शहीदों को शत शत नमन

वसुधैव कुटुंबकम्

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सर्वधर्म सम्मेलनं एकैव रज्जु योजकं बन्धुत्व भावना अहे वसुधैव कुटुंबकम् भारतस्य एकता जनाः च अखंडता  मनसे मित्र भावना विच्छिन्न द्वेष दुर्भावना  त्वं हि धर्मरक्षकः त्वं हि देशरक्षकः त्वं हि वीरसैनिकः राष्ट्रस्य गर्व वर्धकः  भिन्न पर्व उत्सवः भिन्न जाति धर्म च भिन्न वेशभूषा अपि परंतु अखंडता सदा  जय हिन्द जय भारत संगीता शर्मा 

मत पूछिए

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हंसते चेहरे के पीछे कितना छिपा है दर्द मत पूछिए आंखों से बहते अश्कों में झांकते हुए फर्ज़ मत पूछिए मेहनत से बने उस  घर की तारीफ़ करते रहिएं हुजूर पर उसके पीछे लिए गए इतने  कर्ज़ को  मत पूछिए शरीर में लगी चोट कितनी हैं ज़रा देख लीजिए गौर से दिल को खोखला कर रहे लाइलाज मर्ज को मत पूछिए गाइए गुनगुनाइए शौक़ से , किसी भी गीत  को आप  पर किसने बनाया उसके बेहतरीन तर्ज़ को मत पूछिए  संगीता शर्मा

हां... दीवारें भी सुनती हैं

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हां ... दीवारें भी सुनती है छुप छुप कर दूसरों की बातें कब? जब खड़ी हो जाती है  दो लोगों के बीच  नफ़रत और वैमनस्य की दीवार स्नेह बदल जाता है द्वेष भावना में तब उनके हिस्से की दीवारें बन जाती हैं एक दूसरे की हर बात की  मुखबिर   चुपके चुपके कान लगाए सुनती हुई अच्छाइयों को भूलकर बुराइयां तलाशती अपने दिलों में कटुता के बीज बोती ये निर्जीव दीवारें बन जाती हैं सजीव मूर्ति सीमेंट बालू के मिश्रण से तैयार  पत्थर बनी हुई खिंची हुई  ये दीवार संगीता शर्मा

अंत नहीं आरंभ

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मत कहो कि अब मुलाकात आखिरी है अभी तो इस सफर की शुरुआत बाकी है कुछ कांटों से घबरा कर राह क्यों छोड़ें अभी तो  सफलता की  सौगात बाकी है यूं ही  हार मानकर बैठजाना नहीं अच्छा  अभी तो मुश्किलों से दो दो हाथ बाकी है आंसू बहाकर खुद को कमजोर मत करो अभी तो तुम्हारे  दोस्तों का साथ बाकी है आएंगी बहुत बाधाएं रोकेंगे लोग रास्ते पर अभी तो मजबूत इरादे, जज़्बात बाकी है टूटेंगे बिखरेंगे , गिरकर  फिर से खड़े होंगे  अभी तो हमारे  हौसलों की आवाज़ बाकी है  संगीता शर्मा

सैन्य शक्ति

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महबूब वतन तुझ पर हर शख्स की  जान कुर्बान  है  सेना है तेरी शक्ति और हम सब का वो अभिमान है कितनी भी मुश्किलें मिले कितनी भी बाधाएं बढ़ें  कितने भी दुश्मन आ जुटे करती सबका काम तमाम है  सेना है तेरी शक्ति...... एक सिंह जैसी गरज रही हर शत्रु पर वो  बरस रही  बिजली सी वो तड़प रही  वीरों की वो एक खान है सेना है तेरी शक्ति..... परिवार से कितनी दूर वो मिलने को है मजबूर वो पर फिर भी कोई गम नहीं जिन्दगी वतन के नाम है सेना है तेरी शक्ति..... भारतीय सेना दिवस पर   सभी सैनिकों को संगीता शर्मा का नमन... जय हिन्द जय भारत वंदेमातरम

कुहासे की रात

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कुहासे की रात में छिपे हैं कई रहस्य ना जाने कितने गुनाहों का गवाह है ये कभी छुपा लेती है वो  लुटती अस्मत ये घनघोर  कुहासे भरी मनहूस रात  कभी दुर्घटनाओं को न्योता भेज देती है कुहासे से लिपटी सफेद ठंडी चादर ओढ़े  खूनी सड़को पर अपने  संदेश भेजकर  ना जाने कितने बेजुबान रौंद दिए जाते हैं कुहासे में छिपे तेज  वाहनों के पहियों से  कहीं कहीं सोए हुए मिलते हैं गर्म भट्ठियों में थके हुए ठिठुरते हुए मासूम बेसहारा बच्चे  दिन भर काम करने के बाद ढूंढते हैं जो  कोई ठिकाना खुद को सर्द रात से बचाने का ये कुहासे भरी ठंडी रात छिपाए हुए है अनेकों रहस्य इस भागती हुई जिन्दगी के ये कुहासे भरी ठंडी रात...... संगीता शर्मा "प्रिया"

स्त्री शिक्षा की नींव: सावित्री बाई फुले"

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मुख्य भूमिका  - खंडोंजी नैवेशी पटेल - सावित्री बाई फुले के पिता लक्ष्मी बाई  -  सावित्री बाई फुले की माता सावित्री बाई फुले - स्वयं ज्योतिराव गोविंद राव फुले - सावित्री बाई फुले के पति एवम् महान समाज सुधारक फातिमा शेख़ , उस्मान शेख़ - सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले  के शुभचिंतक, मित्र कुछ अन्य भूमिकाएं। प्रथम दृश्य (नन्हीं सी बच्ची सावित्री अपने घर के आंगन में मिट्टी से आड़ी तिरछी रेखाएं खींचती हुई अपनी मां लक्ष्मी से कहती है)                                                                   सावित्री - आई , सारे लड़के पाठशाला जाते हैं । अपना बस्ता और पट्टी लेकर । तू मुझे क्यों नहीं जाने देती।  लक्ष्मी विवशता से अपने पति खंडोजी की तरफ देखती है (खंडों जी अपनी लाडली बेटी को  अपने पास बुलाकर गोद में बिठा लेते हैं और उससे प्यार से पुचकारते हुए कहते हैं )   - तू तो अपनी मीठी मीठी...

अपना सा अजनबी

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वो दूर चला गया उससे सारे रिश्ते नाते तोड़कर एक प्यारे से  पवित्र बंधन की  गांठ खोलकर  एक झटके में ही बिखर गया आशियाना उसका जो सजाया था उसने उसकी यादें जोड़ जोड़कर  ना अपना था वो, ना अजनबी ही था उसके लिए बस हमदर्द बन गया था , दो मीठे बोल बोलकर  ना उसने कभी बांधा था ना उसने कभी छोड़ा था मजबूरियों ने बदल दिया वो रास्ता एक मोड़ पर एक दोस्त से भी बढ़कर जीने की वजह थी जो वो चल दिया उसे आज यूं तन्हा तन्हा छोड़कर  मालूम है कि आएगा एक दिन फिर से उसके पास दोस्ती का  कर्ज़ चुकाना है अब तराजू से तोलकर जरूरी नहीं कि दोस्ती में पास रहना ही शर्त हो  एक दूसरे के दुख दर्द दिल में  महसूस हों अगर  संगीता शर्मा" प्रिया"

धरा का आर्तनाद

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निज स्वार्थ हेतु यह मानव  पी रहा लहू चुल्लू भर भर । यह धरा विवश हो बिलख रही  यह अत्याचार देख देख कर।। उस समय एक दुःशासन था अब हर मानव दुः शासन है। द्रौपदी के वस्त्र हरण की तरह पृथ्वी का छिनता आंचल है।।  हरित वसन को छीन के तुम क्यों वस्त्र विहीन करते हो ?  काट काट कर वृक्ष ये उसके  क्यों चिथड़े चिथड़े कर देते हो? जैसे एक ममतारूपी मां निज शिशु को दूध पिलाती है। वैसे ही अपने  अंतर से वो हम सबकी प्यास बुझाती है।। यह ह्रदय विदीर्ण किया उसने हम सबको जीवन दान दिया । फिर क्यों क्षुदित दैत्य की भांति उसको तुमने वीरान किया ?  हरी हरी साड़ी पहनाओ फिर से और फूलों से उसका श्रृंगार करो। मत उसको वस्त्र विहीन करो कृष्णा बन उसका उद्धार करो।। संगीता शर्मा "प्रिया"

एक टुकड़ा धूप का भाग २५

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गतांक से आगे मानवेंद्र ने पूरे इलाके में माधव की तलाश की लेकिन वो इतना शातिर दिमाग का था कि वो भागने की बजाय पास के घने जंगल में जाकर छुप गया और संयोगिता को बांध कर एक कोने में फेंक दिया।वो गाड़ी उसने एक खंडहर में छुपा दी। मानवेंद्र के आदमियों और पुलिस ने उन्हें आसपास ढूंढने की बजाय सीधे उसके गांव जाने का निश्चय किया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि माधव संयोगिता को लेकर सीधे अपने गांव ही गया होगा। लेकिन वहां जाकर उन्हें निराशा ही हाथ लगी।और जब वो लोग अपने इलाके में उसे तलाशने लगे तब तक माधव संयोगिता को लेकर रात के घटाघोप अंधेरे में ही उस जगह से बहुत दूर जा रहा था । लेकिन शायद दुर्भाग्य उन दोनों के ऊपर मंडरा रहा था।एक घने जंगल को पार करते ही एक गोली सीधे माधव के सीने में आकर लगी और वो वहीं ढेर हो गया। संयोगिता डर के मारे बेहोश हो गई । जब उसे होश आया तो वह एक अनजान जगह अंजान कमरे में अंजान लोगों के बीच एक मखमली बिस्तर पर लेटी हुई थी। वो चौंक कर उठकर बैठ गई। उसने अपने चारों तरफ देखा ना तो उसे माधव सिंह दिखाई दिया और ना ही मानवेंद्र।वो कहां थी?  कौन थे ये लोग ? उसे कुछ भी पता नहीं...