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"चुनौतियां"

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जीवन किसी का भी चुनौतियों से अछूता नहीं हर सपना हो जाए  साकार हर किसी का  जीवन में हमेशा ऐसा होता नहीं।। अद्भुत होती हैं ये  जीवन की परीक्षाएं भी कोई पाठ्यक्रम भी  इनका होता नहीं।। कठिन परिश्रम और लगन का गर साथ हो तो कौन सी परीक्षा है जो उत्तीर्ण होगी नहीं।। चखले गर ये जिंदगी हार का भी स्वाद तो हार  ही तो है कोई  पत्थर की लकीर नहीं जो खिच गई अगर तो  पार फिर होगी नहीं।। जीवन में न जाने मोड़ कितने ऐसे आयेंगे खुद ब खुद ही जब कदम डगमगायेंगे।। जीवन की कहानी ये बिन चुनौतियों के पूरी कभी होती नहीं गर हो भी जाए पूरी तो वो कोई कहानी नहीं।। हकीकत की कहानी में  सिर्फ जीत ही होती नहीं जो हारी न हो कभी वो कोई जिंदगी नहीं बिन चुनौतियों के जो हो जाए पूरी ऐसी होती कोई कहानी नहीं।। कविता गौतम...✍️

"कोशिश"

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कौन है जो हतोत्साहित नहीं हुआ कौन है जो कभी निराश नहीं हुआ । मगर एक अलग पहचान बनाई है उसी ने जो संघर्ष के दौर में भी विचलित नहीं हुआ । आते हैं कई पड़ाव जीवन में ऐसे  जो धैर्य की लेते हैं परीक्षा । जरूरी है उस वक्त खुद पर विश्वास करना कौन है जो प्रत्येक परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ । बिना हार के किसने है जीत का स्वाद चखा हारने के बाद ही तो जीत का असली मतलब पता चला । कौन है जो कोशिशों के बाद भी कामयाब नहीं हुआ ।। कविता गौतम...✍️

"किस्से जीवन के हिस्से"

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जो बीत जाते हैं लम्हें वो किस्से बन जाते हैं  ये किस्से ही तो  जीवन के हिस्से बन जाते हैं  कुछ को सोच कर ये मन हर्षित हो जाता है तो कुछ को सोच कर ये मन द्रवित हो जाता है कुछ किस्से होठों पर  मुस्कान ले आते हैं तो कुछ किस्से इन आंखों को नम कर जाते हैं आते हैं जब याद नए, पुराने से एहसास ये एहसास ही तो  किस्सों की दास्तां सुनाते हैं जो बीत जाते हैं लम्हें  वो किस्से बन जाते हैं ये किस्से ही तो जीवन के हिस्से बन जाते हैं ।। कविता गौतम...✍️

"संगीत"

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आओ कुछ गीतों के तराने गुनगुनाते हैं... समय की ताल से  लय जीवन की मिलाते हैं... जिंदगी के साज पर चलो लम्हों को सजाते हैं... चलो मिलकर जीवन को संगीतमय बनाते हैं... कुछ सपने और आशाओं को उन लम्हों में सजाते हैं... कुछ एहसासों को चलो फिर से दोहराते हैं... बैठ कर दो पल  कुछ गीत गुनगुनाते हैं... चलो मिलकर जीवन को  संगीतमय बनाते हैं... कुछ भूली बिसरी यादों को फिर से महकाते हैं... आने वाले कल को और भी  खूबसूरत बनाते हैं... कल का क्या पता आज ही चलो मिलकर मुस्कुराते हैं... ये अनमोल पल जिंदगी में  फिर लौट कर कब आते हैं... चलो मिलकर जीवन को संगीतमय बनाते हैं... मुश्किल हो, संघर्ष हो या हों खुशियों के पल... चलो मिलकर साथ में इन पलों को जी जाते हैं... जिंदगी के सफर में एक दूजे का  साथ हम निभाते हैं... संगीत के सुरों को  चलो जीवन में सजाते हैं... चलो मिलकर जीवन को  संगीतमय बनाते हैं... कविता गौतम...✍️

"पूरब से पश्चिम"

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लेकर स्वर्ण सी चमक  अनंत रश्मियों के साथ पूरब से देखो सुबह आ रही है... समेंटे हुए अनंत  आशाओं को स्वयं में पश्चिम में सांझ सी  ढलती जा रही है... ये अंत तो नहीं है  अनंत आशाओं का परिवर्तन है शायद समय के चक्र का... तभी तो ढलने को एक नई सुबह में एक सांझ उम्मीदों की फिर से स्वप्नों की नींद में सोने जा रही है... अनंत से स्वप्नों को हकीकत बनाने सांझ नई भोर में  परिवर्तित हो रही है... ये सुबह का इस तरह  सांझ में ढलना नई सी उमंगों का व्याकुल सा होना कहीं पूरब से पश्चिम का  मिलन तो नहीं है... लेकर स्वर्ण सी चमक अनंत रश्मियों के साथ पूरब से देखो सुबह आ रही है... समेंटें हुए अनंत  आशाओं को स्वयं में पश्चिम में सांझ सी ढलती जा रही है... कविता गौतम...✍️

"तेरा साथ"

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एक अजनबी इंसान से रिश्ता ऐसा बन जाता है होकर भी वो अजनबी अपना नसीब बन जाता है नसीबों से मिलता है ऐसा  एक साथी कोई अपना सा मिल जाए तो जीवन रौशन नही तो लगे फिर सपना सा कितनी खुशियां कितने ही गम हां साथ में मिल के बांटे हम अगले जन्मों का पता नहीं इस जन्म साथ मैं जीले हम हो जाये कोई भूल अगर तो प्यार से मुझे बता देना जीवन मरण का पता नही बस इतना साथ निभा देना तेरे बिन भी क्या जीना है नहीं मुझको कभी जानना है तेरा साथ रहे मेरे हमदम बस दुआ में यही मांगना है मैं क्यों सोचूं कि तेरे बिन जीना भी पड़ जाए मुझको मैं क्यों सोचूं कि मेरे बिन  जीना भी पड़ जाए तुमको मैं क्यों सोचूं ऐसा ख्याल जिसमे तुम मेरे साथ न हो मैं क्यों नहीं ऐसा सोचूं तुम हर पल मेरे साथ रहो कविता गौतम...✍️

"स्वर्ण चिड़िया"

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स्वर्ण सी चमक उत्साह में खनक उमंगों के पंख उड़ने को आतुर विश्वास का था वेग समुद्र सा संवेग सूर्य की चमकती किरणों का था तेज तभी थी पड़ी किसी की नजर स्वर्ण सी चमक को  फीकी कर गई किसी की मंशा उत्साह की खनक को  किया था हतोत्साहित  उमंगों के पंखों को काटने को आतुर वो लोग सच में थे कितने शातिर हक जमा किसी के सपनों पर अपना विश्वास को किसी के बेड़ियों से जकड़ा जो देश था मेरा कभी स्वर्ण चिड़िया उस देश को मेरे पिंजरे में में कैद किया मगर वीरों ने लड़कर सपना साकार किया ना की प्राणों की चिंता बलिदान पूरा दिया छोड़ कर हर मोह को संसार से उन्होंने देश की खातिर अपना हर सपना कुर्बान किया कविता गौतम...✍️

"तुम्हारा शहर"

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अंजाना होकर भी जाना पहचाना सा लगा... क्यूं तुम्हारा शहर अपना सा लगा... कभी तुम से ना कोई राबता ही रहा... फिर क्यूं तुम्हारे शहर से  वास्ता सा रहा... कविता गौतम...✍️ कविता गौतम...✍️

"धूल के फूल"

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धूल में लेते हैं जन्म धूल में हीं मिट जाते हैं धूल के ही तो फूल हैं वे पहचांन कहां कोई पाते हैं खुले आसमां के नीचे धरती पर ही सो जाते हैं सिर पर छत का सपना लिए दुनियां से विदा हो जाते हैं धूल के ही तो फूल हैं वे पहचांन कहां कोई पाते हैं कविता गौतम...✍️

"दीवारों के कान"

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क्या ये सच है कि होते हैं दीवारों के भी कान क्या सुनते हैं इंसानों की  बातें भी मकान क्या समझती हैं इंसानों की भाषा दीवारें भी या सिर्फ यूं ही किसी भ्रम में है इंसान आजमाया नहीं कभी भी नहीं पूछा कभी दीवारों से क्या महसूस करती हैं वो भी इंसानों के भाव जब बांट दी जाती हैं नफरत से दीवारें पूछा नहीं कभी दीवारों से क्या दुखता है कभी उनका भी मन जब सुनता है कोई बातें दीवारों के उस ओर से क्या होती हैं वो दीवारें हीं या होता है कोई इंसान सुनता है बातों को जब कोई इंसान बेवजह बदनाम हैं दीवारों के कान कविता गौतम...✍️

"सूर्यास्त"

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हो जाए गर सूर्यास्त अगर छा जाए अंधेरा चहुं ओर अगर मन हो जाए विचिलित ये अगर तो भी अपना धैर्य न खोना तुम... सूर्योदय की नई किरणों के संग जीवन में नए रंग भरना तुम एक नई सुबह के साथ एक नयापन लाना तुम अपना धैर्य न खोना तुम... कब रुकता है कोई समय कभी चाहे अच्छा हो या बुरा सभी ये याद हमेशा रखना तुम अपना धैर्य न खोना तुम... बदलाव ही जीवन जीने का एक नया विकल्प होता है सूर्यास्त के बाद हमेशा ही सूर्योदय भी होता है... प्रत्येक बदलाव से जीवन में मिलती है एक नई सीख किससे क्या तुम सीखोगे ये तुम पर निर्भर करता है... परिस्थियां चाहे जो भी हों हर एक को अपनाना तुम कभी विचलित न होना तुम अपना धैर्य न खोना तुम... कविता गौतम...✍️

"वो आखिरी खत"

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वो आखिरी खत जो लिखा था कभी वक्त की दहलीज पर क्या मिला कभी या खो गया वक्त के साथ ही कहीं वो आखिरी खत क्या मिला कहीं... वो आखिरी खत जो लिखा था बारिश की बूंदों ने इस जमीं पर क्या  देखा कभी या खो गया कहीं... वो आखिरी खत जो लिखा था फिजाओं ने हर जगह क्या रूबरू हुआ कभी या गुम हो गया कहीं... वो आखिरी खत जो लिखा था खामोश सी नजरों ने क्या पढ़ा कभी या इबादत बन गया कोई... वो आखिरी खत जिसमें शब्द नहीं बस भाव ही थे जिसमें बातें नहीं बस एहसास ही थे क्या महसूस हुआ कभी या खो गया कहीं... वो आखिरी खत जिसमें न लिख कर भी  कितना कुछ लिखा था कभी है आज भी वहीं जहां था कभी... वो आखिरी खत क्या मिला कभी या गुम हो गया कहीं वो आखिरी खत क्या मिला कभी... कविता गौतम...✍️

"कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें"

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कुछ खट्टी कुछ मीठी यादों का संगम है ये जीवन... कभी मिलन तो कभी दूरियों का आगमन है ये जीवन... कभी मुश्किल सा तो कभी आसां सा लगता है ये जीवन... कभी हार जीत के भंवर के जैसा है ये जीवन... कितना कुछ इससे सीख लिया फिर भी तो अधूरा है ये जीवन... कभी पूर्णता का कभी अपूर्णता का एहसास है ये जीवन... कभी हर्ष कभी उल्लास का त्योहार सा है ये जीवन... कभी आशा कभी निराशा का उपहार है ये जीवन... कभी उम्मीद कभी नाउम्मीद का इंतजार है जीवन... कुछ खट्टी कुछ मीठी यादों का संगम  है ये जीवन... कविता गौतम...✍️

"एक लेखक का सपना"

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एक लेखक का सपना है अपनी कलम से गर मैं दुनियां को बदल पाऊं तो मैं एक लेखक कहलाऊं... ह्रदयतल से निकले भावों से लोगों के ह्रदय तक पहुंच पाऊं तो मैं एक लेखक कहलाऊं... अपनी निर्मल भावनाओं को शब्दों में गर ढाल पाऊं तो मैं एक लेखक कहलाऊं... नकारात्मकता को गर मैं सकारात्मकता में बदल पाऊं तो मैं एक लेखक कहलाऊं... दुनियां की बेरंगी सोच को सच्चाई की किरणों के रंगों में बदल पाऊं तो मैं एक लेखक कहलाऊं... कविता गौतम...✍️

"अन्नदाता"

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धरती से सोना उगाता है अन्नदाता वो कहलाता है गर्मी, सर्दी, बारिश में भी न अपनी परवाह करता है यूं हीं तो नहीं वो अन्नदाता कहलाता है... दुनियां का पेट पालने को ईश्वर से वरदान वो लाता है फिर भी लोगों की  नज़रों में न कोई सम्मान वो पाता है... भूख मिटाने वाला सबकी क्यों बेचारा कहलाता है बेचारा ही लेता है जन्म  बेचारा ही मर जाता है... क्यों उसकी मजबूरी को कोई समझ न पाता है क्यों उसकी मेहनत का मोल नहीं उसको कभी मिल पाता है क्यों लड़ते लड़ते हालातों से  दुनियां से विदा हो जाता है... धरती से सोना उगाता है अन्नदाता वो कहलाता है अन्नदाता कहलाने की वो कीमत बड़ी चुकाता है यूं हीं तो नहीं वो अन्नदाता कहलाता है... कविता गौतम...✍️

"आराधना तुम हो मेरी"

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आराधना तुम हो मेरी हां साधना भी तुम ही हो... दिया और बाती भी तुम प्रकाश भी तो तुम ही हो... हां इस संपूर्ण श्रृष्टि का आधार भी तो तुम ही हो... प्रत्येक क्षण में हो विद्यमान तुम प्रत्येक काल में भी तुम ही हो... आराधना तुम हो मेरी हां साधना भी तुम ही हो... इस धरा पर भी तुम ही हो और शून्य में भी तुम ही हो... प्रत्येक रंग में भी तुम ही हो प्रत्येक रूप में भी तुम ही हो... प्रत्येक कर्म फल के प्रभु दाता भी तो तुम ही हो... आराधना तुम हो मेरी हां साधना भी तुम ही हो... मेरे अनंत विचारों की विचारशीलता भी तुम ही हो... लेखन का मेरे आधार तुम परिकल्पना भी तुम ही हो... भाव हो मेरे ह्रदय का तुम मेरी कविता भी तो तुम ही हो... आराधना तुम हो मेरी हां साधना भी तुम ही तो... अश्रु हो मेरी आंखों का तुम मुस्कान भी तो तुम ही हो... जो खो दिया वो तुम ही हो जो पा लिया वो तुम ही हो... विश्वास हो तुम ही मेरा उम्मीद भी तो तुम्ही हो... इस श्रृष्टि का आरंभ तुम  और अंत भी तो तुम ही हो... आराधना तुम हो मेरी हां साधना भी तुम ही हो... कविता गौतम...✍️

'ये धरती ये आसमां'

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रात और दिन क्या मिलते हैं कभी ये चांद और सूरज क्या मिलते हैं कभी ये धरती और ये आसमां क्या मिलते हैं कभी...? जब प्रकृति खुद दे रही संदेश है कि सिर्फ मिलना ही न कोई उद्देश्य है उद्देश्य तो वो है जो बदल सके सोच को जो बदल सके समाज को...? गर न मिलकर ही कोई पा सकता है इतनी उच्चता तो मिलना कब जरूरी है तो मिलना क्यों जरूरी है...? सच है कि न मिलने से ही पवित्रता का  एक खूबसूरत एहसास होता है मगर सिर्फ दूरी ही नहीं  पावन एहसास भी जरूरी होता है कोई मिले न मिले मगर एक उद्देश्य तो पूरा होता है...? जो धरती से आसमां के रिश्ते की पावनता को बयां करता  है इसीलिए शायद न मिलना भी जरूरी होता है जरूरी होता है...।। कविता गौतम...✍️

मुक्ति कहां'

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' विचार ही जब शुद्ध नहीं  तो आत्म की मुक्ति कहां.....? ह्रदय जब पावन ही नहीं तो परमात्मा की प्राप्ति कहां.....? जीवन ही बन जाए उलझन तो जीने का उल्लास कहां.....? दिखावे के इस दौर में भक्ति का सही अर्थ कहां.....? तर्क और वितर्क में  ईश्वर में आस्था कहां.....? कलयुग के इस दौर में अनमोल विचारों का मोल कहां......? अच्छे संस्कारों के अभाव में कुसंगती से अलगाव कहां.....? लालच से जब घिरे हों हम तो जीवन मरण से मुक्ति कहां.....? कविता गौतम...✍️

ये आंखे'

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' मन का दर्पण होती हैं ये आंखे खुशी और गम दोनों में  छलकती हैं ये आंखे..... मन के भावों को खामोशी से बयां कर करती हैं ये आंखे आयना मन का होती हैं ये आंखे..... बिन कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती हैं ये आंखे दुनियां के हर रंग रूप से  वाकिफ कराती हैं ये आंखे..... मन तक हर बात को सहजता से पहुंचाती हैं ये आंखे अच्छे और बुरे के भेद को  बताती हैं ये आंखे..... बहुत कुछ सोचने पर मजबूर  कर जाती हैं ये आंखे भावों को शब्दों में बदलने का  हुनर भी रखती हैं ये आंखे..... जागते हुए भी ख्वाब दिखाती हैं ये आंखे जिंदगी को खूबसूरत बनाती है ये आंखे.... कुदरत का अनमोल तोहफा होती हैं ये आंखे अंधेरों को रौशनी से भरती हैं ये आंखे रात में इक दिया जैसे होती हैं ये आंखे.... लेकिन ये सच है कि हम इनसे  क्या देखना चाहते हैं जिंदगी को खूबसूरत या जहन्नुम बनाते हैं.... सही और गलत के भेद को  क्या स्पष्ट कर पाते हैं या गिरकर पर्दा इन आंखों पर अनभिज्ञ बन जाते हैं..... कविता गौतम...✍️

'कुछ अहसास'

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जिंदगी तुम जब भी मेरे घर आना तो कुछ अहसास लेती आना मेहनत, प्रेम, दया, करुणा और विनम्रता का भाव उनमें लाना  जिंदगी तुम जब भी मेरे घर आना तो कुछ अहसास लेती आना.... कमी ना पड़ जाए कभी इनकी इसलिए थोड़े और लेती आना जिंदगी तुम जब भी मेरे घर आना ना हो उदास नहीं करूंगी तुम्हें निराश रखूंगी इन्हें संभाल कर सदा अपने पास जिंदगी तुम जब भी मेरे घर आना तो कुछ अहसास लेती आना..... ले आना थोड़ी सी मुस्कुराहटें भी कर देना थोड़ी सी और कर्तव्य और निष्ठा की बरसात कुछ करने के जज्बात भी साथ लाना जिंदगी तुम जब भी मेरे घर आना तो कुछ अहसास लेती आना..... बड़ों का स्नेह और आशीर्वाद भी साथ में लाना जिनके बिना होगा ना पूरा कोई कार्य ईश्वर की कृपा को देखो भूल मत जाना जिंदगी तुम जब भी मेरे घर आना तो कुछ अहसास लेती आना..... द्वेष, अभिमान, पाखंड, बेईमानी इनको छोड़कर कर आना विश्वास,और मानवता को साथ में लाना जिंदगी तुम जब भी मेरे घर आना तो कुछ एहसास लेती आना जिंदगी तुम जब भी मेरे घर आना...... कविता गौतम...✍️