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ये स्मृतियां

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ये स्मृतियां सुःखद"ये स्मृतियां " ये स्मृतियां सुःखद या दुःखद! जमीं होती परत दर परत! मन की भित्तियों पर । जैसे सेल्फ पर लगी किताबें ,, खङी रहती हैं अथक!       ✍️"पाम"   इन्हें हिलाना डुलाना होता है,, पङी धूल हटानी होती है। तब ये सज जाती हैं बिल्कुल नई सी,, और आंखों को सुकून दे जाती हैं।  मन की दिवारों की धूलें इतनी आसानी से नहीं जातीं।  पङी रहती हैं किसी कोने में  हमारे व्यक्तित्व को खोखला करते,, दीमक की तरह अन्दर ही अन्दर सबकुछ रूग्ण करते,, जब तलक सब गिर नहीं जाता... भरभराकर,,अचानक!! पर अचानक तो कुछ नहीं होता! दिखता जरूर है। कितना कुछ ढोता है मन... मान,,अपमान,,प्रतिष्ठा,,सम्मान।  सिर्फ नेह के बन्धन नहीं दिखते,, आज अभी जो हमारी मुट्ठी में है नहीं दिखता..        ✍️"पाम " हम देखते रहते बीता कल.. अपने ह्रदय की मिट्टी पर .. राख से कुछ उगाने का प्रयत्न करते! या भविष्य के त्रिशंकु की तरह  कुछ तो अधर में लटकाते रहते! मन के दरवाजे पर चिटकनी लगा कर  कुछ भी सुनना नहीं चाहते! बंद कर पङे रहते  रौशनी अवरूद्ध कर! पर अंधकार में...

अंग तस्कर बन गया डॉक्टर-इंसान

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आज कितना बदल गया इंसान। पैसे के खातिर देखो है परेशान।      बेच रहाहै मानव अंगों को इंसान।      डर नहीं लगता देख रहा भगवान। मानव अंगों की तस्करी है करता। ऑपरेशन में अंग निकाला करता।     बेहोशी में मरीजों से खोट करता।     जान बचाने को खेला वह करता। डॉक्टर तो धरती के हैं भगवान। जाने क्यों फिर बनता है शैतान।    कितने करते स्वयं ही हैं अंग दान।    ब्रेन डेड बॉडी  का होता अंग दान। यहाँ तो धोखे से ले लेते हैं जान। पैसे के खातिर बेच रहे हैं ईमान।    मानव अंगों की तस्करी का रैकेट।    कुछ निकृष्ट मिल चलाएं ये रैकेट। हृदय लीवर किडनी का पैकेट। आँख कॉर्निया टिसू का पैकेट।         बना-बना कर बेंच रहे हैं इंसान।         औषधियों में अंग रखते शैतान। मानवता में करते जो अंग दान। जीते जी ही कर वे जाते हैं दान।      अंगों के व्यापार में भारी मुनाफा।      देख-2 तस्करों का हुआ इजाफा। बड़े-2 लोग रुपया भरा लिफाफा। जरूरी अंग खरीदें देके लिफाफा...

तस्करी

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वो ज़माने लद गए, जब मानवता ज़िन्दा थी। अब जीते जी इंसान, किसी काम का नहीं।। बैठें हैं कई आदमख़ोर, तस्करी की कश्ती में। बेच खाते है अंगों को, अमीरी की बस्ती में।। इनको फ़र्क़ नही जीने, या जीते जी मारने वाले से। ये बस दाम लगते है, महँगे खरीदने वाले से।। अस्पतालों के आड़ में, ये व्यापार चलते हैं। किसी की किडनी, लिवर, तो किसी का दिल बेच खाते है।। हज़ारो की कीमत को, ये करोड़ो तक ले जाते हैं। गरीब को हो ज़रूरत, तो खाली हाथ दिखाते हैं।। फ़रेब और चोरो की दुनिया के, ये बादशाह कहलाते है। ऑपरेशन की आड़ में, ये ऑर्गन फेल बताते हैं।। हेरा फ़ेरी अंगों की करते, पैसा खूब कमाते है। बड़े बड़े हस्तियों से मिलकर, ये तस्करी की दुनिया चलाते है।। ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

अंगों का व्यापार

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मानवता की हद सारी यह पार करने लगा  अरे अब तो यह अंगों का व्यापार करने लगा   विद्या बुद्धि बल को शर्मसार करने लगा   मानवहोके मानव का संहार करने लगा   धरती का भगवान मानकर पूजा जिसे है जाता   जीवन उसके हाथ सौंपते  जिससे ना कोई नाता   वह भी जान बचाने में है पूरी जान लगाता   खुशियां देता है सबको तो दुगनी खुशियां पाता   फिर भी कुछ मक्कारों को यह जीवन नहीं है भाता   पैसों का लालच उनसे यह गलत काम करवाता   अंग तस्करों से मिलकर वह दानव फिर बन जाता   अपने कौशल को फिर वह बद नीयति में है लगाता   करते हैं खिलवाड़ जान से जो चंगुल में आता   तब मरीज की जान से उसका रह जाता ना नाता   तस्कर गैंग में शामिल होकर जेबे भारी करने लगा   अरे अब तो यह अंगों का व्यापार करने लगा                      प्रीति मनीष दुबे     .              मण्डला मप्र

ईश्वर कृपा,रुचि,कर्म,भाग्य से सब बनता है

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प्रभु ने मानव योनि में ये तन देकर उसमें भर दी है सांसें। सबकी नपी तुली हुई है गिन कर लिखी गई हैं यह सांसें। उससे ज्यादा नहींहै चलती किसी भी प्राणी की ये सांसे। इंसा तभी ये रोये गाये हँसे हँसाये बोले छींके पादे खाँसे। पुण्य प्रताप ये कुछ मिलता है मात-पिता पूर्वजों का भी। पूर्व जन्म के कर्मो का भी फल मिलता है प्रारब्ध का भी। निज रुचि कर्म धर्म भाग्य से ही जीवन में कुछ बनता है। डॉक्टर इंजीनियर बैरिस्टर वैज्ञानिक सभी कुछ बनता है। आई ए एस,आई पी एस,पीसीएस,पीईएस भी बनता है। आई एफ एस,आई आर एस,आई ई एस,कभी बनता है। विभागी अफसर,सेनाओं में सर्वोच्च अधिकारी बनता है। जल थल वायु सभी सेवाओं में 1 उच्चाधिकारी बनता है। चोर उचक्का कतली डाकू गुंडा मवाली लोफर बनता है। भूमाफिया खनन माफिया  डॉन ब्लैक मार्केटर बनता है। मजदूर मिस्त्री रेहड़ीवाला रिक्शा चालक कोई बनता है। पंचरवाला सब्जी वाला धोबी नाई मोची कोई बनता है। जादूगर मदारी नर्तक गायक कौवाल बाजीगर बनता है। वाद्य यंत्रों के वादक कवि लेखक साहित्यकार बनता है। गीतकार नाटककार उपन्यासकार कहानीकार बनता है। इतिहासकार  दर्शनशास्त्री  शिक्षाशास्त्री कभ...

अंकुर

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जब दिल में प्रेम का अंकुर फूटता है  तो यह जहां कितना मनोरम लगता है  आसमान "जन्नत" जैसा दिखाई देता है "सागर" प्रेम पतवार का खिवैया लगता है  पत्ती पत्ती डाली डाली "कामनाएं" सी लगती हैं  फूल किसी प्रेमिका के नाजुक बदन के से अंग  घने काले बादल नवयौवना के खुले हुए केशराशि  बिजली "अभिसारिका" के हिय में उठती सी तरंग  तब प्रकृति से बेसाख्ता प्यार होने लगता है  मन दुश्मन को भी अपना समझने लगता है  जड़ , जीव सबमें प्रेमी का वास महसूस होता है प्रेम के बिना ये जीवन निसार लगने लगता है  मगर किसी मजहबी तकरीर सुनने के बाद  दिल में नफरतों का लावा खौलने लगता है  अंध घृणा में डूबा कोई "फिदायीन गुलाम"  किसी "कन्हैयालाल" का सिर कलम करता है  इन नफरतों के शोलों को "भड़काऊ भाईजान"  वोटों की खातिर और ज्यादा भड़काते रहते हैं  किसी धर्मस्थल का कोई धार्मिक व्यक्ति उनमें  72 हूरों का ख्वाब दिखा घृणा का अंकुर भरते रहते हैं  नफरतों के अंकुर को विशाल वृक्ष मत बनने दो  जेहादी मानसिकता को शांति भंग मत करने दो  कुचल...

समाज के पिशाच

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आज समाज भरा पड़ा है  जगह जगह पिशाचों से  नही सुरक्षित देश हमारा दरिंदो नर पिशाचों से !! नही कोई बहु बेटी सुरक्षित  आज इस समाज में  गिद्ध बन झपटने को बैठे  पिशाच हैं कबसे ताक में!! मौका पाते लड़की का अस्मत लूट  उसे जीते जी मार देते हैं  फिर खुद खुली हवा में वो निडर हो  बिचरते रहते हैं!! जब देखो लड़की के साथ जबरदस्ती होती है रहती प्रतिदिन एक निर्भया सड़क पर मरती दिखती है रहती लड़की ने अवहेलना की तो तेजाब मुंह पर फेक देते  उसका जीवन बर्बाद कर नेताओं के आड़ में छिप जाते !! ये देश के नेता भी किसी पिशाच से कम नही वो भी देश को लूटने से कभी बाज आते नही! अपने ओहदे का ये भरपूर लाभ उठाते है  नरभक्षी राक्षस ये औरतों बेटियों  को कहां बख्शते हैं!! दहेज लोभी भी सच पूछो तो समाज के पिशाच हैं होते ? दहेज खातिर ये कुछ भी ,करने से कहां चूकते! आए दिन समाज में बहुओं के साथ अत्याचार के किस्से सुनने में आते उनको घुट घुट कर जीने के लिए, ये हैं बाध्य करते !! कई जगह तो पति भी मां बाप के साथ मिला होता  नई नवेली दुल्हन को तिल तिल करके है तड़पाता! शारीरिक म...

मैं कवियत्री हूँ

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मैं कवियत्री हूँ श्रृंगार सजाती हूँ 🌹🌹🌹🌹 सभी रस भाव छंद बंध लिखती हूँ प्रेम के सभी अनुबंध लिखती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ श्रृंगार सजाती हूँ 🌹 मै ही ओज हास्य विभत्स और रस सार लिखती हूँ विश्व व्यापक सर्वोच्च अभिसार लिखती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ अंलकार सजाती हूँ 🌹 मण्डन खण्डन अभिनन्दन में ही रचती हूँ कृष्णा माधव केशव सा चितरंजन रचती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ शिवात्व सजाती हूँ 🌹 दैवित् निमित्त उद्धत  ब्रह्मत्व  बुनती हूँ आकाश निमित्त प्राणो के श्वास बुनती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ संसार  सजाती हूँ 🌹 कोमल समता रमता में ही होती हूँ प्राणो से भी प्रिय प्रिया ममता होती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ मातृत्व सजाती हूँ 🌹 रोली अक्षत दीप मोती ज्योती सी जलती हूँ . बागो की ठण्डी छाव हूँ पलको में सोती  हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ अर्चन सजाती हूँ 🌹 लक्ष्मी दुर्गा काली चन्डी शिव को लिखती हूँ  मन के भीगे अहसासो को सत्य मेव लिखती हूँ हाँ मैं कवियत्री हूँ सौन्दर्य सजाती हूँ 🌹  ईद दीवाली होली कभी  गुरुवाणी सी खिलती हूँ भावो के भीने पोखर में पंकज कभी जलज सी खिलती हूँ हाँ म...

"हे भारत के वीर जवान"

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हे ! भारत के वीर जवान, तुझसे है जिंदा यह हिंदुस्तान पिता तेरा यह खुला आकाश, सरहद की भूमि तेरी मात समान। हे ! भारत के वीर जवान। तेरी रग-रग में बहता लहू दर्प का, ह्रदय तेरा राष्ट्रप्रेम से है भरा, माथे पर चमक रहा सूर्य शौर्य का, भुजाओं में अदम्य साहस है भरा, किन शब्दों से करूं तेरा गुणगान। हे ! भारत के वीर जवान। वंदे मातरम् स्वर के गर्जन से, देश के हर दुश्मन थर्राते, नमन करता उस माटी को माथा, तेरे कदम जहां-जहां तक जाते, तू ही इस मातृभूमि की शान। हे ! भारत के वीर जवान। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

अग्निवीर

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देश की माटी इनका चंदन रक्त प्रवाह इनका नवयौवन रिपु की राह में स्थिर रहते अग्निवीर है यह कहलाते क्या कर लेगा अंधड़ इनका अटल रहे हर झंझावात में देश प्रेम में निशदिन रहते अग्निवीर है यह कहलाते मात पिता का आदर करते भ्रात सखा संग प्रेम भी करते देशप्रेम सर्वोपरि रखते अग्निवीर है ये कहलाते देश भी इनको देता सब कुछ भोजन स्वास्थय सुरक्षित भविष्य आन बान और शान से रहते अग्निवीर है ये कहलाते।                       साधना सिंह                      

समाज के कोढ़ हैं,राक्षस हैं,ये नर पिशाच हैं

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देखो कैसी झेल रहीं हमारी बेटियाँ चारो तरफ है जुल्म। समाज के पिशाचों की बर्बरता औ बुरी नजर का जुल्म। जीवन जीना मुश्किल होगया रस्ता चलना हो गया दूभर। सड़क छाप मजनुओं के मारे जाएं वह कैसे कहाँ किधर। नहीं सुरक्षित जीवन उनका खतरा रहता है आने जाने में। कैसे करें पढ़ाई पूरी अपनी स्कूलों कालेजों में वे जाने पे। मानव भेष में दानवी घृणित सोचों घूरती नजरों से बैचेन। बेटियों को मिलता नहींहै कहीं भी सुख शान्ति और चैन। मानवता की हदें पार कर क्रूरता से इंसानियत हो शर्मिंदा। सभ्य समाज में रहने लायक नहींहैं ऐसे इंसा नहों शर्मिंदा। पहन मुखौटा इंसा के ये राक्षस घूम रहे हैं घर बाहर अंदर। भरी शरारत जेहन में इनके पिशाच बैठाहुआ इनके अंदर। रूप रंग से लगते मानव कृत्य करम दिखते असुरों के जैसे।  मौके की बस तलाश में ही सिरफिरे झपटें नोचें काटें कैसे। मानसिक रूप से बीमार हैं होते यह हैं समाज के पिशाच। दरिन्दगी बहसीपन अमानवीय करम का सरताज पिशाच। निर्भया की पीड़ा भूले भी नहीं लोग मौत की शिकार हुई। हैदराबाद में डॉ. सक्सेना भी दरिन्दों की मौत शिकार हुई। हाथरस में भी घटी घटना है मनीषा पर अत्याचार किया। ऐसे अनजानी कितन...

समाज के पिशाच

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इंसान के भेश में, हैं ये पिशाच। न करते दया किसी पर, न है करते विश्वास।। देखो ज़रा संभल जाओ, कही हो न तुम्हारे आस पास। पहचान नही सकते इनको, ये हो सकते है तुम्हारे खास।। मानवता की कब्र खोदे, ये कातिल कसाई हैं। हो सकते है ये कोई ग्राहक, जिसने प्यास खून से बुझाई है।। ये नही छोड़ते किसी कीमत पर, ये तो अंधे व्यापारी हैं। ये मांस नोचते फिरते है, इन्होंने कसम शैतान की खाई है।। ये बन के रिश्तेदार, पड़ोसी, तुमसे जोल बढ़ाते हैं। फिर नफरत के खंजर लेकर, तुम्हारी बली चढ़ाते हैं।। ये किसी की टांग चीरते, अंगों की करते कटाई हैं। रोज़ी रोटी फूँक डालते, दंगो की करते अगुवाई हैं।। ये झट से गायब हो जाते, न खोज इनकी हो पाई है। आंख मूंदे कानून है बैठा, तो सबकी शामत आई है।। सारेआम ये बंदूक उठाते, पत्थरों की बारिश आई है। नही बख्शते बच्चे बूढे, औरत की इज़्ज़त लुटाई है।। ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

🌵🌻समाज के पिशाच🌻🌵

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🌵🌻🌵🌻🌵🌻🌵🌻🌵🌻🌵🌻🌵🌻🌵🌻🌵🌻🌵🌻🌵 कहने को तो अब वक़्त बदल रहे है दुनियादारी के नाम चलन बदल रहे है फिर भी बदलते नहीं सोच भेडियो की समाज के पिशाच बने सरेआम घूम रहे है लड़कियों की नज़र उठ जाये तो खैर नहीं हर कदम पर लाखो हिदायते मिल रहे है पर उनका क्या जो अपनी गंधी नज़रे लिए चलते राह में भी बहन बेटियों को देख रहे है क्यों लड़की ही बदनामी के खाते में आए किस लिए समाज इन्हे ये दाग़ देते आरहे है क्यों नहीं बंद करते ऊन औलादो को अपने जो आए दिन किसीके ज़िन्दगी बर्बाद कर रहे है लाख मना करने पर भी नहीं सुनते बात कभी दिल के बहाने हर दिन ज़ज़्बातो से खेल रहे है जो मान गयीं लड़की तो तोड़ जाते है इस कदर की अब हर साँस पे मौत की इंतजार कर रहे है दुनिया में हर किसीका परिवार ख़ास होते है हर कोई अपने शख्सियत की मिसाल दे रहे है फिर क्यों नहीं सोचते ऊन परिवारों की तकलीफ जो घुट घुट कर पल पल ज़िन्दगी की काट रहे है अपनी बच्ची को खरोच भी लगे तो गँवारा नहीं पर दूसरे की बेटियों को जिन्दा जलाये जा रहे है शगुन के नाम पर चाहिए इन्हे करोड़ो की दौलत क्यों बेटियों के स्वगुणो को नज़रअंदाज़ कर रहे है दुनिया के कुछ खोखली स...

अग्निवीर को समर्पित

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प्रजंडता के शिखर पर, हिम नदी बहा रहा ... धधक रही लौ मशाल वो जला रहा ...। नायक ,अग्निवीर का ऋतुराज आव्हान कर रहा .. बासंतिक, सौंदर्य का वसन पीत हरा- भरा..! पंछियों का कलरव दिशा को चहका रहा .. जाति -धर्म से परे बिगुल गुंजन कर रहा..। देश की माटी का श्रृंगार चंदन नित सजा रहा .. प्रात: ,तेज़ से तन कुंदन -कुंदन निखर रहा ..! प्रज्वलित ,लगन का गीत -गीत गा रहा .. नौनिहाल ,ध्वजा को शौर्य से लहरा रहा..! घट ले ,नभ से आस की बौछार भिगा रहा.. सर्वोपरि ,देश हित शीर्ष पर रख रहा ..! ये, अग्निवीर का चक्र अग्निपथ पर चल रहा.. लाखों ,युवकों का कौशल बिंदु चमक रहा ..! पाताल,धरा,जल ,अग्नि ,वायु अस्त्र का जल जला .. देश की रक्षा करने का प्रण बना रहा ..! अम्बर, पर गण सुदूर टिमटिमा रहा ... कर्मयोग, के चक्षुओं से धर्म निभा रहा ..! काल आया जो बैरी ज्वाला बुझा रहा.. भयभीत बैठ वो अब थर- थर कांप रहा ..! सौगंध मातृभूमि की प्राणों से निभा रहा.. सुप्त भाग्य की विडंबना को जगा रहा ..! (✍️स्वरचित काव्य) दिनांक: ३०/६/२०२२ समय : ३ (शाम) शहर : लखनऊ  सुनंदा असवाल

"हे! देश के अग्निवीरों"

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कहां जा रहे हो, हे देश के अग्निवीरों, तनिक ठहरो! और झांकों अपने अंतर्मन में, तुम्हीं हो शक्ति पुंज, इस राष्ट्र के निर्माण के, फिर क्यों भटक रहे हो, पतित गलियों में। यह देश देख रहा है अब तुम्हारी तरफ, तुम ही बनोगे आजाद, शेखर और भगत, जागो, आगे बढ़ो, बनो देश का संबल, फिर क्यों सो रहे हो, अब तक चिरनिद्रा में। देश के निर्माता हो, विनाश तेरा कार्य नहीं, मातृभूमि का गौरव बनो, राह भूला राही नहीं, राम, कृष्ण, बुद्ध की भूमि के हे वीर सपूतों, फिर क्यों भूल रहे हो खुद को पहचानने में। तुम चाहो तो मोड़ दो धारा नदी का, लड़ो आलस दंभ से विवेकानंद हो इस सदी का, हां, तुम कर सकते हो भारत का नवनिर्माण, फिर क्यों उलझ रहे हो, व्यर्थ की बातों में। उखाड़ फेंको उस चौसर को,  जो भविष्य दांव पर लगाती है, रुख मोड़ दो उस हवा का, जो साथ बहा ले जाती है, सही दिशा दो उर्जा को, कि फैले चहूं ओर सुरभि, फिर क्यूं जला रहे हो खुद को, अंगार लिये हाथों में। स्वरचित रचना रंजना लता समस्तीपुर, बिहार

अग्निपथ

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सरकार ने राष्ट्र हित हेतु एक नयी मुहिम चलाई युवा देशसेवा में आये सोच  एक अग्निपथ योजना लाई। बेरोजगारों को भी कुछ रोज़गार मिल जाये तत्पर युवा देश के लिए  अग्निवीर बन आगे आये। आज का युवा वर्ग कहाँ समझें कब अपनी भलाई दिग्भ्रमित हो कर बस पहचाने हिंसा औऱ लड़ाई। आक्रोश के स्वर बुलंद कर घूम रहा सड़कों पर  पथ से भटका मंजिल अपनी ढूढ़े रस्तों पर। शिक्षित होकर भी यह देश का हित न जाने उपद्रव और आगजनी को जन आंदोलन माने। अन्याय का विरोध करने यह किसी भी हद तक जाये बेकसूरों को क्यों यह बेमतलब नुकसान पहुचाये। भारतीय लोकतंत्र में न्याय की जब भी मांग करे सत्य औऱ अहिंसा के मार्ग पर ही अडिग रहे। ऐसे उत्पात से सोचो अहित सभी का होगा बिगड़ेगे हालात औऱ जनता को भरना होगा। अग्नि जो तुम्हारे अंतस में प्रज्जवलित हो रही वीर योद्धा होने की गर अनुभूति भी हो रही। अग्निपथ की राहों पर साहसी बन डट जाओ अग्निवीर बन देश को समर्पित देह प्राण कर जाओ। हे! शूरवीर माँ भारती के मस्तक को अपने कर्मों से न झुकाओ सच्चे योद्धा राष्ट्र निर्माण में भारतीय होने का फर्ज़ निभाओ। स्वरचित एवं मौलिक शैली भागवत "आस" इंदौर (म. प...

'वीर सैनिक'

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मातृ भूमि का सपूत, शत्रु का वो कालदूत, लिए प्राण हार सूत, वायु पे सवार है। स्वर में ऐसी तान है, विजय गीत गान है, दूर तक उड़ान है, वार को तैयार है तन में भारी जोश है, रण का जय घोष है,        रिपु के लिए रोष है,चेतना अगार है। रुधिर में उबाल है, तेज तुरंग चाल है, वक्ष बहु विशाल है, शत्रु जार जार है। धार हृदय धीर है, कांधे पर तुणीर है,  सपूत माँ का वीर है, उगता विचार है। चमचमाता भाल है,सीमा पर वो ढाल है, अरि के लिए जाल है,दृष्टि आरपार है। तिरंगा आन बान है, प्रेम रस वितान है, काम हर महान है, देश की कटार है। देश प्रेम की लगन, वीर तुझे है नमन, वैरि का करे दहन, तेरी जय कार है। कवयित्री- गोदाम्बरी नेगी (हरिद्वार उत्तराखंड)

बारिश की बूंदे

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नभ में काली- काली बदरा छा जाती है प्रेम का राग छेड़कर मधुर गीत सुनाती हैं। बारिश की बूंदे,,,,,,,,,,,, अठखेलियाँ करके जिया ललचाती है छन,,,, से गिरकर तपती वसुधा को ठंडक पहुंचाती है। बारिश की बूँदे,,,,,,,,,, प्रकृति को हरीतिमा कर सुंदरम बना जाती है बारिश की टपकती बूंदों का स्पर्श पाकर पेड़ -पौधे लहलहा उठते है बारिश की बूंदे बरसकर,,,,,,  प्रेयसी को प्रीतम की याद दिलाती है। बारिश की बूँदे,,,,,,,,,,,  की संगीतमय तान सुनकर  कोयल मल्हारती हुए मीठे गीत गाती है मयूरी की पांँव थिरकने लग जाते है। बारिश की बूंदे,,,,,,,,,,, ऊमस भरी गर्मी से राहत दिलाती है। बारिश के बूंदे,,,,,,,,,,,,,, धरती पर बरसाकर नदीयाँ उफान खाकर बलखाती, इठलाती हैं। बारिश की बूँदे ,,,,,,,,,,,,,,,,, को पाकर बच्चे बूढे सब मग्न हो जाते गढो में पानी भरने पर बच्चे  छईछपाछई करते हुए कागज की नाव चलाते है। बारिश की बूँदे,,,,,,,,,,,,,,, सतरंगी धनुष बनाकर नभ पर अपनी छटा बिखरते है। शिल्पा मोदी ✍️✍️

" मन चितेरी बारिश की बूँदें "

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ये बारिश की बूँदें, बरखा का पानी,जाको कोउ नहीं है सानी। मोरा मन चितवत चहुँओर, कहाँ गयो चितचोर। बरसा बरस रही चहुँओर। घन गरजत हरषत मोरा जियरा, नाचत बन में मोर। पिहु-पिहु जो रटत पपीहा,देखत घन की ओर,  हँसत-हँसावत श्याम हमारे, श्यामल परम मनोहर मनहर, प्रीतम नंद किशोर। दादुर की टर्र टें सुनि-सुनि,  कोकिल मधुर तान से कूके, पंख पसार मयूर जो नाचे, रुनझुन मयूरी दौरी आवे, किशन कन्हैया, राधे प्यारे  लेते मन चित चोर। बिजरी चमकत हे गिरधारी,  बीती पल-पल रैना सारी। तू मन मोहन आराध्य जो मेरा,  मैं तेरी गणगौर। गौरांगिनी राधिका प्यारी,  सुखी संत महिमा लखि भारी। सुषमा भजन करै, होकर प्रेम विभोर। आई हैं बारिश की बूँदें,  पावस ऋतु को शोर, निकल गई तपिश, अंग से,  मिली जो शीतल कोर।      रचयिता- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक भाव, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

🌹🌧️बारिश की बुँदे🌧️🌹

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🌹🌧️🌹🌧️🌹🌧️🌹🌧️🌹🌧️🌹🌧️🌹🌧️🌹🌧️🌹🌧️🌹🌧️🌹 कब से छुपा रखे थे हम राज़ जो दिल में हर भेद खोल रहा ये बरसती बारिश की बुँदे धुन कयी छेड़ गया ये बारिश की रिमझिम साँसो में नशा घोल रहा हैं यूँ बरस बरस के हवाओ के साथ उड़ता आया बहकता मदहोशी में सिमटे ये घने बादल कहीं से छागया दिल के आसमान पे इस कदर की  बस में नहीं रहा हमारी धड़कन दिल के क्यों इतना बेकरार हैं ये हवा क्या जाने एक अहसास लिए गुज़रा अभी यही से अजब हाल होजाता हैं इस दिल का भी जब छूकर गुज़रता हैं दिल को मदहोसी से जाने क्यों इतना छेड़खानी करने लगे हमसे  खन खन करती कंगन व ये बलखाती झुमके कलतक तो नहीं थे हम ऐसे दीवानी उनके आजकल धड़कन भी थमती हैं मुश्किल से कल भी हमें बेकरार करता था इश्क़ उनकी हर रोज़ गुज़रते हैं वो हमारे दिल के गली से फिर भी कभी कहते नहीं वो हाले दिल अपनी जिसका इंतजार हैं हमें इश्क़ में बड़े बेसब्री से ए बांवरा बादल ज़रा थम के पिघला कर डरने लगा हैं दिल तेरे इस तरह दिल्लगी से  लाख कोशिश कर तू हमें पिघला ना पायेगा अच्छी तरह वाकिफ हैं हम तेरे इस दीवानगी से इस तरह गुस्ताखी ना किया कर ए हवा तू भी कहाँ तक उड़ा ...