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मारो राजस्थान

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रंग रंगीलो एडो मारो राजस्थान केर सांगरी ओर मतीरा ज्वार बाजरा मक्का तीरा राबड़ी का प्याला वीरा ढोलक चंग बजे मजीरा एडो मारो राज,,,,,,, केसरिया साफा में वीरा चुड़लो खनके चमके हीरा एकतारा रा बोल है झींना बोले मोर पपीहा धीरा एडो मारो राज,,,,,,,  मायड़ एडा पूत है पावे बिना शीश के ही लड़ जावे वीरगति है जो पा जावे जग में कमधज नाम कमावे एडो मारो,,,,,,,,, राणा ओर पन्ना री धरती खुना रा नाला सु बहती इन् री गाथा हल्दी कहती रेता री तो नदिया बहती एडो मारो,,,,,,, झीलों ओर महलों की जाई अठे पूजे कालिका माई हिंडोले गणगोर झुलाई पीवे देखो रबड़ी मलाई एडोमरो,,,,,   तुर्रा कलँगी रा खेल अठे  पद्मिनी र जौहरअठे चंदन र जेड़ा पूत अठे मीरा री देखो भक्ति अठे संध्या पंवार राजस्थान

छू लो आसमान

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नन्हीं कलियों पढ़ो ,आगे बढ़ो जिंदगी में सबसे आगे चलो। तम मिटा फैला उजियारा नया सूरज नजर है आया । शिक्षा की इस नई किरण से जीवन को तुम रोशन करलो। करो प्रयास मिले आकाश करे न कोई तुम्हारा उपहास। हर तकनीक को तुमअपनाओ आसमान में तुम छा जाओ। लगता सफर सुहाना सबको सबको साथ निभाना होगा। आसमान की ऊंचाइयों को  तुम भी आज जीवन मे भरलो नभ को देखो सूरज चमके आज सभी का मुखड़ा दमके जीना सीखो  करो तुम नाम छू लो देश मे तुम आसमान संध्या पंवार निम्बाहेड़ा राजस्थान

💐परतंत्र आवाम💐

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स्वतंत्र देश की आबोहवा हुई है देखो आज जवां। कही आग है कहीं पे पानी डालती उसको कही रवानी। आंखे नम है जुबां बंद है संस्कार ओर मर्यादा कम है। डोलता फिरता हर नोजवा बर्बादी का चला कारवाँ। कलम की ताकत बनी हुई थी देश की जनता की वाणी। बिक गए सारे चूने पत्थर तेल चुन अनाज यहाँ। रोशन होती गलियों में बिक गई नन्ही कली जहाँ। गूंगे बहरों की दुनियां में चीख ना सुनता कोई यहाँ। आंखे खुली है जुबां बंद है कलम पर लगी है बेड़ी यहाँ। अपनो की ही बात बताना ओरो की हथकड़ी यहाँ। सच को लिखना भूल गए कलमकार अब देखो यहाँ। दुनियां को दिखलाना जो है पैसा मिलेगा उन्हें यहाँ। स्वतंत्र देश की काली स्याही  हो गई नीलाम यहाँ। आग लगे उन जुनूनकारो को लिखते जो परवाने यहाँ। देश प्रेम की चिता में जलना बचा है कोई पतंगा यहाँ। चुन चुन कर है माला बनाई बंदिशों की हथकड़ी लगाई। Tv न्यूज सब है सजाई सच्चाई जो कह नही पाई। कहे कहानी कलम की देखो चित्राव ली आज यहाँ  संध्या पंवार  निम्बाहेड़ा राजस्थान 

💐जौहर दिवस पर नमन

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नम है आँखे उन सतियों पर, गर्व जिनसे मेवाड़ पर। जॉ न्यौछावर करदी जिनने, मातृभोम के नाम पर। खुद ही ज्वाला बन बैठी, देश के सम्मान पर। याद दिलाती आज धरा, उनके बलिदान पर। नमन करे और दे श्रद्धांजलि, वीरांगनाओ के स्थान पर । संध्या पंवार  मेवाड़  जय चित्तौड़ जय एकलिंग

घर

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जिसमें मानव रहता है मानवता को साथ लिए।,,,,, माता पिता का साया हो , बसती जिसमे  काया हो। जोसुख दुःख में  हंसता हो, एक दूजे में बसता हो। अपनो को जो लेसाथ चले, गम सभी के बांट ले।जिसमे,,,,,,, रोज रोज के  झगड़े टंटे, जहाँ न होते प्रेम से। मा बहन बेटी और नारी , रहती है सब चेन से। जिसमे,,,,,,  बच्चों की किलकारी गूंजे, दादी नानी को हम पूजे। करते सदा सम्मान सभी का, रखते दिल से ध्यान सभी का जिसमे,,,, घर अपना अपना ही होता, रहने से ही काम नही होता। जुड़ता है जो स्नेह प्रेम से, दिलो में वास जहाँ होता जिसमें,,,, संध्या पंवार

भारत की संस्कृति

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जिस देश में ममता समता हो गंगा का पानी ना जमता हो करता नित वंदन सागर भी श्रीराम प्रभु का चंदन हो जिस,,,,,,  रेतीले टीले लहराती पवन बरसाती सजन आया सावन भाई और बहन का वंदन हो गुरुदेव का भी अभिनंदन हो जिस देश,,,,, गाय को जो माता कहते है हनुमान भी संग में रहते है नागों की जहाँ पर पूजा हो विष भी अमृत में बदलता है जिस देश,,,,,,,,,,,  मीरा के जैसी भक्ति है पन्ना के जैसी शक्ति है करके बलिदान जो जीवन का नाम कराया मेवाड़ी धरती का जिस देश,,,,,,  नल निल की जैसी माया हो सत पर ही टिक पाया हो राजा ने त्यागा राज जहाँ ऐसा बलिदानी राजा कहां जिस देश,,,,,,,,,,,,,,,,,,, माता पिता की छाया हो बसती जिसमें काया हो भेद न कोई करता हो एक दूजे के संग में मरता हो जिस देश,,,,,,,,,,, देश धर्म नारी शक्ति को लक्ष्मी का रूप समझता हो कन्या का जहाँ पर पूजन हो। जिस देश ,,, संध्या पंवार

संस्कार

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तन से मनुज कर्म से रावण बन जाता है ब्राह्मण कुली श्रेष्ठ पूजक  अंत में कलंक लगा जाता है जर जरा जोरू के कारण व्यक्ति रावण बन जाता है कहा गया वो राम सा मन जो ना चाहे कैसा भी धन पिता का आज्ञाकारी संग जानकी हमारी भाई संग है आज कहाँ बसते रावण यहां वहां दो संस्कार परिवारों में लाड़ से बिगाड़ो ना दीवारों में अपनी करनी फल देगी घर से दिए संस्कारो में रावण को अब राम बनाना सब ऐसा कुछ कर दिखलाना वरना लंका जल जाएगी अपने ही अंगारों में  संध्या पंवार

नंदलाल

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नटवर नागर नंदा फसा है मोह का फंदा करत फिरत हम धंधा विनती करत है बंदा  श्याम सुंदर गोविंदा जोड़ दोनो हाथ खड़ा है बंदा राधा जी का भाल चमकता  बिजुरी पड़े काहे नंदा  श्याम सखी के नैनन चंदा राधा प्यारी गोविंदा।  संध्या पंवार

झनकार

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मा के स्वर से शिव के नृत्य की आगई झंकार किया क्रोध शुरू तांडव हुआ हवा में आई आवाज बजे मृदंग बजे डमरू  करती नयी झंकार माँ के अंगों से हवा में  मची हाहाकार जिस दिशा में पहुँचा माँ अंग हुआ नया अवतार माँ के शक्ति पीठो की ज्योति अपरम्पार धर्म और शक्ति भक्ति की दुनियां में बजरही झनकार संध्यापंवार

🙏🙏🙏हमारे🙏🙏

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जिंदा है केवल श्वास है तन में हमारे कहने को लाखों लोग है  अपने हमारे कब श्वास बन्द होगी बोलेंगे सितारे जिन्दा है केवल श्वास है तन मैं हमारे प्रेम भाव मिलन सब है गहने हमारे मिलते है व्हाट्सअप पे ये रोज बेचारे जिंदा है ।,,,,, संध्या पंवार

👣मुजरिम👣

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हम तेरे शहर में आये है मुजरिम बनकर क्योंकि किश्मत ने भेजा है बेरंग हमें बैठे डोली में विदा होके गये कुछ दिनों बाद ही  लौट आये है जिनको कहते है सभी अपना सा लगने लगा हमे  तो सपना सा कुछ लोभियों ने रुलाया हमको रिश्ते नातो ने भी तुलवाया हमको जाए तो कहा जाए हम बनकर मुजरिम ही यहां बैठे है संध्या पंवार

😷चौमासा😷

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चार माह का वक्त है। देवशयन कहलाता है। जीवजंतु सब राह तके वर्षाकाल जब आता है। सब घरों में स्थिर हो धर्मध्यान का पाठ करे सावन में शिव रुद्री करे महामृत्युंजय का जप करे योगी मुनि ध्यान धरे प्रकृति आनन्दमय भरे भादव में भगवान की सेवा पाते सब धर्म का मेवा लहरिये सी लहराती फसले नया धान ले आती फसलें कर कार्तिक में नव श्रंगार घर को चमका नए द्वार आसोज की नवराते में  होता माँ की पूजा अपार धन धान्य ओर धर्म की  करता चौमासा भी जय जयकार संध्या पंवार

जुनून

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जुनून है किसी को अपनाने का जी जान से अपना बनाने का अपना खून भी अपना नही होता तभी अनाथालय आबाद होता   क्यू न किसी को अपनाया जाए दिल से उसे अपना बनाया जाय हो सके तो उसकी जिंदगी को सजाया जाए ए दोस्त आते सब जाते सब खाते सब क्यू न किसी को खिलाया जाय माँ पिता बहन भाई का प्यार दिलाया जाय  एक जुनून हो दिल मे  मानवता का पाठ पढ़ाया जाए संध्या पंवार

भारत की संस्कृति

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भारत की संस्कृति जिस देश में ममता समता है गंगा का पानी ना जमता हैं करता नित वंदन सागर भी श्रीराम प्रभु का चंदन हो  रेतीले टीले लहराती पवन बरसाती सजन आया सावन भाई और बहन का वंदन हो गुरुदेव का भी अभिनंदन हो गाय को माता कहते है हनुमान भी संग में रहते है नागों की जहाँ पर पूजा हो विष भी अमृत में बदलता है मीरा के जैसी भक्ति है पन्ना के जैसी शक्ति है करके बलिदान जो जीवन का नाम कराया धरती का  नल निल की जैसी माया हो सत पर ही टिक पाया हो राजा ने त्यागा राज जहाँ ऐसा बलिदानी राजा कहां माता पिता की छाया हो बसती जिसमें काया हो भेद न कोई करता हो एक दूजे के संग में मरता हो देश धर्म नारी शक्ति लक्ष्मी का रूप समझता हो संध्या पंवार

आज है जो राज

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आज है जो राज जमाना हमने देखा है दीवाना सबको करता है मिली हमको खुशी जो आज वो किश्मत से पायी है हुआ जो आज उसको  हम बया करते लगा राजा बने है सब  मिला है ताज भी हमको लगे कुँवर से मुस्काने करे कोई ना बहाने बहन सौपा है सबको आज का राज ये देखो संध्या पंवार राजस्थान

मां

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सात रंगों की लाई ,चुनरी मेरी सासु माँ। आया सावन ओर देखो ,तीज है सावन की माँ। सासु का प्यार देखो, सजना निहारे देखो। प्रेम दुलार स्नेह ममत्व , अपनापन देखो माँ। जीवन मे रंग भरे  पिया ने  सातों माँ। माता का प्यार है , घर मे दुलारहै।  सतरंगी चुनर मेरी, सजना का प्यार है, सर पे सुहाग है तीज का त्यौहार है । जीवन मे आये देखो, सतरंगी लहरिये सी, पिया ओर प्यार की बहार देखो    संध्या पंवार

👯🏼‍♂️अंदाज🕺

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हाले दिल देख के, अन्दाज लगालेते है। हम तुम्हें अपने शहर में ,बुला लेते है। कोई क्या जाने ,मन ये ना माने। दिल की इस रग पर,मरहम लगा देते है। हाले दिल,,,,,,,, अनजानी मंजिल है,साहिल नही मिलता। दुनियां में लोगों कोई, काबिल नहीं मिलता।  सुख में तो भूल जाये, दुःख में ना साथ हो। ऐसे हमदर्द दुआ देते है ह्रदय वंशी धोखा दे देते है  हाले दिल,,,,,,,,, अंदाज लगा लेते है संध्या

घर

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जिनमें मानव रहता है मानवता को साथ लिए माता पिता का साया हो  बसती जिसमे  काया हो जोसुख दुःख में  हंसता हो एक दूजे में बसता हो अपनो को जो साथ ले गम सभी के बांट ले रोज रोज के  झगड़े टंटे जहाँ न होते प्रेम से मा बहन बेटी और नारी  रहती है सब चेन से  बच्चों की किलकारी गूंजे दादी नानी को हम पूजे करते सदा सम्मान सभी का रखते दिल से ध्यान सभी का  घर अपना अपना ही होता रहने सेही काम न होता जुड़ता जो भी स्नेह प्रेम से भावनाओ का वास है होता संध्या पंवार

बारिश की रात

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 बूंदों की सौगात  न जाने क्यू ऐसा लगा जैसे पतो का नयापन पिया का अपनापन  मन को छू गया क्या ठंडी हवा का झोखा  मुझे हुआ एक धोखा  बारिश थी बूंदे थी पर  ना पिया थे ना पत्ते थे एक अहसास जो दिलाता पिया की याद   बरसात की रात  टिप टिप पानी की आवाज बिजली का कड़कना पिया का हाथ पकड़ना आज भी याद है बाइक पर  डर से चिपकना न जाने क्यू  हाथों में पिया के  बिजली न थी एक अहसास जो  दिल को छू गया  पानी की बून्द  गालों को छूकर निकली वो बारिश नही आँखों का मोती था संध्या पंवार राजस्थान

मारो राजस्थान

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रंग रंगीलो एडो मारो राजस्थान केर सांगरी ओर मतीरा ज्वार बाजरा मक्का तीरा राबड़ी का प्याला वीरा ढोलक चंग बजे मजीरा एडो मारो राज,,,,,,, केसरिया साफा में वीरा चुड़लो खनके चमके हीरा एकतारा रा बोल है झींना बोले मोर पपीहा धीरा एडो मारो राज,,,,,,,  मायड़ एडा पूत है पावे बिना शीश के ही लड़ जावे वीरगति है जो पा जावे जग में कमधज नाम कमावे एडो मारो,,,,,,,,, राणा ओर पन्ना री धरती खुना रा नाला सु बहती इन् री गाथा हल्दी कहती रेता री तो नदिया बहती एडो मारो,,,,,,, झीलों ओर महलों की जाई अठे पूजे कालिका माई हिंडोले गणगोर झुलाई पीवे देखो रबड़ी मलाई एडोमरो,,,,,   संध्या पंवार राजस्थान