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मैं शब्दों का चितेरा

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🌺🦋┄┅══❁❤️❁════┅🦋🌺 🌹जय श्री कृष्णा🌹 "लोगों को तो बहाना चाहिए, टूटे जो दिल किसी का वो तराना चाहिए। लाख कोशिश कर ले कोई, मुझे मेरी माँ और प्यार वो पुराना चाहिए।। मेरी सपनों की नायिका तुम हो... तुझे मैं अपने शब्दों से ही तराशने चला हूँ...।  जो सम्भव नहीं है, मैं संभव उसे करने चला हूँ।। तुम एक काव्य मूरत सी, मैं बन गया शब्दों का चितेरा, संवार दूँ तुझे, तराश दूँ तुझे, तुझे बना दूँ पर्याय खूबसूरती का।। मैं विरक्त अवधूत सा, मैं अपना पराया भूल गया हूँ। दिन-रात का भी हौश नहीं, मैं अपना साया भूल गया हूँ।। फूलों की चाहत हर कोई रखता, ना चाह किसी को काँटों से है। फूल तो फूल, भुलाकर दर्द को मेरे मैंने काँटों की डाल थामी है।। असर तो आज ही दिखाई दिया, तेरे बिना कितना बेकार सा मैं लिख रहा। क्यों सूरज उगता तेरे बिना, क्यों जा अस्ताचल में वो तेरे बिना ही छिप रहा।। खिलना भी तो भूली कली, कहाँ रौनक बिना तेरी मुस्कान के। हवाएँ गर्म हैं, कैसे आये शीतलता भी बिना मेरी जान के।। मैं पतझड़ का सूखा पत्ता, तुम बसंत में खिले हों ज्यों फूल। अब तो हमको माफी दे दो, स्वीकार मुझसे हुई थी भूल।। मैं हरियाणे...

तुम कवि हृदया हो

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"आज सकल विश्व भी करे स्त्रियों पर अभिमान, बेटी, बहन और माँ बन बढ़ाया कुल का सम्मान।। शिक्षिका और डॉक्टर बनकर करे जगत कल्याण। थाम कलम को बेटी ने, दिया साहित्य में योगदान।। कन्या घर में चन्द्र सम, कन्या ही सकल आकाश। कन्या सूर्य सा तेज़ बन, करती घर-आँगन प्रकाश।। बेटी बढ़ा रही हैं आज, देश का गौरव मान। बेटों से भी आगे रहें, बेटियों के सारे काम।।" "एक कवयित्री बेटी/स्त्री के सम्मान में..." तुम उदीप्त प्रबल प्रकाश हो, जैसे शिव का कैलाश। निज कलम से जब भी लिखो, करती दिव्यप्रकाश।। जब जुगनू सी बनकर उड़ो, लगती फूल पलाश। दामिनी-चपला सी चतुर, कभी न होती उदास।। चुनकर शब्दों के मोती, भाव आँचल में भरती हो। कवि हृदया हो भावों को भावों से भावों में लिखती हो।। खुशियों की लताओं से, प्यार की ठंडी हवाओं से। नवजीवन गीतों में भर देती हो, कवयित्री जो हो।। विरह की लहर भी, खुशी संलिप्त चमक भी, वियोग भी संयोग भी, महक थोड़े इंतज़ार की।। हास्य-नैराश्य भाव तो कभी वीररस के प्रसार से। प्रेम में भक्ति हो लक्षित तेरी लेखनी की धार से।। लेखनी साधन, लिखना साध्य ज्ञान का हुआ प्रसार। ज़रा अभिमान नहीं, पाठिका भी, ...