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वो डरावने सपने - भाग २

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सोनाली के हाथ से चाय का कप छूट गया और फर्श पर पड़ते ही टूट गया | क्या हुआ सोनाली तेरी तबीयत तो ठीक है ना ! हां मां सब ठीक है ये बोल कर वो घर से बाहर चली गई | पीछे से सोनाली कि मां आवाज देते रह गयी | नाश्ता तो कर ले बेटा... तब तक सोनाली स्कूटी स्टार्ट कर के ऑफिस के लिए निकल गई | इधर सोनाली कि मां मधु अपनी सास के पास जाकर रोने लगी | क्या हो गया है मेरी बच्ची को किसकी बुरी नजर लग गयी है ! हे भगवान अब तुम ही हमारी मदद करो |  मधु कि सास शंकुतला देवी ने अपनी बहू को समझाया और जल्दी से तैयार होने के लिए कहा | मधु - हम कहा जा रहे हैं मां ! मधु कि सास - हम ऐसी जगह जा रहे है जहां हमारी समस्या का समाधान होगा |  कुछ ही देर में दोनों एक मंदिर के सामने थे | सोनाली कि मां और दादी शंकुतला देवी अपने शहर चांपा के प्रसिद्ध काली माता के मंदिर में थे | दोनों मंदिर में प्रवेश करके माता के दर्शन करते हैं | दर्शन करने के बाद वहां के परोहित जी से मिलते हैं | प्रणाम परोहित जी!!! मधु और शंकुतला देवी ने एक साथ कहा | परोहित जी - मां काली आपकी सभी मनोंकामना पूर्ण करें | कहिए क्या समस्या लेकर आयी है ...

भुतहा मकान भाग 3 : साक्षात दर्शन

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एक विशेष प्रकार की आवाज सुनकर राजन की नींद खुल गई । आवाज ऐसी आ रही थी जैसे कोई सांप रेंग रहा है । उसने धीरे से अपनी आंखें खोली मगर उसे कुछ दिखाई नहीं दिया । उसे लगा कि उसने डर के मारे आंखें खोली ही नहीं थीं । उसने अपनी दोनों हथेलियों से अपनी थोनों आंखें मसली फिर खोलीं । अभी भी कुछ दिखाई नहीं दिया । राजन सोच में पड़ गया कि आखिर माजरा क्या है ?  राजन के दिमाग में अचानक कौंधा कि वह शायद बिजली बंद करके सोया था । पर उसे याद आया कि वह तो बिजली जली छोड़कर बिसार लेटा था और हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था कि अचानक उसकी आंख लग गई । लेकिन पूरे मकान में ये अंधेरा क्यों है ? शायद लाइट चली गई होगी , राजन के मस्तिष्क में एक क्षण को यह बात आई लेकिन अगले ही पल उसने गर्दन घुमाकर बाहर की ओर देखा तो पता चला कि रोड लाइट जल रही थी । "ये क्या माजरा है" ? राजन को कुछ समझ नहीं आ रहा था । जब दिमाग में भय समाया हुआ हो तो फिर वहां बुद्धि और ज्ञान नहीं रहते हैं । दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है ।  राजन ने सोचा कि वह उठकर लाइट जला दे । क्या पता बंद करके सोया हो ? लेकिन उठना कोई कम जोखिम का काम था क्य...

वो डरावने सपने

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भयानक अंधेरी रात में एक लड़की बेतहाशा भागे जा रही है , शायद किसी से डर कर भाग रही है । उसने घुटने तक साड़ी पहन रखी है और पैरों में पुराने जमाने की पायजेब पहनी हुई है । पहनावे से किसी कबीले कि जान पढ़ रही है । भागते - भागते अचानक वह किसी मंदिर के प्रांगण में प्रवेश कर आसमान कि तरफ देखकर कहती हैं - तुम मुझे कभी नहीं पा सकते ना इस जन्म में और ना ही किसी और जन्म में .... इतना कह कर वह लड़की मंदिर में बने तालाब में कूद जाती हैं ..... और हमेशा की तरह यह सपना देखते हुए सोनाली डर कर जाग जाती है । सोनाली जब 10 साल की थी तभी से उसे ये डरावने सपने दिखाई देने लगे हैं और अभी तक ये सिलसिला चल रहा है । डर कर अचानक उठने के कारण सोनाली कि सांसें तेज चलने लगी थी , तभी अचानक सोनाली की मां कि आवाज आई -  सोनाली उठो बेटा ऑफिस नहीं जाना क्या ? जाना है मां बस थोड़ी देर में आई ... ये कह कर सोनाली फ्रेस होने बाथरूम में जाने लगी | करीब आधे घंटे में तैयार हो कर सोनाली रूम से बाहर आई |  अभी सोफे पर बैठ कर वो चाय पी रही थी और उस सपने के बारे में सोच ही रही थी कि मां ने कहा - कोई परेशानी है क्या बेट...

अग्निवीर (सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि) (अंतिम भाग)

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(लाइफ स्टोरी ऑफ अलख पांडे)  पांडे अब इतना विश्वसनीय बन चुके थे कि कुछ ही समय में ऐप पर 2 लाख स्टूडेंट आ गए और एप क्रैश हो गई। असंख्य युवा ऐप में एनरॉन कर चुके थे, ऑनलाइन फीस भर चुके थे । इसी बीच पांडे के पास एक ऑफर आया। एक बड़े व्यापारी ने उनकी ऐप का मूल्य  लगाया , मूल्य था 75 करोड़ रुपए । पांडे  चाहते तो उसी समय इतनी धनराशि के मालिक बन सकते थे । लेकिन उन्होंने इस ऑफर को लात मारकर ठुकरा दिया । जैसे कि मैंने शुरुआत में ही कहा कि पांडे का "फिजिक्स वाला" अब 777 करोड़ से ऊपर फंडिंग जुटा चुका है । आज के तारीख में राष्ट्र के सबसे सफल स्टार्टअप में से एक हैं।  आज पांडे रोजगार बांट रहे हैं। फिजिक्स लगभग 19000 लोगों को रोजगार दे रहा है। इनमें टीचर्स, एसोसिएट प्रोफेसर, सब्जेक्ट मैटर, एक्सपर्ट से लेकर टेक्नीशियन आदि शुमार हैं। पांडे अकेले नहीं हैं ,जिन्होंने अपने सपनों का पीछा करते शून्य से  करोड़ों तक का सफर तय किया है। सिर्फ पांडे ही नहीं जो भुखमरी के दौर से उठकर करोड़ों के मालिक बन गए। ऐसे कई उदाहरण हैं । र उन सभी उदाहरणों में एक बात सामान्य है कि उन सभी ने कभी ...

अग्निवीर (सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि) भाग -५

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(लाइफ स्टोरी ऑफ अलख पांडे)  अमन की बातों को सुन वह व्यक्ति मुस्कुराने लगता है। वह समझ जाता है की ये लड़का अंदर ही अंदर टूट चुका है , किंतु अभी भी उसके अंदर सैनिक बनने का जज्बा है। फिर वह उमार्दराज व्यक्ति अमन से कहता है -  अलख पांडे !  नाम सुना है ....नहीं सुना? फिजिक्स वाला .....नाम सुना है ...शायद सुना होगा ।  क्योंकि पांडे जी द्वारा स्थापित फिजिक्स वाला स्टार्टअप लगभग 100 मिलियन डॉलर की फंडिंग यानी 770 करोड रुपए जुटा चुकी है।  दोहरा रहा हूँ......777 करोड़  पांडे छठी कक्षा में थे । घर की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पांडे के पिता को उनका पुश्तैनी मकान बेचना पड़ा। पूरा परिवार सड़क पर आ गया। पांडे पढ़ाई में अब्बल थे ,और जिम्मेवार भी ।आठवीं कक्षा में पांडे छठी कक्षा के बच्चों को जीवन यापन हेतु ट्यूशन पढ़ा रहे थे इसलिए पढ़ा रहे थे कि दो वक्त की रोटी के इंतजाम में कुछ योगदान उनका भी हो।  पांडे आठवीं में ही मास्टर जी बन चुके थे । स्कूल से लेकर कॉलेज तक पांडे जी बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर जीवन यापन करते थे। फिजिक्स में उनका ऐसा इंटरेस्ट बैठा कि उन्ह...

अग्निवीर ( सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि) भाग- ४

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कुछ समय बाद अमन जगता है तो उसकी नजर दीवार पर टंगी हुई घडी पर पड़ती है जिसमें ८ बज रहा होता है। समय देखकर उसे राहत महसूस होती है, की "कल जो भी उसके मित्र गण बोल रहे थे वह ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे , अगर ऐसा करना होता तो वह उसे अपने आंदोलन में शामिल होने को जरूर कहतें।  दूसरी तरफ अमन के सभी मित्र और  गाँव के बहुत से लडके जिन्हें सैनिक में नहीं जाना था, वह भी इनलोगों के साथ मिलकर ट्रेनों, बसों, ट्रक इत्यादि यहाँ तक की बहुत से पब्लिक कारों तक को आग लगा देते हैं। करण अमन को वहाँ न देखकर कुछ लड़कों के साथ उसके घर आ जाता है और अमन को आंदोलन में शामिल होने को कहता है। अमन और सीमा (अमन की माँ) के लाख मना करने पर भी वह नहीं मानता है। आखिरकार अमन को आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए जाना ही पड़ता है।  अमन बचपन में ही ये संकल्प लिया होता है की परिस्थिति चाहे जैसी भी हो वह कभी अपने देश का अहित नहीं करेगा। वह अपने बल का प्रयोग सदा देश हित के लिये ही करेगा।ट्रेनों, बसों में आग लग जाने के कारण बहुत से यात्री वहीं बैठे घर जाने की प्रतिक्षा कर रहे होते हैं।  वहाँ पहुँचते ही अमन भीड़ म...

पुनर्विवाह - प्यार कि एक नयी शुरूआत ( अंतिम भाग )

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रविश प्यार से स्वाति का चेहरा देख रहे होते हैं । स्वाति सबके बीच रविश को इस तरह देखता पाकर शरमा जाती है । और आंखें नीचे कर तेजी से अपने रूम में चली जाती हैं । कुछ देर बाद रविश भी स्वाति  के पीछे रुम में जाते हैं । जहां स्वाति अपने रूम में बने खिड़की की तरफ मुंह करके सिर झुकाए खड़ी थी । रविश पीछे से आकर , स्वाति के कान में धीरे से कहते हैं - आप वहां से ऐसे क्यूं चली आई !  स्वाति जो अब तक खिड़की को निहारे खड़ी थी । अचानक से रविश की तरफ मुड़कर कहती हैं - आपके कारण ‌!  रविश अनजान बनते हुए - मेरे कारण ! वो कैसे !  स्वाति - अब ये भी मैं ही बताऊं !  रविश - बिल्कुल आप बताएंगी ! मैंने किया क्या है कि आप इस तरह से वहां से भाग आयी ! स्वाति को अपनी बाहों के घेरे में लेते हुए ...हम तो बस अपनी खूबसूरत सी बीवी को देख रहे थे । अब इसमें हमें  किसी तरह की कोई गलती नहीं दिखती ! ( स्वाति को अपने सामने लाते हुए ) अगर आप को ये ग़लत लगता है , तो बात अलग है ।  स्वाति - मैंने ऐसा कब कहा ! रविश - वैसे मानना पड़ेगा आपको , मैंने कभी सोचा नहीं था कि आप रिचा को ऐसे हैंडल कर...

गलती भाग ३० अंतिम भाग

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  दिन पर दिन गुजरते गये। घर में दया मात्र एक कमरे में सिमट गयी। बार बार अपनी ही गलती सुनते सुनते वह खुद को गलत भी मानने लगी। हाॅ... ।सच में मैं गलत क्यों नहीं हूँ। क्या पैसे की चकाचौंध में मैं अंधी नहीं हुई थी। जिस तरह आज मेहनत कर अपनी बेटी का पालन कर रही हूँ, उस समय नहीं कर सकती थी। मैं क्यों उस अनुचित का विरोध नहीं कर पायी, जिसका विरोध करना अति आवश्यक था। मुझे आखिर लगा ही क्यों कि शुचि के भविष्य के लिये मुझे किसी पुरुष के सहारे की आवश्यकता है। और वह पुरुष भी कौन... । वही जिसके बहशीपन का मैं खुद शिकार थी। पक्का तो नहीं, पर संभव है कि वही शुचि का वास्तविक पिता है। सही ही है कि मुझे ऐसे धूर्त के खिलाफ मुंह खोलना चाहिये था। फिर गलती तो मेरी ही है। इसमें असत्य कहाँ..।   जाड़े आ गये। दया सुबह सुबह काम के लिये निकलती। काफी समय से अभ्यास की कमी और कुछ उम्र का भी प्रभाव, सर्दी की चपेट में आ गयी। फिर भी रोज का काम करना चलता रहा। खुद के लिये लापरवाही बढती गयी। और एक दिन वह बिस्तर पर ऐसी लेटी कि फिर दिन भर न उठी।   सौम्या आतुर थी कि कब दया कमरे से बाहर निकले और उसे आज के हिस्से का ...

अग्निवीर (सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि)भाग- ३

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विक्रम एवं उनके साथियों का चरित्र चित्रण -  "विक्रम, प्रशांत , करण, जय, रवि और अमन यह सारे लड़के एक ही गाँव के थे और साथ साथ ही सैनिक में जाने की तैयारी कर रहे थे। इनका स्कूल से लेकर कॉलेज तक का सफर साथ में ही बिता। गाँव से दूर शहर में भी रूम लेकर यह एक साथ रहते थे और पढाई करते थें। यही कारण था की इनलोगो में गहरी मित्रता थी। इन सभी दोस्तों में करण ही ग्रुप का लीडर था, जो की बहुत ही गुस्सेल् और लडाई करने वाला था इसलिए सभी इसे ग्रुप का लीडर कहते थे। विक्रम और प्रशांत ये दोनों भी लडाई झगड़े में पीछे नहीं रहते थे लेकिन करण के तुलना में ये करण से पीछे थे, क्योंकि करण की कोई सीमा नहीं थी लडाई में वह न जाने कितनों का खून तक बहा चुका था! लेकिन विक्रम और प्रशांत कभी किसी का खून नहीं बहायें थे बस यही फर्क था ,करण और इन दोनों में "।  "अब बारी है जय और रवि की इन्हें लडाई झगड़ों से कोई मतलब नहीं रहता था। ये दोनों मजाकिया किस्म के लोग थे। इन्हें हँसी मजाक करना,इक दूसरे को किसी लड़की का नाम लेकर चीढाना बस इन्हीं सब चीजों से मतलब था। रही बात अमन की तो वह अपने नाम की भाँति ही शां...

गलती भाग २९

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  यदि किसी नजदीकी की मृत्यु जीवन का एक बड़ा दुख है तो मोहन न तो सौम्या के मन के नजदीक था और न हीं दया के मन के। कितने आश्चर्य की बात कि इसी मोहन के लिये दोनों बहनों में एक बड़ी प्रतिद्वंदिता हुई थी। सचमुच धन दौलत के आधार पर किया प्रेम स्थायी नहीं होता है। प्रेम  मन में उठी वह तरंग नहीं जो उठकर जल्दी ही समाप्त भी हो जाती है। प्रेम तो शर्करा का जल के प्रति वह समर्पण है जिसमें शर्करा खुद मिटकर भी मिटती नहीं अपितु उस जल को अपनी ही मिठास से भर देती है।   मोहन की मृत्यु पर न तो सौम्या और न दया का मन रो रहा था। रुदन भी मात्र लोकाचार था। जैसे तैसे तेरह दिन गुजरे। तेरई के बाद जीवन को नवीन तरह आगे बढाना था।   सौम्या और दया दोनों ही नहीं जानती थीं कि अभी उनके जीवन में बहुत कुछ होना शेष है। इतने वर्षों की नफरत दया पर निकालने का अवसर सौम्या को मिलने बाला है। दया के जीवन का सबसे कठिन समय सामने आने बाला है।   मोहन और दया के विवाह का कोई कानूनी आधार तो था नहीं। विभागीय रिकार्ड में भी मोहन की पत्नी के रूप में सौम्या का नाम ही दर्ज था। मोहन का सारा फंड सौम्या को मिल गया। साथ में ...

अग्निवीर (सैनिक वही जो माने माने देश सर्वोपरि) भाग -२

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 सीमा इन ख्यालों खोई ही थी की अचानक किसी ने दरवाजा  खटखटाया -  "चाची ओ चाची! अमन है का घर पे, दरवाजा तो खोलो उससे कुछ जरूरी बात करनी है " (दरवाजा खटखटाते हुए विक्रम ने पूछा)  विक्रम की आवाज सुन सीमा का ध्यान टूटा और वह अपनी आँसुओ को पोछते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ गई।  दूसरी तरफ अमन भी अपने आँसुओ को छुपाने के लिये पानी से अपना चेहरा धोने लगा।  जैसे ही सीमा दरवाजा खोलती है विक्रम झट से अंदर आता है और जोर जोर से चिल्लाने लगता है -  "अमन ओ अमन! हमारी सारी मेहनत मिट्टी में मिल गई। जो सपना देखें थे हम सारे सपने अधूरे रह गयें। अरे जब चार साल के लिए ही सैनिक में रहेंगे तो काहे के लिए इतनी मेहनत! और जरा ये सोचो जब हमारे चार साल पूरे हो जायेंगे तो हम क्या करेंगे? दर -दर की ठोकरे खाते फिरेंगे "। अमन ; तो क्या करें? हम कुछ कर भी तो नहीं सकते हैं।  विक्रम ;कुछ नहीं कर सकते? क्यों नहीं कर सकतें? ये देश हमारा है , हमारे भविष्य का इतना बड़ा फैसला लेने वाले ये नेता होते कौन हैं। आज जो ये जिस कुर्सी पर बैठे हैं और इतने बड़े बड़े फैसले ले रहे हैं, तुम भूल रहे ह...

अग्निवीर ( सैनिक वही जो माने देश सर्वोपरि) भाग १

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  "अंदर ही अंदर घुटन सी हो रही थी उसे! मानो जैसे उससे किसी ने उसकी बहुमुल्य वस्तु छीन ली हो। न चाहकर भी उसके आँखों से आँसुओ की धारा बहने लगी। वह अपने किस्मत को हर बार की तरह फिर से कोसने लगा। "अच्छा होता अगर मेरा जन्म ही  न हुआ होता, अच्छा होता अगर बाबूजी के जगह मेरी मृत्यु हो जाती । न जाने कितने वादे किये थे अपनी मां से अब कैसे करूँगा उसे पुरा? कैसे करूँगा अपनी मातृभूमि की रक्षा? काश मेरी अधूरी ख्वाइशें की तरह मेरी जिंदगी भी अधूरी रह जाती। हर वक्त आजमाती है ये जिंदगी, न जाने क्यों इतना तड़पाती है ये जिंदगी। अगर इतना ही बुरा हूँ तो ऐ खुदा मुझे बुला क्यों नहीं लेतें, मेरे अस्तित्व को मिटा क्यों नहीं देते। हार चुका हूँ अपनी जिंदगी से थक गया हूँ इसे झेलते झेलते ,अब जीने की कोई ख्वाइश नहीं है, मुझे भी मेरे बाबूजी के पास बुला लो।"  अपने आँखों पर हाथ रखकर अमन रोये जा रहा था । दूर खड़ी उसकी  बेबस,लाचार माँ जो की उसे रोता देख खुद भी रो रही थी। कहे तो क्या कहे अपने बेटे से, उसका सपना तो मानो टूट ही गया था, बचपन से उसने सोच रखा था की मैं तो सैनिक नहीं बन पाई लेकिन अपने...

गलती भाग २८

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  वासना में अंधे बने को जीवन में सुख कब मिलता है। आत्मबोध और मन की धिक्कार भले ही सचेत व्यक्ति के लक्षण हैं। कामी का मन कभी भी उसे उसके कृत्य के लिये धिक्कारता नहीं है। हाॅ जब वह अपनी कामना ही पूरी न कर पाये, उस समय जरूर व्यथित हो जाता है। सम्हलता फिर भी नहीं है। कुमार्ग का राही दूसरे साधन तलाशने लगता है।    मोहन के मन में दया से किये कुकर्म से कोई भी आत्मग्लानि न थी। फिर जब दया भी उसकी पत्नी बन वापस आ गयी तब मोहन के कामी मन को यही लगा कि दया का मन भी उसी की भांति क्षुद्र है। यदि ऐसा न होता तो दया इस विवाह के लिये तैयार ही क्यों होती। एक स्त्री के निर्णय के हेतु तक पहुंच पाने की उसकी मानसिक अवस्था न थी।    दया मोहन से विवाह कर ससुराल वापस आयी पर मोहन जैसे राक्षस को उसने पति का दर्जा न दिया। परिस्थितियों से लड़ते लड़ते अब वह पहले जैसी कमजोर न थी। घायल सिंहनी की तरफ आंख उठा पाना भी मोहन के लिये संभव नहीं था। केवल बेटी के लिये दुबारा विवाह बंधंन में बंधने बाली दया के जीवन का उद्देश्य केवल और केवल शुचि थी।    दिन, माह और वर्ष गुजरते गये। मोहन कभी भी उस उद्...

भुतहा मकान : भाग 2 बिना सिर वाला भूत

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राजन बड़ा आश्चर्य चकित था उस भूत के पदचाप की रिकॉर्डिंग को सुनकर । उसके मुंह से बोल नहीं निकले । कहीं उसका इस मकान को किराये पर लेने का निर्णय उसके लिए घातक तो सिद्ध नहीं हो जाएगा ? अब तक उसने सुनी सुनाई बातों के आधार पर ही अपनी धारणा बनाई थी कि भूत प्रेत नहीं होते हैं पर यहां तो भूत की पदचाप की आवाज रिकॉर्ड होकर सुनाई भी जा रही है । अब तो मानना ही चाहिए कि भूतों का अस्तित्व है । बड़े असमंजस में फंस गया था राजन । अब तो मकान किराए का तीन महीने का एडवांस भी दे दिया था उसने । यदि अब वह इस मकान में नहीं रहता है तो तीन महीने का किराया जब्त हो जाएगा । इतना नुकसान उठाने की स्थिति में नहीं था राजन । अब तो कम से कम तीन महीने रहना ही पड़ेगा उसे इस भुतहा मकान में । वह अभी इसी उधेड़बुन में उलझा हुआ था कि रमा बोली "वैसे वह भूत इतना दुष्ट भी नहीं है । शुरु शुरू में तो वह केवल डराता है जिससे लोग मकान खाली कर जाएं । मगर फिर भी कोई अगर नहीं डरे और मकान छोड़कर भाग नहीं जाये तो फिर वह उस पर हमला करता है" । रमा की आंखों में भयानक भय व्याप्त था । डर के मारे उसकी आवाज भी लड़खड़ा गई थी ।   ...

भुतहा मकान भाग : 1

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राजन का स्थानांतरण रामनगर में हो गया था । बड़ी समस्या थी कि राजन अपने परिवार को रामनगर शिफ्ट नहीं कर सकता था क्योंकि उसके बच्चे बोर्ड की परीक्षा दे रहे थे । इसलिये उन्हें डिस्टर्ब करना ठीक नहीं था । राजन की पत्नी सुनंदा बच्चों को छोड़कर राजन के साथ जा नहीं सकती थी । इसलिए राजन को अकेले ही रामनगर जाना पड़ रहा था ।  रामनगर में अब राजन को अपने लिए एक आशियाने की तलाश करनी थी ।रामनगर में मकानों का किराया बहुत ज्यादा था । राजन के लिए दो दो मकान अफोर्ड करना भारी पड़ रहा था लेकिन मजबूरी थी । राजन ने एक "टु लेट सर्विस" की सेवाएं ली । उसने राजन को बहुत से मकान दिखाए । मगर किसी में कोई सुविधा नहीं थी तो किसी में प्रॉपर वैन्टिलेशन नहीं था । जिसमें सब कुछ ठीक था उसका किराया बहुत ज्यादा था जिसे राजन अफोर्ड नहीं कर सकता था । बड़ी समस्या हो गई थी राजन के लिए । लगभग दस दिन हो गये थे मकान ढूंढते ढूंढते , मगर अभी तक कोई मकान फाइनल नहीं हो पाया था । दस दिनों से वह एक होटल में ठहरा हुआ था । उसका किराया और खाने पीने का खर्च भी बहुत ज्यादा था । राजन को जल्दी से मकान के बारे में कोई निर्णय क...

गलती भाग २७

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  कभी माॅ को रंगीन वस्त्र धारण करता देख दोनों हाथों से ताली बजा रही छोटी सी बालिका शुचि पंद्रह साल की हो गयी। खुद पढाई से दूर भागने बाली दया के ही समझाने और प्रोत्साहन का प्रभाव था कि शुचि की गिनती मेधावी छात्रा के रूप में की जाती थी। पढाई के अलावा भी उसे जीवन की ठीक ठाक जानकारी हो गयी। वह समझ सकती थी कि उस दिन जब उसकी माँ ने चटक रंग के वस्त्र पहने थे, तब उसकी माँ के जीवन से खुशियां पूरी तरह विदा हो रही थीं।   सौम्या का पुत्र कैलाश भी जीवन के बीस बसंत देख चुका था। पढाई में वह भी अच्छा था। अध्यापन कर अपना जीवन बसर करना उसका स्वप्न था। अपने स्वप्न के प्राप्ति की तरफ वह धीरे धीरे आगे बढ भी रहा था।   जुगनू के हिस्से की जिस जमीन को सैरावत ने बचाया था, वह और मोहन के हिस्से की भी जमीन सुरक्षित न रही। आखरी सांस तक पुरखों की निशानी को सम्हालने का दावा करने बाले सैरावत भी उसे बचा न पाये। सत्य बात थी कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिये न तो दया और न सौम्या गांव में रहने को तैयार थी। शहर का बड़ा खर्च। फिर ईर्ष्या का ऐसा प्रभाव कि दोनों ही औरतें एक दूसरे से कम न पड़तीं। किराये के छोटे स...

इंकलाब जिंदाबाद ;भगत सिंह भाग -३२

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नए नेताओं के अलग-अलग विचार (तृतीय भाग)  आगे भगत सिंह लिखते हैं- लेकिन बाद में मुंबई के एक भाषण में यह बात स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ गई। पंडित जवाहर लाल नेहरू इस जनसभा की अध्यक्षता कर रहे थे और सुभाष चंद्र बोस ने भाषण दिया। वह एक बहुत भावुक बंगाली हैं। उन्होंने भाषण आरंभ किया कि हिंदुस्तान का दुनिया के नाम एक विशेष संदेश है। वह दुनिया को आध्यात्मिक शिक्षा देगा। खैर आगे वह दीवाने की तरह कहना आरंभ कर देते हैं - चांदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की सूझ का परिणाम था ,उसकी महानता की कल्पना करो। सोचो एक बंगाली उपन्यासकार ने लिखा है कि हममें  ,हमारे  यह आंसू ही जमकर पत्थर बन गए हैं। वह भी वापस वेदों की ओर लौट चलने का आवाहन करते हैं। आपने अपने पूना वाले भाषण में ' 'राष्ट्रवादिता ' के संबंध में कहा है कि अंतरराष्ट्रीयतावादी ,राष्ट्रीयतावाद को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं ,लेकिन यह भूल है। हिंदुस्तानी राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है। वह न संकीर्ण है,ना निजी स्वार्थ से प्रेरित है और न उत्पीड़नकारी है ,क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो 'सत्यम् शिवम् सुंदरम् ,...

गलती भाग २६

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  पंचायत के फैसले से केवल दया ही दुखी नहीं थी, अपितु इस फैसले को सुन सौम्या भी बहुत ज्यादा व्यथित हो गयी। वह समझ नहीं पा रही थी कि इस तरह कुछ लोग कैसे कोई फैसला सुना सकते हैं जिससे किसी के जीवन की दिशा ही बदल जाये। पंचायत मात्र दया के अधिकार और उसके दुख दूर करने के लिये बैठी थी। पर किसी पंचायत को क्या अधिकार है कि वह सौम्या के जीवन में हस्तक्षेप करे। वैसे भी वह पति के स्नेह की प्यासी थी। कोई उम्मीद भी नहीं थी कि पति का स्नेह उसे जीवन में कभी मिलेगा। फिर भी सामाजिक रूप से वही तो मोहन की अर्धांगिनी थी। दया के दुख दूर करना उद्देश्य था या जुगनू के हिस्से की संपत्ति बचाना, पर किसी भी उद्देश्य की पूर्ति हेतु वह अपने पति को अपनी चचेरी बहन के साथ क्यों बांटे। पहले किस तरह से परिपाटी चली कि एक भाई की मृत्यु के बाद दूसरा जीवित भाई, उसकी विधवा से दूसरा विवाह कर लेता था। पर आज ऐसी परिपाटी को कैसे स्वीकार किया जा सकता है।   सौम्या को भले ही अपने पति से शिकायत थी फिर भी वह समझती थी कि मोहन इस निर्णय का विरोध करेगा। उसे क्या पता कि इस फैसले के बाद मोहन के मन में किस तरह के लड्डू फूट रहे हैं।...

पुनर्विवाह - भाग २९

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रविश और सरला जी रिचा को अपने घर में देखकर अवाक हो जाते है । स्वाति , रवि और नेहा से रिचा को गेस्ट रूम में ले जाने को कहती हैं ।रिचा के जाते ही ,  रविश स्वाति की ओर मुड़ कर उस से कुछ कहते , उससे पहले ही स्वाति ने धीरे से सब बताना शुरू किया ।  स्वाति - मां हम सब गार्डन घूमकर रेस्टोरेंट से खाना खाकर निकल ही थे कि रेस्टोंरेट के बाहर आइसक्रीम देखकर  शिवांश ने आइसक्रीम खाने की ज़िद करने लगा । हम सभी आइसक्रीम खा रहे थे कि अचानक एक कार हमारे सामने से इन्हें टक्कर मारते हुए । आगे बढ़ गई और इन्हें वहीं  बेहोश छोड़कर आगे बढ़ गई । वहां सड़क पर खड़े किसी इंसान ने इनकी मदद नहीं की और मैं इन्हें ऐसे सड़क पर मरता छोड़ कर नहीं आ सकती थी । स्वाति रविश की तरफ देखते हुए - और इतनी रात गए हास्पिटल ले जाने का फैसला मेरा था ।  इसमें नेहा या पीहू की कोई गलती नहीं है ।  मैंने कहा भी नेहा को की सब घर चलें जायें । लेकिन नेहा और पीहू ने मेरी बात नहीं मानी । स्वाति हाथ जोड़कर - मुझे माफ़ कर दीजिए आगे से बिना आपसे पूछे ऐसा कोई काम नहीं जिससे आपको तकलीफ हो । बोलते हुए स्वाति की आं...

गलती भाग २५

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  " नहीं माॅ। ऐसा निर्णय क्यों। मेरे हित चाहते चाहते मेरे ही हित की अवहेलना क्यों। इसकी तुलना में तो अच्छा रहता कि पंचायत ही न बुलाई जाती। चोट लगे हुए की चोट पर मलहम लगाने के स्थान पर उस घाव को छेड़ना... । क्या चोटिल के कष्ट का अनुमान नहीं है।"   दया अपने मन के रोष को मन में न रख पायी। " इसमें परेशानी ही क्या है। हमारी बिरादरी में तो पहले भी ऐसा होता रहा है। "   बेटी की तकलीफ सबसे ज्यादा माॅ समझती है। पर कभी कभी स्वार्थ की पराकाष्ठा जब होने लगती है तब माॅ भी माॅ नहीं रहती। सुरैया मानतीं थी कि इस निर्णय का दया के जीवन में कोई अच्छा प्रभाव नहीं होगा। फिर भी मानतीं थी कि स्त्री को बार बार समझोता करना चाहिये। बिना समझोते के स्त्री का क्या जीवन।   " पर माॅ।"   " अब कुछ नहीं। यह तेरे दादा का निर्णय है। सभी रिश्तेदारों का निर्णय है। फिर खुद अपनी ही क्यों सोचती हों। शुचि का भविष्य क्यों बर्बाद करना चाहती हों।"   " शुचि। उसका क्या हित।"   " किसी भी संतान का हित केवल उसके परिजन ही सोच सकते हैं। किसी अन्य से क्या आशा। "   दया चुप रह गयी।...