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Showing posts with the label कीर्ति रश्मि नन्द

मेरे पथ प्रदर्शक

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मेरे पथ प्रदर्शक के लिए सरेआम कोई सवाल न पुछो। किस तरह किया होगा उजाला मेरी राहों में हाल न पूछो। कभी चाहतों को जलाया होगा कभी अपने हृदय को, फिर भी कैसे रखा होगा मुस्कान को संभाल न पूछो। जीवन की गहरी खाई को अपने विचारों से रौशन किया होगा। मेरे लिए आगे न बढ़ पाए होंगे अरमान दिल में दफन किया होगा। रहे वो ज्ञान के देवता शिव समान हरदम फटेहाल न पूछो। मेरे भविष्य निर्माता बने थे कैसे तीसरी नेत्र डाल न पूछो। मेरी छवि में देखते होंगे अपने सपनो को साकार होते। सम्पूर्ण जीवन को जिया होगा स्वयं में मेरा अवतार होके। प्रथम वंदनीय आज वही हैं मेरे, गौरी के वो लाल न पूछो। अपने ऐबी रूप में भी हमें दिया कितना सुंदर ढाल न पूछो। हैं आज वह हर रूप में हर स्वरूप में मेरी आत्मा के संग संभाल रखा है उन्हे अब भी अपने हरेक रिश्तों के रंग में रंग  ढूंढ़ लेता है मन कहीं भी उपमा दे के उन्हे बेमिसाल न पूछो पंख के बजाए जमीं पर दिया कैसे उन्होंने कदमताल न पूछो।           --------------------------    मौलिक व स्वरचित    ~ कीर्ति रश्मि "नन्द" ( वाराणसी)

असली गणतंत्र

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अपनी आजादी के संघर्षों को याद कर आओ गणतंत्र पर्व मनाएं । शहीदों को भाव भीनी श्रद्धांजलि देकर आओ तिरंगा फहराएं। पर फहराते तिरंगे के नीचे जाने क्यों मन बहुत चिंतित है । क्या शहीदों के वतन का असली गणतंत्र प्रतिबिंबित है ? छूट पाएं हैं क्या हम अपने बंधनों से,अपने कुविचारों से ? क्या आजाद हो पाएं हैं जीवन के दिखावटी प्रकारों से ? नहीं ,हम अब भी नहीं स्वतंत्र सामाजिक ऊंच नीच के भाव से। दिखता है अंतर भी भाषाई और धर्म के नाम पे पलता चाव से। हम सब अब भी दास बने हैं छुआछूत जाती- पाती के । जो दिन ब दिन अंदर से और हमें खोखली करती जाती है। सोचने समझने की क्षमता को हमने गिरवी रख दिया । बेटियों को पिंजरे में कैद कर स्वतंत्र होने का दंभ भर लिया। अपूर्ण लोकतंत्र की गढ़ी हमने अब तक की परिभाषा है। जबकि आधी आबादी के मन में अभी भी स्वतंत्र होने की आशा है। सही मायने में हमारे तिरंगे की रंगत विश्व पटल पर तब छाएगी। जब खुले विचारों के संग नमन कर शहीदों की यशोगाथा गाई जाएगी। जय भारत 🙏          स्वरचित व मौलिक --      कीर्ति रश्मि " नन्द"       ...

नया सवेरा आने को है

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ऊषाकाल सी लाली मुख पर,आया जोश नया है। उनींदी आंखों से जाग कर पाया होश नया है। हर ओर सुनहरी ऊर्जा का स्वर्ण घेरा छाने को है, गौरवान्वित आभा युक्त एक नया सवेरा आने को है।। आशाओं की अरुणोदय से अति घबराती हूई। जाती दिखती है दुःख भरी रजनी शर्माती  हूई। विहंगो के सुरीले स्वर मधुर रस बरसाने को है, गौरवान्वित आभा युक्त एक नया सवेरा आने को है।। उर सन्ताप का घनघोर तमस बस छंटने वाला है कुहासा ये दीर्घश्वास सा अब बस घटने वाला है नभ की कीर्ति रश्मियां व्याकुल धरा पाने को है गौरवान्वित आभा युक्त एक नया सवेरा आने को है शतदल की बंद पंखुड़ियों में बन्दी बेसुध पड़ा था मन भ्रमर अभिलाषाओं के जंजाल मध्य जकड़ा था मृदु छद्मावरण से परे स्वतंत्र बसेरा बसाने को है गौरवान्वित आभा युक्त एक नया सवेरा आने को है       ---------------------  मौलिक व स्वरचित~ कीर्ति रश्मि "नन्द( वाराणसी)

मैं और मेरी चाय

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उष्णता से मिलन के पहले था शांत शीतल जल। आंच की छुअन से ही हमारे प्रेम की भांति पड़ा उबल।।  फिर डाली उसमें मैंने चंद चायपत्ती तेरे प्यार सी। उस उबाल में फैली लालिमा शर्मिली निखार सी।। अपने श्वेत धवल मनमीत सा उसमें मैंने जो दूध मिलाया। प्रियतमा के गुलाबी गालों सा तब मैंने वो रूप पाया।। डाला उसमें फिर वो मिठी सी छोटी शक्कर की डली। मेरे मधुर जीवन की भांति मिठास उसमें भी यूं घुली।। मिलाया मैंने उसमें फिर कुछ मसाले अपनी नोक झोंक सी। अदरक इलायची की सुगंध बिखर गई हमारे प्रीत योग सी। ताप की आंच पर उसका सुंदर स्वरूप पूर्ण हुआ। ज्यों जीवन की धूप तपकर हमारा प्रेम सम्पूर्ण हुआ।। सुंदर पात्र में उतारा जब इसे अपनी चाहत की तरह । तेरे संग का बहाना मिल गया मुझे तब राहत की तरह।। सिमट कर प्याली में वो सोंधी महक घोलती जाये। तेरे कंचन आनन सी है प्रियतम "मैं और मेरी चाय" ।।         मौलिक व स्वरचित कीर्ति रश्मि "नन्द( वाराणसी)

तू आरंभ मैं अंत

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जैसे तू मुझे संभाले है वैसे मैं सहारा तेरा हूं,   परिवर्तन को छुपाए तेरे जीवन का फेरा हूं। तू नवकिसलय सा और मै घना वृक्ष अविचल,   जीवन की इस धूप में तेरे लिए छांव हूं हरपल। रूप  है तू मेरे भूत का और मैं तेरा अनागत,   तेरी ढलती सांझ हूं मैं,तू मेरा भोर समागत। जहां तेरे हाथों में हैं मेरे लड़कपन की लड़ियां ,   वहां मेरे हाथों में तेरी गंभीरता की हैं झुर्रियां । कदम तेरे लड़खड़ाते हैं तो मैं भी कंपित हूं,   तू मजबूत नींव स्तंभ का मैं धूल धूसरित हूं। मेरे सम्पूर्ण जीवन की तू यादों की सौगात है,   और तेरा आने वाला कल मेरे रूप में तेरे साथ है। पूर्ण है ये जीवन तेरे कदम से मेरे कदम तक,   उदित"रश्मि तू ले चल मुझे मेरे उस तम तक।  तू इस जीवन चक्र के अनेकानेक बिंदु में से,   आरंभ है मेरा और मैं अंत तेरा इस सिंधु में से।             ------------------------  मौलिक व स्वरचित~     कीर्ति रश्मि "नन्द            ( वाराणसी)

मन को साध लो

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प्रतिकूल परिस्थितियों में भी  जीवन धारा यूं बहने दो ।            मन अनुसार न होगा हरदम  उतार चढ़ाव जरा सहने दो ।       थाम दी जाती है बांधो से शक्ति उफनती नदी की भी,          सो आवेश हृदय के अपने हृदय में संयम से रहने दो।।                                  +++++ सोलह कलाओं से युक्त जो चंद्रमा सदियों से प्यारा है । बादल की ओट में क्या कभी  हमें लगता वो बेचारा है ? क्षणिक दुःख के आगमन को तुम  विपत्ति कभी न अपनी बनाओ, अपने व्यक्तित्व की आभा को  इस पूरे अम्बर को गहने दो ।। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी  जीवन धारा यूं बहने दो।।            +++++ पंक के दूषित परिवेश में  भला पंकज कभी मैला है? महत्व नहीं क्या उस सर्प का जो स्वभाव संग विषैला है? सुख दुख तो जीवन में अपने  जीने हेतु चालक यंत्र हैं, जो मिला उसी में खुशी ढूंढ दुखों को स्वत: ही ढहने दो।। प्रतिकूल ...

तेरे इश्क में

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बचपन से लेकर जवानी तक। तुम्हें सताने की मनमानी तक। श्रेष्ठता का भाव मेरे अंदर था। जलन का बहुत बड़ा समंदर था। बिन बात तुम्हे नीचा गिराता हुआ। हर बात पे तुम्हें रुलाता हुआ। जवानी की दहलीज पे मैं आ गया। और अपने रंग रूप पे इतरा गया। अहंकार के पर्दे से मैं देख न पाया। विधाता ने उकेरी थी तेरी जो काया। दिन पंख लगा के उड़ रहे थे। हम दोनों अपने रास्ते मुड़ रहे थे। न मैंने पुकारा न तूने बुलाया मुझे। फिर एक दिन वक्त ने आजमाया मुझे। तेरे विदाई की घड़ी सुहानी आ गई। लेने तुझे वो डोली अनजानी आ गई। देख तेरी वो डोली वो फूलों वाली। टीस सी उठी दिल में कुछ भूलों वाली। हृदय आज बहुत व्यथित था। सुन रहा था वो जो कभी न कथित था। जिंदगी सीख नई सिखला रही थी। तेरा रूप कुछ और मुझे दिखला रही थी। कह रही थी "ले मैं तुझको छोड़ चली। तेरी होकर तुझसे मुंह मोड़ चली। जब मैं रहती थी सदा पास तेरे। समझ न पाया था तू एहसास मेरे"। चेहरे पे ख़ुशी पर मन में बवंडर था। जाने कैसा विछोह का ये मंजर था। तेरी जुदाई के डर से मन कांप उठा । सब कुछ खोने का दर्द मैं भांप उठा। जो चली तेरी डोली तैयार होके। बेजान हो गया मैं तेरे...

समझौता( कम्प्रोमाइज)

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उसने कहा" मैं मां को साथ नहीं रखूंगा"। क्यों ?" जज ने पूछा "इस बुढ़ापे में तुम ही तो उसका सहारा हो फिर ये रवैया क्यूं"...। "मेरी बीवी नहीं चाहती उसका इगो हर्ट होता    है" लड़के ने बनावटी बात बोली। "ये भी भला कोई बात हुई ,समझाओ बीवी को" " नहीं समझा सकता" क्यूं" "उसका इगो भी महत्व पूर्ण है" वह कुछ सोचते हुए कहता है। " क्या मतलब" " मैं कौन होता हूं उसे समझाने वाला"  " अरे तुम उसके पति हो" "पति हूं तो क्या वो मेरी बात मानने के लिए बाध्य है" उसने उल्टा सवाल किया। जज ने सोचा ..... " तो तुम्हारी मां तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है? जज ने पुनः सवाल किया। " है और मैं उठाऊंगा भी.... पर मैं अपनी फैमिली के साथ उन्हें नहीं रख सकता " उसने मजबूती से कहा शायद उसे कुछ पिछला हिसाब चुकाना था। अब मां को तो वैसे भी अकेले रहने की आदत है... है  न मां !! " छोटी से छोटी बात पर कानून का फायदा उठाने वाली उस औरत से उसने पूछा। सन्नाटा...  मां के आंसू लगातार बह रहे थे। उसे याद आ रहा ...

एहसास

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बड़ा ही व्यापक शब्द है... एहसास या अनुभूति...। और विरोधाभास की तरह... बड़ा ही संकुचित भी...। किसी एक बिंदु पे आकर ... तेरे एहसास से ...। कुछ अलग होंगे मेरे एहसास... भले ही विश्वास रहे विश्वास से ...। जब बीतेगी मन पर दुखों की वेदना... या सुखों के गहरे समंदर में...।  जब कहीं खो जाऊंगी, अनगिनत लिए बवंडर मैं...। क्या तुम भी जी उठोगे ... उसी तरह मेरे उस पल की भावनाओं को ...। पीड़ाओं को .... या सूख के उस प्रतिमाओं को...। सम्भवतः नहीं... तुम मात्र कल्पना कर सकते हो...। मेरी मनस्थिति की..., पर उसे जी नहीं सकते हो ...। मेरी वेदना... संवेदना ले नहीं सकते उस स्थित बिंदु के पास से ...। भले गुजर जाओगे   परन्तु वंचित रह जाओगे मेरे एहसास से। मैं भी कैसे दावा कर दूं...कि... तुम्हारी पीड़ा समझ सकती हूं...। तुम्हारी खुशी में... वही प्रफुल्लता जी सकती हूं...। वास्तव में तुम जो होते हो...उस बिंदु पे...  तुम्हारा व्यक्तिगत एहसास है...। मैं उसे जी सकती हूं... भ्रमित करता हूआ ये मेरा आभास है। कल्पना में...भले जी लूं पर... तुम्हारी तरह जी न पाऊंगी। यथार्थ की धरातल पर... दिखावे की झी...

पिता

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मेरे स्कूल न जाने पर  पिता  की  वो  पिटाई...आज भी याद है।। उसके बाद उनकी आंखें थी जो छलक  आई... आज भी याद है।। जब उन हाथों पे रखी थी मेरी पहली कमाई...आज भी याद है।। फिर से एकबार उनकी आंखें थी छलक आई...आज भी याद है।। मौलिक व स्वरचित:- कीर्ति रश्मि "नन्द( वाराणसी) छायाचित्र :- साभार गूगल

गज़ल

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2122 2122 2122 212 दर्द है आवाम सारी मजहबी दिखने लगी क्या कहूं तुमसे धरम की बंदगी दिखने लगी।। जिस्म के संग रूह भी वो बेच बैठें हैं यहां शहर हो या घर सभी में नाखुशी दिखने लगी।। क़त्ल होता है सरे बाज़ार अब तो हर पहर  सूख जाते हैं लहू वो दिल्लगी दिखने लगी।। मुल्क मेरा दर्द से उभरा है अभी तो और फिर बदनसीबी की वही सब दरिंदगी दिखने लगी।। राज अब तो कर रहें सिंह भेष धर गीदड़ यहां, बेअसर होती दुआयें कीर्ति" की दिखने लगी।। मौलिक व स्वरचित:- कीर्ति रश्मि "नन्द( वाराणसी)

दीपावली का भाव

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देख असंख्य दीपों की दीपमाला       विस्मित खड़ा घनघोर तम काला। आज अमावस ठौर नहीं उसकी       दीए तले छुप के डेरा उसने डाला।। गहन तिमिर का तो यही भाव है       रौशनी से छुपना सदा का स्वभाव है। अपनी दीपावली विजय गाथा सी है         हुआ विलीन वह श्याम वर्ण वाला।। दिए तले अंधेरा" कहावत चरितार्थ न हो       दूजे की बुराई निकाल सिद्ध स्वार्थ न हो। दमकते रौशन चेहरे के पीछे मानव!       क्यूं तेरे हृदय ने अंधकार को पाला।। अबके दीपपर्व अपना ये उदाहरण हो        एक दीप उस" के भी चौखट रौशन हो। वह जरूरतमंद दुआएं जरूर देगा       जिसे दिया तूने खुशी भरा निवाला।। तंत्र मंत्र सिद्धि छोड़ अलख ये जगाते हैं     इस पर्व मानवीयसंवेदनाओं को बुलाते हैं। रौशन जहान हो सबका अभिमान हो      एक मन से दूजे मन तक फैले उजाला।। दीपों की कतारों के मध्य जगमगाती रात        आज कुछ यूं दांव लगाने करते हैं बात। कुछ उनको देते हैं कुछ उनसे लेते है  ...

जीवन धारा यूं बहने दो

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          ++++      प्रतिकूल परिस्थितियों में भी  जीवन धारा यूं बहने दो ।            मन अनुसार न होगा हरदम  उतार चढ़ाव जरा सहने दो ।       थाम दी जाती है बांधो से शक्ति उफनती नदी की भी,          सो आवेश हृदय के अपने हृदय में संयम से रहने दो।।                                  +++++ सोलह कलाओं से युक्त जो चंद्रमा सदियों से प्यारा है । बादल की ओट में क्या कभी  हमें लगता वो बेचारा है ? क्षणिक दुःख के आगमन को तुम  विपत्ति कभी न अपनी बनाओ, अपने व्यक्तित्व की आभा को  इस पूरे अम्बर को गहने दो ।। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी  जीवन धारा यूं बहने दो।।            +++++ पंक के दूषित परिवेश में  भला पंकज कभी मैला है? महत्व नहीं क्या उस सर्प का जो स्वभाव संग विषैला है? सुख दुख तो जीवन में अपने  जीने हेतु चालक यंत्र हैं, जो ...

प्रतीक्षा चांद की

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ओ चांद ! आज तेरी प्रतीक्षा में मैंने      सारा दिवस जतन करते बिसार दिया । तेरी एक झलक पाने को "सुधांशु   तन मन अपना प्रसन्नता से संवार लिया ।।               अब मेरे प्रेम की परीक्षा ही नहीं "शशि आज रजनी बेला में तेरा भी इम्तिहान है । भले ही लाख नखरे दिखला ले तू चंदा  पर सुहा गिन सम्मुख आना तेरा विधान है ।।               आज अपनी गंभीरता को ग्रहण कर मैंने सोलह श्रृंगार संग अब "सुशांत धैर्य धरा है । तेरी आभा में अपने पी का मुख देखूं  प्रत्येक दिन आज के लिए ये आस गढ़ा है ।।                 पिया मेरे आज सुख के साथी बन प्रत्येक भावनाओं को क्षण में जा रहे समझ। पर ओ मयंक! तू तो यूं लजा रहा है  जैसे आती हो नववधू कोई उलझ उलझ ।।                 व्रत करवाचौथ का उठा कर मेरे चंदा आज निहारूं राह तेरी अपने "उनके संग। आजा ओ! मेरे चांदनी युक्त धवल रजत ! बढ़ा दे मेरे माथे पे साजन के प्रीत का रंग ।।   ...

अपने रूप में रंग दे मां

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       ---------------   हे! नवदुर्गा ! , हे! परमेश्वरी! हे! परम पूज्य माता, इस पर्व पर मेरी विनती... तुझसे कुछ विशेष रहे। हे!पहाड़ों वाली माता!! विषमता में समता दे , सबके लिये रहे.. जब तक ये जीवन शेष रहे।। ++++++++++                 हे! त्रिनेत्र धारिणी!! अच्छे बुरे का अंतर कर सकूं, तीसरी नेत्र सा माता... मुझको भी संज्ञान रहे। हे! बहुभूजा धारीणी!! कर्तव्य निर्वहन कर पाऊं भली भांति बल मेरे हाथों को... तेरी भुजाओं समान रहे।। ++++++++++ हे! अनन्त रूपों वाली!! तेरी तरह जटिलता में भी, सरलता का सुंदर रूप... मेरा भी प्रतिवर्ष रहे।। हे! मनोहारिनी माता!! नारी रूप में संपूर्ण बन,  वंश बेल बढ़ाने का... सौभाग्य मुझे सहर्ष रहे।। ++++++++++ हे! शक्तिरूपा!! शक्ति रूप से सदा सराबोर रहूं, प्रयोजन से अस्त्र शस्त्र का... सार्थक योग रहे। हे! विद्यादायिनी!! झोली इतनी मेरी भर देना की  शिक्षा संग विनम्रता का भी... मन में प्रयोग रहे।। ++++++++++ हे! शिवप्रिया!!! अपने पति की प्रिय रहूं सदा,  संग पिया का मेरे जीवन में... मुझ...

दिल्लगी का बेरंग सिलसिला

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अच्छा हूआ कि खत्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला,  न मुहब्बत न नफरत, रस्मों रिवाज भी रहा बेहद ढीला, पारावार की मौजों में उफनती रही चाहत की कश्तियां। पर यकीं जानो तुझसे जुदा होके सुकून बहूत मिला।। कारवां- ए- जिन्दगी आज गूजर ही गई उस मोड़ से, निकल गई अब तो सारी हसरतें भी अपनी उस दौर से, वक्त का वो मंजर यादों में जब मिला, बेरौनक ही  मिला। अच्छा हुआ कि खत्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला।। माना कि कांटों में खिलने वाले फूल से जज्बात थे हमारे, पर हल्की हवा भी उड़ा दे उस धूल जैसे ख्यालात थे हमारे, ज्वार भाटों से खौलते दिल, पर आंखों का रंग हरदम पीला। अच्छा हुआ कि खत्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला।। पतझड़ में भी रौशन  हुआ करती थी जहां कभी वो बहारें, ज़ालिम जमाने की नजरों ने गिरा दी सब सुनहरी वो दीवारें, विरान राहों पर दिखता है चारो ओर खंडहरों का टीला। अच्छा हुआ कि खत्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला।। रुसवा न मैंने किया कभी तुझे न तूने ही किया कहीं कोई दावा, बस उतरता रहा सीने में, जाने क्यों सुलगता हुआ इक लावा, न दर्द की दास्तां रही दोस्त न ही रहा कोई भी शिकवा गिला।...

🍁मैं तुम्हे फिर मिलूंगी🍁

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मेरे जन्म लेते ही तुम लगे सर झुकाने। तब से ही मेरे ब्याह हेतु लगे रुपए जुटाने।। मुझे निर्बल सा बना जीवन की सीख न दी। मेरे 'पर' काट मुझे कैद चारदीवारों में की।। जो चाहूं मैं उड़ना तो उड़ान छीन लेते थे। कोई बहेलिया न लूट ले आसमान छीन लेते थे।। आज बताओ न बाबा बात एक पूछती हूं। मेरी शादी ही लक्ष्य था तेरा आज सोचती हूं।। मेरे अस्तित्व पे कर के हजार कुठाराघात । गैर हाथों सौंप, निश्चिंत कर लिए अपने जज्बात।। क्या तू रोया न होगा बाबा! कभी चुपचाप। तेरी जानकी अग्नि में जब होती होगी राख।। तू जब निर्मोही तो मेरा मोह करेगा कौन। मेरे सवालों पे तू आखिर कब तक रहेगा मौन।। कोई नहीं ! उसी राख से पुनः नारी बन निकलूंगी। मुझ से पीछा न छुड़ा मेरे बाबुल !!! मैं तुम्हें फिर मिलूंगी।।    मौलिक व स्वरचित --  कीर्ति रश्मि "नन्द (वाराणसी)

ईमानदारी

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      "आज क्या क्या खरीदा आपने मेले में" दादी ने रिया से पूछा जो मेला घूमकर बहुत खुश लग रही थी। बच्चे भी न! कितनी मामूली सी बात पे खुश हो जाते हैं इन्हें खुशी देने के लिए बहुत बड़े तामझाम की जरूरत नहीं होती है। दादी मन ही मन रिया की खुशी देख मुस्कुरा रही थी।            अरे!!! दादी बहुत सुंदर मेला था हमलोग खूब घूमें , फिर भाई और पापा संग झूला भी झूला मैंने... वो चकरी वाला ... ट्रेन वाला ... घोड़े वाला ...,          "अरे बस बस... ये बताओ तुमने कुछ खाया पिया कि नहीं" दादी जानती थी रिया चुप होने वाली नहीं है तो उसने उसकी बातों पे विराम देते हुए पूछा।          " हां दादी पापा ने हमें बहुत अच्छी अच्छी चीजें खिलाई आइसक्रीम, केक, गोलगप्पे वो भी मीठे वाले मूंगफली... " फिर कुछ सोचती हुई बोली " पर दादी आप रहती और मम्मी रहती तो हमें और बहुत मजा आता।" और वह निराश हो गई            दादी रिया का उतरा चेहरा देख सोच में पड़ जाती है साल भर में एक बार तो ये दुर्गापूजा को मेला...

रक्षाबंधन

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-------------- रेशमी डोर रक्षा की कभी पिघलती नहीं। मियाद हमारे प्रेम की कभी ढलती नहीं।। तुम चाहे दूर रहो चाहे पास मेरे। बहन की आस्था कभी बदलती नहीं।। दिन का कोई पहर ऐसा नहीं भाई। जब दुआ तेरी सलामती की पलती नहीं।। हमेशा गुजर जाती हूं वहां से। जहां तुझ संग जिंदगी कभी खलती नहीं।। चमकीला है ये मौसम राखियों से। कैसे कहूं वो जगमग मुझे छलती नहीं।। उन राखियों में एक कलाई तेरी है। यादों से मेरी ये सुखद आशा टलती नहीं।। रक्षाबंधन के इस मनभावन पर्व पे। तूझसे मिलने की भावना संभलती नहीं।। देख तुझे तस्सली से भर जाती हूं। तब दुखों में दीपशिखा सी जलती नहीं।। मेरी राखी रिश्तों को मजबूत कर। यादों में बसाए रखती है, फिसलती नहीं।।    मौलिक व स्वरचित -- कीर्ति रश्मि "नन्द ( वाराणसी)

आजाद भारत🇮🇳

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आओ तिरंगा फहराते हैं...  स्वतंत्रता का पर्व मनाते है... साल में एकबार हमने झंडोत्तोलन कर लिया अपनी आजादी के संघर्षों को याद कर लिया दे दी भाव भिनी श्रद्धांजलि शहीदों को... संजो लिया स्वतंत्रता सेनानियों की यादों  को... पर नभ में फहराते इस तिरंगे के नीचे... क्या वास्तव में हम आजाद है ये सोचें... हमारा तिरंगा है हमारी आजादी का प्रतीक परतंत्रता से स्वतंत्र होने की सीख... पर हम अपने बंधनों से अपने विचारों से... क्या आजाद हो पाएं हैं जीवन के प्रकारों से। सोचें हमने जिस देश के लिए...                                       लड़ी लड़ाइयां जिस परिवेश के लिए... क्या वास्तव में ये वही लोकतंत्र भारत है...? क्या वास्तव में इसे ही कहते स्वतंत्र भारत है...? नहीं.....!!! हम अब भी नहीं स्वतंत्र...  सामाजिक ऊंच नीच के भाव से... भारत में पलता जो अत्यंत चाव से। संपन्न और संपन्न हुए जा रहें है... विपन्नता का दंश दबे कुचले पा रहे हैं। हम सब अब भी दास बने हैं जाती- पाती के... जो दिन ब दिन ह...