जीवन धारा यूं बहने दो

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प्रतिकूल परिस्थितियों में भी 
जीवन धारा यूं बहने दो ।           
मन अनुसार न होगा हरदम 
उतार चढ़ाव जरा सहने दो ।      
थाम दी जाती है बांधो से
शक्ति उफनती नदी की भी,         
सो आवेश हृदय के अपने
हृदय में संयम से रहने दो।।          
            
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सोलह कलाओं से युक्त जो
चंद्रमा सदियों से प्यारा है ।
बादल की ओट में क्या कभी 
हमें लगता वो बेचारा है ?
क्षणिक दुःख के आगमन को तुम 
विपत्ति कभी न अपनी बनाओ,
अपने व्यक्तित्व की आभा को 
इस पूरे अम्बर को गहने दो ।।
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी 
जीवन धारा यूं बहने दो।।

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पंक के दूषित परिवेश में 
भला पंकज कभी मैला है?
महत्व नहीं क्या उस सर्प का
जो स्वभाव संग विषैला है?
सुख दुख तो जीवन में अपने 
जीने हेतु चालक यंत्र हैं,
जो मिला उसी में खुशी ढूंढ
दुखों को स्वत: ही ढहने दो।।
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी 
जीवन धारा यूं बहने दो।।

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सहनशील बन जाना स्वयं में 
सामर्थ्य ही तो दर्शाता है।
वो पतनोन्मुख है जो इनको 
शक्तिहीन यथा बताता है।
बात आन बान शान की हो
या कदाचित मन अभिमान की,
धीरज संग हर निर्णय धरो
शांत भाव मन को महने दो।।
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी 
जीवन धारा यूं बहने दो।।

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मौलिक व स्वरचित:-
            कीर्ति रश्मि "नन्द
( वाराणसी)
छायाचित्र :- साभार गूगल

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