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Showing posts with the label विकास कुमार लाभ

भीड़ से निकल

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आ गया है समय फिर से, अब तू जीत के निकल... कहीं अकेला फँस न जा, इस भिड़ से निकल... आ गया है समय...... ना परवाह कर तू नाकामी की, हौसला चल बुलंद कर... मौका मिला एक बार फिर, जा सपने तू साकार कर... आ गया है समय...... सरपट् भाग...देख! नाकाम बहुत है... हौसलों पर टिके रहने की, गुलाम बहुत है... अकड़ दहाड़ चल दौड़ लगा, देखना झुकेगी आसमां अब ना देर कर... आ गया है समय...... आगे आ...भीड़ को छोड़ चलो, अपने मंजिल के पथ पर अब दौड़ चलो... देख...फैलाये हैं हाथ तेरी दुआं को, दे जीत की सलामी...खुद पे यकींन कर... आ गया अब समय...... ✍ विकास कुमार लाभ          मधुबनी(बिहार)

भूखक मारल "मैथलि कविता"

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तरपैत बिलकैत भूख सँ मुदा, आहार नै हमरा किछु भेटल... सांझ-पराति परितै देरी, पेट तरैप-तरैप कै सेकल... नै जानै कोन जनमक पाप पड़ल थीक, लोक-लाज सब बिसैर गेलैऊ... जमन लैलौं गरीबक घर मुदा, ठाठ-दुआर सब छुटल... करम दुआर पर भटैक रहल छि, पेट भरबाक लैल घर मिलैय... अप्पन झोपड़ी पर बाँस नै कोरो, तैं कैकरा सँ भूख मिटैय... गरीब रहल थिक आइ नरक भेलौं, अमीर रहितौं धरि पोथी... माइर रहल सब लात-जुता सँ, पेट भरल नै कोठी... आइ गरीब बनल पाप थिका, नै कनियौं मिलल सम्मान... भूखक चादर लिपैट कै मरल, तखनो धरि करैत लोक अपमान...  ✍विकास कुमार लाभ          मधुबनी(बिहार)

प्यार के पहलू

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तेरे होने से मैं चूक रहा हूँ, आज यह इम्तिहान हमारा है... कभी तकलिफ़ की आहट भी ना मिला, ये रातें भी हमने रोते-रोते गुजारा है... यह कैसी कसमोकस है लफ़्जों की, ना-हा-हा-ना में मिल पायें... उन्मुक्त गगन की चिड़ियाँ बनके, खुले आसमां तक ऊड़ पायें... कभी हिम्मत करके हाँ भरों तो, देखो एक बार हमारे नजरों से... रूप तरुन की गहराई में, विरक्त-प्रेम की अँखियों से... मोह की ताले खोलो रे मन, वैराग्य नहीं है पथ प्रेम की... छुटे नहीं कभी ये अर्पण, तेरी यादों की दिल के डोर की...   ✍विकास कुमार लाभ           मधुबनी(बिहार)

क्षणभर की यात्रा

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ये मालिक तूम क्यों भेजे हो, तन का भी सेवा ना कर पाऊं... रात्रि मोम से 'लौ' जली है, ना नींद कभी पूरी कर पाऊं... सब कहता है सत् कर्म करो, पर सत् कर्म को ना मैं समझ पाऊं... भिक्षा से भयभीत लगे, फिर कैसे मैं भिक्षुक बन पाऊं... ना उम्र सदा कभी एक रहे, ना कर्तव्य पथ कभी मैं चल पाऊं.. साधूओं की जन सेवा में, अपना कर्तव्य निभाता जाऊं... हे इश्वर मेरा राह बतादे, किस पथ पर मैं चलने आया हूँ... कब तक मैं इस जग का सेवक, कुछ समय के लिए रहने आया हूँ... ना यहाँ मेरा अपना है, सब तेरा ही तेरा कहता है... फिर मेरा कौन कहो मालिक, किसके साथ मैं रहने आया हूँ... इस जग का कोई मोह नहीं, जहाँ देखता हूँ केवल विष ही विष है... डर कर जिने से मौत भला, मैं तो अमृत जल पीने आया हूँ... बस पुरातत्व की समाधि पर कौन ले जाऐगा, अग्नि की आहुत कौन दे जाऐगा... ना कोई मेरा सा एक कहे, इसी डर से शरीर कँपकपा जाऐगा... फिर ना सुख ना दुःख की चिंता, ऐसा भाव कहाँ पाऊँगा... नश्वर की परलोक सिधारुँ, जहाँ सदा पूजे जाऊँगा... बस एक सदा तेरी आश लगे प्रभू, कर कृपा इतना भर तू... मेरा भी सदा मान रहे, फिर ना तन का कोई रोग लगे... ✍️वि...

जलियावाला बाग हत्याकांड

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यह अप्रैल है लथपथ खूनों से,    जलियावाला बाग नरसंहार की... एक नहीं हजारों माशुमों की,    बलि चढ़ि थी जान की... यह अप्रैल है...... आज बैसाखी के दिन 13 थी,    अमृतसर की पावन भूमि सजी... खुशियों अमन की मेला लगी थी,    हजारों लोगों की भीड़ जुटी... यह अप्रैल है...... एक क्रूर आदेश था जनरल डायर की,    निहत्थे लोगों पर गोली चलवा दी... बच्चे,बूढ़े,माताओं को,    बेघर,बेवजह मरवा दी... यह अप्रैल है...... एक कवि थे रविन्द्र नाथ जी,    जिनको इस घटना की घात लगी... ब्रिटिश उपाधि "सर" का ताज़,    उन्होंने अंग्रेजों को फौरन लौटादी... यह अप्रैल है...... मैं सभी शहीदों को नमन करता हूँ,    जिन्होंने अपनी प्राण गवाये थे... यह दिन अंग्रेजों की है 'काला' चिट्ठा,    सबको याद दिलाने थे... यह अप्रैल है......    ✍️विकास कुमार लाभ            मधुबनी(बिहार)

खो गए हैं हम

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ना जाने किस दिशा में जा रहे हैं, एक उम्मिदें दासतां संजोये हुए... ये कैसी करवट बदल रहा है जिंदगी, सपनों को पिरोये जा रहे हैं... उल्फ़त अंगारों की प्यासी है, नम होते पिघल रही... दिल किसकी राहें देख रही, जो होने से भी घिसक रही... रुआं-रुआं कभी काँप रही, तन में आहट की चुभन... डूबते ही मन जा रहा, क्रुंदन की अनंत सागर में... आज व्याकुलता की सीमा लांघ रही, नक्काशों की जींवन सी बुनाई में... रोना-धोना सब सीख लिया, कुछ ऐसी पिड़-पराई में...      ✍विकास कुमार लाभ              मधुबनी(बिहार)

माँ

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ओ माँ मुझे जोड़ों की भूख लगा है, जरा जल्दी से भोजन लाओ ना... कौआ,तितर,बगरा बनाकर, अपने हाथों से खिलाओ ना... ओ माँ मुझे जोड़ों...... ना आदत है खुद से खाने की, थोड़ा प्यार से फिर खिलाओ ना... सोने जाऊँ जब मैं बिस्तर पर, मीठा-मीठा गीत सुनाओ ना... ओ माँ मुझे जोड़ों...... तुम खाती हो इतने क्यों लेट से, सबको खाना खिलाने के बाद... सुबह भी ऊठती हो सबसे पहले, आती रहती हमेशा तुम्हारी याद... ओ माँ मुझे जोड़ों...... सुबह का नास्ता कैसे बनाती हो? इतना सारा काम अकेले करती हो... आज बताओ मैं भी काम करुँगा, ना बैठकर दिनभर आराम करुँगा... ओ माँ मुझे जोड़ों...... जरा मुझे बड़ा तो होने दो, मैं अपने हाथों से तुम्हें खिलाऊँगा, जो चलती है गाड़ी आसमान में... उसपर बैठकर शैर कराऊँगा... ओ माँ मुझे जोड़ों...... मैं छोटा सा ही तो लड़का हूँ, तुम मेरे लिए कितना कष्ट उठाती हो... करुँगा तुम्हारी नाम भी रौशन, तुम क्यों घबराती हो... ओ माँ मुझे जोड़ों...... जरा देख इधर मेरे तरफ़ "माँ", तू क्यों रोये जा रही है... ना बेटा मैं नहीं रोती हूँ, ये तो खुशी की आँसू निकले जा रही है... ओ माँ मुझे जोड़ों...... बेटा!...

गौरैया

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एक प्यारी सी नन्हीं गौरैया, फुदकती उड़ती अंगराई में... चूंगती दाने झारियों में, बच्चे ले रहीं निंद गहराई में... बच्चे हो या हो परिवार, दिन भर काम में लगे रहती है... चाहे हो भोजन लाने की, या घोंसला बनाने की बारी... अब सायद ही दिख जाती है गौरैया, बढ़े पतन की ओर चले... इसका अस्तित्व बचाना है हम सबको, कहीं देर हो ना जाये ढ़ले... हम सबको है इसकी जिम्मेदारी, जगह-जगह पर दाना-पानी रखें... आ गई है बसंत-गर्मी की, ना किसीसे कोई भूल हो सकें... आओ सब मिलकर कदम बढ़ाते हैं, इस मुहिम को आगे बढ़ाते हैं... ना कहीं समय की चूक हो जाये, आज से ही कदम बढ़ाते हैं...   ✍ विकास कुमार लाभ            मधुबनी(बिहार)

पंछी और मानव

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रे मानव तू ना उतना उड़, पंछी न कभी बन पायेगा... जो दो शब्दों को प्रेम बतादे, क्या? ता उम्र दुःख सहन कर पायेगा... रे मानव तू....... ना तेरे जैसा कोई छत है मेरा, ना तेरा जैसे पहिनावा मिले... घास-फूस की डेरा डालूँ, उसे भी हवा कभी ले उड़े... रे मानव तू....... जिंदगी है तेरा...ना मुझसे लड़, लेगा क्या जान? ता उम्रभर... एक बूंद की ऐहसान नहीं, तरपता छोड़...चल ले डगर... रे मानव तू....... दुःख की पीड़ा तू क्या जाने? जिसे हमेशा सुख-सुविधा मिले... मुझे देख...राही का मारा, ना किसी ने एक बूंद पानी दिये... रे मानव तू....... आओ तुम-हम आपस में सद्भाव रखें, एक-दूसरों के अब साथ चले... मानवता की उम्र बढ़ाने को, भूखे-प्यासे को दाना देते चलें... रे मानव तू.......   ✍विकास कुमार लाभ           मधुबनी(बिहार)

सबने नाता तोड़ लिया

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हर एक से उम्मीदें लगाना छोर दिया, सबने आज नाता तोड़ लिया... आज कोई नहीं है अपना कहने को, आख़री साँसों के हवाले छोड़ दिया... हर एक पहलुओं को जीना सीखा था, पर प्यार कहीं न नसीब हुआ... एक उम्मीदें लगाए थे अपने से, आज अपना कहना भी छोड़ दिया... सोचता हूँ...रूह काँपने लगता है, किसके लिये चलना सीखा... आज मुँह भेरते हैं अपने, क्या इसी दिन के लिये बड़ा किया... क्या गलती था मेरा? थोड़ा सोचने का भी ना मौका दिया... एक इशारे थी अंगुली की, विधी के हवाले छोड़ दिया... भी तो लौटेगा अपना भी दिन, नफ़रत की लाठी तोड़ दिया... कोई मिले कभी अपने कहने को, आज रिस्ता अपना जोड़ लिया... एक एहसास रुलाया हर-पल, कि किसने तेरा नाम दिय... लौटेगा कोई तुम्हें मनाने को, कोई तो आज तुम्हें अपना बना लिया...          ✍विकास कुमार लाभ                  मधुबनी(बिहार)

अपना नाम बनाने आया

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उड़ने दो मैं उड़ने आया, अपना पंख फैलाने आया... चट्टानों को पार करूँ मैं, अपना इतिहास बनाने आया... लांध लूंगा ये ज़मी की राहें, बिस्तर अपना जमाने आया... रुबरू होने की अब है बारी, अपना नाम बनाने आया... अब उड़ने दे आसमां में, अपना कर्तव्य दिखाने आया... भेदूंगा हर आँकड़े को, अपना रंग ज़माने आया... बात बिगरती है दागों से, कलंकित दाग मिटाने आया... रूप बनेगा फिर पौरुष का, सबमें प्यार बढ़ाने आया...   ✍️विकास कुमार लाभ           मधुबनी(बिहार)

कुछ यूँ बदलते रास्ते

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कुछ के रास्ते आसान होते हैं, कुछ मुश्किल भरे दर्मियां... यूँ समझो सफ़र मुश्किलों से भरे हैं, डटो! बनाओ अपना कारवां... देखना! लौटेंगे तुम्हारे भी दिन, निकलेगी कभी तो रौशनी... इन्तजार तो करो तुम जीत की, काफ़ियाँ निकलेगी तुम्हारे नाम की... तू सूरज है! खुद को जलाये जा, निखरने की चमक फैलाये जा... मेहनत से कभी मुँह ना मोरना, यही आदत अपनी लगाये जा... ना रुकना एक स्थान पर, अपना लक्ष लगाये जा... चूमेगा तुम्हें भी आसमां, एक-एक कद़म आगे बढ़ाये जा... हमसफ़र के मोह में, यूँ ना कद़म को मोड़ना... तकलिफ़ में ना रख खुद को, कहीं ज़माना पड़े ना छोड़ना... तू जीतेगा ये जिन्दगी,  जीत का रास्ता बनाते जा... रुख समय का मत देख, सफ़लताओं की चिंगारी जलाते जा...     ✍️विकास कुमार लाभ             मधुबनी(बिहार)

पुष्प बहारों का

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रंग-बिरंगी फूलें बागों में, लहलहाती फूलों की गाँव... पीले-निले अतरंगी सी, मँहक उठूँ खुशबू मेंहकाऊँ... रंग-बिरंगी फूलों...... खिलखिलाती धूप की छिंटे, बिखरे इन्द्रधनुष की रंगों में... इन नजारों की बात अनोखीं, सजती जाये उल्फत गगन में... रंग-बिरंगी फूलें...... मैं मौसम की बादियों में, इतराऊँ कभी भौंरों को लाऊँ... मेरे कोमल सी पंखुरियों में ताज़ी-ताज़ी लुफ्त ऊठाऊँ... रंग-बिरंगी फूलें...... मैं हूँ बागों की अनोखीं रानी, प्यारी रंगों में बिभोर हूँ... झूम ऊठूँ प्राकृतिक के धून में, ना तुमसे मैं अब दूर हूँ... रंग-बिरंगे फूलें......        ✍️विकास कुमार लाभ                मधुबनी(बिहार)

शबरी का बाँध टूट गया

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मन अमृत सा बना लिया, तन रोग 'राम' का लगा लिया... उनके आने की आहट से, नैन मोम रुप का बना लिया... 'शबरी' का बाँध टूट गया......2 ब्रह्म रुप की मानव काया, रोम-रोम बस जाए....2 'राम' की कृपा हुई कभी तो, ना मन तेरा पछताये...2 देर तो है अंधेर नहीं अब, कब तेरा मन भर जाऐगा... 'शबरी' का बाँध टूट गया......2 मालिन के चुने पूष्प सुगंधित, पग पैर जमीं बिछाये...2 मिठा 'बैर' जुठा चून-चून कर, प्रभू 'राम' को दिए खिलाये...2 जग में वंदन नाम रहे, कभी प्रेम नहीं धूल पायेगा... 'शबरी' का बाँध टूट गया......2 दिव्य रुप में समा गई, 'शबरी' पर 'राम' की कृपा हुई... जग तेरा वंदन गायेगा, 'शबरी' का बाँध टूट गया...2      ✍️विकास कुमार लाभ              मधुबनी(बिहार)

गुलाब

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गुलाब सी मैं एक नाजुक कली हूँ, कहीं टूट ना जाऊँ पंखुरियों की तरह... कभी महकूँ अलबेलों की खूश्बू से, मिल जाऊँ फिर प्यार की रंगों में... इस संसार की अद्भुत कली हूँ, आती हूँ एक-दूसरों की संबंध में... मिलता है मुझमें प्यार सभी का, यह कैसा? मैं अलौकिक संगम हूँ... रब को मैं अर्पण करता हूँ, ऐसे ही मुझे प्यार मिले... बन जाऊँगा मैं प्रेम की गंगा, सबमें प्रेम बढ़ाती रहूँ...         ✍️विकास कुमार लाभ                 मधुबनी(बिहार)

मैं निःशब्द हूँ

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ओ माँ! आज मैं निःशब्द हूँ, तेरी महान उपकार का एक शब्द हूँ... हाँ आज मैं निःशब्द हूँ..... वो यादें अंगुली पकड़कर चलने की, बचपन की खुबशूरत वो लम्हा थी... माँ की ममता की एक तरप में, उमड़ता प्यार की भूख हूँ मैं... हाँ आज मैं निःशब्द हूँ..... पहली अक्षर का ज्ञान तुमने सिखायीं थी, "माँ" कहने की आदत भी तुमने लगाई थी... मिला "पापा" का प्यार से लोट-पोट हूँ मैं... हाँ आज मैं निःशब्द हूँ..... हमेशा याद आती है बचपन, मुस्कुराता हूँ अलौकिक आनंद में... अब कहाँ लौटेगा फिर चित्कारी, वो बनाते नख़रे की रूप हूँ मैं... हाँ आज मैं निःशब्द हूँ.....        ✍️ विकास कुमार लाभ                 मधुबनी(बिहार)

पार्थिव शरीर

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ना कुछ खोया,तू जाग परिंदे उमर की लेप लगाने दे... खड़ा होकर बैठ भी जा 'क्षणभर', आख़िरी वेद तो गाने दे... ना कुछ खोया...... ना किसीका चिंतन होगा, ना कभी तू रोऐगा... बीच श्मशान की घाट में, कुंठित मन को टोऐगा... ना कुछ खोया...... सिमट गई अब तेरी आशायें, किसके लिये मैं रत्न गढ़ूँ... दिन बिछाये मन होर रहा, किससे क्या उम्मीद करुँ... ना कुछ खोया...... पँचतत्व की क्यों आहुति दी, आख़िरी साँसें भी दान किया... क्षणिक धरोहर क्यों छोड़ गया, यादें भी गुमनाम किया... ना कुछ खोया...... जब देखूँ तश्वीर तेरा मैं, ना खुद को कभी रोक सकूँ... ढ़बक उठता नैनों से लोड़ महज, कैसे मन को बाँध सकूँ... ना कुछ खोया......   ✍️विकास कुमार लाभ           मधुबनी(बिहार)

शोर्य ये बलिदान की

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हर-एक फौज को नमन करुँ मैं, जय बोलूँ हिंदुस्तान की... आऊँगा फिर याद दिलाने, सोर्य ये बलिदान की...... रात-दिन सैनिक जाग रहे, और हम जीतें हैं शान में... आओ मिलकर दुंआ करें, हम सब अपने भगवान से... आऊँगा मैं याद...... जब-जब दुष्मनों नें नापाकी की, तब-तब "रावत जी" जैसे कमान बने... अलग-थलग करते गये बंबारी से, "सर्जिकल" भी सीमा पार की... आऊँगा फिर याद...... ना हम लड़ते ना लड़ना चाहते, आपस में मेल से रहना चाहते... गर कोई आँख-बिचौली खेले तो, कसम है भारत की आन की... आऊँगा मैं याद......   ✍️ विकास कुमार लाभ            मधुबनी(बिहार)

आत्मजय

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मन में उमड़ रही विष अंगारों की, पट दरवाजों को खोल ले... आह भरेंगी पल 'नैन' आसुओं से, ना ऐसा कोई झोल ले... आत्मचिंतन कर तू खुद की, आगे कैसे क्या होगा??? समय बित गया,तो पचताओगे ना कोई ऐसा मोल ले... दुखद भरी है हरकंप से दुनियाँ, सोचो तुम्हारा क्या होगा? कर्म करो..सत् कर्म करो, ना कोई तेरा..ना मेरा होगा... मन की किंचर उतार-फेंक अब, व्याकुल मन एकाग्र होगा... छुऐगा तुम आशमान को, ना सफलता की आह होगा...   ✍️ विकास कुमार लाभ            मधुबनी(बिहार)

ऐ मेरे मालिक

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तू ही राम है,   तू रहीम है... तू ही अल्हा भी है,   तू ही फ़कीर है... तू ही अनादि है,   तू ही अंत है... तू ही कृष्ण है,   तू ही कंश है... तू ही राम है........ क्षण प्यास कुन्द्र..मीठा जल तूही,   रुद्र रुप तेरे प्रकोप है... संज्ञान लेता..अनंत रुप तेरे,   नव ख्याति अम्बर विस्तार है... तू ही राम है........ मैं प्रकाश की इस जोत में,   उल्झन चिंता में डूब रहा... संतन् सी सदमार्ग दे,   करुणा ही व्याप्त होता जा रहा... तू ही राम है........ ऐ मेरे मालिक बता,   क्यों ऐसा यह संसार है?? एक-दूसरे लोग जलता है,   आपरूपी लेता यह हथियार है... तू ही राम है........ एक आश तुमसे करता हूँ,   लौटाले इस निर्माण को... अलौकिक सुगंध से मनमुग्ध कर,   अद्भुत तू रचनाकार है... तू ही राम है........        ✍️ विकास कुमार लाभ                 मधुबनी(बिहार)