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Showing posts with the label जीवन समीर

बारिश बादल और हवायें

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ये सर्द हवायें ये नटखट बादल और बातूनी बारिशें कुछ अधूरा कर गई मुझे पानी अपना धर्म निभा गई जैसे ये याद दिलाती ये नित फाग सुनाती और मधुर मधु मुलाकातें मेरे नजदीक कर गई तुमको नियति का निर्मम उपहास हो जैसे इन लहरों में बुझी किरणों में और दिवा स्वप्नों में तेरा बारिश बन मुझ पर बरसना ऊंच-नीच होता सूखे गीले नयनों में जैसे गगन का आलिंगन पी गया धरा का दाहन और तुमने अपने लय में मेरे अधरों को चूम लिया यूंही खंडहर होते मनुष्य का ध्वस्त भविष्य हो जैसे टिप टिप कर अटक अटक कर और मगन होकर छज्जे से लिपट जाती हो अनायास मुझसे बहुत बड़े आघात से उबरा हो अनाथ जैसे ये भटकती बूंदें नयनों में सब कुछ मूंदे कहकर मुझसे अलविदा दे जाती जीवन का महात्म्य धूमिल निष्कर्ष के उपसंहार में जैसे

तुम आना

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तुम आना लेकर रातों की जागरें सपनों की पोटली में खनकती चूड़ियाँ पैरहन में बंधी प्रेम की सूक्ष्मतर कविताएं! तुम आना लेकर सिंदूरी शाम कंधे पर रखती हो जो धीमे से हाथ खुद ही सहन नहीं होती उस दर्द में सामर्थ्य भरने दबे पांव! तुम आना लेकर एक दीप जो जाने-अनजाने पढ़ती हो तुम्हारी आंखें सुबिधाओं के उलझनों को उबारती कि फिर फिर सकते हैं दिन घूरे के भी! तुम आना लेकर कुछ नये शब्द जिसके रथ पर आरूढ़ हो दिनकर तारों की निराई करते कुछ अधकच्चे घन कुछ इंद्रधनुष चूम ले उन हाथों को जुगनुओं को रोपते हुए  विपदाओं की छाती पर  जो मुस्कान बिखेर दे!!  ©जीवन समीर

चिर विकल हैं प्राण मेरे

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रात भीगी झिलमिल सितारे चिर विकल हैं प्राण मेरे स्मृति में छवि तेरी आती रही गा रही सांसें मधुगीत तेरे जल रहे दीप आस के फिर भी तिमिर न साथ छोड़े मीत मेरे पनघट में लौट आती हैं बहारें जब भी आंचल स्नेह का संवारे प्रीत को कर मुझे समर्पित तुम रच बस जाओ अंतर्मन में मेरे

है यह जाड़े की शाम प्रिये!

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थरथर कांपे तन सघन होते वन सुधा गरल पीकर है टूटे अश्रु अविराम प्रिये! ना सिसकारी ना किलकारी बंद कपाट मंदिर के है सूने पनघट औ'धाम प्रिये! ऋतु बदली दिन बदले न पपीहा बोले न ही कोकिल कुहुके है विहंगम अंतर्धान प्रिये! टूटी सूखी विटप लतिकायें खड़खड़ाती पल्लव कलिकायें खांसते बूढ़े बरगद है हुक्का हक्काबक्का गुड़ गुड़ थाप प्रिये! नीड़ों में है कंपन मौन पदचापों का घर्षण नयन बिछाये आस में है पलक अकुलाहट में थाम प्रिये! है विग्रह आग्रह कहाँ है स्वर में कलह यहाँ वे मधुर बातों का गुनगुन है नहीं तबले की थाप प्रिये! सूना प्रांगण सूना गगन न गौ रंभाये न पायल की रूनझुन शरणागत के जर्जर चौबाटे में है यह जाड़े की शाम प्रिये! वे लोरियाँ वे लोकगाथाएँ रणबांकुरों की गूंजती सदायें घुटी रह गई वादियों में है बीत गई सन्नाटे की रात प्रिये! कैसे ठहरूं कैसे ढोऊं अतीत को बिसरा कैसे वोझिल स्वप्नों में सोऊं अब रो लूं कि खुद पर हंस लूं है यह ढाढ़स की रात प्रिये!  सुविधाओं की चाह में  छले गये जो ठगों से राह में  अभावों के खंडहरों से है पूछते निरीह अपनी थाह प्रिये!  उजड़े हैं कुटुंब सारे रूठे हैं क...

गुमसुम गुमसुम तुम भी

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गुमसुम गुमसुम तुम भी मैं भी खोया खोया सा हूँ खामोश गगन की छाया में शंकित तुम भी मैं भी सकुचाया सा हूँ रिमझिम रिमझिम तुम भी मैं भी भीगा भीगा सा हूँ आज रो लो तुम भी तनिक मैं भी सिसकी भर लूं बंद नयनों के आलिंगन में गीतों के कलरव मधुर कर लूं बदली बदली तुम भी मैं भी टूटा टूटा सा हूँ सच्चाई के इस दलदल में निकल झूठ के मलमल से ढीठ संदर्भों से कटकर राख हुए जल जल के बिखरी बिखरी तुम भी मैं भी रीता रीता सा हूँ हारी तो तुम भी नहीं मैं भी अजीता अजीता सा हूँ हंसते-हंसते रो जाने पर चलते-चलते रुक जाने पर रिश्तों के अजब झमेले हैं फासलों के आयोजन पर खुशी खुशी में मरे मरे से संकेतों में सहमे सहमे से तीब्र वेग से बढ़ता ही जाता ठहरा रहा जो काल युगों से शरमाती शरमाती तुम भी मैं भी भीता भीता सा हूँ दर्पण के छली पन्नों में मैं भी खुला खुला सा हूँ गुमसुम गुमसुम तुम भी मैं भी खोया खोया सा हूँ ©जीवन समीर