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दरख़्त (पेड़,वृक्ष )

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ऐ मेरे प्यारे दरख़्तों, इतनी सहन शाक्ति  कहाँ से पाते हो... मेरे मन को बहुत लुभाते हो जब हवा संग इठलाते हो.... आंधी ,तूफान ,बारिश न जाने कितना कुछ चुप चाप सह जाते हो इतनी सहन शाक्ति कहाँ से लाते हो .... मानव जन को कितना, कुछ दे जाते हो... फल, फूल ,शीतल छाँव .... न जाने अनेको व्याधियों से उन्हे बचाते हो... ऐ मेरे प्यारे दरख़्त इतना  धीरज कहाँ से लाते हो ... आता है तुम्हारी  शरण मे  जब परिन्दा  कोई  तुम अपनी बाँह फैलाकर  उसे शरण दे जाते हो ... ऐ दरख़्त तुम मानव जीवन मे, कितने सुखद पल दे जाते हो.. बचपन मे खुद पर झूला  डलवा कर,झूला झूलाते हो.... बुढा़पे मे अपनी छाँव मे चौपाल सजवाते हो .... इतना सब देकर भी तुम कुछ एहसान न जताते हो ऐ दरख़्त तुम इतनी  सहन शाक्ति और धीरज कहाँ से लाते हो... परन्तु मानव तुम्हारी कृतज्ञता न मान कर , तुमको चोट पहुँचाता है... ऐ मेरे प्यारे दरख़्त ,  तुम्हारे हरे भरे जीवन को..  नष्ट करने मे  जरा भी न सकुचाता है...  मौन रह कर ,तुम कब तक  इस अन्याय को सहते ! ऐसे कृतज्ञहीन मानव को  सबक तो सीखा...

"बेटी का घर " ?

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बेटियों को क्यों नही मिल पाया कभी अपना घर ? बचपन जहाँ गुजरा वो तो था माँ बाप का घर ? जब माँ बाप ने ही नही दिया अधिकार इस घर को अपना घर कहने का तो ?   बेटियां जायें किधर ? बचपन से ही संस्कार दिये जाते तरह तरह के ... बेटियों को जाना  है .. पराये घर ? काश ! इन रीतियों को बनाने वालो ने  एक बार सोचा होता !! जिस घर मे बेटी का जन्म हुआ उस घर को अपना घर कहने का अधिकार नही ? पराये घर कोअपना कहने का अधिकार  कोई देगा क्यो  ? ससुराल मे आकर तन, मन से संवारती है घर !    परन्तु जब भी... किसी कारण से नाराजगी दिखाई जाती कहा जाता भेज दो इसे इसके घर ? आज भी प्रश्न  है ? कहाँ है वो घर ? जिसे पूरे अधिकार से बेटियां भी कह सके । यह है हमारा घर  ।  !!!!! ✍🏼 रानी सिंह मौलिक रचना

कौन अपने कौन पराये

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कहीँ उजालो का संसार  कहीं अधंकार के साये हम सोचते ये ही  कौन अपने कौन पराये वजूद से लिपटे इस दर्द को हम किसी से कैसे बताये दर्द दिया जब अपनों ने तो इस पीडा़ को कौन मिटाये  निरर्थक  गयी जिंदगी अपनी जिनको समझते रहे अपना वो ही निकले  पराये इस अंधकार भरे जीवन में कहीं से तो कोई रोशनी ना नज़र आये इस अंधकार मय जीवन में जब अपनें साये भी लगने लगे पराये वद्धाआश्रम में बैठे उन माँ बापों को कोई कैसे समझाए जिनको जीवन भर समझते रहे वो अपना आज वो खून के रिश्ते  न जानें क्यूँ हो गये पराये । ✍🏼 रानी सिंह