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अनेकता में एकता

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अनेकता में एकता, हिन्द की विशेषता, यही तो भारत वर्ष है. याद करो इतिहास का पन्ना, कर्मवती ने गुहारा था, हुमायूँ ने सेना लेकर बहन की राखी का कर्ज उबारा था. मोहन को भजते है रसखान, रहीम को है भारतीय संस्कृति का भान. अब्दुल हमीद भी था रक्षक, बम जो घट गयी किया आत्मोत्सर्ग. हम दूर क्यों जाते है भाई, हमें याद आतें है अबुल कलाम भाई. पाकिस्तान को सबक सिखाने को जिन्होंने मिशाईल आजमायी. सादा जीवन था उच्च विचार, शिक्षा की पूँजी ही काम आयी. ये जाति धर्म छोड़ो भाई, इसने ही तो भारत में आग लगायी. ये घड़ी बड़ी है संयम की, यह वक्त देश में नाजुक है. ऐसे मत बनों तुम आत्महंता, ये वक्त बड़ा ही विभाजक है. हमने तो इस मिट्टी में कुछ संस्कार के बीज तो बोये है. धरती की आन को रखने को कबीर,गौतम, गांधी बोये है. है आज जरूरत आदमियत की, मानवता की लाज बचानी है. कुछ शर्म करो, कुछ शर्म करो ऐसे न इसको मिटानी है. चाहे हो अलग पंथ हमारे, चाहे रवायत बिताने हो. हम दिखे भले ही अनेक मगर भारत माँ की लाज बचानी है. अलग अलग हम दिखें मगर अनेकता में एकता को दिखानी है। स्वरचित मौलिक कविता डॉ कन्हैयालाल गुप्त किशन भाटपार रानी, दे...

श्रृंगार माँ भारती का

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श्रृंगार माँ भारती का हिमालय मुकुट सँवारता है। सागर भी चरणों में बैठ कर निज पाँव पखारता है। हवाओं में पुष्प सुरभित तन मन की साँस लगती है। नदियाँ तेरे हृदय की गल माल हार सज्जितसुशोभित है। वंदन अराधना नित सूरज, चाँद, तारे हम सब गाते है। भाव हृदय सुमन अर्पित कर, तेरा निश दिन गुणगान करे। तेरे आँचल के हम है लाल, हम सच्चे सपूत तेरे बन जाये। तेरी गोद में ही जन्म लिया, तेरी गोद में ही हम सो जाये। श्रृंगार तेरा माँ कर जाये, श्रृंगार तेरा माँ कर जाये।