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काव्यरस भाग १

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काव्य रस के प्रकार नौ बताए गए हैं जिनमें वात्सल्य और भक्ति रस को जोड़ा गया है यह कुल मिलाकर 11 होते हैं काव्य रस के इन सभी प्रकारों को मनुष्य अपने शारीरिक हावभावों से अभिव्यक्त कर सकते हैं इनके अलावा कुछ पशु-पक्षी भी अभिव्यक्ति इसी माध्यम से करते हैं। इंसान भी दहाड़ते हैं शेर भी दहाड़ता है क्योंकि यहां पर वीर रस प्रभावी होता है। चिड़िया भी चहकते हैं और मनुष्य भी चहक चहक कर बातें करते हैं कहने का मतलब हंस-हंसकर..... काव्य के सभी रस अपने आप में सर्व सिध्द हैं पर हास्य रस की सिद्धि जिसे मिल जाए उसकी महिमा अपरंपार है मतलब नो आरग्यूमेंट, नो टेंशन...रश्मिरथी के धुरंधर हास्य कवियों ने आज रश्मिरथी पाठकों एंवम लेखकों को खूब हंसाया है।  हंसना जरूरी भी है इसीलिए तो हंसी को बनाया।  सोंचो-सोंचो अगर मुंह में ताले लगते तो कैसा लगता।।  गर गुस्से को हंसना और हंसना को गुस्सा कहते तो कैसा लगता।  बचपन में भाई की नर्सरी राइम में जो पढ़ा था उसे आपको भी पढ़ाते हैं हंड्रेड परसेंट गारंटी है इसे पढ़कर आप जरूर हंस देंगे हा हा हा हा हा  ही ही ही ही ही  हो हो हो हो हो  हौ ...

क्या यही प्यार है

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मानसिक शारीरिक आघात कर  अपना दंभित पुरुषुत्व का रूप दिखाते हो  जिस हृदय में बसता असीम प्रेम तुम्हारे लिए  उसे ही बड़ी निर्लज्जता से भावविहीन कर जाते हो क्या यही प्यार है क्या तुम इसे ही अपना प्यार कहते हो..........।  केरोसिन उड़ेल जलती माचिस की तीली फेंककर  अपने धड़कते दिल को तुम कैसे पाषाण बना जाते हो भले ही झूठ-मूठ का मोह जाल था तुम्हारी ओर से मेरे लिए दुष्टता से भरे कृत्य कर आखिर कौन सी संतुष्टि तुम पा जाते हो क्या यही प्यार हैं क्या तुम इसे ही अपना प्यार कहते हो..........।  स्त्री जाति स्त्री सम्मान पर खूबसूरत विवेचना कर तुम सबके मन पर अधिकार जमाने की कुशलता रखते हो अन्याय होने पर मुक बघिरों सा तुम चुप्पी साध लेते स्वार्थ लिए तब क्यूं सबको समझाने की उन कलाओं को परोस नही पाते हो क्या यही प्यार है क्या तुम इसे ही अपना प्यार कहते हो...........।  गुस्सा लिए आंखों में किसी कुसुम पर तेजाब की बौछार कर उसके जीवन को वीभत्स बना तुम कैसी आत्मसंतुष्टि पा जाते हो जिसके प्यार में तुम घंटों व्यर्थ करते उसके हुस्न के दीदार के लिए उसे कुरूप बना अपने प्यार क...

लांछन

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बदनियति तुम्हारे नजरों कि जो  दिलो-दिमाग को तेरे गुमराह करती है और कदम अपने बढ़ा चलते हो लिए मिज़ाज आशिकी के पैंतरे ढकोसलें एक तरफा ही ना जाने कैसी कैसी चाहतों  के दीवानगी लिए मचलते अरमानों को बेक़रार करते हुये प्रेम का जाल बिछाना तो फितरत होती तेरी फूल और पैगामों के फेहरिस्त भेज के  वक्त बेवक्त तेरे आने की आहट पर वो  सहम जाती धड़कनों की रफ्तार तेज कर किसी कोने में जिंदगी बसर होती तेरी संग लिए नापाक इरादों को को और हंस के लेता बड़े मजे तू किसी फूल के कुम्हलाने के झूठा प्रेम दिखा स्त्री को बदनाम करने की जुर्रत करते हो नहीं बंधना चाहती मोहपाश में वह किसी अन्जान फ़रेबी के  क्योंकि तुम्हारे खोट़े मन का रिवाज़ है जो बात जमाने तलक पहुंचेगी जब लांछन मुझपे ही लगा जाओगे मनुष्य की प्रवृत्ति है जब वह अपने ही बुने हुए जाल में फंसता है तो खुद को दोषी ना ठहराते हुए वह किसी और पर ही अपनी गलती मढ़ देता है मनुष्य अपने बचाव में झूठ भी बोल सकता हैं।

विरह

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जिसकी चाहत पर था गुमां दिल को  हां सितम दे वो ही तोड़ गया उसको अंखियों का मीत आंसुओं को बना  कसक दर्द कि मेरे जिया में सुलगा हुई दिल कि रुसवाई फ़कत गम देने  और सिल गए हमीं जैसे बेघर हो तन्हाई में सारी इनायतों को तुम्हारी ही दरकारें थी  हां तेरी मेरी एक ही तो खुशगवार धड़कनें थी सुरतें निहारें गुफ्तगू करें आरजू थी हमारी  वो रहबर गमों का फसाना दे खो गया भीड़ में कहीं चांद से शिकवा करूं और तारों से शिकायत  मेरी मोहब्बत को कफ़न पहना गया हाय वो दगाबाज दो धड़कनों के इश्क को मुकम्मल ना होने देना  नफरत -ऐ -फितरत है जमाने की उन्हें जुदा करना बेकद्रों की दुनियां बस कहती फिरती यही हमेशा से आवारगी मनचले दिल कि छुपा सभी कहते हैं इत्मिनान से गर मिल जाए इक दफे वो बेदर्द किसी मोड़ पे  कहूंगी आहें ले जमाने भर की इश्क नसीब ना हो तुझे फिर से

मुस्कुराहट

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जब से इमोजी भरी दुनियां ने इस जग में पैर पसराई है मुस्कुराहट की रहस्यमयी पहेली भी कुछ समझ में आई है बेमन की मुस्कानों ने भी अपनी जगह खूब बनाई बिखराई है इन मुस्कुराते चेहरों ने अपनी कोई बात शायद चुपके से छुपाई है इक मुस्कान पे अनेक मुस्कानों ने अपनी अलग प्रतिक्रिया दिखाई है हंसते रहो खिलखिलाते रहो इसीलिए तो मुस्कुराहट जैसी चीज बनाई है 😇😊🤗😀😃😄😁😆🤣🤣😂😇😍🤩🥰😉🙂☺🥲😀😇

शह और मात

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                  इंसान बुरी लतो को  शह   दे जाता है।  और वो बुरी लतें इंसानियत को  मात  है।। फरेबी जगत का ये मायाजाल है। करता जो इनको अनदेखा, उनका हाल बेहाल है।।    ।। शह और मात की बस यही बिसात है।।

हमारे फौजी भाइयों की फौज

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हमारे फौजी भाइयों की फौज जब निकलती है  हमारे देश के जन, गण, मन सभी, सुरक्षित रहती हैं।।  हमारे फौजी भाइयों की फौज जब निकलती है  अमन, चैन, शांति,फतेह की आगाज तभी तो होती है।।  हमारे फौजी भाइयों की फौज जब निकलती है  भारत के हृदय स्थल में तिरंगा तभी तो फहरती है।।  हमारे फौजी भाइयों की फौज जब निकलती है  उनके हाथों में बंदूकों की अस्त्र-शस्त्र बहुत ही फबती है।।  हमारे फौजी भाइयों की फौज जब निकलती है   फूल भी उनके कदमों तले बिखरने की चाह तब रखती है।। हमारे फौजी भाइयों की फौज जब निकलती है  रणभूमि पर अदम्य साहस और फुर्ती का परिचय दिखाती है।।    हमारे फौजी भाइयों की फौज जब निकलती है   उनके बंदूकों से निकलते शोलें शत्रुओं के दिल दहलाती है।। हमारे फौजी भाइयों की फौज जब निकलती है  दुश्मनो की सेना उनकी आहट सुन दो कदम पीछे हटती है।।  हमारे फौजी भाइयों को कर्मपथ से जब छुट्टी नहीं मिलती हैं  गांव की गलियां, मिट्टी,घर भी उनको मिलने को तरसती हैं।।  हमारे फौजी भाइयों की अंतिम यात्रा जब निकलती है ...

एक जासूस

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जासूसों की जासूसी  होने लगी जब खामोशी खामोशी प्यार में होने लगी तब तकुल्लुफ बंदिशे जरा सी  वक्त भी हो गया बेरहम छोड़ गई वह भी हमें ही गैर सी फिर हुई अल्फाजों की दगाबाज़ी  हारकर भी मेरे दिल से हो गई उसकी रुखसते ए नवाजी

यादें

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इस मोड़ से जाते हैं जो  फिर कभी किसी को क्यूं नहीं दिखाई देते हैं वो"""" अनंत यात्रा के मार्ग पर निकल जाते हैं जो  अपनों को रोता बिलखता छोड़ कर न जाने क्यूं वो""" पंचतत्व में विलीन हो जाते हैं वे  स्पर्श एहसासें बातें ही रह जाती हैं बस बनकर उनकी यादें""" ह्रदय को विचलित करने दुख से भरने नीरस बनाने  आखिर आते हैं क्यूं ऐसे मोड़ जो जिंदगी को नासूर बनाते""" जिंदगी की कश्मकश उलझने सभी चले आते हैं फिर तो  बढ़े दर्द को और बढ़ाने जीते जी मुर्दों सा बनाने उनको""" कर्म नियति के नाम जुड़कर जीवन को निराशा से भर देते   न जाने क्यूं ये मोड़ जीवन की खुशियों को बहा ले जाते """ इन मोड़ों की व्यथा कितने ही जीवन को बेसहारा कर देते  इनका आना ही कितनी जिंदगीयों को मायूसी से भर देते"""  इस मोड़ पर मुड़ने की कवायदें सबकी अलग-अलग होती है  इन मोड़ पर अचानक ही सारी रिवायतें खत्म हो जाती है""" इस मोड़ से जाते हैं जो हमको बहुत याद आते हैं वो इस मोड़ से गुजरे जो आज भी हमारे दिलों में बसते है...

तेरे इश्क में

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एक दिन ढलती दोपहरी में अपनी सहेलियों के साथ खेलने निकली गुड़िया अचानक,अपने पड़ोस की चाची को उसने किसी से बात करते हुए देखा। जो एक घर की देहरी पर बैठी हुई थी।                                     शायद चलते-चलते थक गई थी वो शायद किसी को ढूंढते-ढूंढते बौरा सी गई थी वह। बेहद मैले कुचले, काले हो चुके कपड़ों में लिपटी सामने से अधखुला वक्षस्थल दिखाई दे रहा था।                                                   हां अब उसे किसी चीज की सुध कहां थी अब शर्म, हया, लाज उसके गहने नहीं रह गए थे।  जुल्फें बिखरे हुए, न जाने कितने दिन हुए होंगे उसे अपने बाल सवारें हुए।आईने में चेहरा देखे... या कुछ महीने न जाने........... चाची जी ने कहा सामने दिख रहा है।  बटन क्यों नहीं लगाती।  तो उसने कहा बटन टूट गया है ना।  उसे सेफ्टी पिन ला कर दिया चाची जी ने।  स्त्री ...

मुक्ति

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कैसे मिलेगी मुक्ति इस देह को  अनेक चेष्ठाओं से ग्रसित मन को न सत्कर्मों की बेल बढ़ रही  सब्ज़बागी दुनिया सिर्फ अपने ही स्वार्थ गढ़ रही इंसानी भावनाओं का पड़ा घोर अकाल कलयुग में एक दूजे पर व्यंग कस हो रहे हैं बेहाल मुक्ति पतवार ना कोई चलाना चाहे  बिना ईश भक्ति के वैतरणी फिर कौन पर लगाये मोह माया के बंधनों में उलझ अधर्म कृत करते हो  परमपद का जब लोभ ही नहीं तो एक सौ आठ क्यूँ जपते हो दुर्बल तन ले उतरते बेरा में कहां ले पाओगे हरि का नाम  परम तत्व में विलीन होने के लिए ले कर ले कुछ सार्थक काम दुविधा अदुविधा में भटक रहा कहलाते हुए बुद्धिमान इंसान आखिर क्यूं नहीं कर पाते अपने ही सार्थक उद्देश्य की पहचान 🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌

गोधूलि बेला

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अदृश्य होते सूरज की लालिमा भी कम होती जाती  विचरण करते पंछी फिर से अपने नीड़ की ओर है आती दूर से ही घंटी की ध्वनियां,रम्भानें की आवाजें आती  धूल उड़ाते गायें पशु धन गांव की गलियों में है आती नन्हे मुन्ने बरदियों को देख घर में है आवाज लगाती  मां आकर कोठे में सभी को पैरा भूंसा पानी दे जाती गोधूलि बेला की घड़ियां संध्या का एहसास कराती   तब तुलसी चौंरा पर जाकर मां अगर,दीपक है लगाती  बापू को सांझ को काम से लौटते देख मुनिया मुस्काती बापू के झोले को झट से पकड़ कर वह जलेबियां निकालती बड़े बुजुर्गों की ठिठोली दिन भर की थकान को मिटा जाती  बैठकर परिजन के साथ जब चाय की चुस्कियां मिल जाती  पढ़ाई लिखाई के लिए माएं बच्चों को आवाज लगाती  जिंदगी से जुड़े कुछ सबक भी अपने बच्चों को सिखाती रसोई घर में चूल्हे से उठते धुंए और भोजन की महक भी  तब घर के लोगन की भोजन की क्षुधा भी है बढ़ाती जाती""  यह पारिदृश्य ग्रामीण क्षेत्र पर आधारित है बरदीयों- पशुओं का समूह  कोठा- गौशाला

रवैय्या......

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आनंदिता क्या तुम तैयार हो जाने के लिए श्रीमान जी ने जब आनंदिता से पूछा तो उसने कहा जी नहीं सुबह कितनी आपाधापी रहती है सारा काम एक साथ ही करना होता है मैं थोड़ी लेट हूं वोटिंग के लिए आपको बाहर जाना है आप हो आइए मैं फ्री होकर चली जाऊंगी काम से निवृत्त होकर आनंदिता स्कूल की ओर निकल पड़ जाती है वह सोचने लगी स्कूल में मताधिकार के महत्व के बारे में पढ़ाया और समझाया जाता हैं ताकि आम नागरिक सरकार की ओर से प्राप्त होने वाली योजनाओं से वंचित ना हो जिसके लिए आप को मतदान करना नितांत आवश्यक होता हैं। आखिर एक जागरूक नागरिक की भूमिका भी निभानी होती है जरूरी मूलभूत सुविधाओं के लिए .... सड़क पर अलग-अलग खेमे के लोग अपने चिर परिचित मुस्कान, अभिवादन के साथ भाभी जी याद रखिएगा कहकर याद दिला रहे हैं  कि कतार में इस बार हम भी शामिल हैं।  कि हमें भी एक मौका देकर तो देखिए पिछली वाली गलती को नहीं दोहराएंगे।  कि जीत या हार हो खड़े होने में क्या जाता है दोनों ही स्थिति में हम तो खुश हैं कि हमने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई एक उम्मीदवार के रूप में परवाह नहीं पैसे का कितना अपव्यय हुआ।  कि हमें तो बड़े ...

व्यर्थ

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आज फिर तुमने अन्न को डस्टबिन में फेंक दिया कल ब्रेड के टुकड़े फेंके थे कुछ ना कुछ फेंकने की गलत आदत पड़ी हुई है तुम्हें  रोज रोज अन्न का अपमान क्यूं करती हो क्यूं फेंक देती हो तुम,अनाज पैसों से आते हैं किसी के घर से नहीं। बालकनी में खड़ी शिखा बालकनी से बाहर की ओर निहार रही थी पर कान अंदर की ओर ही खड़े थे और मुख पर हल्की सी मुस्कान फैली हुई थी सामने हो रहे दृश्य को देखकर। एक टब में थोड़ा सा बचा चावल और कुछ नम हो रखे बिस्किट के टुकड़े जिससे पप्पियों की मां खा रही थी और उसके नवजात पप्पी अपनी मां का स्तनपान कर रहे थे उछल उछल कर, आखिर उसे अपने बच्चों के दूध के लिए उस बचे हुई भोजन की, मतलब व्यर्थ नाम के भोजन की बड़ी ही जरूरत थी अब कौन देता उसे महंगे हड्डियों के टुकड़े, इंपोर्टेड बिस्कुट या ₹50 किलो वाला दूध जिसे खा पीकर वह अपने बच्चों को हष्ट पुष्ट करती। कचरो के ढ़ेर से कितने ही जानवर फ्रिज से निकालकर फेंका हुआ सड़ा गला या बासी भोजन कर अपनी भूख मिटाते हैं बचे हुए भोजन का थोड़ा सा बासी हिस्सा कितने काम का होता है किसी के लिए कितना मददगार होता है भूखे के लिए किसी के बिलखते भूख को म...

घर लौटता फौजी

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घर लौटता फ़ौजी  दूर दहशत के अंगारों को छोड़ आता है वह मस्त मौला फौजी  सुकून के चंद पल बिताने वह मनमौजी  ढेर सारे अरमानों को मन में सजाये संवारे वह जांबाज फ़ौजी  गलिया गांव की हो या शहर की राह तकते वे भी  सबकी मुस्कुराहटों से, लगाकर गले दोस्त करते हैं स्वागत भी   आती है जब डगर पर ठंडी बयार बूढ़े बरगद के नीचे की गई मस्ती उसको याद दिला जाती है  धूल मिट्टी में खेलते  बच्चों की टोली जवान को देखकर जोरदार सेल्यूट लगाती है रसोई घर से  आ रही खुशबू की महक भी घर के खाने की तलब बढ़ाती है  पानी भरती पनिहारीनें  भी लजाकर गले को तर करने लिए जरा पूछ ही जाती है  आशीष बरसाती है जब घर की देहरी पर सजल नयन उसके मन को अपने घर में होने का एहसास सुकून दे जाती है जननी की गोद में सर रखकर सोता है जब वह फौजी  हर्षित पुलकित हो जाती है उस पल को देखकर मातृभूमि भीजी

रुकने का कोई मतलब नहीं

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व्यर्थ ही अपना समय गंवाने का कोई सबब ही नही कहीं  ठहर कर हम अपने ही ताबीरों को ध्वस्त करते जाएंगे  लगन और हौसलों के दम पर ही हम अपने मंजिलों को पाएंगे घबराते, टूटते उम्मीदों को जोड़ते ऐसे ही तो अपनी आशाओं को जगायेंगे। इन भावनाओं का भी, मन में आना जरूरी है ये ही तो आप के सफलता की ललक बढ़ाएंगे।। समय के फेर हमें परास्त करने के लिए अपने दांवपेंच भी दिखाएंगे। पर वे नहीं जानते इन से लड़ कर ही तो हम सबके बीच में खास हो जाएंगे।। अथक प्रयास ,सूझ-बूझ और निरंतरता से हम अपने मुकाम तक जा पहुंचेगे । अपने कदमों को रुकने ना देना कभी यकीनन फिर एक दिन खुद के नाम से जाने जायेंगे।। नन्हा बोया हुआ बीज भी मौसम की मार सहकर कल फलदार वृक्ष कहलायेगें । वैसे ही नन्हे सपने भी जो अंतस की गहराई में जगे है वह भी एक दिन परिपक्व हो पूर्णता को प्राप्त हो जाएंगे।। बस रुकना नहीं हिम्मत नहीं हारना ..

🇮🇳 तिरंगा 🇮🇳

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                       ।। झंडा तेरी                     आन रहे                    शान रहे                     मान रहे                                  मातृभूमि का सम्मान रहे ।।  ।। तिरंगा, रंग                      केसरिया                       सफेद                        हरा                                 माथे हिमालय का ताज रहे ।।  ।। ध्वज प्रतीक                  ...

संजोग भाग ३

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रविवार शाम को 5:00 बजे तीनों इंडियन कैफे हाउस में पहुंचकर बेसब्री से मां पापा की पसंद का इंतजार करने लगते हैं। रिक्तिमा कैफे में एंटर करती है और आंटी को देखकर उनकी और बढ़ती है। अंश की पीठ कैफे के दरवाजे की ओर होती है। पास पहुंच कर रिद्धिमा कहती है प्रणाम आंटी अंकल जी कैसे हैं आप?  अंश इस आवाज को सुन कर आश्चर्य से भर जाता है और पलट कर देखता है वह स्वयं को काबू में करने की कोशिश करता है।   रिक्तिमा भी अचंभित हो बिना कुछ कह हैरत में पड़ जाती है।  आंटी कहती है बैठो बिटिया यह हमारा बेटा है हमें तुम पसंद हो इसलिए हम चाहते थे कि तुम्हारी एक बार मुलाकात करवा दे अंश से अगर तुम्हें पसंद आए तो, तुम हमें बाद में बता सकती हो।  रिक्तिमा बस जी आंटी कह पाती है।  काफी देर होने के बाद मां अंश से कहती है बेटा आपकी पसंद अभी तक नहीं आई हम उससे मिलने को बेताब है।  रहस्यमई मुस्कान के साथ वह कहता है मां आपकी और मेरी दोनों की पसंद मेरे बाजू में बैठी है। आश्चर्यचकित! होकर क्या सच में  हां मां रिक्तिमा वही है जिससे मैं आपको मिलवाना चाहता था और रिक्तिमा कहती है एकांश...

संजोग भाग २

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अवंतिका कैफे में बैठकर रिद्धिमा का इंतजार कर रही थी और उनके सामने दो और व्यक्ति बैठे हुए थे जिसे देख रिक्तिमा थोड़ी आशंकित गई क्या कोई प्रॉब्लम है। पास जाने पर उसने देखा की साथ में अविनाश और एकांश भी बैठे हुए हैं। हेलो अवंतिका, अविनाश  हाय रिक्तिमा, तुम्हारा ही इंतजार हो रहा था।  रिक्तिमा इनसे मिलो यह एकांश है अविनाश और एकांश एक ही ऑफिस में AAO के पोस्ट पर हैं। शादी में तुम्हें देखकर हमसे इन्होंने बहुत ही मिन्नतें की तो सोचा एक बार तुमसे इनको रूबरू करवा दिया जाए।  सॉरी डियर... कहकर वह मैन्यू आर्डर करती है।  थोड़ी देर बाद हम दोनों यहां आ ही गए हैं तो घर के लिए कुछ सामान रख लेते हैं बुरा ना माने तो क्या हमें इसकी परमिशन मिल सकती है ।  एकांश कहता हैं, हां अच्छे से शॉपिंग करना आपके आने तक हम यहीं बैठे हैं।  अवंतिका कहती है मैं जाऊं ना।  वह हां में सिर हिला देती है। उनके जाने के बाद कुछ देर तक दोनों चुपचाप से बैठ एक दूसरे के होने को महसूस करते हैं। फिर एकांश कहता है आपको बुरा तो नहीं लगा मैंने इस तरह से आप को बुलवाया।        रिक्...

संजोग

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प्रेम का सांचा ना होता तो यह जीवन क्या उतना ही खुशगवार हो पाता जो इसकी तीव्र अनुभूति कर लेने के बाद होता है...  हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी डियर  सुबह-सुबह एकांश ने रिक्तिमा को उठाते हुए कहा रिक्तिमा उठकर एकांश के गले लग गई आखिर भोर की किरण और खुशियों का आगाज जो एक साथ हुआ था आज।  एकांश को निहारते हुए उसने कहां कितने साल हो गए हमारी शादी को पूरे दो साल माॅय डियर,हांजी तीन साल पहले हम तो एक दूसरे को जानते भी नहीं थे रिक्तिमा शरारती निगाहों से कहती है। चलती हुई रिक्तिमा के हाथ को एकांश खींचकर अपनी बाहों में भर लेता है और प्यार का चुंबन उसके होठों पर अंकित कर देता है।                छुट्टी ले लेता हूं ऑफिस से, आज का दिन तो सिर्फ हमारे लिए ही होना चाहिए है ना एकांश बड़े रोमांटिक मूड में कहता हैं। नहीं एकांश आप ऑफिस जाइए हम शाम को सेलिब्रेट करेंगे अपना एनिवर्सरी, कहकर वह किचन में कॉफी और नाश्ता तैयार करने के लिए जाती है एकांश नाश्ता कर ऑफिस के लिए निकल जाता है जल्दी आने का वादा कर और वह कॉफी का मग लेकर बालकनी से लगे चेयर पर बैठ जाती ह...