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भगवान

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इस जग की रचना की उसने वह है सबसे शक्तिमान। हमसब जिसका वंदन करते कहते हैं उसको भगवान।। सृष्टि का निर्माण किया व जीवन का अस्तित्व बनाया। खनिज संपदा से पूर्ण इस वसुधा को हम सबने पाया।। उसने ही इस धरती पर रंगों का अद्वितीय संसार बनाया। भिन्न-भिन्न जीवो को रचकर पृथ्वी का उपवन सजाया।। उसका ही आशीष पाकर सब जीवों में हुए बडे विद्वान। हमसब जिसका वंदन करते कहते हैं उसको भगवान।। हर एक मौकों पर आकर मानव जाति को समझाया। कहीं बंधा वह मर्यादा में कहीं गीता का पाठ पढ़ाया।। कहीं तो शांतिदूत बना वह कहीं क्रोध की सीमा लांगी। कहीं कहीं सर्वस्व दिया तो कहीं तीन पग भूमि मांगी।। कोई ना उसको जान सका वह तो सर्व गुणों की खान। हम सब जिसका वंदन करते कहते हैं उसको भगवान।। बल दिया मानव को उसने प्रतिभाओं से संपन्न बनाया। जिस पर उसने छाया करदी उसने ही परचम लहराया।। अगम, अगोचर, निराकार है महिमा उसकी सबसे न्यारी। जहां पर उसकी दृष्टि पड़ती मुस्काती है हर एक क्यारी।। शकल धरा पर कोई नहीं है करता जो उसका अपमान। हम सब जिसका वंदन करते कहते हैं उसको भगवान।। नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली

कान्हा

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ब्रजमण्डल की भूमि हमारी। लगती हमको सबसे प्यारी।। ब्रज माटी में नारायण बालक बनकर खेले थे। उनकी छवि देखने को गोपियों के मेले थे।। सारी दुनिया वाले उनको नारायण बतलाते थे। हमारे ब्रजमण्डल में वो कान्हा कहलाते थे।। कभी किसी ने छलिया कभी माखन चोर कहा। कभी जगतगुरु तो कभी रणछोड़ कहा।। नीति, न्याय, कर्म योग का था सबको संदेश दिया। युद्ध भूमि में खड़े हो गीता का उपदेश दिया।। नाम - विक्रांत राजपूत पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

ख्वाबों का मंजर

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हर पल मन में सपनों का एक नया समंदर होता । मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर सा होता ।। हम रहते हैं इसी धरा पर किंतु चांद पर जाना । मेरी आंखों ने देखा फिर से एक ख्वाब पुराना ।। क्या हम नीले आसमान में पंछी बन उड़ पाएंगे । या फिर मेरे सारे ख्वाब अधूरे ही रह जाएंगे ।। मेरी आंखों ने ख्वाबों का नया जहां अब देखा । मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर होता ।। मेरा मन अब सपनों में हर पल ही तो तपता । खूब रोकना चाहू पर मेरा मन कब रूकता ।। अपने मन को तुम ही बोलो कैसे मैं समझाऊं । ख्वाबो के सैलाब को अब कैसे मैं रोक पाऊं ।। मेरा मन तो हर पल ही सपनों की धुन में खोता । मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर होता ।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

तेरा मेरा साथ

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मेरे अंतर की धड़कन हर पल मुझसे यह कहे। इस जन्म से हर जन्म तक तेरा मेरा साथ रहे।। यूँ तो आए कितने चेहरे पर कोई चेहरा जचा नहीं। जब से देखी तेरी सूरत फिर कोई सपना रचा नही।। क्या कहती हो सखी बताओ जीवन पथ पर चलते हैं। छोड़ पुरानी इस दुनिया को नए ख्वाब फिर बुनते हैं।। एकदूजे के साथ चलें हम एकदूजे की बात रहे। इस जन्म से उस जन्म तक तेरा मेरा साथ रहे।। सकल धरा पर तुम से अच्छा साथ नहीं अब दिखता। सारी दुनिया भ्रमण करके तुम पर ही है मन रुकता।। बे-सुध से हम रहें हमेशा कब आओगे तुम बतलाओ। कितनी और रहेगी प्रतिक्षा अब तुम हमको समझाओ।। साथ तुम्हारे चलने को मेरा मन विचलित रहे। इस जन्म से हर जन्म तक तेरा मेरा साथ रहे।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

यह मेरा हिंदुस्तान है।

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मेरे देश की इस दुनिया में अलग सी पहचान है। यहाँ सबसे प्यारा सबसे न्यारा मेरा हिंदुस्तान है।। अनादिकाल से भारत ऋषियों की तपोभूमि रहा। इतिहासों के पृष्ठों ने भारत को स्वर्ग खग कहा।। यहां हर बच्चे में राम बसें हर बाला सीता सी। ऋषियों की वाणी यहां लगती भगवद गीता सी।। इस धरा पर मेरे देश का एक अलग सम्मान है। यहाँ सबसे प्यारा सबसे न्यारा मेरा हिंदुस्तान है।। मेरे देश की इसी धरा पर चंदा सी तरूनायी थी। मिट गईं वीरांगनायें किंतु आन पर आँच ना आई थी।। मेरे देश के बालक भी सिंहो से लड़ जाते थे। सब कुछ खोकर भी क्षत्रिय अपना धर्म निभाते थे।। मेरे देश की इस मिट्टी के कण-कण में भगवान है। यहाँ सबसे प्यारा सबसे न्यारा मेरा हिंदुस्तान है।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

मिट्टी

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सब कुछ मिट्टी से है जन्मा मिट्टी में ही अंत। मिट्टी का अस्तित्व, कहानी दोनों ही अनंत।। जिनसे कांपती थी धरा वह भी मिट्टी में मिल गए। मिट्टी में बीज के कारत सुगंधित पुष्प खिल गए।। मिट्टी ने जीवन दिया, जीवन को महकाया। नए-नए जीवो को मिट्टी ने ही चहकाया।। मिट्टी ही सर्जन करे मिट्टी से होता विध्वंस। मिट्टी का अस्तित्व, कहानी दोनों ही अनंत।। मिट्टी पूर्ण जीवन के सर्जन का आधार बना। इसी धरा पर मिट्टी से ही जीवन फूला फला।। मिट्टी कई रूप दिखाएं समय-समय पर प्यारे। मिट्टी के कईं खेल देखे अलग-अलग व न्यारे।। जो अपना गुरुर दिखाएं मिट्टी में विलीन तुरंत। मिट्टी का अस्तित्व, कहानी दोनों ही अनन्त।।  नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कविता

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हर स्थिति के दो विकल्प जो चाहे मैं लेलूं। जैसे होते है सदा हर सिक्के के दो पहलू।। अच्छाई, बुराई साथ रहे जैसे पुण्य व पाप। वैसे ही पथ के दो मार्ग ज्ञात और अज्ञात।। स्थिर मन के साथ हमेशा चंचल मन भी होता। जो ज्यादा हंसता दुनिया में सबसे ज्यादा रोता।। यहाँ भी दो राह है कहलूं या फिर सहलूं। जैसे होते हैं सदा हर सिक्के के दो पहलू।। न्याय, अन्याय साथ चले जैसे दिन व रात। वैसे ही चलता सदा सांझ के साथ प्रभात।। सत्य असत्य साथ चले जैसे धर्म अधर्म। वैसे ही पानी के पहलू होते ठण्डा व गर्म।। दो पहलू फिर से आ गए चलूं या फिर ठहरूं। जैसे होते हैं हमेशा हर सिक्के के दो पहले।। नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कलम

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कबीर वंशज कहां डरे हैं भूपों की हुंकारों में। कलम कहां टिक पाती सत्ता के गलियारों में।। कलम विरोधी रही हमेशा सत्ता के दीवानों की। कवियों ने कब परवाह की अपने आशियाने की।। जब जब कलम चली सत्ता संग जनमानस रोया। उसी समय कवियों ने भी अपना वजूद खोया।। कवियों को कैसे बांधोंगे के लालच के किरदारों में। कलम कहां टिक पाती है सत्ता के गलियारों में।। जब सत्ता मतवाली होती कलम राही दिखलाती। बड़ा विनाश तभी होता जब कलम मौन हो जाती।। कवि मन होता बंजारा जिसके पैर कहीं न टिकते। उन विलासी महलों में कवियों के मन ना रुकते।। कवियों को कैसे जकड़ोगे डर रूपी हथियारों में। कलम कहां टिक पाती है सत्ता के गलियारों में।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

मायके के दखल से टूटती ससुराल

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छोटा सा एक बना घरौंदा हमने तुमको थमा दिया। तुमने पीहर की बातों में आकर मंदिर मिटा दिया।। रिश्ते पहले भी होते थे जीवन भर साथ निभाते थे। अपंग साथी भी होता था फिर भी स्वीकार जाते थे।। मेरी मां को मां न समझा बहन संग न तुम रह पायीं। मेरे घर का एक बोल भी क्यों चुप तुम न सह पायीं।। यह तो तेरा ही घर था फिर क्यों मोह घटा दिया। तुमने पीहर की बातों में आकर घर मिटा दिया।। नैतिकता की बात करो तो ससुराल की आशा तुम हो। सास-ससुर की बेटी व पति, ननद की अभिलाषा हो।। पूरे घर ने अपना माना पर तुम अपना न कह पायीं। जब भी बुरा समय आया साथ खड़ी ना रह पायीं।। पीहर को अपना माना यह घर मन से हटा दिया। तुमने पीहर की बातों में आकर घर मिटा दिया।। सास-ससुर को छोड़ अपनी मां को घर लायीं। अच्छी बहू न बन सकी आदर्श बेटी कहलाई।। पति कहीं गर बात न माने बहुत बुरा वो कहलाता। घर छूटा है उससे पूछो कैसे अपना मन बहलाता।। मां-बाप की बात मान कर बेटी ने सब बटा दिया। तुमने पीहर की बातों में आकर घर मिटा दिया।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

स्वतंत्रता सेनानी

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भारत मां के लिए दी गयीं कईं वीरो की कुर्बानी। आजादी की उठा मसाल चले स्वतंत्रता सेनानी।। अपने जीवन का न लालच दिल में बस अरमान था। जीवन में जीवन से बढ़कर मातृभूमि सम्मान था।। बच्चों ने जीवन दे दिया वयस्क जवानी दे गए। आजादी की कीमत क्या है यह कहानी दे गए।। कैसे उनका दम घुटता था मिलती कईं निशानी। आजादी की उठा मशाल चले स्वतंत्रता सेनानी।। भगत सिंह फांसी पर झूले किंतु कभी हार न मानी। स्वाभिमान की खातिर मिट गई मण्डला की रानी।। कईं वीरों ने जान गवाई कईयों ने अस्तित्व खो दिया। इन वीरों की कुर्बानी ने आजादी का बीज बो दिया।। वह वीर मिटकर दे गए हमें अनेक नई कहानी। आजादी की उठा मसाल चले स्वतंत्रता सेनानी।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

शिव / महादेव

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छिति, जल, नभ के तुम हो स्वामी। सबसे अलग रहे तुम्हारी कहानी।। पर्वत बीच सदा वास तुम्हारा। सब तुमको कहें डमरू वाला।। नाम संग तुम मन के भी भोले। इस देवभूमि में तुम ही थे डोले।। तुमसे ही निर्मल गंगा पानी। सबसे अलग तुम्हारी कहानी।। वर देने में तुम भेद न करते। सुर, असुरों की पीड़ा हरते।। भेद न तुमसे किसी ने पाया। तीनो लोक में तुम्हारी माया।। गिरि कण कण के तुम हो स्वामी। सबसे अलग रहे तुम्हारी कहानी।। सावन मास तुम्हारा ही आवे। सबको खुशियों से भर जावे।। श्रावण सोमवार तुमको ध्याये। जीवन में वह सब सुख पाए।। सदा घट घट के तुम अंतर्यामी। सबसे अलग तुम्हारी कहानी।। नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

परिवार

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जब हम सभी इकट्ठे होते लगता जैसे हो त्यौहार। इस धरती पर हरा भरा उपवन सा मेरा परिवार।। मेरे घर में आज भी दादा का अनुशासन चलता। दादा दादी की छांव में मेरा सब परिवार पलता।। मेरे घर पर लोग सभी जब एक साथ होते हैं। तब हम अपने मन की सारी सुध बुध खोते हैं।। अदभुत सा मुझको लगता मेरा घर रूपी संसार। इस धरती पर हरा भरा उपवन सा मेरा परिवार।। कितना भी बड़ा काम हो सबका ही साथ रहता। ऐसा सुख कहीं ना होगा ऐसा मेरा मन कहता।। जब भी कोई पड़े विपत्ति एक साथ सब रहते हैं। एक पर पड़ी मुसीबत इकट्ठे होकर सब सहते हैं।। सब ही साथ में रहते सबका ही संतुष्ट व्यवहार। इस धरती पर हरा भरा उपवन सा मेरा परिवार।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

अध्यापक

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जीवन की कठिन राह में चलना हमको सिखाते। अच्छाई की राह हमको अध्यापक ही बतलाते।। जीवन वैसे बहुत जटिल था पर उन्होंने आसान बनाया। मेरे जीवन बंजर भूमि पर उन्होंने उपवन सा सजाया।। जीवन की कठिन डगर पर बड़ा सहारा उनका पाया। कठिनाई से पार निकलना अध्यापक ने हमें बताया।। जीवन में पड़े मुसीबत उनके ज्ञान काम आते। अच्छाई की राह हमको अध्यापक ही बतलाते।। मेरे जीवन का निर्माण उन्हीं से संभव हो पाया। अंतर में ज्ञान के बीच उन्हीं के कारण वो पाया।। मुझको मेरी असभ्यता से पूर्णतः मुझे सभ्य बनाया। जीवन की उन्नत चोटी का सफर उन्हीं ने बतलाया।। जीवन की हर मुश्किल को आसान वह बनाते। अच्छाई की राह हमको अध्यापक ही बतलाते।। नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश) © स्वरचित रचना एवं सर्वाधिकार सुरक्षित

सावन

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इस मास का दृश्य होता अनोखा व प्यारा। साल के हर मासों से सावन सबसे प्यारा।। इस माह में सभी नारियां पीहर में होती। अपनी सखियों से मिल बचपन में खोती।। सावन मास के गीत होते अदभुत व निराले। इस मास की छवियां देख आनंद आते सारे।। इसी मास में बहती है पानी की नदियों सी धारा। साल के हर मासों से सावन होता सबसे प्यारा।। सावन मास की मलारे होती हैं कितनी अदभुत। मेरे दिल पर छाप छोड़ करती है मुझको विस्मित।। वह सावन के झूले मेरे अंतर को खुश कर जाते। इसी मास में कुदरत संग खग भी सारे मुस्काते।। इसी मास में दिखलाती है कुदरत रूप निराला। साल के हर मासों से सावन होता सबसे प्यारा।। इसी माह को महादेव का मास भी कहा जाता। इस माह में शिव को पूजे अपनी सब मन्नत पाता।। सावन मास में कावड़ की निकले बहुत सवारी। इस मास में शिव भक्ति मे खोती दुनिया सारी।। इसी मास में आता है त्योहार रक्षाबंधन न्यारा। साल के हर मासों से सावन होता सबसे प्यारा।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कर्म

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मानव कर्म हमेशा जीवन में प्रधान होते। कर्मों के आधार से ही भविष्य तय होते।। कर्म बिना इस दुनिया में फल कहां मिलता है। बिना पेड़ लगाए फूल कभी नही खिलता है।। कर्म हमारे जीवन उन्नति की प्रमुख निशानी है। जिन्होंने सत्कर्म किए दुनिया उनकी दीवानी है।। वैसे ही हम को मिलता जैसा हम बोते। कर्मों के आधार से ही भविष्य तय होते।। जीवन पथ की कर्म ही वह प्रमुख है रेखा। उसी से जीवन में स्थान सभी का तय होता।। कर्म करें अच्छे मन से फल भी अच्छा होगा। जिसने जैसा कर्म किया वैसा ही फल भोगा।। कभी-कभी ईर्ष्या में ही अपना सब कुछ खोते। कर्मों के आधार से ही भविष्य हमारे तय होते।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

पुरुष

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कर्तव्यों की जंजीरों में बंधा मैं विवश हूं। इस वसुधा का निवासी मैं एक पुरुष हूं।। मैं अपनी जिम्मेदारी निभाता चला गया। अपने मन को अंतर में दबाता चला गया।। संवेदनाएं दबा दीं मैंने कर्तव्यों को अपनाया। त्याग मैं करता रहा फिर भी दोषी कहलाया।। जीवन पथ पर चलने वाला अपूर्ण निष्कर्ष हूं। अपनी इस धरती का वासी मैं एक पुरुष हूं।। बचपन में सबने सिखाया कि तुम कभी रोना नहीं। अंतर में अपने संवेदनाएं को एकदम बोना नहीं।। बचपन से मुझको यही सब बताया गया। मेरे अंतर मन को शिला सा बनाया गया।। जीवन की राहों पर चलने वाला पथिक हूं। अपनी इस धरा का वासी मैं एक पुरुष हूं।।  बस कमी मेरी इतनी रही दिखावा न किया। अपने कर्तव्यों का कभी श्रेय मैंने न लिया।। मैं अपने दिल के अरमानों को जता न सका। मैं कभी अपने ह्रदय के भाव दिखा न सका।। क्योंकि मैं अपने कर्म रूपी पथ का पथिक हूं। अपनी इसी धरा का वासी मैं एक पुरुष हूं।। नाम - विक्रांत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

त्रिकोणीय प्यार

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हमारी मोहब्बत का एक अलग ही आधार था। मुकाम तक कैसे पहुंचता त्रिकोणीय प्यार था।। हम उनको चाहते रहे दिलो जान से। पर वह कहीं और ही थे बे इंतहान से।। मुकम्मल ना कभी भी हमारे प्यार का जहां हो पाया। मोहब्बत वापस आने के इंतजार में मैं कहां से पाया।। हम इंतजार करते रहे क्योंकि वह मेरा संसार था। मुकाम तक कैसे पहुंचता जो त्रिकोणीय प्यार था।। अपनी अपनी चाहत में भागते रहे पर कुछ ना मिला। हम कभी भी सच स्वीकार न सके फिर कैसा गिला।। प्यार हमेशा से ही मेरा उसके लिए ही बरसता रहा। मैं उसके और वह किसी और के लिए तरसता रहा।। वह हमसे मुस्कुराते थे यह उनका आभार था। मुकाम तक कैसे पहुंचता त्रिकोणीय प्यार था।। नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

पतंग

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आसमान में उड़ती लगती परिंदों से ये न्यारी। है तो यह निर्जीव पर लगती पक्षी सी प्यारी।। यह भी मनमौजी सी कभी धरा कभी गगन में। कभी उड़ती आंखों में ये कभी ओझल गगन में।। कभी पतंग रहे तो यह कभी यह पंछी बन जाए। आसमान में जाकर यह सारे अदभुत सुख उठाए।। आसमान में जब उड़ती लगती अदभुत, न्यारी। है तो यह निर्जीव पर लगती पक्षी जैसी प्यारी।। यह दूर गगन में जाकर सारे पक्षी के सुख उठाती। मुझे देखती दूर गगन से मेरे मन को बहुत लुभाती।। जब भी यह कट जाती है मेरा दिल दुख जाता। इसको ऊपर देख कर ही मेरा दिल सुख पाता।। जब मेरे हाथ में रहती मन मे रहती खुशी प्यारी। है तो यह निर्जीव पर लगती पक्षी जैसी प्यारी।। नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

मर्यादा सामाजिक बंधन या अभिशाप

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नैतिकता जंजीर पडी हो मर्यादा अभिशाप कहां। मर्यादा के कारण ही हम करते हैं सत्कर्म जहां।। नैतिक मर्यादाओं से ही समाज का उत्थान हुआ। नैतिक मर्यादावादी को हर जगह सम्मान मिला।। जब तक नैतिकता की बेड़ियां मर्यादा में पड़ी रहीं। तब तक मर्यादा इस धरा पर धर्म, सच में खड़ी रही।। मर्यादा अभिशाप बनेगी होगा तब सम्मान कहां। मर्यादा के कारण ही हम करते हैं सत्कर्म जहां।। मर्यादा की लीक पड़ी तब परंपरा का उदय हुआ। इस धरा पर मर्यादा में अभिशापों का जन्म हुआ।। मर्यादा दूषित होती तब यह अभिशाप कहातीं। सारे गलत कर्मों को तब मर्यादा चादर उढाती।। मर्यादायें अच्छी हैं जब तक मानवता होगी वहां। मर्यादाओं के कारण ही करते हम सत्कर्म जाहां।। नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

विधवा पुनर्विवाह

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आओ मिलकर कदम बढ़ाए नारी के सम्मान में। विधवा विवाह शुरू करें महिला के उत्थान में।। सारे अपने छोड़ आई तब एक आसरा उसने पाया। नियति का खेल उससे जीवन साथी छीन लाया।। अब पड़ी असहाय बताओ जिए किसके सहारे। इस नियति के खेल अनोखे होते एकदम न्यारे।। आओ उसको नवजीवन दें एक नई पहचान में। विधवा विवाह शुरू करें महिला के उत्थान में।। हरपल अकेली यही सोचे कैसे जीवन बीतेगा। मेरे इस उपवन रूपी जीवन को कौन सींचेगा।।  अब किसका मै हाथ पकड़ कर गर्वित हो पाऊंगी। जीवन रूपी पथ पर आगे किसके साथ जाऊंगी।। आओ उसको राह दिखाएं सब के तत्वधान में। विधवा विवाह शुरू करें महिला के सम्मान में।। वह किसी के घर की बिटिया आंगन की उजियारी। उसके सीने में भी दिल है वह भी अपनों की प्यारी।। वह फिर से सपने देखे क्या उसको अधिकार नहीं। समाज में घुट कर जिए क्या उसका तिरस्कार नहीं।। चलो एक आगाज करें हम नारी के सम्मान में। विधवा विवाह शुरू करें महिला के उत्थान में।। नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ईमेल पता - ndlodhi2@yahoo.com © स्वरचित रचना एवं सर्वाधिकार सुरक्षित