कविता



हर स्थिति के दो विकल्प जो चाहे मैं लेलूं।
जैसे होते है सदा हर सिक्के के दो पहलू।।

अच्छाई, बुराई साथ रहे जैसे पुण्य व पाप।
वैसे ही पथ के दो मार्ग ज्ञात और अज्ञात।।

स्थिर मन के साथ हमेशा चंचल मन भी होता।
जो ज्यादा हंसता दुनिया में सबसे ज्यादा रोता।।

यहाँ भी दो राह है कहलूं या फिर सहलूं।
जैसे होते हैं सदा हर सिक्के के दो पहलू।।

न्याय, अन्याय साथ चले जैसे दिन व रात।
वैसे ही चलता सदा सांझ के साथ प्रभात।।

सत्य असत्य साथ चले जैसे धर्म अधर्म।
वैसे ही पानी के पहलू होते ठण्डा व गर्म।।

दो पहलू फिर से आ गए चलूं या फिर ठहरूं।
जैसे होते हैं हमेशा हर सिक्के के दो पहले।।

नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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