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Showing posts with the label अनिता शर्मा

आरूषि!!!

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आरूषि अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी।सभी सुख उसे बचपन से मिले और क्यों न लाड प्यार मिलता शादी के सालों साल बाद जो पैदा हुई थी।वो भी तब जबकि उसके माता-पिता ने संतान की उम्मीद भी खो दी थी। लेकिन शिक्षा दीक्षा में कोई कभी नहीं रखी।बहुत अच्छे संस्कार दिए थे।बोल ऐसे मीठे कि बरबस अपनी ओर ध्यान खींच ले।केन्द्रीय विद्यालय से पढ़ाई की और यूनिवर्सिटी से ।देखने में बहुत सुन्दर सौम्यता चेहरे पर मुस्कान के साथ आकर्षक लगती।   आरूषि के माता पिता ने उपयुक्त जीवन साथी चुना जो प्रोफेसर था नाम था राज और दिखने में आकर्षक।स्वभाव से शान्त सुलझा हुआ।परिवार में माता पिता और एक छोटी बहन थी। सभी कुछ अच्छा चल रहा था पर आरूषि को बच्चे की तमन्ना थी पर ईश्वर के आगे विवश।लोग अपनी हरकतों से बाज कहाँ आते?पूछते बच्चे के लिए।जब छोटी ननद के विवाहोपरान्त एक बेटा और एक बेटी हो गये तो नाते रिश्तेदार ताने और छीटाकशी करने लगे।आरूषि और राज परेशान हो गये सभी इलाज करवा लिए,सभी पूजा पाठ । जिसने जो बताया सब किया अब दोनो अधेड़ उम्र के पड़ाव में थे उम्मीद खत्म होने लगी निराश हो चुके थे पर....आरूषि की तमन्ना कहीं न कहीं जिन्दा ...

पितृ दिवस पर हृदयी उद्गार

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पिता संघर्ष की आंधियो में....एक हौ पिता वट वृक्ष विराटतम्, आजीवन संघर्ष में रत्। देता शीतल छाँव हमें, हर दुख दर्द को दूर करे। परिवार की हर खुशी, हर अनुशासन की नींव पिता। पिता हौसला हर बच्चों का, हर मुश्किल आसान करें। चाहे जितनी आंधिया आयें जीवन में, हर तूफान की दवा पिता । जीवन के झंझावातो को, हर लेते वट वृक्ष पिता। पिता हौसला हर बच्चे का, पिता गर्व है बच्चों के। जब जब ठोकर लगती हमको, संबल है पिता जग में। जब भी हम कमजोर पड़े तो, हौसला बढ़ा देते पिता। ---अनिता शर्मा झाँसी ---मौलिक रचना

"प्रेम की निशानी"

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सच्चा प्रेम विश्वास है, यही निशानी सच्ची है। आपस के भावों को समझें, बिन बोले नजरों को पढ़ ले। आंखो से उमड़े भावों को, पढ़ ले प्रेम निशानी वो। दिल से दिल का रिश्ता, दो शरीर एक प्राण हों ज्यों। दिल की धड़कन बढ़ जाये, साजन की आहट को पहचानने। प्रेम की निशानी है, अखियां बतिया दिल की कहती। हाँ प्रेम निशानी है।।। ----अनिता शर्मा झाँसी ----मौलिक रचना

रक्त की बूँद!

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रक्त की बूँद!!!! रक्त की हर बूंद कीमती, रक्तदान जरूरी है। कीमती हर जान रक्त से, रक्त दान जरूरी है। समय-समय पर शिविर में, रक्त दान जरूरी है। सेहत के लिए जरूरी है, संतुलित आहार लेना। रक्त से बड़ा नहीं कोई दान, दान करें हम सब रक्त। जीवन में परोपकार की भावना, और रक्तदान जरूरी है। किसी के जीवन रक्षा हेतु, आगे बढ़ रक्त दान जरूरी है। हमारे रक्त से बच सकता है, किसी का दूसरे का जीवन। किसी मौके पर बढ़कर सहेजे, किसी एक का भी जीवन। ----अनिता शर्मा झाँसी -----मौलिक रचना

इत्र और मित्र!!!

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जिंदगी को महकाने के लिये इत्र जरूरी है जीवन की बगिया को महकाने इक मित्र जरूरी होता है। जो गलत को गलत कहे, हमें सच्ची राह दिखाये । जीवन में खुशियाँ भर दे, दुख में हर गम बाँटे । कभी डांटे,कभी फटकारे, कदम-कदम पर साथ चले। मित्र-इत्र का कार्य करे, जीवन को जीना सिखला दे। मन मंदिर को महका दे , चेहरे की रौनक को चमका दे। जब परम मित्र जीवन में, इत्र की खुशबू भर जाती । मित्र इत्र सा महकाता जीवन, हर पल हजारों खुशियों के । हर खुशबू को भर देते सच्चा इक मित्र जरूरी है। ------अनिता शर्मा झाँसी -----मौलिक रचना

स्वाभिमानी!!

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सुर्ख जोड़े में सजकर, स्वाभिमानी घर आई। सुर्ख ओढ़नी लाज भरी,नयनों में काजल सजा। नाक नथनी स्वाभिमान की,पवित्रता निशानी। समर्पण हर रिश्तों में,स्वाभिमानी जीवन की चाह। नहीं बंधिनी गृहस्थी में,गृहस्वामिनी भरे घर की। ओजस्वी चेहरा दमके,नयनों में झलके आत्मविश्वास। संस्कार और मर्यादा से नित्य सींच रही रिश्तों को। लालिमा होंठो की ,आशा का संचार भरे। बिन्दिया दमके माथे पर,स्नेही सजना के नाम से। मांग का सिन्दूर गरवान्वित पहचान सुहाग की। छोड़ आई बाबुल का अंगना।। --अनिता शर्मा झाँसी। ---मौलिक रचना

परिवर्तन और हम

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जीवन के नियम निराले समय के साथ बदलता परिवेश। समयचक्र बदलता निश दिन परिवर्तन प्रकृति का नियम। कभी खुशी-कभी गम आते जीवन झंझावातो का संगम । परिवेश सोच विचार बदलते बदल रहे हम सब दुनिया में । पसंद बदलती,रंग बदलते  जीवन के चक्र घूमता प्रति पल। संस्कृति संस्कार बदलते देखे परिवर्तित होते हम भी। सोच समझ में परिवर्तन दिखता नित्य नई सुबह खिलती है आशा से हम सबको भरती। धरती घूम रही धुरी पर परिवर्तित करती दिन और रात। बदलते परिवेश में जरूरी है परिवर्तन के साथ बदले अपने विचार। पुरानी जिन्दगी बदल गयी परिवर्तन और हम आधुनिक हो गये। -----अनिता शर्मा झाँसी -----मौलिक रचना

आवाज आई

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दूर से आवाज़ आई बड़ी दूर से आवाज़ आई मधम मधम सा स्वर गूँजा। मधुर स्वर सुखद लहरी से आज फिर आवाज़ दी। सुखद अनुभूति का क्षण  पहचानी सी स्वर लहरी । अनजानी सी कुछ पहचानी बहुत दिनों के बाद सुनी । तंद्रा भंग हुई सहसा ही फिर बीता कल जाग गया। परतें दर परतें खुलने लगी हर बीता पल चलचित्र दिखा। भूलना चाहा हर बीता पल रह-रहकर नासूर बना। छोड़ दिया जिन बातों को कब्र तोड़ बाहर निकली । जिनसे दूर हुए वो ही अक्सर टकरा कर सामने खड़े मिले। एक आँधी धूल का बवंडर उड़ाती एक रिश्तों का शमशान सजाती। हाँ एक मद्धम सा स्वर सुना  कुछ जाना-पहचाना सा था। -------अनिता शर्मा झाँसी -------मौलिक रचना

ये जीवन है!!

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ये जीवन है!! यायावरी सा जीवन है आना और जाना है। फिर भी गुमान बहुत है शानो-शौकत सी जिंदगी। मन गगनचुम्बी सा देखो कभी यहाँ तो वहाँ घुमता। सपने बहुत सजाकर आंखो में भर रहा मन। कल्पना की उड़ान ऊँची उड़ती न थकती । संतोष कब हुआ था लिप्तता ही बढ़ती जाती। कभी जिद्द हावी होती कभी गुरूर बढ़ता जाता। शान्ति कहाँ से पाते अभिलाषाऐ जाग जाती। सबको यह पता है जाना जहाँ से खाली। पर संजोए जा रहे हैं जाना है हाथ खाली। ----'अनिता शर्मा झाँसी -----मौलिक रचना

पहले जैसा नहीं रहा

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क्यों हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा ? हाँ सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि- क्यों हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा। कितने सिमटकर रह गये हैं रिश्ते कि अब!पहले वाली बात रही नहीं उनमें। सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि पहले जैसा कुछ बचा नहीं इस दौर में । कितने उलझ कर रह गये हम सभी कि पहले वाली बात अब बची नहीं। वो खुशियों का दौर वो मनमौजी फितरत अब रिश्तों में बची ही नहीं। वो अपेक्षाओ की बलि वेदी में दफन हो गया कि हाँ हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा। संकोच और संतुष्टि के भाव न जाने कहाँ आलोप हो गये कि रिश्ते अब औपचारिकता की भेंट चढ़ गए। वो मेल मिलाप भी न जाने कहाँ अंतर्धान हो गया कि हर रिश्ता अब पहले जैसा नहीं रहा। वो डांट वो डपट और अपनापन भी अब झंझटों के डर का शिकार हो गया। आज सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा। आधुनिकता की आहुति में स्वाहा हो गया कि हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा। एक दूसरे की भावनाओं को समझते थे कि आज अपनी भावनाओं के लिए वक्त नहीं रहा। हाँ आज हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा जो बात पहले थी कभी वो बदल गयी। कि अब हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा आज हर रिश्तों में परतें चढ़ गयी। न जाने ...

बसंत

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बसंत की बहार आई ,रंगों की फुहार लाई। चले आओ सजना घर के अंगना । रंगों संग उमंग लाई,चेहरों पर निखार लाई। दिलों में उफान लाई,रंगीली छाई सब ओर। मन चंचल बेचैन हुआ,भाव पर जोर नहीं है। चारों ओर महकते पुष्प,ख्वाबों को बुन रहे । ऋतुराज बसंत आया, हर दिल में प्रेम लाया। रंगों संग उमंग लाया,आओ सजना घर के अंगना। फूलों की बहार छाई,हवाओं में सुगंध भरी। भौरो का गुंजन गूँजा,तितली की उत्कंठाहै। मनो में प्यार की खुशबू,रौशन हरेक आँगन। मादकता मदहोश करती,साजन की बाँहो में। प्रियतम की प्यारी बतिया,चाहे हरेक सखियां। बसंत की बहार आई,रंगों की फुहार लाई। चलो संवारे हर दिन खुशी से भर करके। -----अनिता शर्मा झाँसी ------मौलिक रचना

प्यारा बचपन

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परिवार में बड़ी शक्ति है     मन प्रसन्नता से भर जाता        बच्चों का खिलता चेहरा तो           सराबोर हो हर क्षण जीवन के। महके तन मन माँ का      जब बच्चों के चहके स्वर।          सुखमय जीवन हो जाता है               हृदय पुलकित आनंदित हो जाता। बच्चों के साथ सुखमय    वक्त गुजरता है मेरा । साथ जब उनके होती       चमकता चेहरा गर्व से। सफल हुआ जीवन मेरा      सफलता बच्चों ने पाई। शुक्र ईश्वर का करूँ मैं      नेक संतान छोली में डाली। धन्य हूँ तुम्हारी मौजूदगी में       और प्यारी मुस्कान बिखरी मुझमें।। बच्चों सा मन है कोमल चेहरे पर निश्छल मुस्कान। गाने के सुर पर पैर थिरकते कितनी भोली सी मधुर मुस्कान।    देख बालपन हृदयी प्रेम उमड़ता    प्यारा नन्हा सा रूप फरिश्ता है।    बाहों में भरने की उत्कंठा प्रबल    कितना भोला बचपन मिलता है। ------अनिता शर्मा झ...

आशा

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उसने मुझे मुस्कुरा कर देखा, कौन हो तुम?हौले से पूछा। उसने आंखो में चमक भर कहा, मैं तो हूँ,तुम्हारी ही आशा । * एक विश्वास सहज ही आया, आत्म सम्मान सहज ही छाया। आशान्वित हो उठी तत्क्षण, नव-जागृति मनोबल बढ़ाया। * मैने उस आशा को अपनाया, जीवन में अवसर को पाया। समय का सदुपयोग किया तब, सकारात्मक ऊर्जा से भरा मन। * आशान्वित क्षण नव उत्साहित, आभासित दीपक की ज्योति। सहचर आशा की किरण भर, अग्रसर हो जीवन की ओर । ------अनिता शर्मा झाँसी ------मौलिक रचना

अंजान राहें!!

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है अंजान राहें थमती नहीं नित नये रास्ते मिलते ही जायें। जीवन डगर पर मुस्कान बिखेरी बढ़ते चले हैं बाधाओं से टकराकर। नित नये मुकाम हासिल हुए  अनुभव बहुत जीवन से जुड़े हैं। अंजान राहें थमती छण भर हमारी कोशिश पहचान गढ़ रही है। अंजान राह अब जान पहचान हो गयी है। जीवन के अंजान सफर में हर पल उम्र में बढ़ रहे हैं। कर्म योगी से अंजान राह पर निर्विकार निर्भय बढ़ रहे हैं।।     अनिता शर्मा झाँसी     मौलिक रचना

दिसम्बर की बिदाई और नववर्ष का आगाज़"

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लो दिसम्बर जाने को तैयार नववर्ष आने को उत्सुक हैं। सारे रंजो गम भुला कर हम हंसी खुशी के संग जियेगें । चलो जनवरी का स्वागत कर अभिनंदन सभी का हृदय से करे। प्यार बांटते हुए सहृदय से बैर भाव भुला मिटाकर जियें। दर्द बहुत सहा है सभी ने  डटकर हिम्मत से आगे बढ़े। नववर्ष का स्वागत हंस कर करें सारे रंजोगम भुला कर करें। अंतर्मन आनंदित हो आनंद में नव चेतना का संचार हो विश्व में। आलौकित हो घर-संसार सुमधुर आंखों में नव चमक और विश्वास हो। चलो दिसम्बर को अलविदा कह दे और हंसी खुशी से नववर्ष का स्वागत करे। मंगलमय नववर्ष का आगाज़ है सुख शांति और समृद्धि के साथ।। ----अनिता शर्मा सुधा नर्सिग होम झाँसी ----मौलिक रचना

माँ का समर्पण

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उसे निभाती एक स्त्री । माँ शब्द अपने में सशक्त, सबको माफ कर चुप रहती। सारा दिन दायित्व निभाती, ताने-बाते सब सह जाती । अपने बच्चों के लिए समर्पित, दुखी-भूखा देख तड़पती । बोझा ढोती, मेहनत करती, बच्चों का हर सुख चाहती । कष्ट झेलती,उन्हें दुलारती, स्नेहिल ममतामयी हृदयी माँ। हर पल घर का ध्यान रखती, अपने से पहले बच्चों को रखती। बच्चों को ठोकर लग जाती, आँसू माँ की आँखो में भर आते। हर मुश्किल में सशक्त खड़ी हो, हल खोजती मेहनत करती।     ----अनिता शर्मा झाँसी     -----मौलिक रचना

"शून्य की ओर"

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शून्य सी शान्ति ब्रहमांड में सूक्ष्म शरीर पर उतरा। नया वस्त्र धारण किया शरीर मोह माया के जाल में। बंधा यहाँ रिश्तों के बंधन में फिसलन इस संसार में। भूल गया अपने गंतव्य को उलझ गया संसार में। भटकाव यहाँ हर मोड़ पर फिसलन इस संसार में। कर्मयोगी तू फिसल रहा क्यूँ मोह के जंजाल में। जान ले,इस धरा के प्रारब्ध को शून्य में समाहित है सब। फिसलन से बचकर निकल शून्य की ओर ब्रम्हाण्ड में।। ------अनिता शर्मा झाँसी ------मौलिक रचना

प्रेरणा!

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मेरे जीवन की प्रेरणा स्रोत है आपका आशीर्वाद! हर पल राह दिखाई सच्ची,हर पल साथ तुम्हारा था! जब-जब मैं कमजोर पड़ी,सीख-प्यार तुम्हारा था! संस्कार और मर्यादा से नित्य सींच आपने बड़ा किया! आत्म सम्मान और आत्म विश्वास का ज्ञानवर्धन तुम्हारा था! प्रेरणा स्रोत तुम्हीं हो जिन्होंने आत्म नियंत्रण सिखलाया! बचपन से ही हाथ पकड़कर चलना मुझको सिखलाया! बेटी जिसका धन हो,धन्य ऐसे पिता को पाकर मैं हूँ! मान-गर्व-स्वाभिमान से सिर उठाकर चलने की प्रेरणा दी! बचपन से ही मेरे नायक ,मेरे आदर्श का साकार रूप! ईमानदारी से जीवन जीने का गुर तुमने ही तो सिखलाया! कभी कमजोर पड़ी तो हौसला तुमसे ही पाया! वट-वृक्ष से सुदृढ़ पिता ,धन्य हुई पाकर तुमको! वचन दिया था नेक राह पर बढ़ रही हूँ,प्रेरणा तुम्हारी पाकर ! मन में दृढ़ संकल्प संग ,इच्छाशक्ति मजबूत है! ----'अनिता शर्मा झाँसी ----मौलिक रचना

उलझे-बिखरे सब"

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उलझे-बिखरे सब" कितने उलझे-उलझे हुए सब , कितने बिखरे-बिखरे हुए सब। बनावटी दुनिया में उलझे हुए सब, दिखावटी सब सज-धज ओढ़ी है। अंदर से खाली-खाली सब दिखते , खोखलेपन में टूट रहे सब भीतर । टूट रहे अंदर-अंदर,बाहर चमक- निराली सी,अजब तेरी कहानी बंदे। सांसे भी गिनती की दे भेजी रब ने, उलझनों में उलझ बर्बाद करी सब । बची-खुची समेट अंतस की शांति में , सुलझी सी जिन्दगी चुन अब जी ले । भटकाव बहुत आयेंगे जीवन में, चमक धमक चौंकाने वाली । छुपकर आँसू व्यर्थ बहा मत , खुद में खुद की खोज करें सब । चिंता तनावमुक्ति सर्वोपरि जीवन में, सरल-सहज हो अंतस-बाहर ।। क्या थे?क्या है? क्या हो रहे सब? पल-भर ठहर :विचार करें सब ।। ---अनिता शर्मा सुधा नर्सिग होम झाँसी ----मौलिक रचना

सूनापन अखरता"

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अकेले चुपचाप खड़ी हो , देख रही थी,जहाँ दुनिया बसती थी । सूनापन पसरा था कमरे में, जहाँ रौनक रहती थी । अंधियारा छाया था बंद कमरे में, जहाँ उजियारा चहल-पहल होती थी। बहुत अखरा था सूनापन मुझको, बहुत अकेलापन लगता है। जीवन में अकल्पनीय घटित हुआ, सिर से हाँथ हटा माता पिता का । कितने स्नेहिल मातृ-पितृ कवच था, हर विपदाओं का हल मिलता था। निष्ठुर काल एक-एक कर निगल गया, मेरे प्रिय जन मुझसे छीने । कसमसाहट हृदय वेदना बेबसी का, दे गया काल छटपटाने हमेशा। बेहद वेदनीय घड़ी थी,नयन अश्रु भरे , पलकों ने अश्रु पीकर सुखा दिये थे। चलचित्र से पल गुजर रहे थे और, बाहर खामोशियां पसरी थी।! -----अनिता शर्मा सुधा नर्सिग होम झाँसी -----मौलिक रचना