Posts

Showing posts with the label कुमार अविनाश केसर

सूरज

Image
सूरज, तुम क्यों जलते हो इतना? कहाँ से आती है तुम्हारी ज्वाला? क्यों इतनी तपन है तुममें? कैसे उठाए फिरते हो इतना ताप? मैं जब भी महसूसता हूँ  - तुम्हारी तड़प! उत्तप्त हो उठता है - मेरा रोम-रोम!! आखिर, तुम्हें किसने जलाया होगा- प्रथम बार!!! मैं सोचता हूँ - एक बार जलने में, असंख्य अग्निशिखाएँ... अनंत  तापपूँज.... एक साssssथ!प्रज्वलित हो उठे होंगे. तब तुम जले होगे!!!! जलना आसान नहीं है, नहीं तो तुम सूरज न होते। हर कोई सूरज नहीं होता।

बसंत बूढ़ा हो गया

Image
अब चिड़िया आती नहीं मुंडेर पर! फड़फड़ाते नहीं पंख, सुबह को समेटकर- अब गाती नहीं चिड़िया.... अब आती नहीं चिड़िया... कौवे भी, अतिथि का संदेश लेकर नहीं आते.... कहां चली गई विदेशी कोयल! शायद! इसीलिए बसंता बूढ़ा हो गया है!! इसीलिए अब धीरे-धीरे आता है.. देर से... कम समय के लिए...। आम! शायद इसीलिए अब सालों भर मिलने लगे हैं... हर जगह... वक्त बे वक्त दिखने लगे हैं... शायद कहीं मिल जाएँ...... मोर... पपीहा..... तोता..... कोयल.....!!!!