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पहली मुलाकात

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नैनन से नैन मिले जैसे मिले कोई हमजोली, प्रेम प्रीत का खेल नही हृदय बात ही बोली। क्या कह गई अँखियाँ साथी बिन बोले कोई बात, व्याकुल जी देखन से ही बस मिले प्राण में श्वांस। पहली नज़र का पहला प्रेम वो पहली मुलाकात, आंखें आंखों से बातें करें जब हो हमदम पास। हस्त स्पर्श से ही हृदय में उठी तरंगों की फुहार, सलिल धार भांति मन हुआ मांझी का हकदार। प्रेम सुमन प्रीत से जुड़ जीवन में शामिल किया, प्रेम भवँर बंध के मैंने जीवन भी सपर्पित किया। वो पहली मुलाकात आखिरी दम तक जुड़ी रहे, आस, विश्वास की पोटली प्रेम से सदा भरी रहे।। नेहा यादव स्वरचित रचना।

माँ की ममता

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आंखों को देखा है मैंने उसके सैलाबों के ढेर सा समुंदर लिए घूमती है माथे पर लाल बिंदी शून्य सी हर दर्द को अपने अंदर लिए घूमती है स्नेह करुणा से भरी रहती है माँ मेरी दृढ़ता का अद्भुत कलंदर लिए घूमती है ममता की शक्ति ऐसी कि जहां झुका दे माँ मेरी प्रेम निरन्तर लिए घूमती है श्रद्धा की अलौकिक देवी का स्वरूप है स्वाभिमान को आँचल में लेकर घूमती है कोई दर्द हो अगर जेहन में मेरे  बिन कहे जान लेने का हुनर लिए घूमती है माँ दिव्यता का दुर्लभ आभूषण है ममत्व को हृदय में धारण करके घूमती है। नेहा यादव स्वरचित रचना।

काजल

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आंखों में लगे तो श्रृंगार हो जाता है रिसे तो बादलों का फुहार हो जाता है खुली पलकों में स्वप्न हज़ार सजाए काजल बन के पी का प्यार हो जाता है नज़र का टीका प्रेम प्रीत में भर के  माँ के स्नेह से भरा संसार हो जाता है नई सहर शीत लहर रेखाओं के मध्य हवा शबनमी फिर गुलज़ार हो जाता है जुड़ता है ऐसा कुछ रिश्ता प्रीत बंधन में आंखों का काजल हरसिंगार हो जाता है। नेह यादव स्वरचित रचना।

प्रकाशमय

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आकाशगंगा की शीतल छाया में प्रेम की अविरलता का प्रमाण होगा दीपोत्सव में संग हमारे संसार सागर माधुर्य संगम स्थल का प्रसार होगा कार्तिक मास के आमवस्य में तल पर नभ का साक्षात्कार होगा प्रेमरूपी दीपों से सुशोभित  प्रकाशमय पृथ्वी लोक बार-बार होगा रंगों की रंगोली से घर आंगन सजे उत्साहित जग अपना परिवार होगा। ●नेहा यादव स्वरचित रचना।

बंधन

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तुमसे वादा है सनम जीवन भर साथ निभाने का कभी दर्द हो तुम्हें तो तुम्हारा हमदर्द बन जाने का बातों की बात नही है ना ये ज़माने भर की बातें हैं यूँ ही थामकर हाथ तुम्हारा प्रेम प्रीत बन जाने का दिन महीने साल गुजरेंगे मेरे, तुम्हारे एहसास से एक तुझमें जिंदा होकर बस तुम्हारा हो जाने का बंधन होगा मन से मन का वादों से पूरी मांग होगी एक तुम बस मेरी होगी मैं बस तुम्हारा हो जाने का तुम होगे और मैं होऊंगा एक अपना संसार होगा वादा है तुम्हारे वादे से बस तुम्हारा ही हो जाने का। ●नेहा यादव स्वरचित रचना

सर्द रातें

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दिसंबर की वो सर्द रात थी, कुछ अहसासों की बारात थी, दिल का आलम भी असहज सा, ख्यालों की बस सौगात थी। कुछ यूँ हुआ कुछ लम्हों के बाद, सितारें आसमां में सैकड़ों थे, पर एक चाँद के दीद के खातिर, आँखों से अक्सर होती बरसात थी। वक्त निकलता गया हम संभलते गए, बेरुखी आदतों को हम समझते गए, एक शख्स के खातिर बदला ख़ुद को, फर्क नहीं उसे क्यूंकि कोई और साथ थी। दूर तो निकल आये थे पर ख्यालों से, कुछ सवालों से कुछ जवाबों से, पर रुके थे उसी मोड़ पर आज भी, जहाँ से थाम कर चली उसका हाथ थी। ये वक्त की मार थी या ख्यालातों की, समझ तो हम पाए नहीं थे कभी भी, पर दिल ने बस यही समझाया मुझे, कुछ नहीं बस ये दर्द से मुलाकात थी। ●नेहा यादव स्वरचित रचना