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देखेंगे हम तो आपको

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देखा नहीं उनको तो कभी,जिनको लोग याद करते हैं। देखेंगे हम तो आपको , कि अब आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी----------------।। कहती जिनकी कहानी, यह जमीं ये हवाएं। पढ़ी है मैंने तो सिर्फ किताबों में, ये कथाएं।। किसने लिखी यह दास्तां ऐसी, अपने बलिदान से। देखेंगे अब इस देश के लिए, कुर्बान आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी-----------------।। कौन हुआ है शहीद इसके लिए, नींव का पत्थर बनकर। कौन है तैयार इसके लिए, करने खत्म खुद को हंसकर।। किसको नहीं है मोहब्बत, यहाँ अपनी जिंदगी-सुख से। देखेंगे अब इस देश के लिए, त्याग आप क्या करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी------------------।। उत्सुक है हर कोई यहाँ, देश का ताज पहनने को। बनकर कंगूरा देश में , अपना नाम अमर करने को।। बहुत आसान है लिखकर गजल, महफ़िल में सुनाना। देखेंगे अब इस देश के लिए, बलिदान किसका करते हैं।। देखा नहीं उनको तो कभी-----------------ll शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

हे वतन , क्या होगा तेरे कल का

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देखकर आज इंसान की हरकतों को, उसके लफ्ज़ और उसके कारनामों को, सोचता हूँ तेरे बारे में , हे वतन, क्या होगा तेरे कल का ? पुकारता हूँ उस मालिक को, जिसकी रचना है इंसान, जो होकर गुमराह इस प्रकार, अपने स्वार्थ के लिए, कर रहा है ऐसे कुकृत्य, जिनसे नहीं है अमन वतन में। कर रहा है वह विश्व में, नाम बदनाम तेरा सच में, कर रहा है धूमिल तेरी वह तस्वीर, जो बनाई थी तेरे सपूतों ने, देकर अपना बलिदान, तुमको दासता से मुक्त कराने के लिए। लिखा था जो भविष्य तेरा, उन शहीदों ने लहू अपना बहाकर, सब रिश्तें- नाते तुझपे कुर्बान करके,  देने को हंसी-खुशहाली नई पीढ़ी को। लेकिन आज देखकर नई पीढ़ी को, जो कर रही है तेरा सौदा विदेशों में, तेरे महापुरुषों की विरासत का, और बुझा रही है वो ज्योति, जो जलाई थी तेरे सपूतों ने  तुमको रोशन करने के लिए, लेकिन कर रही है बर्बाद, यह नई पीढ़ी उन सभी को, अपनी जठराग्नि को बुझाने को, सोचता हूँ और आश्चर्य करता हूँ, हे वतन, क्या होगा तेरे कल का ? शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

क्या था, क्या हो गया

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मुझको मालूम नहीं था बिल्कुल भी, मोहब्बत किस चिड़िया का नाम है, और किस तरह जुड़ते हैं, दो अजनबी दिल आपस में, अंजान और नादान था मैं। हुई जब उससे पहली मुलाकात, देखकर उसकी खामोशी को, चांदनी सी उसकी सुंदरता को, बेमिसाल उसकी खूबसूरती को, होता गया उसके नजदीक मैं, और जुड़ते गए दिल के तार उससे। लेकिन भूलता गया ऐसे में मैं, अपने अजीज दोस्तों को, अपने परिवार के रिश्तों को, अपनों की प्रार्थनाओं को, अपने माता-पिता के प्यार को, उससे नजदीकी और प्यार में। हमेशा चंचल रहने लगा, मेरा दिल उससे मिलने को, मेरे कदम उसके घर जाने को, उससे बातें करने को, उसके निमंत्रण के बिना, बिना मान- सम्मान के मैं। लेकिन मालूम नहीं था, वह करेगा मुझको बदनाम, मुझको बर्बाद जीवन में, वह देगा मुझको ऐसा दर्द, मेरे प्यार के बदले तोहफे में, क्या था, क्या हो गया। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

या खुदा बचा लेना उसके दामन को

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पूछता हूँ हर बार यही सवाल, जब भी जाता हूँ उसकी दर पर मैं, क्या नहीं मिला तुमको मेरा प्यार, जब भी वो मिलता है मुझको, किसी भी राह या मंदिर में। वो कहता है मुझसे, कुछ भी नहीं हुआ है तेरे यार को, सलामत है तेरा यह यार हर कहीं, कोई नहीं पहुंचा सकता चोट,  तेरे इस यार को सच में। मगर मुझको नहीं होता है विश्वास, उसकी बातों पर सच में दिल से, उसकी चंचलता को देखकर, उसकी शरारत को देखकर, उसकी नादानी को देखकर। आवाज देकर पुकारता हूँ मैं, दीपक लेकर तलाशता हूँ मैं, मंदिर में जाकर प्रार्थना करता हूँ मैं, दुहा करता हूँ मैं खुदा से, करता हूँ उसकी सलामती की फरियाद। मगर उसको क्या शक है मुझसे मिलने में, उसको क्या डर है दर्द मुझको सुनाने में, फिर भी लगे नहीं दाग उस चांद पर, उसके पवित्र शरीर - दामन पर, लुटे नहीं उसकी अस्मत कभी , किसी गैर के हाथों मेरे मालिक, या खुदा बचा लेना उसके दामन को। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

वह लता

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दरख़्त से लिपटी हुई वह लता, जो पुलकित कर देती है मन को, अविराम हवा की भांति, गतिशील रखती है मेरे विचारों को, चाहे वह है स्वप्न मेरे लिए, अविस्मरणीय याद मेरे लिए। उसकी मौन अभिव्यक्ति, जो सृजित होती है मेरी कलम से, हर महफ़िल में शिरकत में, हर कोई पूछता है प्रश्न मुझसे, मेरी रचना को देखकर , वह अलभ्य है मेरे लिए, और मुश्किल मेरा उस मंजिल तक, पहुंचना और उसको सीने से लगाना। मगर मुझको विश्वास है कि, कुछ भी हो फिर भी वह, नहीं मुझसे अपरिचित, और नहीं हूँ मैं दूर, उसकी स्मृति में , उसकी बातों और दर्द में। लेकिन वह करीब है, हर पल मेरे विचारों में, मेरे अदब और मेरे रचना में, मेरे काव्य की प्रेरणा बनकर, काव्यात्मा बनकर हर वक़्त, जिसको स्वीकार करता है, यह संसार और हर कवि। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

तो वो यह सोचते हैं

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तो वो यह सोचते हैं कि, यह जो कुछ हुआ, उनकी बदौलत हुआ, कर्म मैंने किया और, नाम उनकी बदौलत हुआ। दुनिया को बता रहे हैं वो, अपने अहसानों को, सबको सुना रहे हैं वो, अपने कर्ज को मुझ पर। मगर,  बेकार समझकर कल तक तो, उन्होंने तोड़ दिए थे सारे रिश्तें, सड़ा हुआ फल समझकर, मुझको फैंक दिया था सड़क पर। और आज, उस सड़े फल में महक देखकर, हीरे के समान उसकी कीमत जानकर, बसाना चाहते हैं उसको अपने दिल में। बता रहे हैं अब, दुनिया को उसको, अपने खून से सींचा बाग, पीयें थे अपने आंसू - गम, उसको आबाद करने के लिए। कर रहे हैं अब मेरी तारीफ, दे रहे हैं मुझको सम्मान, मेरी सफलता और तरक्की पर, दुनिया से यह कहकर,  कि हमारे परिवार का अंग है। तो वो यह सोचते हैं कि शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

मुझको विश्वास है ऐसा

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बुझे नहीं वह चिराग, किसी आते तूफां में। महकता रहे वह चमन, हर वक़्त हर बयार में । झिलमिलाता रहे वह सितारा, सितारों के संग चांदनी में। ना कोई भय - दुःख में, ना कोई दर्द- गम हो, ना कोई सितम- जुल्म हो, ना कभी उदासी- मायूसी हो उसके दिल और चेहरे पर, उसको उन महलों में । उस हसीन चेहरे को खुदा ने देखा है हमेशा, खुद अपनी निगाहों से, समझा है उसकी मजबूरी को, खामोश उसके लबों से। कहा है खुदा ने उससे, हकीकत होंगे तुम्हारे सपनें, खिल उठेगी तुम्हारी बगियाँ, महक उठेगी तुम्हारी फिजा, जल उठेगी तुम्हारी शमां जाग उठेंगे तुम्हारे अरमां, देखकर तुम्हारी दुहा को। देखकर उसकी काबलियत को, उसकी आँखों की चमक को, उसकी हिम्मत और विश्वास को, सच इस जमीं - दुनिया में, होगा रोशन उसका नाम,  मुझको विश्वास है ऐसा। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

हे कली

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हे कली, क्यों इस तरहां मुस्करा रही हो, क्यों हो रही हो इतनी बेचैन, अपनी इस जवानी पर , और क्यों हंस रही हो मेरी सूरत पर। क्या तुझको मालूम नहीं, मैं भी टूटा हुआ फूल हूँ , महककर अब सूख चुका हूँ , तू भी लगी है उसी डाल पर, मेरे साथ उसी बाग में।    सिर्फ अंतर यह है कि, तू मेरे बाद जन्मी है, इसलिए तू आबाद है, इसलिए तू जवान है, मगर मुझको अफसोस नहीं है, मेरी बर्बादी और मौत पर, क्योंकि मैं चढ़ा हूँ शहीदों पर। तू मदहोश है आजादी में, लगे हैं पंख तुझे उन्मादी में, फिर भी तुमसे मैं नाराज नहीं, बस दर्द इसलिए होता है, देखकर उस माली की दशा, जिसने सींचा है तुमको, अपने खून- पसीने से, उसकी पगड़ी गिरा मत देना,  हे कली । शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

बन्द लिफाफे में

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ऐसा क्या लिखा है आपने,  इस बन्द लिफाफे में, हमें जो सौंप रहे हो आज तुम, अब तक क्यों रहे खामोश तुम, जब देना ही था यह बन्द लिफाफा। क्या आपने किया था कबूल, कल को मेरा वह लिफाफा, जो देना चाहा था मैंने तुमको, बताने को तुम्हारे लिए मैंने, आपका सच्चा प्यार दिल में। आज छोड़कर अपनी जमीन, क्यों चले आये देने को यह लिफाफा, क्या लिखा है मेरे लिए सम्मान,  मेरे लिए प्यार और समर्पण, सच्चे दिल से इस बन्द लिफाफे में। क्या मौजूद है इस बन्द लिफाफे में, तेरी आँखों से गिरते आँसुओं की बूंदे, सच्चे प्रेम को दिखाती खून के छींटे, या फिर किया है मुझको खबरदार, इस बन्द लिफाफे में शब्दों से। मैं जरूर खोलूंगा यह बन्द लिफाफा तुम्हारी मौजूदगी में महफ़िल में, लेकिन पहले खोलिये मेरा बन्द लिफाफा, जिसमें दिया है तुमको मैंने सच्चे मन से, सम्मान और महत्त्व इस बन्द लिफाफे में। शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

यह प्यार

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यह प्यार ,  जिसकी चाहत है हर किसी को, गरीब, अमीर, वजीर, मालिक आदि को। चाहे वह रहता हो जमीं या आसमां पर, या रहता हो समुद्र में या उड़ता हो आसमां में। चाहे वह बच्चा हो या वृद्ध व्यक्ति, चाहे वह जवान हो या औरत। यह प्यार, जो रखता है सबको खुश और आबाद, देता है सबको हिम्मत और ऊर्जा, जो जोड़ता है आपस में विभिन्न देशों को, हराता है दुश्मन को, जोड़ता है दिलों को, रखता है सबको जवां और हसीन। यह प्यार, जो कर देता है राजी देने को कुर्बानी, अपने देश की आन - बान - शान के लिए, इज्ज़त - सम्मान - स्वाभिमान की रक्षा के लिए, अपनी मोहब्बत को बेदाग अमर करने के लिए, दूसरे को जीवनदान - खुशी प्रदान करने के लिए। यह प्यार, जब होता है आत्मा से किसी से, हो जाता है यह अमर तब, बन जाता है आदर्श सबके लिए, स्वीकार करता है तब इसको ईश्वर भी, गाये जाते है ऐसे प्यार के तरानें लोगों द्वारा। यह प्यार, जब इसमें नहीं होती है चाहत, दौलत - महलों - वासना की, बदला किसी से लेने की , नहीं छुपी होती है इसमें जब,  चालाकी- दगाबाजी- बेवफाई, तब कहलाता है यह सच्चा,  पवित्र प्यार सबकी जुबां से। यह प्यार, किया है मैंने भी किसी को, ...

इसलिए धरती को धरती माता कहते हैं(पृथ्वी दिवस पर)‌

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इसलिए धरती को ,धरती माता कहते हैं। क्योंकि इसके आँचल में ,हम जो पलते है।। इसलिए धरती को------------------।। लेता है हर प्राणी जन्म, इसके गर्भ से। करती है सबका पोषण, यह अपने अन्न से।। मानती है हर प्राणी को, यह अपनी सन्तान। करती है प्यार सबको , यह सच्चे मन से।। इसलिए धरती को------------------।। रूप इस धरती के , एक नहीं, अनेक है। कहीं पहाड़, कहीं समतल, कहीं रेगिस्तान है।। कहीं है पठार - जंगल , कहीं बर्फ की है चोटियां। नहीं जन्नत से कम , आबाद इनमें इंसान है।। इसलिए धरती को------------------।। इसकी सुंदरता की रक्षा, हम सबका धर्म है। इसको प्रदूषित होने से , बचाना है हमको।। इसकी हरियाली- वनों को , हम नष्ट नहीं करें। इसकी सुरक्षा से जीवनदान,मिलता है हमको।। इसलिए धरती को------------------।। शिक्षक एवं साहित्यकार -  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

जब भी वह होता है अकेला या

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जब भी होता है वह अकेला, या फिर किसी महफ़िल में, लबों पर नाम सिर्फ उसी का होता है, गीत बस उसी का होता है,  दर्द सिर्फ उसी का होता है, जिससे वह करता है प्यार। सभी उससे पूछा करते हैं, उसके गीतों की प्रेरणा कौन है ? तन्हाई में जीने की ताकत कौन है ? राह में आगे बढ़ने की हिम्मत कौन है ? हंसने और मुस्कराने की वजह कौन है ? लेकिन वह किसी कुछ नहीं कहता है। तब वह हो जाता है खामोश, निरुत्तर और खुद एक सवाल, मुस्कराता है खुद ही खुद में, या फिर हो जाता है उदास, या करके कोई बहाना फिर,  दूर कहीं वह चला जाता है। तब देता है कोई उसको आवाज, करता है कोई उसके आने का इंतजार, ऐसे में वह करता है वक़्त बर्बाद, करता है शब्दों की तलाश, जवाब किसी को देने को,  प्यार अपना पाने को वह, रंग भरता है अपनी कलम से,  मन के खाली पन्नों पर ,  अपनी जिंदगी को हंसाने को। शिक्षक एवं साहित्यकार-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

मुझको बस यह जानना है कि

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जी, ऐसा मैं सोचता भी नहीं हूँ, जो मैं सोचता हूँ वो कुछ और है, जो अपेक्षायें है तुमसे, जो विशेषतायें है तुझमें, देखता हूँ मैं इनको,  सोने की तरहां कसौटी पर। मुझको यह नहीं देखना कि, कितनी शक्ति है तुझमें ? मुझको सिर्फ यह देखना है कि, कितनी शर्म है तुझमें ? कितनी वफादारी है तुझमें ? कितनी समझदारी है तुझमें ? मुझको मतलब नहीं इससे कि, कितनी दौलत है तुम्हारे पास ? कितनी सुंदर सूरत है तुम्हारी ? किस जन्नत में है तुम्हारा घर ?  और क्या हस्ती है तुम्हारी ? मुझको बस यह जानना है कि कितनी देशभक्ति है तुझमें ?  कितनी सच्चाई है तुझमें ? कितना बहता है खून तुम्हारा ? जख्म वतन पर होने पर , मुझको बस यही जानना है तुझमें। साहित्यकार एवं शिक्षक- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

होली हर रोज जलाता हूं

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अपनी इस कलम से, लिखता हूँ जो खत,, उठ जाता हूँ नींद में ही, याद उसकी आते ही,, सोचता हूँ यह एक ख्वाब है सिर्फ, नहीं ,यह हकीकत है सच, और मैं लड़ता हूँ अपनी कल्पनाओं से, फिर भूला देता हूँ मैं यह सब, मानता हूँ सच में इसको मैं, अपना एक पागलपन ही । वह इतना बेखबर तो नहीं, कि मैं उसको नहीं चाहता, वह यह भी जनता है, कि मैं उसको प्यार करता हूँ, उससे इकरार करता हूँ , और इंतजार करता हूँ, कि वह भी इजहार करेगा, मुझ पर एतबार करेगा। मगर वह तो चाहता ही नहीं, देखना एक पल भी मेरी तरफ, कहना कोई दिल की बात मुझसे, अपनी मजबूरी और शिकायत मुझसे, चिढ़ाते है मुझको मेरे ये खत, होकर मजबूर मैं भी इन खतों की,  होली हर रोज जलाता हूँ । साहित्यकार एवं शिक्षक- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

इस विश्व विरासत की रक्षा करना

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इस विश्व विरासत की रक्षा करना। हमारा धर्म है, हमारा कर्म है।। यह नष्ट नहीं हो, विश्व विरासत। सच इसको बचाना, हमारा फर्ज है।। इस विश्व विरासत की--------------।। यह विश्व विरासत पहचान है, किसी देश की। यह सम्पत्ति और एक शान है, किसी देश की।। नहीं है सम्मान किसी देश का, इसके बिना। नीलामी फिर इसकी करना, अच्छी नहीं बात है।। इस विश्व विरासत की---------------।। यह विश्व विरासत इतिहास है,किसी देश का। यह गाथा और एक गौरव है, किसी देश का।। नहीं कोई हस्ती इसके बिना, किसी देश की। रौनक इनकी मिटाना फिर, हमारे लिए एक शर्म है।। इस विश्व विरासत की---------------।। लाल किला, कुतुबमीनार, या चाहे हो हवामहल। सांची का स्तूप , जन्तर मन्तर, या चाहे हो ताजमहल।। इनकी चमक और रंगत को , जिंदा बनाये रखना। जिम्मेदारी और कर्त्तव्य है ,हमारी यह देशभक्ति है। इस विश्व विरासत की----------------।। साहित्यकार एवं शिक्षक-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

आप जहाँ भी रहे, आप आबाद रहे

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आप जहाँ भी रहे, आप आबाद रहे। यह दिन ,यह पल , सदा याद रहे।। हर कदम पर मिले तुमको रोशन चिराग। यह खुशी ,यह बहारें , सदा साथ रहे।। आप जहाँ भी रहे------------------।। आज मौसम यह ऋतु , रुखसत की लाया है। हर फूल, हर कली का दिल, भर आया है।। नई डगर है शुरू, नया सफर है शुरू। हम करेंगे दुहा , आप खुशहाल रहे।। आप जहाँ भी रहे-------------------।। क्या नसीब नहीं हुआ,ख्वाब देखा क्या नहीं। ऐसा शख्स कौन है, ख्वाब बाकी जिसका नहीं।। बहाकर अश्क नसीब पर, निराश खुद को नहीं करें। खुदा से यही मांगेंगे, आप खुशनसीब रहे।। आप जहाँ भी रहे-------------------।। जैसे बहती मौजों का, नहीं है कोई किनारा। ऐसे ही चलती बहारों पे, नहीं है कोई पहरा।। सितारें संग हो तुम्हारे, सबसे सम्मान मिले। जीत हो आपकी, ताज सिर पर रहे ।। आप जहाँ भी रहे------------------।। साहित्यकार एवं शिक्षक-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

जय जय हनुमान

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जय जय हनुमान, जय जय हनुमान। राम के सच्चे भक्त तुम, भक्तों की शान।। जय जय हनुमान-------------------।। अंजन पुत्र तुम हो, आज्ञाकारी। संकटमोचक तुम हो, ब्रह्मचारी।। राम के हो लाड़ले तुम , बड़े बलवान। जय जय हनुमान-------------------।। संजीवनी बूटी लाकर, लक्ष्मण को बचाया। सीता की रक्षा के लिए, लंका को जलाया।। नहीं कोई दूजा तुमसा, देशभक्त इंसान। जय जय हनुमान-------------------।। अधूरी है रामायण, तुम्हारे बिना। जीवन अधूरा राम का, तुम्हारे बिना।। राम और रामायण की है तुमसे पहचान। जय जय हनुमान-------------------।। साहित्यकार एवं शिक्षक- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

आप और हम

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आप है बहिर्मुखी और हम है अंतर्मुखी, क्योंकि आप महशूर है और हम गुमनाम। आप हर एक में हो और हम सिर्फ खुद में ही, क्योंकि आप खुदा है और हम सबसे जुदा। आप मालिक है और हम है सेवक , क्योंकि आप राजा है और हम है आवाम। आप है महलों की शोभा और हम है झुग्गी वासी, क्योंकि आप है दौलतमंद और हम है खोटा सिक्का। आप प्रज्ज्वलित हो रात में और हम है बुझते दीपक, आपके साथ रोशनी है और हमारे साथ अंधेरी रात। आप अगाड़ी हो रफ्तार में, हम पिछड़े हैं दौड़ में, आप दौड़ाते हो अपनी गाड़ी, हम चलाते हैं अपने पैर। आप सागर हो जल के, हम एक बूंद है नीर की, आप हो आँखों के नूर, हम है आँखों के अश्क। आप खरीद सकते हो सब कुछ, हम बेच देते हैं सब कुछ, आप पाने हो अपनी हुकूमत, हम बचाने को अपनी जान। आप है अनमोल मोती जमीं पर, हम है रज चरणों की, बोलो कैसे कर सकते हैं हम जीवन में आपकी बराबरी। आप पर फिदा है दुनिया, हम पर मेहरबां मुफलिसी, आप सूरत हो मूरत की, हम पत्थर है बिन तराशें। कैसे पा सकते हैं हम ,आपकी तरह ऊंचा मुकाम, क्योंकि गूंजती है आवाज सभाओं में , और दब जाती है हमारी आवाज उस शोर में,  आपकी होती जय जयकार , जिन्दाबादी में। साह...

जय जय जय बाबा भीमराव अंबेडकर

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जय जय जय बाबा भीमराव अंबेडकर। आप हो सच में , सबके जीवन के ईश्वर।। दिया है आपने, सबको सच में नवजीवन। भारत का विश्वप्रसिद्ध संविधान लिखकर।। जय जय जय बाबा------------------।। आपने जीया है , एक ऐसा जीवन। मिलती है शिक्षा जिससे, संघर्ष करने की।। हारे नहीं आप कभी, जीवन में मुसीबतों से। आपसे मिलती है प्रेरणा, मुसीबतों से लड़ने की।। बदला सबका जीवन, आपने नायक बनकर। भारत का विश्वप्रसिद्ध, संविधान लिखकर।। जय जय जय बाबा-----------------।। आपने उद्धार किया , सभी जाति धर्म का। आप हो पैगम्बर एक, इस नये युग में।। सबको पढ़ाया पाठ, मानवता-भाईचारे का  आप हो उद्धारक , नारियों के इस युग में।। दिया सम्मान स्त्री को, शिक्षा का अधिकार देकर। भारत का विश्वप्रसिद्ध, संविधान लिखकर।। जय जय जय बाबा-----------------।। आप हो मसीहा सच में, सभी जातियों के। आपने दिया है सबको, सम्मानजनक जीवन।। आप थे सच में , सच्चे देशभक्त भारत के। कर दिया कुर्बान आपने,सबकी भलाई में जीवन।। सबको दे गये खुशियां , ऐसी वसीहत देकर। भारत का विश्वप्रसिद्ध, संविधान लिखकर।। जय जय जय बाबा-----------------।। साहित्यकार एवं शिक्षक- गुरुदीन व...

जय जय जय,जय महावीर स्वामी

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जय जय जय ,जय महावीर स्वामी। शान्ति के दूत, अहिंसा के स्वामी।। जय जय जय---------------------।। इंसान को,मानवता का पाठ पढ़ाया। हर प्राणी के लिए, दया का भाव जगाया।। मानवता के प्रतीक आप, दया के स्वामी। जय जय जय-----------------------।। मानव में अहिंसा की, ज्योति जलाई। हर प्राणी से प्रेम की, अलख जगाई।। हर प्राणी के उद्धारक,करुणा के स्वामी। जय जय जय, --------------------------।। धन - दौलत से मोह नहीं करना सिखाया। परहित में धन का त्याग , आपने सिखाया।। जीवो और जीने दो के , सत्य के स्वामी। जय जय जय ----------------------------।। साहित्यकार एवं शिक्षक-  गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)