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Showing posts with the label मनीषा अग्रवाल

शिवरात्रि

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पावन ये घड़ी आई, मंगल की बेला छाई। विवाह है गौरा संग, सभी गण आइए।। धूनी रमी अंग-अंग, छाने लगा प्रेम रंग। रुद्र जाते हैं मगन, नगाड़े बजाइए।। वर माला लिए हाथ, चली सखी संग साथ। अंखियन लाज सजी, फेरे तो लगाइए।। शिव-रात्रि आई आज, पूरे होंगे सब काज। शिव-गौरा का जो साथ, आशीर्वाद पाइए।। मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

विधवा पुनर्विवाह

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एक समय था जब विधवा विवाह समाज में मान्य नहीं था। पर जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ती गई, समाज सुधारकों ने इस दिशा में एक नई पहल आरंभ की और विधवा विवाह को मान्यता मिलने लगी। बाल्यकाल में ही लड़कियों का विवाह अपने से दोगुनी, तिगुनी आयु के लोगों से कर दी जाती थी। जो कुछ ही समय में ब्रह्मलीन हो जाते थे और आठ से दस वर्ष की उस बालिका पर विधवा होने का कलंक लग जाता था। और सारी उम्र उसको अंधेरे कमरों में ही जीवन गुजारना पड़ता था। ऐसे में उन पर हर तरह के ज़ुल्म किये जाते थे। उन्हें या तो अपने पति की चिता के साथ ही जलना होता था या केश मुंडन करके एक चोगे में ही रहना होता था। यह एक विडम्बना थी कि समाज में महिला के विधवा होते ही उसे अशुभ मान लिया जाता था, उसकी परछाईं भी यदि विवाहित स्त्री पर पड़ जाती तो कोहराम मच जाता था। सत्रहवीं शताब्दी में मालवा राज्य में जब रानी अहिल्याबाई होलकर के श्वसुर जी का शासन था, तब रानी अहिल्याबाई ने विधवा पुनर्विवाह के लिए सतत प्रयास किए और अपनी ही विधवा सखी का पुनर्विवाह करवाया था। तब उनको इस कार्य के लिए समाज में भर्त्सना हुई थी। फिर भी सूबेदार मल्हार राव होलकर के हस्...

मेरे जीवन साथी

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जब से मिले हम दोनों संग...! आ गया जीने का नया ढंग...! मेरी हर सॉंस में नाम आपका...! प्यार बस मिलता रहे आपका...! कभी रही नहीं ‌बिन आपके...! सातों जन्म अब हूॅं साथ आपके...! मेरे हृदय के स्पंदन में... आप! रुधिर की हर तरंग में...आप! सदा-सदा ही रहे साथ...मैं और आप! जीवनसाथी मेरे...! ओ! हमराही मेरे...! संग चले हैं हम दोनों...! चलना आगे भी! रहना नहीं मुझे बिन आपके! जीना नहीं मुझे बिन आपके! ©मनीषा अग्रवाल मौलिक, स्वरचित

वो खिड़की जो बंद रहती है

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ना झुको कभी, हौसला रखो अभी, गर, है समय कठिन तो निकल जाएगा वो भी, बढ़ते चलो अपनी मंज़िल पर तुम अभी, प्रयासों से ही बाधाएं पार हो जानी हैं सभी, डरकर इन कठिनाईयों से हटना नहीं कभी, तैरकर भवसागर, पार करना होगा तभी, बंद हैं गर खिड़कियां, जो खुली थीं कभी, ज्ञान चक्षुओं से देखो उनकी ओर भी, नहीं रहेंगी वो बंद अब खुल जाएंगी मेहनत से ही, मिलेगी एक दिशा नई, निकल जाएगा रास्ता भी। © मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

बसंतोत्सव

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पीली चादर तानें धरती है गदराई, लो कलियों ने फिर ली अंगड़ाई, फूलों ने भी पंखुड़ियॉं चटकाई, सतरंगी बहार चहुॅं ओर है छाई, बौर से लद गई सारी अमराई, मन में उमंग भर जागी तरुणाई, पीत वसन पहने केसरिया रंग रंगी, गोरी देखो पी से मिलन को चली, नई उमंग छा गई मन में उठी लहर, प्रेम मिलन की घड़ी में उठ रही हिलोर, आज श्याम संग खेलूंगी होरी सखी, तन-मन सब है उनके ही नाम सखी, सजधज निकली जब राधिका कुंज गली में बांह पकड़ कान्हा ने रंग दिया अपने रंग में कुछ शर्माई, कुछ सकुचाई सी, देखे पलक झुकाए  राधा के मन में देखो पावन सी खुशी छाए  प्रीत की ये ऋतु अनोखी है आई बसंतोत्सव की देखो बहार आई। © मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

रोबोट

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स्व चालित मशीन है जो, कंम्पयूटर से नियंत्रित है जो, मानव द्वारा बनाया गया है जो, यंत्रचालित रोबोट ही तो है वो, मनुष्य नहीं पर दिखता है हू-ब-हू, चलता, फिरता रहता घूम-घूमकर, उद्योगों में करता काम बहुत खूब, यातायात नियंत्रण करता रहकर सतर्क, चीते जैसी चाल चल, बन जाता सैन्य रोबोट, अस्पतालों में कर रहे चिकित्सकों की मदद, बना दिये हैं ऐसे यंत्र चालित रोबोट बहुत, द्रोण बन करता सीमा पर सुरक्षा भी, कर नहीं सकता मनुष्य जो काम, कर देता पल भर में ये मशीनी मानव महान, तकनीकों के बढ़ने से जहॉं मिलती है सुविधा, वहीं युवाओं पर हो रहा कुठाराघात, बढ़ रही बेरोजगारी, श्रमिक भी बैठ गये खाली, सब कुछ कर सकने की होगी क्षमता इनमें, पर चला नहीं सकते समाज, संस्कृति और कानून, समझो सभी इस बात को, बुद्धि हीन हैं ये सभी, इन पर निर्भरता से पाओगे तकलीफ़। © मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

अनेकता में एकता

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आओ हम सब मिल भारत देश सजाएं, एक-एक फूल पिरोकर माला एक बनाएं। धर्म अलग हैं, जाति अलग हैं, अलग है वेशभूषा , पर जुड़े हुए हैं एक लड़ी में, जैसे हों गुलदस्ता। चाहे रहें कहीं भी, चाहे करें काम कोई भी, हो जाते हैं एक तभी, आए विपदा कोई भी। मॉं के लिए बराबर सब जो जन्मा इस धरती पे, पालन करती हैं, सभी का एक ही नज़र से। रखना होगा हमको भारत मॉं का मान यहॉं, पूरे विश्व में पहचान हमारी तभी बनेगी नेक यहॉं। है सदियों की जो परंपरा उसका ध्यान रखें, माला टूट ना जाए इसका सतत प्रयास करें। पंजाबी, मद्रासी हों या गुजराती, बंगाली, चाहे हों मराठी, मारवाड़ी,या हों काश्मीरी। रहना होगा एक हमें, हाथों में हाथ डालकर यहॉं,  लालच और स्वार्थ में पड़कर भूल ना जाएं एकता। विश्व में होगा नाम हमारा करेंगे सब सम्मान हमारा वसुधैव कुटुंबकम् की परंपरा बनी रहेगी सदा। ©मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

धरती का स्वर्ग

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हर घर में जब होगा प्यार जब भाईयों में हो आपसी सौहार्द जब रहें सभी मिलकर एक साथ रुपये-पैसे से ना तौला जाए कोई रिश्ता हर किसी को मिले सम्मान तभी वहॉं होगा धरती का स्वर्ग  जब पति-पत्नि में हो शुद्ध प्यार ना हो सामाजिक स्तर बढ़ाने का दबाव कम में भी कर ले वो गुज़ारा हर बार एक-दूसरे को समझने का हो साहस प्यार से मिल-बांटकर सुलझा लें हर मुश्किल तभी होगा वहॉं धरती का स्वर्ग बच्चों को मिले उचित संस्कार ना हो आपस में कोई तकरार बैठकर सभी करें एक साथ भोजन साथ ही एक साथ करें मनोरंजन दिन भर का लेखा-जोखा भी मिले वहीं हर एक की ख्वाहिशों को समझें सभी तभी होगा वहॉं धरती का स्वर्ग चारों ओर हो खुशहाली ना हो कहीं कोई बदहाली सभी को मिले प्यार और सम्मान ना हो कहीं कोई भेदभाव बेटे-बेटियों को मिले समान अधिकार तभी होगा वहॉं धरती का स्वर्ग। © मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

दीवारों के कान

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बहुत पुरानी इक बात सुनी है! दादी नानी के किस्सों में मिलती है, जब भी होती बातें कोई खुफिया, चिल्लाना नहीं, धीरे बोलो, यही कहती गुईंयां, बच्चे, बूढ़े या हों जवान, रहते हैं सब सावधान, बात ना हो जाए कोई इधर-उधर क्योंकि घर की दीवारें भी नहीं है सुरक्षित कहते हैं दीवारों के होते हैं कान! सुन लेतीं हैं वो, जो नहीं सुनना होता बिना काम! पर कान कहीं नहीं दिखते उनके, वो तो खड़ी रहती निश्छल बनके, ये काम है उन लोगों का, जिनको पसंद नहीं है एका  छुप-छुप कर सुनते बातें, फैलाते नफरत का रौपा, ना करो बुराई किसी की, ना करो बेइमानी कभी, ना करो बदनाम किसी निर्दोष को, ना सुनो बात जो हो ना मानने वाली, सदा ही रहो और रखो खुशहाल सभी को, खुद भी जियो और औरों को भी जीने दो, दीवारों के कानों की ना सुने,स्वयं पर करें विश्वास। © मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

घर-घर की कहानी

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कभी खट्टी कभी मीठी होती है कहानी हर घर की, तिनका-तिनका जोड़कर, बनाते हैं एक मकान जब भी, परिवार से ही बनता है वो घर तभी, सुबह से लेकर शाम तक... मिल-बांटकर करते हैं जब काम, बना रहता सौहार्द हर तरफ... मिल जाता है आराम, जब काम को समझा जाता बोझ, तब लड़ाई-झगड़ा होता रोज़-रोज़, टूट जाते हैं रिश्ते बिना बात, गर आ जाए किसी एक को अहंकार, बंधी हुई मुट्ठी से ही होती तरक्की, खुल जाए गर, बिखर जाती है ज़िन्दगी, हर सदस्य का रखना पड़ता है मान, हर छोटे बड़े का करना होता सम्मान, प्यार से संभालनी होती है रिश्तों की डोर, तभी बढ़ती है कहानी सफलता की ओर, बात ये समझ लें छोटी-सी, कभी खट्टी कभी मीठी, होती है कहानी हर घर की। © मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

तेरी बिंदिया रे

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गोरी तेरे ये खुले केश, करते हैं घायल मेरे नेत्र, लगती तू हर रूप में सजीली, तेरे रूप पर वारी मैंने खुशी, ये भोला-भाला तेरा मुखड़ा,  लगता है मुझे चॉंद का टुकड़ा, ये पलकों के किनारे कजरारे, घायल करते देते दिल को हमारे, जब छनकते हैं तेरे कंगन, मन में जग जाती है उमंग, सुनकर तेरी पायल की झंकार, जीवन में आ जाती है बहार, पर सबसे मोहक, सबसे प्यारी,  सुंदर, सजीली, औ' चमकीली  माथे पर तेरे सजी बिंदिया है  जिसने चुरा ली मेरी निंदिया है, इस बिंदिया का ही है कमाल धड़के है नादान दिल बारंबार घूंघट में भी दमकती है ये तेरी बिंदिया ही तो है रे। ©मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

ऑनलाइन का जमाना

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देखो कैसा ये दौर है आया, मोबाइल, टैब का ज़माना है आया। बचाते थे कल तक जिनको, आज वही सबसे ज्यादा चलाते इसको। ऑनलाइन के दौर में अब, पढ़ाई कर रहे इससे ही सब। तकनीकी ज्ञान बढ़ गया है, सोशल मीडिया का जोर चल गया है। एक बटन पर ही मिल जाता सारा ज्ञान, जिससे हम सब थे कभी अंजान। नये जमाने में है चारों ओर यह शोर, चले ना अब जिस पर किसी का जोर। फेसबुक, व्हाट्स और साहित्य समूह परिवार, प्रतिभाओं को मिल रहा अभिव्यक्ति का आधार। बच्चों में है उत्साह, सब जानने और देखने का, चश्मा भी चढ़ गया, बढ़ता जा रहा नंबर उसका। रहें सावधान सभी करें सही संज्ञान, ना हो दुरुपयोग इंटरनेट का, हो सदुपयोग सदा। © मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश

खट्टी-मीठी यादें

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शाम ढलने को थी। अभी गर्मी से कुछ राहत मिलने लगी थी, फिर भी लू की गर्माहट महसूस की जा सकती थी, बगीचे के पेड़-पौधे भी दिन भर की लू और तपिश से जल रहे थे, जिनको अपने प्यारे-प्यारे हाथों से संभालती मालती जी बगीचे में पानी देती हुई घूम रहीं थीं। कोई-कोई पौधा बिल्कुल ही कुम्हला गया था तो कोई अभी भी अपने आपको संभाले हुए था। प्रकृति कितनी सहनशील होती है, यही सोचते हुए वो अपने पसंदीदा फूल मोगरे के पौधे को ध्यान से देख रहीं थीं। सोच रहीं थीं भगवान ने हर तरह की रचना की है कोई गर्मी सहन करके खिलता है तो कोई ठंड। गर्मियों में ताप सहन करके भी मोगरा, चंपा, कामिनी, चांदनी के पौधे, कितने फूल देते हैं। यह भी एक खूबी है कि सभी फूल सफेद रंग के होते हैं जो हमें यह संदेश देते हैं कि सूरज कितना भी लाल हो, कितनी भी आग बरसाता हो, पर ये सभी फूल उस तपिश भरी दोपहर में भी हॅंसते ही रहते हैं, और अपनी महक से सभी को खुश कर देते हैं। इनके सफेद रंग से कितनी शांति मिलती है। हमारा जीवन भी तो ऐसा ही होता है कितनी ही खट्टी-मीठी यादें हमें कभी खुशी कभी ग़म देती हैं। सोचते-सोचते मालती जी कहीं खो गईं। जैसे कल ही की बात हो जब इ...

पंडित बिरजू महाराज

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विरासत में मिली कला और संस्कृति परंपरा में मिली पूरी परवरिश भी राजाओं, नवाबों के दरबार की शोभा बने पालकियों में बैठने का सम्मान पाते रहे, कालिका, बिंदादीन की ड्योढ़ी के शागिर्द, अच्छन महाराज और अम्मा के चश्मों चिराग, अचंभित किया सदैव अपने नृत्य से, गायन, वादन कलाओं में भी पारंगत थे, "नृत्य सम्राट" ब्रज मोहन मिश्र थे वो ब्रज की सभी लीलाओं को किया साकार, नृत्य-नाटिका हो या ठुमरी हजारों-हजार, जब करते थे मंच पर प्रदर्शन हर बार, चमत्कृत करते दर्शकों को बिरजू महाराज, नटराज और नटवर के थे उपासक भी, लास्य भाव में करते थे विभिन्न प्रयोग भी, ताल और लय पर था अद्भुत नियंत्रण, पल भर में बना देते थे तिहाई और परण, लखनऊ घराने के सरताज थे पद्म विभूषण, श्री राम कला केंद्र और कलाश्रम के थे प्रवर्तक विनम्र, मधुर और हॅंसमुख थे वो सरल हृदय, शिष्य-शिष्याओं को कथक में ही करते रहे पारंगत, करते रहेंगे सभी नाम उनका रोशन इस जहॉं में, वो अमर थे, हैं... और रहेंगे सदा इस जहॉं में! ©मनीषा अग्रवाल

राजतिलक

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सदियों से ये खेल चला आ रहा राज्य को संभालने के लिए  राजा का तिलक आवश्यक रहा राज गद्दी पर बैठता वही  जिसका राजतिलक होता सही पर इस राजतिलक की महिमा बड़ी निराली है इसके कारण होती रहती क्रांति है, कभी राजा हरिश्चन्द्र जाते वन को तो कभी राजा राम को त्यागना पड़ता इसको चले गए थे वो सब कुछ छोड़ निभाने,  पिता के वचन का मान रखने, राजतिलक का ये खेल अनोखा, चलता रहा युगों-युगों तक, राजा बने रहने को कंस ने,  मार दिया था सात भांजों को, आठवें को भी चाहा था मारना, पर मार सका ना वो उनको, अंत समय में उनके हाथों ही हुआ उद्धार, राजतिलक ने ही तो करवाया युद्ध वो, सदियों तक महाभारत के नाम से जाना जाता है जो, राज जब मिला ना कौरवों को, तो पांडवों से छल था किया, चीरहरण करने का भी निकृष्ट कृत था कर दिया,  इसी राजतिलक की खातिर छोड़ दिया अपनी प्रिया को, बचपन से जो प्यार था सच्चा, त्याग दिया उसी को, बन गए द्वारकाधीश और भूल गए सब लीला, याद कभी नहीं किया पलटकर उसको जो थी राधिका, आज भी सत्ता में बागडोर वही है थामता जिसको मिलते वोट अधिक, राजतिलक होता उसका, ये राजतिलक ही तो है जिससे बनती पहचान बड़...

मुट्ठी में तंत्र

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तन हमारा रहे स्वस्थ, समझो इसको जरा सब , पकड़े रहो हरी सब्जियों का साथ,  तो यकृत रहेगा हरा-भरा। खाओ चुकुंदर गाजर, तो ऑंखें होंगी चमकीली। जाओ घूमने बगीचे में, खाओ हवा ताज़ी, तो फेफड़ों को मिलेगी, प्राण वायु और होंगे वो पुष्ट भी। मिलो यारों दोस्तों से, करो हॅंसी-ठिठोली, तो दिल खुश हो जाएगा , नहीं पड़ेगा औज़ारों से वास्ता। जब रखेंगे हम ध्यान अपना, और अपने शरीर का तो, चलेंगे सभी तंत्र , पकड़े रहेंगे हमारा तन, और होगा स्वस्थ मन, ©मनीषा अग्रवाल इंदौर मध्यप्रदेश