राजतिलक


सदियों से ये खेल चला आ रहा
राज्य को संभालने के लिए 
राजा का तिलक आवश्यक रहा
राज गद्दी पर बैठता वही 
जिसका राजतिलक होता सही
पर इस राजतिलक की महिमा बड़ी निराली है
इसके कारण होती रहती क्रांति है,
कभी राजा हरिश्चन्द्र जाते वन को
तो कभी राजा राम को त्यागना पड़ता इसको
चले गए थे वो सब कुछ छोड़ निभाने, 
पिता के वचन का मान रखने,
राजतिलक का ये खेल अनोखा,
चलता रहा युगों-युगों तक,
राजा बने रहने को कंस ने, 
मार दिया था सात भांजों को,
आठवें को भी चाहा था मारना,
पर मार सका ना वो उनको,
अंत समय में उनके हाथों ही हुआ उद्धार,
राजतिलक ने ही तो करवाया युद्ध वो,
सदियों तक महाभारत के नाम से
जाना जाता है जो,
राज जब मिला ना कौरवों को,
तो पांडवों से छल था किया,
चीरहरण करने का भी निकृष्ट कृत था कर दिया, 
इसी राजतिलक की खातिर छोड़ दिया अपनी प्रिया को,
बचपन से जो प्यार था सच्चा, त्याग दिया उसी को,
बन गए द्वारकाधीश और भूल गए सब लीला,
याद कभी नहीं किया पलटकर उसको
जो थी राधिका,
आज भी सत्ता में बागडोर वही है थामता
जिसको मिलते वोट अधिक, राजतिलक होता उसका,
ये राजतिलक ही तो है जिससे बनती पहचान बड़ी,
बस इसका मान रखकर जो करता पूरे काम
उसी का होता जग में सच्चा नाम।
© मनीषा अग्रवाल
इंदौर मध्यप्रदेश
स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित

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