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Showing posts with the label जितेन्द्र कबीर

दुनियादारी

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बड़े खुश थे सभी चुप रहा करते थे जब तक, जरा सी जुबान जो खोली तो शिकवे हजार हो गये। बड़ी तारीफें होती थी जब करते थे सबके मन की, कभी जो अपने लिए किया  तो अफसाने हजार हो गये। बड़ा पसंद था साथ सबको खर्च करते थे जब खुलकर, जरा सी मुट्ठी क्या बंद की तो लोग दरकिनार हो गये। बड़े चर्चे थे दरियादिली के मदद जब करते थे सबकी, एक बार जो हमने मांग लिया तो बहाने हजार हो गये। बड़ा याद करते थे सब काम पड़ता था जब तक, जरा सा बेकार क्या हुए तो दर्शन भी दुश्वार हो गये। बड़ा इतराते थे सभी तारीफें जब तक निकलती रही, आलोचना जो एकाध निकली तो फासले हजार हो गये। साथ निभाने के थे वादे पक्ष में थे हालात जब तक, वक्त जो खिलाफ हुआ जरा सा तो गायब सरकार हो गये। पूछी जाती थी हर पसंद कभी कभी जो आते थे, निवासी हुए जब से पक्के तो पुराने अखबार हो गये। अपने हाथों से सींचा था जिन फूलों को बड़े प्यार से, बड़े जरा से क्या हुए तो कांटे बेशुमार हो गये। स्नेह के धागों से बंधे थे रिश्ते अब तक, अक्लमंद जरा से क्या हुए तो सब दुनियादार हो गये।             जितेन्द्र 'कबीर'       ...

तुम्हारा असर है इस कदर

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प्रफुल्लित मन मदमस्त होकर बादलों के रथ पर सवार आकाश चूमता है, सुकून की शीतल हवाएं अन्तर्मन के उद्वेग को शान्त कर जाती हैं, हर्षोल्लास की नन्हीं बूंदों से हृदय का प्यासा समंदर भर जाता है, ताजगी भरे प्यारे से अहसास मेरे वजूद को हौले से सहला जाते है, देख लो! इक तेरे मिलने और बात करने से चमत्कार कितने सारे मेरी जिंदगी में हुए जाते हैं।                         जितेन्द्र 'कबीर' यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है। साहित्यिक नाम - जितेन्द्र 'कबीर' संप्रति - अध्यापक पता - जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

यह कैसा समाज?

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हत्यारों से.. पशुओं को बचाने की खातिर रक्षक दल हमने लिए बनाए, मगर अफसोस दरिंदों से.. अपनी बच्चियों को बचाने की खातिर कोई नहीं हमने किये उपाय। पशुओं की तस्करी के आरोपी लोगों की जान  पीट-पीटकर लिए जाना है बहुत से लोगों को स्वीकार्य मगर अफसोस बच्चियों एवं महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या के  आरोपियों के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी न समझा जाए। यह किस तरह का समाज हुए जा रहे हैं हम? जहां राजनीति में फायदे के हिसाब से पशुओं की सुरक्षा की जाए लेकिन इंसानों की सुरक्षा की बात राजनीति में ही दबा दी जाए।                                  जितेन्द्र 'कबीर'

कोई क्या कर पाएगा?

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बहुत मेधावी होगा अगर किसी का बच्चा तो डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी, खिलाड़ी या फिर वैज्ञानिक बनकर अपने माता-पिता, खानदान का नाम रौशन कर जाएगा, इतना बुद्धिमान व मेहनती होने के बावजूद किसी भी विभाग में  वो पद किसी जुगाड़ू नेता से नीचे ही पाएगा, हर हथकंडे में माहिर वो नेता अपने मिजाज के हिसाब से उसे  जब चाहे तब हड़काएगा और बेचारे  उस मेधावी इंसान का भरोसा प्रतिभा व मेहनत से उठता जाएगा। बहुत देशभक्त होगा अगर किसी का बच्चा तो देश के लिए तन मन धन समर्पित करके अपनी मातृभूमि का झंडा समस्त विश्व में लहरा कर जाएगा, इतना सबकुछ करके आखिरकार वो भी एक दिन नेताओं की घटिया राजनीति का शिकार  बन जाएगा, कोई  चालाक नेता उसके बलिदान से जनता के वोट बटोर जाएगा और कोई विपक्षी नेता उसकी नीयत पर सवाल उठा वोट जुटाने का जुगाड़ भिड़ाएगा, कुछ इसी तरह एक देशभक्त का बलिदान राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा।                                               जितेन्द्र 'कबीर' ...

सवाल और जवाब

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सवाल! बिगड़ती कानून व्यवस्था का हो या फिर उन्मादी भीड़ हिंसा का, विवादास्पद कानूनों का हो या फिर विरोध प्रदर्शनों का, चरमराती अर्थव्यवस्था का हो या फिर बढ़ती बेरोजगारी का, जवाब! हमेशा एक ही होता है.. "अगर हम गलत होते तो जनता हमें चुनाव जिताकर संसद न भेजती।" वाह! क्या जवाब है। बिल्कुल ऐसी ही दलील मछुआरा भी अपने जाल में फंसी मछलियों को दे सकता है। सवाल! दूसरे दलों के नेता तोड़ने का हो या फिर सत्ता के लिए रिश्ते जोड़ने का, महंगाई का उत्तरोत्तर बढ़ते जाने का हो या फिर उसको ही देशहित में बताने का, अपनी हठधर्मिता को सही बताने का हो या फिर दूसरों की हर बात ग़लत ठहराने का, जवाब! हमेशा एक ही होता है... "मैंने अपने लिए आज तक  कुछ नहीं किया, जो किया देश के लिए किया" वाह! क्या जवाब है। बिल्कुल ऐसी ही दलील एक तानाशाह जनता के खून की आखिरी बूंद अपने हक में इस्तेमाल किए जाने को दे सकता है।                                            जितेन्द्र 'कबीर' यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित ए...

ईश्वर क्या है?

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एक उम्मीद है! कुछ अच्छा होने की, अपने जीवन में कठिनाइयों से जूझते इंसान के लिए, एक विश्वास है! शांति, प्रेम और भाईचारे से जीवन बिताने की सोच रखने वाले इंसान के लिए, एक भ्रम है! लगातार शारीरिक - मानसिक कष्टों एवं यातनाएं सहते  और क्रूरतापूर्ण हत्याओं एवं बलात्कार का शिकार बनते इंसान के लिए, एक डर है! स्वभाव से डरपोक लोगों को बुराई के रास्ते पर जाने से रोकने के लिए, एक ठहराव है! विचारों की कश्मकश में  उलझे हुए मन को एकाग्र करने के लिए, एक सहारा है! नवीन राहों के अन्वेषण में अकेले पड़ चुके इंसान के लिए, एक हथियार है! कुछ चालाक एवं धूर्त लोगों के हाथ में अपनी मनमानी को न्यायसंगत ठहराने के लिए और एक बहाना भी है पीढ़ी दर पीढ़ी मानसिक गुलामी की एक परंपरा चलाने के लिए, ईश्वर ! जो भी हो, जैसा भी हो, वैसा तो बिल्कुल नहीं  जैसा ज्यादातर दुनिया सोचती है उसे अपना काम चलाने के लिए।                                    जितेन्द्र 'कबीर'                 ...

ऐसे बदलाव नहीं आएंगे

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सिर्फ इसलिए कि हमें बुरा लगता है देखना... देश को दंगे-फसादों में जलते हुए, मानवता को विभिन्न धर्मों की बलि-वेदी पर रोज चढ़ते हुए, निर्दोष बच्चियों एवं महिलाओं को क्रूर भेड़ियों का शिकार बनते हुए, सिर्फ इसलिए कि हमें बुरा लगता है सोचना... एक दिन कहीं खाने-पहनने की हमारी व्यक्तिगत आजादी राजनीति की भेंट न चढ़ जाए, एक दिन कहीं निष्पक्ष राय रखने की हमारी व्यक्तिगत आजादी जेलों में न सड़ जाए, वे रुक नहीं जाएंगे! वे रुकेंगे केवल तब ही जब उनको रोकने के लिए धरातल पर सामूहिक प्रयास किए जाएंगे, उतरना पड़ेगा पूरे मन से उनके खिलाफ रणक्षेत्र में, सिर्फ देखने एवं सोचने भर से बदलाव नहीं आएंगे।                                     जितेन्द्र 'कबीर'                                      यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है। साहित्यिक नाम - जितेन्द्र 'कबीर' संप्रति - अध्यापक पता - जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी ड...

धारा के विपरीत

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शक्तिशाली का गुणगान करना फायदे का सौदा रहा है हमेशा से, यह जानते हुए भी कमजोर के पक्ष में जो इंसान आवाज उठाएगा वही इंसान एक दिन न्याय की सही परिभाषा गढ़ पाएगा। धनवान का गुणगान करना फायदे का सौदा रहा है हमेशा से, यह जानते हुए भी गरीब के पक्ष में जो इंसान आवाज उठाएगा वही इंसान एक दिन समानता की सही परिभाषा गढ़ पाएगा। सरकार का गुणगान करना फायदे का सौदा रहा है हमेशा से, यह जानते हुए भी जनता के पक्ष में जो इंसान आवाज उठाएगा वही इंसान एक दिन लोकतंत्र की सही परिभाषा गढ़ पाएगा। धारा के साथ बहना ज्यादातर लोगों ने चुना है हमेशा से, यह जानते हुए भी धारा के विपरीत तैरने का हौसला जो इंसान रख पाएगा वही इंसान एक दिन संघर्ष की सही परिभाषा गढ़ पाएगा।                                  जितेन्द्र 'कबीर'                                   यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है । साहित्यिक नाम - जितेन्द्र 'कबीर' संप्रति - अध्याप...

लूट मची है लूट

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शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में जो छोटे-बड़े 'कुकुरमुत्ते' उग आए हैं अवसर पाकर, लगाते हैं अक्सर नारे वो जनसेवा के बदलाव और सुधार के झंडे उठाकर, सच तो यह है कि उनमें से अधिकतर आए हैं इस क्षेत्र में मोटा मुनाफा देखकर, जानते हैं वे अच्छी तरह से कि कर नहीं सकता इंसान कोई भी समझौता बच्चों की शिक्षा और अपने परिवार की सेहत को लेकर, दुनिया के सामने लाख दिखा लें खुद को सेवा भावना से प्रेरित लेकिन वास्तव में अपनी संस्था का प्रचार-प्रसार कर मुनाफा कमाना ही है उनकी प्राथमिकता में  सबसे ऊपर, अपनी बाहरी चमक-दमक और छद्म आधुनिकता से लोगों की आंखें चौंधिया कर, लूट रहे हैं वो दोनों हाथों से लोगों को उनकी दुखती रग को दबाकर।                           जितेन्द्र 'कबीर'                            यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है। साहित्यिक नाम - जितेन्द्र 'कबीर' जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

जो कम लोग देख पाते हैं

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आग लगाई गई... ज्यादातर लोगों ने उसमे जलती देखी गाड़ियां, भवन और दुकानें, कम ही लोग देख पाए  उन गाड़ियों में राख होती हुई किसी परिवार की  रोजी-रोटी, जलता हुआ किसी बच्चे का भविष्य, किसी नौकरी पेशा वाले के आने-जाने का साधन और जीवन भर की बचत से साकार किया गया किसी का सपना, कम ही लोग देख पाए उन भवनों में राख होती हुई न जाने कितने लोगों की जमा पूंजी, नष्ट होता किसी परिवार के सिर के ऊपर छत होने का इत्मीनान  और सबसे जरूरी इंसान का इंसान पर से उठता, धुंआ-धुंआ होता विश्वास, ज्यादातर लोगों ने देखा आग लगाकर  तबाही मचाने वालों को, कम ही लोग देख पाए परदे के पीछे से उस आग के लिए नफरती तरकीबों  एवं जलावन का प्रबंध करने वालों को, जलती हुई आग में  घी डालकर उसे और भी ज्यादा  भड़काने वालों को और ऐसी गतिविधियों में संलिप्त अपराधियों को कानून के चंगुल से बचाकर किसी धर्म अथवा जाति विशेष का हीरो बनाने वालों को।                                  जितेन्द्र 'कबीर'       ...

शक्ति का झूठा दंभ

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उसने हमला किया... इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि वह बहुत बड़ा शूरवीर या बहादुर है, बहादुरी एवं शूरवीरता हथियारों के बल पर  नहीं दिखाई जा सकती कभी, उसने हमला किया... क्योंकि वह मन ही मन डर रहा है तुमसे, वह अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस करता है जब तुम अपनी बुलंद आवाज में उसके गलत कार्यों का प्रतिकार करते हो, वह जानता है कि वह तुमसे प्रेम, धैर्य, तर्क एवं न्याय में जीत नहीं सकता और इसी डर के चलते वह हथियारों से तुम पर हमला करता है, लेकिन वह नहीं जानता कि एक निहत्थे इंसान से यूं हथियार लेकर लड़ने जाना ही दुनिया की सबसे बड़ी कायरता है, वह डरता है कि उसकी कमजोरी दुनिया के सामने आ गई तो उसकी झूठी शान का शीशमहल चकनाचूर हो जाएगा और इसी डर के कारण वह तुम पर हमला करने के सौ बहाने एवं दलीलें गढ़ता है, मगर वह नहीं जानता कि खुद को सही साबित करने के लिए उसका यूं छटपटाना ही उसकी सबसे बड़ी हार है, मृत्यु के अंतिम क्षणों में जब उसकी स्मृतियां वापस दौड़ेंगी उसके छुपे हुए डर की पटरियों पर तब वह हमलावर जान जाएगा कि शक्तिशाली एवं निडर होने का  उसका दंभ दुनिया का सबसे बड़ा झूठ था।     ...

कौन है अच्छा इंसान?

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एक अच्छा इंसान नहीं टालता किसी का कहना, मान लेता है सबकी बात बिना कोई बहस अथवा विरोध किए, कर देता है खुशी से वे सारे काम जो उसे बताए जाते हैं घरवालों, पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों के द्वारा, रुपए-पैसे अथवा अन्य किसी  सहायता के लिए भी करता नहीं वह किसी को इंकार, एक अच्छा इंसान बुरा लगने लगता है जब वह बोलने लगता सच को सच और झूठ को झूठ किए बिना किसी की लिहाज, सबका हुक्म  बजाते जाने की अपेक्षा जब वह रखने लगता है  सिर्फ अपने काम से काम, नहीं बढ़ा पाता जब वह  अपनी आर्थिक तंगी अथवा अन्य किसी समस्या के चलते किसी की ओर मदद का हाथ। इंसान के लिए बहुत मुश्किल है कि वह बना रहे अपनी पूरी उम्र सबके लिए एक अच्छा इंसान, गलतफहमियों अथवा  परिस्थितियों के चलते कोई न कोई मान ही बैठता है उसे बुरा इंसान।                              जितेन्द्र 'कबीर' यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है। साहित्यिक नाम - जितेन्द्र 'कबीर' संप्रति - अध्यापक पता - जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व...

कैसे एतबार करें किसी का

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हर इंसान खुद को सच्चा बताता है यहां, एतबार कर लें  कैसे हम किसी का  नुमाइशों के इस दौर में कि झूठा आदमी भी  सच की सी मासूमियत ओढ़कर आता है यहां। हर इंसान खुद को बेगुनाह बताता है यहां, एतबार कर लें कैसे हम किसी का नफरतों के इस दौर में कि हत्यारा भी शांति और भाईचारे का मसीहा कहलाता है यहां। हर इंसान खुद को पीड़ित बताता है यहां, एतबार कर लें कैसे हम किसी का विज्ञापनों के इस दौर में कि तेंदुआ भी अपने शिकार पर झपटने से  पहले तक खुद को  बिल्ली जैसा दिखाता है यहां।                     जितेन्द्र 'कबीर'                      यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है। साहित्यिक नाम - जितेन्द्र 'कबीर' संप्रति - अध्यापक पता - जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

चुनाव के पहले और बाद में

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जनता के सामने विनम्र याचक मुद्रा में नेता लोकतंत्र के पर्व की  सबसे सार्थक तस्वीर है, चुनाव के बाद भी अगर  जनता और नेता की स्थितियों में अदला-बदली न हो तो लोकतंत्र किसी देश के लिए सबसे अच्छी व्यवस्था हो जाती है, यह अलग बात है कि हमारे देश में चुनाव के तुरंत बाद नेता शासक के रुआब में एवं जनता याचक की मुद्रा में आ जाती है और यही बात हमारे देश में लोकतंत्र की खराब अवस्था को दर्शाती है। चुनाव के समय  नेता का लोगों के घर-घर जाकर उनका हालचाल एवं समस्याएं  सुनने-सुलझाने की कवायद जनता में लोकतंत्र के प्रति उम्मीद जगाती है, यह अलग बात है कि हमारे देश में चुनाव के तुरंत बाद से जनता नेताओं की प्राथमिकता से  पूरी तरह गायब हो जाती है और यही बात हमारे देश में लोकतंत्र की खराब अवस्था को दर्शाती है।                                   जितेन्द्र 'कबीर'                                    यह कविता सर्वथ...

विज्ञापन-मय भारत

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सरकारी अस्पतालों में पर्ची बनाने से लेकर डॉक्टर को दिखाने एवं छत्तीस प्रकार के टेस्ट करवाने के लिए  लगने वाली लम्बी -लम्बी कतारों को देखकर इंसान बीमार होने से भी डर रहा है और विज्ञापनों के अनुसार हमारा भारत स्वास्थ्य-सुविधाओं के क्षेत्र में विश्वगुरु बन रहा है। महिलाओं एवं बच्चियों से दुष्कर्म की  खबरों से रोज के रोज अखबार पूरा भर रहा है और विज्ञापनों के अनुसार हमारा भारत एक बार फिर से रामराज्य बन रहा है। खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर आम आदमी की जरूरत के हर सामान का मूल्य  बढ़ते हुए लोगों का जीना दूभर कर रहा है  और विज्ञापनों के अनुसार हमारा भारत संसार का सबसे लोक-हितकारी राज्य बन रहा है। विज्ञान विषय को चुनने वाले छात्रों की संख्या में आ रही है निरन्तर कमी, तर्क एवं शोध को पीछे छोड़ युवा राग धार्मिक कट्टरता का जप रहा है और विज्ञापनों के अनुसार हमारा भारत विज्ञान व टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन रहा है। अब तक लिखे गये समूचे इतिहास को  खारिज करके  फिल्मों, वाट्सएप, फेसबुक, यूट्यूब के जरिए इतिहास की पीएचडी करने वालों का आंकड़ा बढ़ रहा है और विज्ञापनों...