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Showing posts with the label गुंजन कमल

अग्निवीर बनेंगे बुढ़ापे का सहारा

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"नहीं सरोज! तुम इस तरह से ऑंसू नहीं बहा सकती। तकलीफ होगी हमारे बेटे को। याद है ना तुम्हें? हमसे बिछड़ने से पूर्व एक ही बात कहता था कि मेरे पीछे आप लोग आंसू मत बहाना।"  रिटायर्ड कर्नल रंजीत सिन्हा ने अपनी पत्नी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।  "मैं आंसू नहीं बहा रही। आज करण की याद कुछ अधिक ही आ रही थी तो सोचा!उससे कुछ बातें कर लूं। बातें करने में इतनी सुध - बुध ही ना रही। देखिए ना! इतनी देर हो गई है, आपकी शाम की चाय का वक्त भी हो चला है और मैं अपने बेटे की यादों में ही खोई रह गई।" रिटायर्ड कर्नल रंजीत सिन्हा की पत्नी सुजैन सिन्हा ने अपने आंखों की कोरों में आए आंसुओं को पोंछते हुए कहा।  "तुम चाहो तो करण से कुछ देर और बातें कर सकती हो। मैंने तुम्हें उससे बातें करने से कभी नहीं रोका है। मैं तो सिर्फ तुमसे इतना कहना चाहता था कि उससे बातें करते समय अपनी आंखों को गीली मत करना वरना हमारे बच्चे की आत्मा को सुकून नहीं मिलेगा। इस देश का मस्तक फक्र से ऊंचा करते हुए शहीद हुआ है हमारा बेटा। एक फौजी और उसका पिता होने के नाते भी मेरा सीना यह सुनकर चौडा़  हो जाता है कि मेर...

"सामने वाली खिड़की"

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आज बादलों का स्वभाव कुछ अलग ही संकेत दे रहे थे। काले बादलों ने चारों और घुमड़ - घुमड़ कर तूफानी हवा के साथ गर्जना शुरू कर दिया था। बादलों का साथ देने चमचमाती बिजली भी आ गई थी और उसके साथ आ गई थी बारिश। खिड़की पर पड़ने वाले हवा के जोरदार झटके पड़े तो मैं नींद से जागा। अभी इस मोहल्ले और इस घर में आए हुए दो ही दिन तो हुए थे मुझे। घर व्यवस्थित करने के नाम पर ऑफिस से छुट्टी ले ली थी। घर  पूरी तरह व्यवस्थित हो गया था लेकिन थकान ने शरीर को चूर चूर कर दिया था। जल्दी से दो मिनट वाली मैगी बनाई और जल्दी - जल्दी खाकर "ऑंखों में चढ़ी नींद मेरी थकान को कम कर देगी"  ये सोचकर चादर तान सो गया था।  हवा की जोरदार आवाज जब कानों में टकराई तब जाकर नींद खुली। देखा तो खिड़की के पल्ले कभी दाएं कभी बाएं हो रहे थे और साथ ही हवा भी खिड़की के रास्ते कमरे में प्रवेश कर रही थी। तुरंत ही समझ में आ गया कि बरखा रानी आ चुकी है और उनका साथ चमचमाती बिजली और गरजते  बादल दे रहे हैं। उठ कर जल्दी से खिड़की के पास पहुंचा ताकि खिड़की बंद कर आराम से फिर से सो सकूं। खिड़की के पास पहुंचा और जैसे ही खिड़क...

" जल है तो कल है "

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"अरे! चुन्नी- मुन्नी कहाॅं पर हो तुम? गला सूख रहा है, प्यास के कारण बोला भी नहीं जा रहा। क्या तुम्हें ऐसी जगह मिली जहाॅं पर पानी हो?" कहते हुए सोनी चिड़िया ने अपने चारों तरफ नजरें दौड़ाई।  नजरें अपनी सहेली चुन्नी मुन्नी को ढूंढ रही थी लेकिन शरीर ऐसा लग रहा था जैसे अब गिरा तब गिरा। पंखों में भी जान नहीं बची थी। अपनी पूरी ताकत समेटकर सोनी चिड़िया कहीं आराम करने की जगह ढूंढने लगी।  "कहाॅं पर कुछ देर बैठकर आराम करूं  कहीं पर भी तो छायादार पेड़ दिख ही नहीं रहा है? चारों तरफ वीरान खेत तो दिख रहें हैं लेकिन एक पेड़- पौधा तक नजर नहीं आ रहा। हमारे घरों को तो नष्ट कर दिया ही गया हैं जैसे - तैसे जीवनयापन कर रहे हैं। आज तो जल की तलाश में हम तीन सहेलियां भी बिछड़ गई है। ना जाने चुन्नी- मुन्नी कहाॅं पर भटक रही होंगी।" चिलचिलाती धूप में खेत के किनारे इधर - उधर फुदकती गर्मी और प्यास से बेहाल सोनी चिड़िया अपने आप में ही बातें किए जा रही थी तभी उसके सामने एक चिड़िया अपने पंखों को हल्के से  फड़फड़ाते हुए गिरी।  "चुन्नी! तुम्हें क्या हुआ? कुछ तो बोलों।" सोनी चिड़िया न...

आपबीती

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रामशरण एक गरीब परिवार से था । उसके बापू एक दिहाड़ी मजदूर थे । रोज कमाने और अपना भरण-पोषण करने वाले परिवार का एकलौता बेटा रामशरण था उससे बड़ी चार बहनें थीं । परिवार बड़ा था इसलिए सारा पैसा खाने - पीने में ही खर्च हो जाता था । रामशरण के बापू ने किसी तरह से पैसे का जुगाड़ करके रामशरण को बारहवीं तक पढ़ाया था और रामशरण ने भी बारहवीं प्रथम श्रेणी में पास कर रही थी । रामशरण की दिली ख्वाहिश थी कि उसके दोस्तों की तरह उसके पास एक रेडियो हो लेकिन उसके पास इतने पैसे थे नहीं कि वह कोई नया रेडियो ही खरीद सकें । अपनी यह ख्वाहिश पूरी करने के लिए एक दिन वह अपने दोस्तों से छुपकर एक दुकान पर भी गया था जहाॅं पुराने रेडियो की ब्रिक्री होती थी लेकिन पुराने रेडियो तक को खरीदने के लिए उसके पास रखें पैसे कम पड़ गए और वह दुखी मन से अपने घर जाने लगा तभी उसकी नज़र पुनः रेडियो पर पड़ी और उसे लगा कि वह रेडियो उसे अपनी तरफ खींच रहा है । उसने देखा कि उसके ही बापू का दोस्त जो एक कबाड़ी का काम करते थे वह एक हाथ में रेडियो और दूसरे हाथ में कबाड़ की बड़ी सी थैली ले जा रहे थे । रेडियो देखते ही रामशरण की ऑंखें चमकन...

शिक्षा एक व्यवसाय

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प्रारंभिक काल से शिक्षा को एक ऐसा धरोहर माना गया है जिसे ना तो कोई चोरी ही कर सकता है और ना ही कोई लूट सकता है। किसी भी सभ्य समाज का आंकलन वहां के शिक्षा से आंकी जाती है। भारत प्रारंभिक काल से ही शैक्षणिक स्तर पर विश्व गुरु रहा है। भारत ने विश्व को बुद्ध ज्ञान से अवगत कराया । जब दुनिया पुरानी मान्यताओं को ही ज्ञान का आधार मानकर चल रही थी उस कालखंड में भी भारत ने वैज्ञानिक  स्तर पर जांचा - परखा ऐसा ज्ञान दिया जो आज के आधुनिक युग में प्रासंगिक है । इस ज्ञान के अखंड दीप को जलाए रखने में यहां के योग्य गुरुओं व शैक्षणिक संस्थानों  की  सबसे अहम भूमिका रही है ।  सर्वविदित है कि अखंड भारत को खंडित - खंडित कर विश्व विजेता बनने के सपने को पूरा करने के लिए जब सिकंदर ने भारत वर्ष के छोटे-छोटे राज्यों पर आक्रमण करना शुरू किया तब आचार्य चाणक्य जैसे गुरु ने  ज्ञान दान के साथ-साथ मातृभूमि की एकता व अखंडता को बचाए रखने के लिए एक गुमनाम बालक को गांव की गलियों से उठाकर उसे शिक्षा के बल पर ही पाटलिपुत्र के शासन तक पहुंचाया ।  एक गुरु अपने ज्ञान के बल पर हजारों शासक पैद...

साजिश

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सुजीत का आज बैंक जाना बहुत जरूरी है और  सुजीत की पत्नी रिचा को आधी रात से ही बुखार हो गया है । सुजीत इसी कशमकश में आधी रात के बाद से नहीं सोया कि वह कल का दिन कैसे मैनेज करेगा ?? कोई और दिन होता तो वह मैनेज कर लेता लेकिन कल तो उसकी इंवेस्टर्स के साथ बहुत ही जरूरी मीटिंग है । यही सब सोचते हुए सुबह के समय थोड़ी देर के उसकी ऑंख  लगी थी लेकिन एक घंटे में ही उसकी ऑंख खुल गई। वह रिचा के पास गया और उसके माथे को छुआ । बुखार अभी भी था। वह क्या करें उसकी समझ में नहीं आ रहा था ?? सात बज चुके थे और नौ बजे तक उसे बैंक पहुॅंचना था । उसके यहाॅं काम करने वाली बाई को भी रिचा के बारे में पता नहीं होगा यह सोचते हुए जब वह किचन में अपने लिए चाय बनाने पहुॅंचा तो घर में काम करने वाली बाई जिसका नाम जया था को देखकर चौंक गया ।  सुजीत ने जया से पूछा कि तुम यहाॅं कैसे और घर के अंदर कैसे आई हो ??  जया ( सुजीत की बाई ) ने थोड़ा ठिठकते हुए सुजीत से कहा कि सर ! आपलोग सो रहे होंगे और रिचा मैडम को बुखार है और आपको बैंक जाना होगा  इसलिए मैं आज जल्दी आ गई और मैडम ने मेन गेट की एक चाबी...

अखाड़ा

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विजय थक -हार कर ऑफिस से घर आता और जब उसके कानों में अपने दोनों बच्चों के लड़ने की आवाज सुनाई देती तब वह अंदर से टूट जाता। सोचने लगता कि "ऐसी परवरिश तो मैंने इन दोनों को  दी नहीं जिसके कारण यें  दोनों हमेशा ही घर को लड़ाई - झगड़े का अखाड़ा बना कर रख देते हैं। ऑफिस से निकलकर घर आते समय दिमाग में यही बातें चलती रहती है कि घर पहुंच कर बच्चों की तू - तू , मैं - मैं ना मुझे सुननी पड़े।" विजय के दोनों बच्चे, बड़ी बेटी रिया और बेटा रियांश की उम्र में सिर्फ दो साल का फासला होने की वजह से ही उनके बीच लड़ाई - झगड़े होते हैं, ऐसी बातें वह अपने नाते - रिश्तेदारों के साथ- साथ सहकर्मियों के मुंह से भी हजारों बार सुन चुका है । पहले तो उसे भी यही लगता था कि उनके बीच उम्र का ज्यादा फैसला ना होने की वजह से ही ऐसा होता है लेकिन जब रोज - रोज यें  बातें उसे सुनने को मिलती तब वह सोचने लगता कि कहीं कमी हमारी परवरिश में तो नहीं है लेकिन  मैं तो अपनी पत्नी और बच्चों को जोर से भी नहीं डांटता यह सोच कर कि बच्चे जो देखते हैं वही सीखते हैं। फिर क्या वजह है कि इन दोनों के बीच बनती ही नहीं?...

निशिडाक

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पटरियों पर सरपट भागती रेलगाड़ी , सायं - सायं चलती हवा , बेतरतीब गुजरते खेत - खलिहान और खिड़की के पास बैठी मिष्ठी पुराने दिनों की यादों को याद करती हुई मुस्कुराएं जा रही थी । सामने वाली सीट पर बैठे लड़के को अपनी तरफ मुस्कुराते हुए  देखकर वह भी मुस्कुरा देती है ।  मिष्ठी को मुस्कुराते हुए देखकर उस लड़के में मिष्ठी से बात करने की हिम्मत आती है और वह कहता है कि लगता है आपने कुछ पुरानी यादों को अपने पिटारे से बहुत दिनों के बाद निकाला है तभी तों आपके चेहरे पर यह खुबसूरत मुस्कान फैल रही है ।  मिष्ठी को उस लड़के की बातें  और   पहनावा देखकर लगता है कि वह  लड़का शरीफ है । वह उस लड़के की तरफ देखते हुए कहती है कि आपने सही कहा ।  इस दौड़ - धूप वाली जिंदगी में वक्त ही कहाॅं मिलता है कि हम बीती बातों को याद कर सकें और मुम्बई जैसे शहर में तो यह लगभग असंभव ही है ।  आप मुम्बई में रहती है ??  उस  लड़के ने मिष्ठी से पूछा ।  हाॅं मिष्ठी ने मुस्कराते हुए कहा ।  मैं भी वहीं रहता हूॅं और एक कंपनी में जॉब करता हूॅं और पाॅंच सालों के बाद वर...

संयुक्त परिवार बनाम एकल परिवार

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"देख रही हो रति ! हमारा कृष कैसे यहां आकर सबसे घुल - मिल गया है । लगता ही नहीं है कि यह यहां नहीं रहता । हर समय दादी - दादा, चाचा - चाची और भैया की ही रट  लगाएं घूमता रहता है । हम दोनों को तो भूल ही गया है ।"  पति विवेक के मुंह से अपने बेटे कृष  के लिए ऐसी बातें सुनकर  कुछ पल के लिए  रति यह सोचने लगी कि कृष की आंखों में ऐसी खुशी तो मैंने आज तक नहीं देखी जैसे पिछले दो  दिनों से देखती आ रही हूॅं । पाॅंच वर्षीय  कृष लगभग एक वर्ष बाद अपने दादाजी के घर पर आया था । उसके पिता बंगलौर में इंजीनियर थे और वह भी वहीं पर अपनी माॅं और पापा के साथ पिछले चार सालों से रह रहा था । साल में एक - दो बार ही बंगलौर से उसके पापा उसे साथ लेकर दादा द्वारा पटना शहर में बनाएं घर में लाते थे । वहां पर उसके दादा-  दादी, दो चाचा - चाची और उनके बच्चे एक साथ संयुक्त परिवार में रहते थे ।  दादाजी के घर आकर कृष को जैसे पंख लग जाते थे । दिन भर घर में धमाचौकड़ी मचाता, दादाजी के साथ घूमने निकल पड़ता और तो और दादी से कहानियां भी सुनता साथ ही दादी को  लोकगीत सुनाने के ल...

शिवरात्रि की रात

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"आज फाल्गुन मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि है मांजी । इस दिन भगवान शिव के साथ - साथ शिव परिवार  अर्थात माता पार्वती और उनके पुत्र भगवान गणेश एवं कार्तिकेय जी  की भी पूजा की जाती है । भगवान शिव के प्रिय गण नंदी की भी आज पूजा की जाती है । मैं....ने .... पूजा इससे आगे कुछ और बोल पाती उससे पहले ही उसकी सास ने उसे रोकते हुए बीच में ही बोलना शुरू किया और उसकी तरफ गुस्से में देखते हुए कहा :- " देखो बहू ! तुम तो जानती ही हो कि तुम्हारा पति ईश्वर को नहीं मानता है । याद है तुम्हें ?  शादी करके जब तुम आई थी, पहले दिन ही जब उसने तुम्हें अपने साथ लाए हुए देवी मां की तस्वीर की पूजा करते हुए देखा था तो उसने तुम्हें क्या - क्या नहीं सुनाया था ? याद तो होगा ही तुम्हें इसीलिए मैं नहीं चाहती  कि आज शिवरात्रि के दिन घर में कलह हो । जब तक मेरे पति जिंदा थे तब तक वह मेरा समर्थन करते थे इसलिए मैं अपने बेटे के विरोध के वावजूद भी  शिवरात्रि का व्रत कर  लेती थी लेकिन जब से वह मुझे छोड़ कर गए हैं, मेरे बेटे ने मुझे कोई  भी व्रत  करने नहीं दिया । पहले मुझे भी बहुत...

औरत तेरे कई रूप

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औरत    तेरे     कई       रूप  किस  किस  का  बखान करूं  मैं  तों   हूॅं  अदना   सा   व्यक्ति  किस तरह तुम्हारा गुणगान करूं ?  चोट   देखकर   कोई   पूछे     तो  बाथरूम   में     फिसल    गई  थी  पति के किए कर्म  पर  परदा डाल  मेरी ही गलती थी यह कह गई थी ।  ताने  सुन सुनकर भी वह  औरत  काम  कर  रही है  मां - बाप ने कुछ भी नहीं  सिखाया रोज ही सुन रही है ।  कसम   खाकर   कहती    हूॅं     मां - बाप  भाई - बहन     और       आपके     सिवा  किसी     को    भी      नहीं     चाहा     है  यकीन   नहीं   तो   मालूम  ...

पुनर्विवाह ऐसा भी

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"मां ! मैंने पहले भी कहा था और अभी भी कहती हूॅं  कि हर औरत के नसीब  में पति का सुख हो ऐसा होता  नहीं है । मेरी तो किस्मत में ही सुख लिखना ईश्वर भूल गए है । आज हम सभी इक्कीसवीं सदी  में रह रहे  हैं और समय के साथ-साथ लोगों की सोच भी बदली है । इसका जीता -  जागता उदाहरण तो आप दोनों माएं है । आप दोनों ही पुरानी विचारधाराओं में पली-बढ़ी  थी  और यहां तक कि उसे मानने वाली भी थी । सदियों से चली आ रही परंपराओं में बदलाव आप लोगों को मंजूर नहीं था लेकिन फिर भी इन सब के ऊपर आपने मेरी खुशी रखी । अपने बेटे को खोने के बाद मुझे तो यही लग रहा था कि मेरी सासू मां मुझे अपशगुनी  मानकर उनकी मृत्यु का दोष मेरे ही माथे पर मढ़  देंगी  लेकिन मेरी सोच के विपरीत ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । शादी के छः महीने बाद ही मैंने अपने उस पति को हमेशा के लिए खो दिया जो मुझ पर अपनी  जान छिड़कता  था ।"  आंखों में आंसू लिए विशाखा ने कहा ।  "बेटी ! तुम्हारे गुनाहगार हम दोनों ही हैं लेकिन मेरा यकीन करो तुम हम दोनों में से किसी पर बोझ नहीं थी बल्कि हम तो त...

मेरा गांव मेरी जन्म धरती

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नौकरी की खातिर दर - दर भटकते हुए अपने जीवन के अनमोल पलों को बच्चों के लिए कमाने और कुछ पैसे बचत करने के लिए काट दिए । होली दीपावली और बच्चों की गर्मियों की छुट्टियों में ही तो हमारा जाना होता था । दोस्तों .. रिश्तेदारों और यारों के तानें हमने जिंदगी के इतने वर्षों में कितनी बार ही सुने हैं । उनके द्वारा बोले जा रहे तानों पर उनका हक था यह भी मैं जानता हूॅं । यह फौज की नौकरी होती ही ऐसी है । दुश्मनों से हमारी लड़ाई की बात तो सभी जानते हैं लेकिन  हमें अपनी स्वयं की  छुट्टियों के लिए भी विभाग से  लड़ाई करनी पड़ती है यें बहुत कम ही लोगों को मालूम हैं तभी तो हमारी मजबूरियों को  हमारे स्वयं के नाते -  रिश्तेदार ..  दोस्त -  यार तक नहीं मानते हैं । क्या हमें अच्छा लगता है हमारे घर के ही बेटे या बेटी की शादी हो और हम उसमें शामिल ना हो पाए क्या इससे बड़ा दुख और कोई हो सकता है  भला ? मन को चोट कर रह जाता है लेकिन फिर भी हमें अपना फर्ज निभाना पड़ता है । वह फर्ज जिसके लिए हम अपने पूरे परिवार ... समाज और राज्य को छोड़कर इस धरती माॅं  की सेवा के लिए...

शहीद परिवार का दर्द

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एक शहीद जिसने अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए अपने ‌प्राण तक न्यौछावर कर दिए लेकिन दुश्मनों को पीठ नहीं दिखाई । हम सब भली- भांति समझ सकते हैं कि वह अपनी माॅं और मातृभूमि दोनों का ही कितना  वीर और जांबाज  पुत्र होगा। अपनी जन्म देने वाली माॅं , पढ़ा- लिखा कर इस लायक बनाने वाले पिता , भाई और बहनों के साथ खेलने वाला और जीवन भर साथ रहने वाली  जीवनसाथी  इन सब नाते - रिश्तों को प्राथमिकता ना देकर अपनी मातृभूमि  को ही पहली और आखिरी प्राथमिकता मानता है और समय आने पर मातृभूमि के लिए शहीद भी हो जाता है और उस वीर और जांबाज देशभक्त सैनिक की पत्नी कहलाती है" शहीद की पत्नी " । क्या हम सभी शहीद की पत्नी का दर्द अनुभव कर सकते हैं???  जी नहीं , कभी नहीं । हम उसे समझने की कोशिश भर कर सकते हैं लेकिन वास्तव में उसे अनुभव नहीं कर सकते। उसके दर्द को देखकर उसके साथ रो सकते हैं ,उससे  सांत्वना भरी बातें कर सकते हैं , उसे दिलासा दे सकते हैं लेकिन उस पर क्या बीती है, बीत रही है और आगे क्या बीतेगी इसका बस अनुमान लगा सकते हैं। एक सैनिक जब सरहद पर जंग लड़ने के लिए जा रहा...